भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

७० * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *


फिर इस प्रकार कहा—'आप निश्चिन्त होकर जाइये; जबतक लौट नहीं आयेंगे, तबतक यहाँ मैं आपके आश्रमके समीप ठहरूँगा।'

राजकुमारके इस प्रकार कहनेपर तालकेतु नदीके जलमें डुबकी लगाकर अदृश्य हो गया और वे उसके मायानिर्मित आश्रमकी रक्षा करने लगे। जलके भीतरसे वह राजकुमारके नगरमें चला गया और मदालसा तथा अन्य लोगोंके समक्ष पहुँचकर इस प्रकार बोला।

तालकेतुने कहा—वीर कुवलयाश्व मेरे आश्रमके समीप गये थे और तपस्वियोंकी रक्षा करते हुए किसी दुष्ट दैत्यसे युद्ध कर रहे थे। उन्होंने अपनी शक्तिभर युद्ध किया और बहुत-से ब्राह्मणद्वेषी दैत्योंको मौतके घाट उतारा; फिर उस पापी दैत्यने मायाका सहारा लेकर शूलसे उनकी छाती छेद डाली। मरते समय उन्होंने अपने गलेका यह आभूषण मुझे दिया; फिर तपस्वियोंने मिलकर उनका अग्निसंस्कार कर दिया। उनका अश्व भयभीत हो नेत्रोंसे आँसू बहाता हुआ हिनहिनाता रहा। उसी अवस्थामें वह दुरात्मा दानव उसे अपने साथ पकड़ ले गया। मुझ पापाचारी निष्ठुरने यह सब कुछ अपनी आँखों देखा है। इसके बाद जो कुछ कर्तव्य हो, वह आपलोग करें। अपने हृदयको आश्वासन देनेके लिये यह गलेका हार ग्रहण कीजिये।

यों कहकर तालकेतुने वह हार पृथ्वीपर छोड़ दिया और जैसे आया था, वैसे ही चला गया। यह दुःखपूर्ण समाचार सुनकर वहाँके लोग शोकसे व्याकुल हो मूर्च्छित हो गये; फिर थोड़ी देरमें होशमें आनेपर रनिवासकी सभी स्त्रियाँ, राजा तथा महारानी भी अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगीं। मदालसाने उनके गलेके आभूषणको देखा और पतिको मारा गया सुनकर तुरंत ही अपने प्यारे प्राणोंको त्याग दिया।* तदनन्तर पुरवासियों तथा महाराजके महलमें भी बड़े जोरसे करुण-क्रन्दन होने लगा। राजा शत्रुजित्ने जब मदालसाको पतिके बिना मृत्युको प्राप्त हुई देखा, तब कुछ विचार करके मनको स्थिर किया और वहाँ शोक करते हुए सब लोगोंसे कहा—'प्रजाजनो और देवियो! मैं तुम्हारे और अपने लिये रोनेका कोई कारण नहीं देखता। सभी प्रकारके सम्बन्ध अनित्य होते हैं। इस बातका भलीभाँति विचार करनेपर क्या पुत्रके लिये शोक करूँ और क्या पुत्रवधूके लिये। सोचनेसे ऐसा जान पड़ता है, ये दोनों कृतकृत्य होनेके कारण शोकके योग्य नहीं हैं। जो सदा मेरी सेवामें लगा रहता था और मेरे ही कहनेसे ब्राह्मणोंकी रक्षामें तत्पर हो मृत्युको प्राप्त हुआ, वह मेरा पुत्र बुद्धिमान् पुरुषोंके लिये शोकका विषय कैसे हो सकता है। जो अवश्य जानेवाला है, उस शरीरको यदि मेरे पुत्रने ब्राह्मणोंकी रक्षामें लगा दिया तो यह तो महान् अभ्युदयका


* मदालसा तु तद् दृष्ट्वा तदीयं कण्ठभूषणम्। तत्यागाशु प्रियान् प्राणान् श्रुत्वा च निहतं पतिम् ॥
(अ० २२ । २५)

  • तालकेतुके कपटसे मरी हुई मदालसाकी नागराजके फणसे उत्पत्ति और ऋतध्वजका पाताललोकमें गमन * ७१

