भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 61

• अलर्कोपाख्यानका आरम्भ—नागकुमारोंके द्वारा ऋतध्वजके पूर्ववृत्तान्तका वर्णन • ६१

बड़े शक्तिशाली हो गये थे। राजाकी घोषणा इस प्रकार थी—'आजसे मुझको छोड़कर जो कोई भी शस्त्र ग्रहण करेगा अथवा दूसरोंकी हिंसामें प्रवृत्त होगा, वह लुटेरा समझा जायगा और मेरे हाथसे उसका वध होगा।'

ऐसी आज्ञाके जारी होनेपर उस राज्यमें महापराक्रमी नरश्रेष्ठ राजा अर्जुनको छोड़कर दूसरा कोई मनुष्य शस्त्र धारण नहीं करता था। स्वयं राजा ही गौओं, पशुओं, खेतों एवं द्विजातियोंकी रक्षा करते थे। तपस्वियों तथा व्यापारियोंके समुदायकी रक्षा भी वे स्वयं ही करते थे। लुटेरे, सर्प, अग्नि तथा शस्त्र आदिसे भयभीत मनुष्योंका तथा अन्य प्रकारकी आपत्तियोंमें मग्न हुए मानवोंका वे स्मरण करनेमात्रसे तत्काल उद्धार कर देते थे। उनके राज्यमें धनका अभाव कभी नहीं होता था। उन्होंने अनेक ऐसे यज्ञ किये, जिनके पूर्ण होनेपर ब्राह्मणोंको प्रचुर दक्षिणाएँ दी जाती थीं। उन्होंने कठोर तपस्या की और संग्रामोंमें भी महान् पराक्रम दिखाया। उनकी समृद्धि और बढ़ा हुआ सम्मान देखकर अङ्गिरा मुनिने कहा—'अन्य राजालोग यज्ञ, दान, तपस्या अथवा संग्राममें पराक्रम दिखानेमें राजा कार्तवीर्यकी तुलना नहीं कर सकते। राजा अर्जुनने जिस दिन दत्तात्रेयजीसे समृद्धि प्राप्त की थी, उस दिनके आनेपर वह उनके लिये यज्ञ करता था और सारी प्रजा भी राजाको परम ऐश्वर्यकी प्राप्ति हुई देख उसी दिन एकाग्रचित्तसे दत्तात्रेयजीका यजन करती थी।'

इस प्रकार चराचरगुरु भगवान् विष्णुके स्वरूपभूत महात्मा दत्तात्रेयजीकी महिमाका वर्णन किया गया। शङ्ख, चक्र, गदा एवं शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले अनन्त एवं अप्रमेय भगवान् विष्णुके अनेक अवतार पुराणोंमें वर्णित हैं। जो मनुष्य उनके परम स्वरूपका चिन्तन करता है, वह सुखी होता है और संसारसे उसका शीघ्र ही उद्धार हो जाता है। वे आदि-अन्तरहित भगवान् विष्णु अधर्मके नाश और धर्मके प्रचारके लिये ही संसारकी रक्षा और पालन करते हैं। अब मैं इसी प्रकार पितृभक्त राजर्षि महात्मा अलर्कके जन्मका वृत्तान्त बतलाता हूँ; क्योंकि दत्तात्रेयजीने उन्हींको योगका उपदेश दिया था।


अलर्कोपाख्यानका आरम्भ—नागकुमारोंके द्वारा ऋतध्वजके पूर्ववृत्तान्तका वर्णन

सुमति कहते हैं—पिताजी! प्राचीन कालकी बात है, शत्रुजित् नामके एक महापराक्रमी राजा राज्य करते थे, जिनके यज्ञोंमें पर्याप्त सोमरस पान करनेके कारण देवराज इन्द्र बहुत सन्तुष्ट रहते थे। उनका पुत्र भी बुद्धि, पराक्रम और लावण्यमें क्रमशः बृहस्पति, इन्द्र और अश्विनीकुमारोंकी समानता करता था। वह राजकुमार प्रतिदिन अपने समान अवस्था, बुद्धि, बल, पराक्रम और चेष्टाओंवाले अन्य राजकुमारोंसे घिरा रहता था। कभी तो उनमें शास्त्रोंका विवेचन और उनके सिद्धान्तोंका निर्णय होता था; कभी काव्यचर्चा, संगीत-श्रवण और नाटक देखने आदिमें समय व्यतीत होता था। राजकुमार जब खेलमें लगते, उस समय उन्हींकी अवस्थावाले बहुत-से ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंके बालक भी प्रेमवश वहाँ खेलने आ जाते थे। कुछ समय बीतनेके पश्चात् अश्वतर नामक नागके दो पुत्र नागलोकसे पृथ्वीतलपर घूमनेके लिये आये। उन्होंने ब्राह्मणके रूपमें अपनेको छिपा रखा था। वे देखनेमें बड़े सुन्दर और तरुण थे। वहाँ जो राजकुमार तथा अन्यान्य द्विज-बालक खेलते थे, उनके साथ ही वे भी भाँति-भाँतिके विनोद