भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 57
  • दत्तात्रेयजीके जन्म और प्रभावकी कथा * ५७

करने लगे। दुर्वासा अपने पिता-माताको छोड़कर उन्मत्त नामक उत्तम व्रतका आश्रय ले पृथ्वीपर विचरने लगे।

कुछ काल बीतनेके पश्चात् जब राजा कृतवीर्य स्वर्गको पधारे और मन्त्रियों, पुरोहितों तथा पुरवासियोंने राजकुमार अर्जुनको राज्याभिषेकके लिये बुलाया तब उसने कहा—'मन्त्रियो! जो भविष्यमें नरकको ले जानेवाला है, वह राज्य मैं नहीं ग्रहण करूँगा। जिसके लिये प्रजाजनोंसे कर लिया जाता है, उस उद्देश्यका पालन न किया जाय तो राज्य लेना व्यर्थ है। वैश्यलोग अपने व्यापारसे होनेवाली आयका बारहवाँ भाग राजाको इसलिये देते हैं कि वे मार्गमें लुटेरोंद्वारा लूटे न जायँ। राजकीय अर्थरक्षकोंके द्वारा सुरक्षित होकर वे वाणिज्यके लिये यात्रा कर सकें। ग्वाले घी और तक्र आदिका तथा किसान अनाजका छठा भाग राजाको इसी उद्देश्यसे अर्पण करते हैं। यदि राजा वैश्योंसे सम्पूर्ण आयका अधिकांश भाग ले ले तो वह चोरका काम करता है। इससे उसके इष्ट और पूर्त कर्मोंका नाश होता है।* यदि राजाको कर देकर भी प्रजाको दूसरी वृत्तियोंका आश्रय लेना पड़े, उसकी रक्षा राजाके अतिरिक्त किन्हीं अन्य व्यक्तियोंद्वारा हो तो उस अवस्थामें कर लेनेवाले राजाको निश्चय ही नरकमें जाना पड़ता है। प्रजाकी आयका जो छठा भाग है, उसे पूर्वकालके महर्षियोंने राजाके लिये प्रजाकी रक्षाका वेतन नियत किया है। यदि चोरोंसे वह प्रजाकी रक्षा न कर सका तो इसका पाप राजाको ही होता है; इसलिये यदि मैं तपस्या करके अपनी इच्छाके अनुसार योगीका पद प्राप्त कर लूँ तो मैं पृथ्वीके पालनकी शक्तिसे युक्त एकमात्र राजा हो सकता हूँ। ऐसी दशामें अपने उत्तरदायित्वका पूर्ण निर्वाह करनेके कारण मुझे पापका भागी नहीं होना पड़ेगा।'

उसके इस निश्चयको जानकर मन्त्रियोंके मध्यमें बैठे हुए परम बुद्धिमान् वयोवृद्ध मुनिश्रेष्ठ गर्गने कहा—'राजकुमार! यदि तुम राज्यका यथावत् पालन करनेके लिये ऐसा करना चाहते हो तो मेरी बात सुनो और वैसा ही करो। महाभाग दत्तात्रेय मुनि सह्यपर्वतकी गुफामें रहते हैं। तुम उन्हींकी आराधना करो। वे तीनों लोकोंकी रक्षा करते हैं। दत्तात्रेयजी योगयुक्त, परम सौभाग्यशाली, सर्वत्र समदर्शी तथा विश्वपालक भगवान् विष्णुके अंशरूपसे इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए हैं। उन्हींकी आराधना करके इन्द्रने दुरात्मा दैत्योंद्वारा छीने हुए अपने पदको प्राप्त किया तथा दैत्योंको मार भगाया।'

**अर्जुनने पूछा—**महर्षे! देवताओंने परम प्रतापी दत्तात्रेयजीकी आराधना किस प्रकार की थी? तथा दैत्योंद्वारा छीने हुए इन्द्रपदको देवराजने कैसे प्राप्त किया था?

**गर्गने कहा—**पूर्वकालमें देवताओं और दैत्योंमें बड़ा भयङ्कर युद्ध हुआ था। उस युद्धमें दैत्योंका नायक जम्भ था और देवताओंके स्वामी इन्द्र। उन्हें युद्ध करते एक दिव्य वर्ष व्यतीत हो गया। उसके बाद देवता हार गये और दैत्य विजयी हुए। विप्रचित्ति आदि दानवोंने जब देवताओंको परास्त कर दिया, तब वे युद्धसे भागने लगे, अब उनमें शत्रुओंको जीतनेका उत्साह न रह गया। फिर वे दैत्यसेनाके वधकी इच्छासे बृहस्पतिजीके पास आये और उनके तथा वालखिल्य आदि महर्षियोंके साथ बैठकर मन्त्रणा करने लगे।

**बृहस्पतिजीने कहा—**देवताओ! तुम अत्रिके तपस्वी पुत्र महात्मा दत्तात्रेयके पास जाओ और उन्हें भक्तिपूर्वक सन्तुष्ट करो। उनमें वर देनेकी शक्ति है। वे तुम्हें दैत्योंका नाश करनेके लिये वर


* पण्यानां द्वादशं भागं भूपालस्य वणिग्जनः॥
दत्त्वार्थरक्षिभिर्मार्गे रक्षितो याति दस्युतः। गोपाश्च घृततक्रादेः षड्भागं च कृषीवलाः॥
दत्त्वान्यद् भूभुजे दद्युर्यदि भागं ततोऽधिकम्। गव्यादीनामशेषेण वर्णिजो गृह्यतस्ततः॥
इष्टापूर्तविनाशाय तद्राज्ञश्चौरधर्मिणः। (१८। ३-५ १/२)
[539] सं० मा० पु०-३