कारण है। इसी प्रकार उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई यह मेरी पुत्रवधू यदि इस प्रकार अपने स्वामीमें अनुरक्त हो परलोकमें उसके पास गयी है तो उसके लिये भी शोक करना कैसे उचित हो सकता है; क्योंकि स्त्रियोंके लिये पतिके अतिरिक्त दूसरा कोई देवता नहीं है। यदि यह पतिके न रहनेपर भी जीवित रहती तो हमारे लिये, बन्धु-बान्धवोंके लिये तथा अन्य दयालु पुरुषोंके लिये शोकके योग्य हो सकती थी। वह तो अपने स्वामीके वधका समाचार सुनकर तुरंत ही उनके पीछे चली गयी है, अतः विद्वान् पुरुषोंके लिये शोकके योग्य नहीं है।* शोक तो उन स्त्रियोंके लिये करना चाहिये, जो पतिवियोगिनी होकर भी जीवित हों। जो पतिके साथ ही प्राण त्याग देती हैं, वे कदापि शोकके योग्य नहीं हैं। मदालसा बड़ी कृतज्ञ थी; इसलिये इसने पतिवियोगका दुःख नहीं भोगा। जो इहलोक तथा परलोकमें सब प्रकारके सौख्य प्रदान करनेवाला है, उस पतिको कौन स्त्री मनुष्य समझेगी। अतः मेरा वह पुत्र ऋतध्वज, यह पुत्रवधू मैं तथा ऋतध्वजकी माता-इनमेंसे कोई भी शोकके योग्य नहीं है। मेरे पुत्रने ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये अपने प्राण त्यागकर हम सबका उद्धार कर दिया। संग्राममें ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये प्राणत्याग करके मेरे पुत्रने अपनी माताके सतीत्व, वंशकी निर्मलता तथा अपने पराक्रमका त्याग नहीं किया है।'

तदनन्तर कुवलयाश्वकी माताने अपने पतिकी ओर देखकर कहा-

'राजन्! मेरी माता और बहिनको भी ऐसी प्रसन्नता नहीं प्राप्त हुई, जैसी कि मुनियोंकी रक्षाके लिये पुत्रका वध सुनकर मुझे हुई है। जो शोकमें पड़े हुए बन्धु-बान्धवोंके सामने रोगसे क्लेश उठाते और अत्यन्त दुःखी होकर लंबी साँसें खींचते हुए प्राणत्याग करते हैं, उनकी माताका सन्तान उत्पन्न करना व्यर्थ है। जो गौ और ब्राह्मणोंकी रक्षामें तत्पर हो रणभूमिमें निर्भयतापूर्वक युद्ध करते हुए शस्त्रोंसे आहत होकर मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे ही इस पृथ्वीपर धन्य मनुष्य हैं। जो याचकों, मित्रों तथा शत्रुओंसे कभी विमुख नहीं होता, उसीसे पिता वस्तुतः पुत्रवान् होता है और माता उसीके कारण वीर पुत्रकी जननी मानी जाती है। पुत्रके जन्मकालमें माताको जो क्लेश उठाना पड़ता है, वह तभी सफल होता है जब पुत्र शत्रुओंपर विजय प्राप्त करे अथवा युद्धमें लड़ता हुआ मारा जाय।'†


* राजा च तां गतां दृष्ट्वा विना भर्त्रा मदालसाम्। प्रत्युवाच जनं सर्वं विमृश्य सुस्थमानसः॥
न रोदितव्यं पश्यामि भवतामात्मनस्तथा। सर्वथागेव संचिन्त्य सम्बन्धानामनित्यताम्॥
किं नु शोचामि तनयं किं नु शोच्याऽहं स्नुषाम्। विमृश्य कृतकृत्यत्वान्नान्येऽशोच्याबुभावपि॥
यच्छ्रुश्रूषुर्द्वदचनाद् द्विजरक्षणतत्परः। प्राप्तो मे यः सुतो मृत्युं कथं शोच्यः स धीमताम्॥
अवश्यं याति तद्देहं तद् द्विजानां कृते यदि। मम पुत्रेण सन्त्यक्तं नन्वभ्युदयकारि तत्॥
इयं च सत्कुलोत्पन्ना भर्तुर्भावानुव्रता। कथं नु शोच्या नारीणां भर्तुरन्यन्न दैवतम्॥
अस्माकं बान्धवानां च तथान्येषां दयावताम्। शोच्या ह्येषा भवेदेवं यदि भर्त्रा वियोगिनी॥
सा तु भर्तुर्वधं श्रुत्वा तत्क्षणादेव भामिनी। भर्तारमनुयातेयं न शोच्यासौ विपश्चिताम्॥
(अ० २२। २७—३४)

† न मे मात्रा न मे स्वस्त्रा प्राप्ता प्रीतिर्नृपेदृशी। श्रुत्वा मुनिपरित्राणे हतं पुत्रं यथा मया॥
शोचतां बान्धवानां ये निश्वसन्तोऽतिदुःखिताः। म्रियन्ते व्याधिना क्लिष्टास्तेषां माता वृथाप्रजा॥
संग्रामे युध्यमाना येऽभीता गोद्विजरक्षणे। क्षुण्णाः शस्त्रैर्विपद्यन्ते त एव भुवि मानवाः॥
अर्थिनां मित्रवर्गस्य विद्धिषां च पराङ्मुखम्। यो न याति पिता तेन पुत्री माता च वीरसूः॥
गर्भक्लेशः स्त्रियो मन्ये साफल्पं भजते तदा। यदारिविजयी वा स्यात् संग्रामे वा हतः सुतः॥
(अ० २२। ४१—४५)

