संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अलर्कोपाख्यानका आरम्भ—नागकुमारोंके द्वारा ऋतध्वजके पूर्ववृत्तान्तका वर्णन * ६३
निःशङ्क होकर उन्हें दे सकते हो। जो सुहृदोंका उपकार करते, शत्रुओंको हानि पहुँचाते तथा मेघके समान सर्वत्र दानकी वर्षा करते हैं, विद्वान्लोग उनकी सदा ही उन्नति चाहते हैं।
पुत्र बोले— पिताजी! वे तो कृतकृत्य हैं, उनका कोई क्या उपकार कर सकता है? उनके घरपर आये हुए सभी याचक सदा ही पूजित होते हैं, उनकी सभी कामनाएँ पूर्ण की जाती हैं। उनके घरमें जो रत्न हैं, वे हमारे पातालमें कहाँ हैं। वैसे वाहन, आसन, यान, भूषण और वस्त्र यहाँ कहाँ उपलब्ध हो सकते हैं। उनमें जो विज्ञान है, वह और किसमें नहीं है। पिताजी! वे बड़े-बड़े विद्वानोंके भी सब प्रकारके संदेहोंका भलीभाँति निवारण करते हैं। हाँ, एक कार्य उनका अवश्य है; किन्तु वह ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि सर्वसमर्थ परमेश्वरोंके सिवा हमलोगोंके लिये सर्वथा असाध्य है।
पिताने कहा— 'पुत्रो! असाध्य हो या साध्य, किन्तु मैं उस उत्तम कार्यको अवश्य सुनना चाहता हूँ; विद्वान् पुरुषोंके लिये कौन-सा कार्य असाध्य है। जो अपने मन, बुद्धि तथा इन्द्रियोंको संयममें रखकर उद्यममें लगे रहते हैं, उन मनुष्योंके लिये इस पातालमें या स्वर्गमें कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो अज्ञात, अगम्य अथवा अप्राप्य हो। चींटी धीरे-धीरे चलती है; तथापि यदि वह चलती रहे तो सहस्रों योजन दूर चली जा सकती है। इसके विपरीत गरुड़ तेज चलनेवाले होनेपर भी यदि आगे पैर न बढ़ावें तो एक पग भी नहीं जा सकते। उद्योगी मनुष्योंके लिये कुछ गम्य और अगम्य नहीं होता, उनके लिये सब एक-सा है। कहाँ यह भूमण्डल और कहाँ ध्रुवका स्थान, जिसे पृथ्वीपर होते हुए भी राजा उत्तानपादके पुत्र ध्रुवने प्राप्त कर लिया! इसलिये पुत्रो! महाभाग राजकुमारको जिस वस्तुकी आवश्यकता हो, बतलाओ, जिसे देकर तुम दोनों मित्र-ऋणसे उऋण हो सको।*
पुत्रोंने कहा— पिताजी! महात्मा ऋतध्वजने अपनी कुमारावस्थाकी एक घटना बतलायी थी, वह इस प्रकार है। राजा शत्रुजित्के पास पहले कभी एक श्रेष्ठ ब्राह्मण पधारे थे। उनका नाम था महर्षि गालव। वे बड़े बुद्धिमान् थे और एक श्रेष्ठ अश्व लेकर आये थे। उन्होंने राजासे कहा—'महाराज!
एक पापाचारी नीच दैत्य आकर मेरे आश्रमका विध्वंस किये देता है। वह सिंह, हाथी तथा अन्य वन-जन्तुओंका और छोटे-छोटे शरीरवाले दूसरे
* नाविज्ञातं न चागम्यं नाप्राप्यं दिवि चेह वा। उद्यतानां मनुष्याणां यतचित्तेन्द्रियात्मनाम्॥
योजनानां सहस्राणि व्रजन् याति पिपीलिका। अगच्छन् वैनतेयोऽपि पदमेकं न गच्छति॥
उद्यतानां मनुष्याणां नागम्यं न विद्यते।
क्व भूमण्डलं क्व च ध्रौव्यं स्थानं यत् प्राप्तवान् ध्रुवः। उत्तानपादनृपतेः पुत्रः सन् भुविगोचरः॥
तत् कथ्यतां महाभाग कार्यवान् येन पुत्रकौ। स भूपालसुतः साधुर्मित्रानृण्यं भवेत् तराम्॥
(अ० २०। ३७-४०)