भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 59
  • दत्तात्रेयजीके जन्म और प्रभावकी कथा * ५९

करनेकी इच्छा हो गयी। वे अपने बढ़ते हुए कामके वेगको न रोक सके। अब तो उन्होंने देवताओंका पीछा छोड़ दिया और लक्ष्मीजीको हर लेनेका विचार किया। उस पापसे मोहित हो जानेके कारण उनकी सारी शक्ति क्षीण हो गयी। वे आसक्त होकर आपसमें कहने लगे—'यह स्त्री त्रिभुवनका सारभूत रत्न है। यदि यह हमारी हो जाय तो हमलोग कृतार्थ हो जायँ; इसलिये हम सब लोग मिलकर इसे पालकीपर बिठा लें और अपने घरको ले चलें।' यह विचार निश्चित हो गया।

आपसमें ऐसी बात करके वे कामपीड़ित दैत्य आसक्तिपूर्वक वहाँ गये और लक्ष्मीजीको पालकीमें बिठाकर उसे मस्तकपर ले अपने स्थानकी ओर चल दिये। तब दत्तात्रेयजीने हँसकर देवताओंसे कहा—'सौभाग्यसे लक्ष्मी दैत्योंके सिरपर चढ़ गयीं। अब तुमलोग बढ़ो। हथियार उठाकर इन दैत्योंका वध करो। अब इनसे डरनेकी आवश्यकता नहीं। मैंने इन्हें निस्तेज कर दिया है तथा परायी स्त्रीके स्पर्शसे इनका पुण्य जल गया है, जिससे ये शक्तिहीन हो चले हैं।'

तदनन्तर देवताओंने नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे दैत्योंको मारना आरम्भ किया। लक्ष्मी उनके सिरपर चढ़ी हुई थीं, इसलिये वे नष्ट हो गये। इसके बाद लक्ष्मीजी वहाँसे महामुनि दत्तात्रेयके पास आ गयीं। उस समय सम्पूर्ण देवता उनकी स्तुति करने लगे। दैत्योंके नाशसे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई थी। फिर परम बुद्धिमान् दत्तात्रेयजीको प्रणाम करके देवता स्वर्गमें चले गये और पहलेकी भाँति निश्चिन्त होकर रहने लगे। राजन्! यदि तुम भी इसी प्रकार अपनी इच्छाके अनुसार अनुपम ऐश्वर्य प्राप्त करना चाहते हो तो तुरंत ही उनकी आराधनामें लग जाओ।

गर्ग मुनिकी यह बात सुनकर राजा कार्तवीर्यने दत्तात्रेयजीके आश्रमपर जा उनका भक्तिपूर्वक पूजन किया। वह उनका पैर दबाता, उनके लिये माला, चन्दन, गन्ध, जल और फल आदि सामग्री प्रस्तुत करता; भोजनके साधन जुटाता और जूठन