भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 69
  • तालकेतुके कपटसे मरी हुई मदालसाकी नागराजके फणसे उत्पत्ति और ऋतध्वजका पाताललोकमें गमन ८६९

धन, वीर्य तथा यशको अपने समयमें घटा देता है, वह बुद्धिमान् पुरुषोंद्वारा अधम बताया गया है। मैंने जिस प्रकार ब्राह्मणोंकी रक्षा की थी, उसी प्रकार तुमने भी की है; परन्तु पाताललोककी यात्रा और वहाँ असुरोंका विनाश—वे सब कार्य तुमने अधिक किये हैं। अतः तुम्हारी गणना उत्तम पुरुषोंमें है। बेटा! तुम धन्य हो। तुम्हारे-जैसे अधिक गुणवान् पुत्रको पाकर मैं पुण्यवानोंके लिये भी स्पृहणीय हो रहा हूँ। जिसका पुत्र बुद्धि, दान और पराक्रममें उससे बढ़ नहीं जाता, वह मनुष्य मेरे मतमें पुत्रजनित आनन्दको नहीं प्राप्त करता। उस पुरुषको धिक्कार है, जो इस लोकमें पिताके नामपर ख्याति लाभ करता है। जो पिता अपने पुत्रके कार्यसे विख्यात होता है, उसीका जन्म सफल है। जो अपने नामसे प्रसिद्ध होता है, वह सबसे उत्तम है। जो पिता और पितामहोंके नामपर ख्यात होता है, वह मध्यम है तथा जो मातृपक्ष या माताके नामसे प्रसिद्धि प्राप्त करता है, वह अधम श्रेणीका मनुष्य है।* इसलिये पुत्र! तुम धन, पराक्रम और सुखके साथ अभ्युदयशील बनो। इस गन्धर्वकन्याका तुमसे कभी वियोग न हो।'

इस प्रकार बारंबार भाँति-भाँतिके प्रिय वचन कहकर पिताने ऋतध्वजको हृदयसे लगाया और मदालसाके साथ उन्हें राजमहलमें भेज दिया। राजकुमार ऋतध्वज अपनी पत्नीके साथ पिताके नगरमें तथा उद्यान, वन एवं पर्वत शिखरोंपर आनन्दपूर्वक विहार करते रहे। कल्याणी मदालसा प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर सास-ससुरके चरणोंमें प्रणाम करती और अपने पतिके साथ रहकर आनन्द भोगती थी।


तालकेतुके कपटसे मरी हुई मदालसाकी नागराजके फणसे उत्पत्ति और ऋतध्वजका पाताललोकमें गमन

दोनों नागकुमार कहते हैं—पिताजी! तदनन्तर बहुत समय व्यतीत होनेपर राजाने पुनः अपने पुत्रसे कहा—'बेटा! तुम प्रतिदिन प्रातःकाल इस अश्वपर सवार हो ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये पृथ्वीपर विचरते रहो। सैकड़ों दुराचारी दानव इस पृथ्वीपर मौजूद हैं। उनसे मुनियोंको बाधा न पहुँचे, ऐसी चेष्टा करो।' पिताकी इस आज्ञाके अनुसार राजकुमार उसी दिनसे ऐसा ही करने लगे। वे पूर्वाह्नमें ही सारी पृथ्वीकी परिक्रमा करके पिताके चरणोंमें मस्तक झुकाते थे। एक दिनकी बात है, वे घूमते हुए यमुना तटपर गये। वहाँ पातालकेतुका छोटा भाई तालकेतु आश्रम बनाकर रहता था। राजकुमारने उसे देखा, वह मायावी दानव मुनिका रूप धारण किये हुए था। उसने पहलेके वैरका स्मरण करके उनसे कहा—'राजकुमार! मैं तुमसे एक बात कहता हूँ; यदि तुम्हारी इच्छा हो तो उसे करो। तुम सत्यप्रतिज्ञ हो, अतः तुम्हें मेरी प्रार्थना भङ्ग नहीं करनी चाहिये। मैं धर्मके लिये यज्ञ करूँगा और उसमें अनेक इष्टियाँ करनी होंगी। इन सबके लिये इष्टका-चयन करना भी आवश्यक है; किन्तु मेरे पास दक्षिणा नहीं है। अतः वीर! तुम सुवर्णके लिये मुझे अपने गलेका यह आभूषण दे दो और मेरे इस आश्रमकी रक्षा करो। तबतक मैं जलके भीतर प्रवेश करके प्रजाकी पुष्टिके लिये वरुण देवता सम्बन्धी वैदिक मन्त्रोंसे वरुण देवताकी स्तुति करता हूँ। स्तुतिके पश्चात् जल्दी ही लौटूँगा।' उसके यों कहनेपर राजकुमारने उसे प्रणाम किया और अपने कण्ठका आभूषण उतारकर दे दिया।


^* ^आत्मना ^ख्यातोऽयं ^मध्यः ^पितुर्नाम्नैः ^मातृपक्षेण ^मात्रा ^च ^ख्यातिर्वेत्ति ^नराधमः ॥ ^(२१। १०२)^