भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 65
  • पातालकेतुका वध और मदालसाके साथ ऋतध्वजका विवाह * ६५

उसको चोट पहुँचायी। बाणसे आहत होकर वह अपने प्राण बचानेकी धुनमें भागा और वृक्षों तथा पर्वतसे घिरी हुई घनी झाड़ीमें घुस गया। वह घोड़ा भी मनके समान वेगसे चलनेवाला था। उसने बड़े वेगसे उस सूअरका पीछा किया। वाराहरूपधारी दानव तीव्र वेगसे भागता हुआ सहस्रों योजन दूर निकल गया और एक जगह पृथ्वीपर विवरके आकारमें दिखायी देनेवाले गड्ढेके भीतर बड़ी फुर्तीके साथ कूद पड़ा। इसके बाद शीघ्र ही अश्वारोही राजकुमार भी घोर अन्धकारसे भरे हुए उस भारी गड्ढेमें कूद पड़े। उसमें जानेपर राजकुमारको वह सूअर नहीं दिखायी पड़ा, बल्कि उन्हें प्रकाशसे पूर्ण पाताललोकका दर्शन हुआ। सामने ही इन्द्रपुरीके समान एक सुन्दर नगर था, जिसमें सैकड़ों सोनेके महल शोभा पा रहे थे। उस नगरके चारों ओर सुन्दर चहारदीवारी बनी हुई थी। राजकुमारने उसमें प्रवेश किया, किन्तु वहाँ उन्हें कोई मनुष्य नहीं दिखायी दिया। वे नगरमें घूमने लगे। घूमते-ही-घूमते उन्होंने एक स्त्रीको देखा, जो बड़ी उतावलीके साथ कहीं चली जा रही थी। राजकुमारने उससे पूछा—'तू किसकी कन्या है? किस कामसे जा रही है?' उस सुन्दरीने कुछ उत्तर नहीं दिया। वह चुपचाप एक महलकी सीढ़ियोंपर चढ़ गयी। ऋतध्वजने भी घोड़ेको एक जगह बाँध दिया और उसी स्त्रीके पीछे-पीछे महलमें प्रवेश किया। उस समय उनके नेत्र आश्चर्यसे चकित हो रहे थे। उनके मनमें किसी प्रकारकी शङ्का नहीं थी। महलमें पहुँचनेपर उन्होंने देखा, एक विशाल पलंग बिछा हुआ है, जो ऊपरसे नीचेतक सोनेका बना है। उसपर एक सुन्दरी कन्या बैठी थी, जो कामनायुक्त रति-सी जान पड़ती थी। चन्द्रमाके समान मुख, सुन्दर भौंहें, कुँदरूके समान लाल ओठ, छरहरा शरीर और नील कमलके समान उसके नेत्र थे। अनङ्गलताकी भाँति उस सर्वाङ्गसुन्दरी रमणीको देखकर राजकुमारने समझा, यह कोई रसातलकी देवी है।

उस सुन्दरी बालाने भी मस्तकपर काले घुँघराले बालोंसे सुशोभित, उभरी हुई छाती, स्थूल कंधों और विशाल भुजाओंवाले राजकुमारको देखकर साक्षात् कामदेव ही समझा। उनके आते ही वह सहसा उठकर खड़ी हो गयी; किन्तु उसका मन अपने वशमें न रहा। वह तुरंत ही लज्जा, आश्चर्य और दीनताके वशीभूत हो गयी। सोचने लगी—'ये कौन हैं? देवता, यक्ष, गन्धर्व, नाग अथवा विद्याधर तो नहीं आ गये? या ये कोई पुण्यात्मा मनुष्य हैं?' यों विचारकर उसने लंबी साँस ली और पृथ्वीपर बैठकर सहसा मूर्च्छित हो गयी। राजकुमारको भी कामदेवके बाणका आघात-सा लगा। फिर भी धैर्य धारण करके उन्होंने उस तरुणीको आश्वासन दिया और कहा—'डरनेकी आवश्यकता नहीं।' वह स्त्री, जिसे उन्होंने पहले महलमें जाते हुए देखा था, ताड़का पंखा लेकर व्यग्रतापूर्वक हवा करने लगी। राजकुमारने आश्वासन देकर जब उससे मूर्च्छाका कारण पूछा, तब वह बाला कुछ लज्जित हो गयी। उसने अपनी सखीको सब बातें बता दीं। फिर उस सखीने उसकी मूर्च्छाका सारा कारण, जो राजकुमारको देखनेसे ही हुई थी, विस्तारपूर्वक कह सुनाया।

वह स्त्री बोली—प्रभो! देवलोकमें विश्वावसु नामसे प्रसिद्ध एक गन्धर्वोंके राजा हैं। यह सुन्दरी उन्हींकी कन्या है। इसका नाम मदालसा है। वज्रकेतु दानवका एक भयङ्कर पुत्र है, जो शत्रुओंका नाश करनेवाला है। वह संसारमें पातालकेतुके नामसे प्रसिद्ध है, उसका निवासस्थान पातालके ही भीतर है। एक दिन यह मदालसा अपने पिताके उद्यानमें घूम रही थी। उसी समय उस दुरात्मा दानवने विकारमयी माया फैलाकर इस असहाय बालिकाको हर लिया। उस दिन मैं इसके साथ नहीं थी। सुना है, आगामी त्रयोदशीको