संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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करते हुए बड़े प्रेमसे रहते थे। वे राजकुमार, वे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंके पुत्र तथा वे दोनों नागराजके बालक साथ-ही-साथ स्नान, अङ्ग-सेवा, वस्त्र-धारण, चन्दनका अनुलेप और भोजन आदि कार्य करते-कराते थे। राजकुमारके प्रेमवश
नागराजके दोनों पुत्र प्रतिदिन बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ आते थे। उनके साथ भाँति-भाँतिके विनोद, हास्य और वार्तालाप आदि करनेसे राजकुमारको बड़ा सुख मिलता था। वे उन्हें साथ लिये बिना भोजन, स्नान, क्रीड़ा तथा शास्त्रचर्चा आदि कुछ भी नहीं करते थे। इसी प्रकार वे दोनों नागकुमार भी उनके बिना रसातलमें लंबी साँसें खींचते हुए रात बिताते और दिन निकलते ही उनके पास पहुँच जाते थे।
इस तरह बहुत समय बीत जानेके बाद एक दिन नागराज अश्वतरने अपने दोनों बालकोंसे पूछा—'पुत्रो! तुम दोनोंका मर्त्यलोकके प्रति इतना अधिक प्रेम किस कारण है? बहुत दिनोंसे दिनके समय तुमलोग पातालमें नहीं दिखायी देते, केवल रातमें ही मैं तुम्हें देख पाता हूँ।'
पुत्रोंने कहा—'पिताजी! मर्त्यलोकमें राजा शत्रुजित्के एक पुत्र हैं, जिनका नाम ऋतध्वज है। वे बड़े ही रूपवान्, सरल, शूरवीर, मानी तथा प्रिय वचन बोलनेवाले हैं। बिना पूछे ही वार्तालाप आरम्भ करनेवाले, वक्ता, विद्वान्, मित्रभाव रखनेवाले और समस्त गुणोंके भंडार हैं। वे राजकुमार माननीय पुरुषोंको सदा आदर देते हैं। बुद्धिमान् एवं लज्जाशील हैं। विनय ही उनका आभूषण है। उनके अर्पण किये हुए उत्तम-उत्तम उपचार, प्रेम और भाँति-भाँतिके भोगोंने हमारा मन हर लिया है। उनके बिना नागलोक या भूलोकमें कहीं भी हमें सुख नहीं मिलता। पिताजी! उनके वियोगसे पाताललोककी यह शीतल रजनी भी हमारे लिये सन्तापका कारण बनती है और उनका साथ होनेसे दिनके सूर्य भी हमें आह्लाद प्रदान करते हैं।
पिताने कहा—'पुत्रो! अपने पुण्यात्मा पिताका वह बालक धन्य है, जिसके गुणोंका वर्णन तुम-जैसे गुणवान् लोग परोक्षमें भी कर रहे हो। संसारमें कुछ लोग ऐसे हैं, जो शास्त्रोंके ज्ञाता तो हैं, किन्तु उनमें शीलका अभाव है। कुछ लोग शीलवान् तो हैं, किन्तु शास्त्रज्ञानसे रहित हैं। जिस पुरुषमें शास्त्रोंका ज्ञान और उत्तम शील दोनों गुण समानरूपसे हों, मैं उसीको विशेष धन्यवादका पात्र समझता हूँ। जिसके मित्रोचित गुणोंका मित्रलोग और पराक्रमका शत्रुलोग भी सत्पुरुषोंके बीचमें वर्णन करते हों, उसी पुत्रसे पिता वास्तवमें पुत्रवान् होता है। ऋतध्वज तुमलोगोंके उपकारी मित्र हैं। क्या तुमलोगोंने भी उनके चित्तको प्रसन्न करनेके लिये कभी उनका कोई मनोरथ सिद्ध किया है? जिसके यहाँसे याचक कभी विमुख नहीं जाते और मित्रका कार्य कभी सिद्ध हुए बिना नहीं रहता, वही पुरुष धन्य है! उसीका जीवन और जन्म धन्य है! मेरे घरमें जो सुवर्ण आदि रत्न, वाहन, आसन तथा और कोई वस्तु उनके लिये रुचिकर हो, वह सब तुमलोग