भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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६८ * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *


पत्नीकी रक्षा करता है, तब वह पुत्रोत्पादनके द्वारा पितरोंको, अन्न आदिके द्वारा अतिथियोंको और पूजा-अर्चाके द्वारा देवताओंको प्रसन्न करता है। स्त्री भी पतिके बिना धर्म, अर्थ, काम एवं सन्तान नहीं पा सकती; इसलिये पति-पत्नी दोनोंके सहयोगपर ही त्रिवर्गका सुख निर्भर करता है। आप दोनों नवदम्पतिके लिये ये बातें मैंने निवेदन की हैं। अब मैं अपनी इच्छाके अनुसार जा रही हूँ।

यों कहकर कुण्डलाने अपनी सखीको गलेसे लगाया और राजकुमारको नमस्कार करके वह दिव्य गतिसे अपने अभीष्ट स्थानको चली गयी। ऋतध्वजने भी मदालसाको अपने घोड़ेपर बिठाया और पाताललोकसे निकल जानेकी तैयारी की। यह बात दानवोंको मालूम हो गयी। उन्होंने सहसा कोलाहल मचाना आरम्भ किया—'पातालकेतु जिस कन्यारत्नको स्वर्गसे हर लाया था, उसे यह राजकुमार चुराये जाता है।' यह समाचार पाते ही परिघ, खड्ग, गदा, शूल, बाण और धनुष आदि आयुधोंसे सजी हुई दानवोंकी विशाल सेना पातालकेतुके साथ वहाँ आ पहुँची। उस समय 'खड़ा रह, खड़ा रह' कहते हुए बड़े-बड़े दानवों ने राजकुमार ऋतध्वजपर बाणों और शूलोंकी वृष्टि आरम्भ कर दी। राजकुमार भी बड़े पराक्रमी थे। उन्होंने हँसते-हँसते बाणोंका जाल-सा फैला दिया और खेल-खेलमें ही दानवोंके सब अस्त्र-शस्त्र काट गिराये। क्षणभरमें ही पाताललोककी भूमि ऋतध्वजके बाणोंसे छिन्न-भिन्न हुए खड्ग, शक्ति, ऋष्टि और सायकोंसे आच्छादित हो गयी। तदनन्तर राजकुमारने त्वाष्ट्र नामक अस्त्रका सन्धान किया और उसे दानवोंपर छोड़ दिया। उसकी प्रचण्ड ज्वालासे पातालकेतुसहित समस्त दानव दग्ध हो गये। उनकी हड्डियाँ चटख-चटखकर राख हो गयीं। जैसे कपिलमुनिकी क्रोधाग्निमें सगरपुत्र भस्म हो गये थे, उसी प्रकार ऋतध्वजकी शराग्निमें सम्पूर्ण दानव जल मरे।

इस प्रकार बड़े-बड़े दानवोंका वध करके राजकुमार फिर अपने अश्वपर सवार हुए और उस स्त्रीरत्नके साथ अपने पिताके नगरमें आये। पिताके चरणोंमें प्रणाम करके उन्होंने पातालमें जाने, कुण्डलाके दर्शन होने, मदालसाको पाने और दानवोंसे युद्ध करने आदिका सब समाचार सुना दिया। यह सब सुनकर पिताको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने पुत्रको छातीसे लगाकर कहा—'बेटा! तुम सुपात्र और महात्मा हो। तुमने मुझे तार दिया; क्योंकि तुम्हारे द्वारा उत्तम धर्मका पालन करनेवाले मुनियोंकी भयसे रक्षा हुई है। मेरे पूर्वजोंने अपने कुलको यशसे विख्यात किया था। मैंने उस यशको फैलाया था और तुमने अनुपम पराक्रम करके उसे और भी बढ़ा दिया। पिताने जो यश, धन अथवा पराक्रम प्राप्त किया हो, उसे जो कम नहीं करता, वह पुत्र मध्यम श्रेणीका माना गया है; जो अपनी शक्तिसे पिताकी अपेक्षा भी अधिक पराक्रम दिखाये, उसे विद्वान् पुरुष श्रेष्ठ कहते हैं; किन्तु जो पिताद्वारा उपार्जित