भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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६० * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *


साफ करता था। इससे सन्तुष्ट होकर मुनिने कार्तवीर्यसे कहा—‘अरे भैया! तुम देखते हो, मेरे पास यह स्त्री बैठी हुई है। मैं इसके उपभोगसे निन्दाका पात्र हो रहा हूँ, अतः मेरी सेवा तुम्हें नहीं करनी चाहिये। मैं कुछ भी करनेमें असमर्थ हूँ। तुम अपने उपकारके लिये किसी शक्तिशाली पुरुषकी आराधना करो।’

उनके इस प्रकार कहनेपर कार्तवीर्य अर्जुनको गर्गजीकी बातका स्मरण हो आया। उसने दत्तात्रेयजीको प्रणाम करके कहा।

**अर्जुन बोला—**देव! आप अपनी मायाका आश्रय लेकर मुझे क्यों अपनी मायामें डाल रहे हैं? आप सर्वथा निष्पाप हैं। इसी प्रकार ये देवी भी सम्पूर्ण जगत्‌की जननी हैं।

अर्जुनके यों कहनेपर भगवान्‌ने सम्पूर्ण भूमण्डलको वशमें करनेवाले महाभाग कार्तवीर्यसे कहा—‘राजन्! तुमने मेरे गूढ़ रहस्यका कथन किया है, इसलिये मैं तुमपर बहुत सन्तुष्ट हूँ। तुम कोई वर माँगो।’

**कार्तवीर्यने कहा—**देव! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे ऐसी उत्तम ऐश्वर्यशक्ति प्रदान कीजिये, जिससे मैं प्रजाका पालन करूँ और अधर्मका भागी न बनूँ। मैं दूसरोंके मनकी बात जान लूँ और युद्धमें कोई मेरा सामना न कर सके। युद्ध करते समय मुझे एक हजार भुजाएँ प्राप्त हों; किन्तु वे इतनी हलकी हों, जिससे मेरे शरीरपर भार न पड़े। पर्वत, आकाश, जल, पृथ्वी और पातालमें मेरी अबाध गति हो। मेरा वध मेरी अपेक्षा श्रेष्ठ पुरुषके हाथसे हो। यदि कभी मैं कुमार्गमें प्रवृत्त होऊँ तो मुझे सन्मार्ग दिखानेवाला उपदेशक प्राप्त हो। मुझे श्रेष्ठ अतिथि प्राप्त हों और निरन्तर दान करते रहनेपर भी मेरा धन कभी क्षीण न हो। मेरे स्मरण करनेमात्रसे सम्पूर्ण राष्ट्रमें धनका अभाव दूर हो जाय तथा आपमें मेरी अनन्य भक्ति बनी रहे।

**दत्तात्रेयजी बोले—**तुमने जो-जो वरदान माँगे हैं, वे सब तुम्हें प्राप्त होंगे। तुम मेरे प्रसादसे चक्रवर्ती सम्राट् होओगे।

**सुमति कहते हैं—**तदनन्तर दत्तात्रेयजीको प्रणाम करके अर्जुन अपने घर गया और समस्त प्रजा एवं अमात्यवर्गके लोगोंको एकत्रित करके उसने राज्याभिषेक ग्रहण किया। उसके अभिषेकके लिये गन्धर्व, श्रेष्ठ अप्सराएँ, वसिष्ठ आदि महर्षि, मेरु आदि पर्वत, गङ्गा आदि नदियाँ और समुद्र, पाकर आदि वृक्ष, इन्द्र आदि देवता, वासुकि आदि नाग, गरुड़ आदि पक्षी तथा नगर एवं जनपदके निवासी भी आये थे। श्रीदत्तात्रेयजीकी कृपासे अभिषेककी सब सामग्री अपने-आप जुट गयी थी। फिर तो ब्रह्मा आदि देवताओंने होमके लिये अग्निको प्रज्वलित किया तथा साक्षात् नारायणस्वरूप श्रीदत्तात्रेयजी एवं अन्यान्य महर्षियोंने समुद्र और नदियोंके जलसे अर्जुनका राज्याभिषेक किया। राजसिंहासनपर आसीन होते ही हैहयनरेशने अधर्मके नाश और धर्मकी रक्षाके लिये घोषणा करायी। दत्तात्रेयजीसे उत्तम ऐश्वर्य-शक्ति पाकर वे

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