संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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जीवोंका भी शरीर धारण करके अकारण आता है और समाधि एवं मौनव्रतके पालनमें लगे हुए मेरे सामने आकर ऐसे-ऐसे उपद्रव करता है, जिनसे मेरा चित्त चञ्चल हो जाता है। यद्यपि हमलोग उसे अपनी क्रोधाग्निसे भस्म कर डालनेकी शक्ति रखते हैं तथापि बड़े कष्टसे उपार्जित की हुई तपस्याका अपव्यय करना नहीं चाहते। राजन्! एक दिनकी बात है, मैं उस असुरको देखकर अत्यन्त खिन्न हो लंबी साँसें ले रहा था, इतनेमें ही यह घोड़ा आकाशसे नीचे उतरा। उसी समय यह आकाशवाणी हुई—'मुने! यह अश्व बिना थके समस्त भूमण्डलकी परिक्रमा कर सकता है। इसे सूर्यदेवने आपके लिये प्रदान किया है। आकाश-पाताल और जलमें भी इसकी गति नहीं रुकती। यह समस्त दिशाओंमें बेरोक-टोक जाता है। पर्वतोंपर चढ़नेमें भी इसे कठिनाई नहीं होती। समस्त भूमण्डलमें यह बिना थकावटके विचरण करेगा, इसलिये संसारमें इसका कुवलय (कु-भूमि, वलय-मण्डल) नाम प्रसिद्ध होगा। द्विजश्रेष्ठ! जो नीच दानव तुम्हें रात-दिन क्लेशमें डाले रहता है, उसका भी इसी अश्वपर आरूढ़ होकर राजा शत्रुजित्के पुत्र ऋतध्वज वध करेंगे। इस अश्वरत्नको पाकर इसीके नामपर राजकुमारकी प्रसिद्धि होगी। वे कुवलयाश्व कहलायेंगे।' 'राजन्! उस आकाशवाणीके अनुसार मैं तुम्हारे पास आया हूँ। तपस्यामें विघ्न डालनेवाले उस दानवको तुम रोको; क्योंकि राजा भी प्रजाकी तपस्याके अंशका भागी होता है। भूपाल! अब मैंने यह अश्वरत्न तुमको समर्पित कर दिया। तुम अपने पुत्रको मेरे साथ चलनेकी आज्ञा दो, जिससे धर्मका लोप न होने पाये।'
गालव मुनिके यों कहनेपर धर्मात्मा राजाने मङ्गलाचारपूर्वक राजकुमार ऋतध्वजको उस अश्वरत्नपर चढ़ाया और मुनिके साथ भेज दिया। गालव मुनि उन्हें साथ ले अपने आश्रमको लौट गये।
पातालकेतुका वध और मदालसाके साथ ऋतध्वजका विवाह
**पिताने पूछा—**पुत्रो! महर्षि गालवके साथ जाकर राजकुमार ऋतध्वजने वहाँ जो-जो कार्य किया, उसे बतलाओ। तुमलोगोंकी कथा बड़ी अद्भुत है।
**पुत्रोंने कहा—**महर्षि गालवके रमणीय आश्रममें रहकर राजकुमार ऋतध्वजने ब्रह्मवादी मुनियोंके सब विघ्नोंको शान्त कर दिया। वीर कुवलयाश्व गालवाश्रममें ही निवास करते हैं, इस बातको वह मदोन्मत्त नीच दानव नहीं जानता था। इसलिये सन्ध्योपासनमें लगे हुए गालव मुनिको सतानेके लिये वह शूकरका रूप धारण करके आया। उसे देखते ही मुनिके शिष्योंने हल्ला मचाया। फिर तो राजकुमार शीघ्र ही घोड़ेपर सवार हो धनुष लेकर उसके पीछे दौड़े। उन्होंने धनुषको खूब जोरसे खींचकर एक चमकते हुए अर्धचन्द्राकार बाणसे