संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- पातालकेतुका वध और मदालसाके साथ ऋतध्वजका विवाह * ६७
ओर देखा; किन्तु कुछ बोल न सकी। उसकी सखीने फिर प्रसन्न होकर कहा—'वीर! आपकी बात सत्य है; इसमें सन्देहके लिये कोई स्थान नहीं है। मेरी सखीका हृदय और किसीको देखकर आसक्त नहीं हो सकता। अधिक कमनीय कान्ति चन्द्रमाको ही प्राप्त होती है; प्रचण्ड प्रभा सूर्यमें ही मिलती है। दैवी विभूति धन्य पुरुषको ही प्राप्त होती है। धृति धीरको और क्षमा उत्तम पुरुषको ही मिलती है। इसमें सन्देह नहीं कि आपने ही उस नीच दानवका वध किया है। भला, गोमाता सुरभि मिथ्या कैसे कहेंगी। मेरी यह सखी बड़ी भाग्यशालिनी है। आपका सम्बन्ध पाकर यह धन्य हो गयी। वीर! जिस कार्यको विधाताने ही रच रखा है, उसे अब तुम भी पूर्ण करो।'
कुण्डलाकी बात सुनकर राजकुमारने कहा—'मैं पिताके अधीन हूँ, उनकी आज्ञाके बिना इस गन्धर्व-राजकन्यासे किस प्रकार विवाह करूँ।' कुण्डला बोली—'नहीं-नहीं, ऐसा न कहिये। यह देवकन्या है। आपके पिताजी इस विवाहसे प्रसन्न होंगे; अतः इसके साथ अवश्य विवाह कीजिये।'
राजकुमारने 'तथास्तु' कहकर उसकी बात मान ली। तब कुण्डलाने विवाहकी सामग्री एकत्रित करके अपने कुलगुरु तुम्बुरुका स्मरण किया। वे समिधा और कुशा लिये तत्काल वहाँ आ पहुँचे। मदालसाके प्रेमसे और कुण्डलाका गौरव रखनेके लिये उन्होंने आनेमें विलम्ब नहीं किया। वे मन्त्रके ज्ञाता थे; अतः अग्नि प्रज्वलित करके उन्होंने हवन किया और मङ्गलाचारके अनन्तर कन्यादान करके वैवाहिक विधि सम्पन्न की। फिर वे तपस्याके लिये अपने आश्रमपर चले गये। तदनन्तर कुण्डलाने अपने सखीसे कहा—'सुमुखि! तुम-जैसी सुन्दरीको राजकुमार ऋतध्वजके साथ विवाहित देखकर मेरा मनोरथ पूर्ण हो गया। अब मैं निश्चिन्त होकर तपस्या करूँगी और तीर्थोंके जलसे अपने पापोंको धो डालूँगी, जिससे फिर मेरी ऐसी दशा न हो।' इसके बाद जानेके लिये उत्सुक हो कुण्डलाने बड़ी विनयके साथ राजकुमारसे भी वार्तालाप किया। इस समय अपनी सखीके प्रति स्नेहकी अधिकतासे उसकी वाणी गद्गद हो रही थी।
कुण्डला बोली—प्रभो! आपकी बुद्धि बहुत बड़ी है। आप-जैसे लोगोंको कोई पुरुष भी उपदेश नहीं दे सकता, फिर मुझ-जैसी स्त्रियाँ तो दे ही कैसे सकती हैं; किन्तु इस मदालसाके स्नेहसे मेरा चित्त आकृष्ट हो गया तथा आपने भी अपने प्रति मेरे हृदयमें एक विश्वास उत्पन्न कर दिया है, इसलिये मैं आपको कर्तव्यका स्मरणमात्र करा रही हूँ। पतिको चाहिये कि सदा अपनी पत्नीका भरण-पोषण करे। जब पति-पत्नी प्रेमवश एक-दूसरेके वशीभूत होते हैं, तब उन्हें धर्म, अर्थ, काम—तीनोंकी प्राप्ति होती है; क्योंकि त्रिवर्गकी प्राप्ति पति-पत्नी दोनोंके सहयोगपर ही निर्भर है। राजकुमार! स्त्रीकी सहायता लिये बिना पुरुष किसी देवता, पितर, भृत्य और अतिथियोंका पूजन नहीं कर सकता। मनुष्य जब पतिव्रता