संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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देंगे। तत्पश्चात् तुम सब लोग मिलकर दैत्यों और दानवोंका वध कर सकोगे।
गर्गने कहा— उनके ऐसा कहनेपर देवगण दत्तात्रेयके आश्रमपर गये और वहाँ लक्ष्मीजीके साथ उन महात्माका दर्शन किया। सबसे पहले उन्होंने अपना कार्यसाधन करनेके लिये उन्हें प्रणाम किया, फिर स्तवन किया। भक्ष्य-भोज्य और माला आदि वस्तुएँ भेंट कीं। इस प्रकार वे आराधनामें लग गये। जब दत्तात्रेयजी चलते तो देवता भी उनके पीछे-पीछे जाते। जब वे खड़े होते तो देवता भी ठहर जाते और जब वे ऊँचे आसनपर बैठते तो देवता नीचे खड़े रहकर उनकी उपासना करते। एक दिन पैरोंपर पड़े हुए देवताओंसे दत्तात्रेयजीने पूछा—'तुमलोग क्या चाहते हो, जो मेरी इस प्रकार सेवा करते हो?'
देवता बोले— मुनिश्रेष्ठ! जम्भ आदि दानवोंने त्रिलोकीपर आक्रमण करके भूलोक, भुवर्लोक आदिपर अधिकार जमा लिया है और सम्पूर्ण यज्ञभाग भी हर लिये हैं; अतः आप हमारी रक्षाके लिये उनके वधका विचार कीजिये। आपकी कृपासे हम पुनः स्वर्गलोक प्राप्त करना चाहते हैं। जगन्नाथ! आप निष्पाप एवं निर्लेप हैं। विद्याके प्रभावसे शुद्ध हुए आपके अन्तःकरणमें ज्ञानकी किरणें फैल रही हैं।
दत्तात्रेयजीने कहा— देवताओ! यह सत्य है कि मेरे पास विद्या है और मैं समदर्शी भी हूँ; तथापि इस नारीके सङ्गसे मैं दूषित हो रहा हूँ; क्योंकि स्त्रीका निरन्तर सहयोग दोषका ही कारण होता है।
उनके ऐसा कहनेपर देवता फिर बोले—द्विजश्रेष्ठ! ये साक्षात् जगन्माता लक्ष्मी हैं। इनमें पापका लेश भी नहीं है; अतः ये कभी दूषित नहीं होतीं। जैसे सूर्यकी किरणें ब्राह्मण और चाण्डाल दोनोंपर पड़ती हैं; किन्तु अपवित्र नहीं होतीं।
देवताओंके ऐसा कहनेपर दत्तात्रेयजीने हँसकर कहा—यदि तुमलोगोंका ऐसा ही विचार है तो समस्त असुरोंको युद्धके लिये यहाँ मेरे सामने बुला लाओ, विलम्ब न करो। मेरे दृष्टिपातजनित अग्निसे उनके बल और तेज दोनों क्षीण हो जायेंगे और इस प्रकार वे सब-के-सब मेरी दृष्टिमें पड़कर नष्ट हो जायेंगे।
उनकी यह बात सुनकर देवताओंने महाबली दैत्योंको युद्धके लिये ललकारा तथा वे क्रोधमें भरकर देवताओंपर टूट पड़े। दैत्योंकी मार खाकर देवता भयसे व्याकुल हो गये और शरण पानेकी इच्छासे शीघ्र ही भागकर दत्तात्रेयजीके आश्रमपर गये। दैत्य भी देवताओंको कालके गालमें भेजनेके लिये उसी जगह जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने महाबली महात्मा दत्तात्रेयजीको देखा। उनके वामभागमें चन्द्रमुखी लक्ष्मीजी विराजमान थीं, जो उनकी प्रिय पत्नी एवं सम्पूर्ण जगत्के लोगोंका कल्याण करनेवाली हैं। ये सर्वाङ्गसुन्दरी लक्ष्मी स्त्रीसमुचित सम्पूर्ण उत्तम गुणोंसे विभूषित थीं और मीठी वाणीमें भगवान्से वार्तालाप कर रही थीं। उन्हें सामने देखकर दैत्योंके मनमें उन्हें प्राप्त