भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 70

७० * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *


फिर इस प्रकार कहा—'आप निश्चिन्त होकर जाइये; जबतक लौट नहीं आयेंगे, तबतक यहाँ मैं आपके आश्रमके समीप ठहरूँगा।'

राजकुमारके इस प्रकार कहनेपर तालकेतु नदीके जलमें डुबकी लगाकर अदृश्य हो गया और वे उसके मायानिर्मित आश्रमकी रक्षा करने लगे। जलके भीतरसे वह राजकुमारके नगरमें चला गया और मदालसा तथा अन्य लोगोंके समक्ष पहुँचकर इस प्रकार बोला।

तालकेतुने कहा—वीर कुवलयाश्व मेरे आश्रमके समीप गये थे और तपस्वियोंकी रक्षा करते हुए किसी दुष्ट दैत्यसे युद्ध कर रहे थे। उन्होंने अपनी शक्तिभर युद्ध किया और बहुत-से ब्राह्मणद्वेषी दैत्योंको मौतके घाट उतारा; फिर उस पापी दैत्यने मायाका सहारा लेकर शूलसे उनकी छाती छेद डाली। मरते समय उन्होंने अपने गलेका यह आभूषण मुझे दिया; फिर तपस्वियोंने मिलकर उनका अग्निसंस्कार कर दिया। उनका अश्व भयभीत हो नेत्रोंसे आँसू बहाता हुआ हिनहिनाता रहा। उसी अवस्थामें वह दुरात्मा दानव उसे अपने साथ पकड़ ले गया। मुझ पापाचारी निष्ठुरने यह सब कुछ अपनी आँखों देखा है। इसके बाद जो कुछ कर्तव्य हो, वह आपलोग करें। अपने हृदयको आश्वासन देनेके लिये यह गलेका हार ग्रहण कीजिये।

यों कहकर तालकेतुने वह हार पृथ्वीपर छोड़ दिया और जैसे आया था, वैसे ही चला गया। यह दुःखपूर्ण समाचार सुनकर वहाँके लोग शोकसे व्याकुल हो मूर्च्छित हो गये; फिर थोड़ी देरमें होशमें आनेपर रनिवासकी सभी स्त्रियाँ, राजा तथा महारानी भी अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगीं। मदालसाने उनके गलेके आभूषणको देखा और पतिको मारा गया सुनकर तुरंत ही अपने प्यारे प्राणोंको त्याग दिया।* तदनन्तर पुरवासियों तथा महाराजके महलमें भी बड़े जोरसे करुण-क्रन्दन होने लगा। राजा शत्रुजित्ने जब मदालसाको पतिके बिना मृत्युको प्राप्त हुई देखा, तब कुछ विचार करके मनको स्थिर किया और वहाँ शोक करते हुए सब लोगोंसे कहा—'प्रजाजनो और देवियो! मैं तुम्हारे और अपने लिये रोनेका कोई कारण नहीं देखता। सभी प्रकारके सम्बन्ध अनित्य होते हैं। इस बातका भलीभाँति विचार करनेपर क्या पुत्रके लिये शोक करूँ और क्या पुत्रवधूके लिये। सोचनेसे ऐसा जान पड़ता है, ये दोनों कृतकृत्य होनेके कारण शोकके योग्य नहीं हैं। जो सदा मेरी सेवामें लगा रहता था और मेरे ही कहनेसे ब्राह्मणोंकी रक्षामें तत्पर हो मृत्युको प्राप्त हुआ, वह मेरा पुत्र बुद्धिमान् पुरुषोंके लिये शोकका विषय कैसे हो सकता है। जो अवश्य जानेवाला है, उस शरीरको यदि मेरे पुत्रने ब्राह्मणोंकी रक्षामें लगा दिया तो यह तो महान् अभ्युदयका


* मदालसा तु तद् दृष्ट्वा तदीयं कण्ठभूषणम्। तत्यागाशु प्रियान् प्राणान् श्रुत्वा च निहतं पतिम् ॥
(अ० २२ । २५)