७२ * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *

तदनन्तर राजा शत्रुजित्ने अपनी पुत्रवधू मदालसाका दाह-संस्कार किया और नगरसे बाहर निकलकर पुत्रको जलाञ्जलि दी। तालकेतु फिर यमुनाजलसे निकलकर राजकुमारके पास गया और प्रेमपूर्वक मीठी वाणीमें बोला—'राजकुमार! अब तुम जाओ। तुमने मुझे कृतार्थ कर दिया। तुम जो यहाँ अविचल भावसे खड़े रहे, इससे मैंने बहुत दिनोंकी अपनी अभिलाषा पूरी कर ली। मुझे महात्मा वरुणकी प्रसन्नताके लिये वारुण यज्ञका अनुष्ठान करनेकी बहुत दिनोंसे अभिलाषा थी; वह सब कार्य अब मैंने पूरा कर लिया।' उसके यों कहनेपर राजकुमार उसको प्रणाम करके गरुड़ तथा वायुके समान वेगवाले उसी अश्वपर आरूढ़ हुए और अपने पिताके नगरकी ओर चल दिये।

राजकुमार ऋतध्वज बड़े वेगसे अपने नगरमें आये। उस समय उनके मनमें माता-पिताके चरणोंकी वन्दना करने तथा मदालसाको देखनेकी प्रबल इच्छा थी। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा, सामने आनेवाले सभी लोग उद्विग्न हैं, किसीके मुखपर प्रसन्नताका चिह्न नहीं है; किन्तु साथ ही सबकी आकृतिसे आश्चर्य टपक रहा है और मुखपर अत्यन्त हर्ष छा रहा है। पिता-माता तथा अन्य बन्धु-बान्धवोंने उन्हें छातीसे लगाया और 'चिरञ्जीवी रहो वत्स!' यह कहकर कल्याणमय आशीर्वाद दिया। राजकुमार भी सबको प्रणाम करके आश्चर्यमग्न हो पूछने लगे—'यह क्या बात है?' पितासे पूछनेपर उन्होंने बीती हुई सारी बातें कह सुनायीं। अपनी मनोरमा भार्या मदालसाकी मृत्युका समाचार सुनकर तथा माता-पिताको सामने खड़ा देख वे लज्जा और शोकके समुद्रमें डूब गये और मन-ही-मन सोचने लगे—'हाय! उस साध्वी बालाने मेरी मृत्युकी बात सुनकर प्राण त्याग दिये; फिर भी मैं जीवित हूँ। मुझे निष्ठुरको धिक्कार है। अहो! मैं क्रूर हूँ, अनार्य हूँ, जो मेरे ही लिये मृत्युको प्राप्त हुई उस मृगनयनी पत्नीके बिना भी अत्यन्त निर्दय होकर जी रहा हूँ।' इसके बाद उन्होंने अपने मनके आवेगको रोका और मोह छोड़कर विचारना आरम्भ किया—'वह मर गयी; इसलिये यदि मैं भी उसके निमित्त अपने प्राण त्याग दूँ तो इससे उस बेचारीका क्या उपकार हुआ? यह कार्य तो स्त्रियोंके लिये ही प्रशंसनीय है। यदि बारंबार 'हा प्रिये! हा प्रिये!!' कहकर दीनभावसे रोता हूँ तो यह भी मेरे लिये प्रशंसाके योग्य बात नहीं है। मेरा कर्तव्य तो है—पिताजीकी सेवा करना। यह जीवन उन्हींके अधीन है; अतः मैं कैसे इसका त्याग कर सकता हूँ। किन्तु आजसे स्त्रीसम्बन्धी भोगका परित्याग कर देना मैं अपने लिये उचित समझता हूँ। यद्यपि इससे भी उस तन्वङ्गीका कोई उपकार नहीं होता, तथापि मुझको तो सर्वथा विषयभोगका त्याग ही करना उचित है। इससे उपकार अथवा अपकार कुछ भी नहीं होता। जिसने मेरे लिये प्राण तक त्याग दिया, उसके लिये मेरा यह त्याग बहुत थोड़ा है।'

ऐसा निश्चय करके उन्होंने मदालसाके लिये जलाञ्जलि दी और उसके बादका कर्म पूरा

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करके इस प्रकार प्रतिज्ञा की।

ऋतध्वज बोले— यदि इस जन्ममें मेरी सुन्दरी पत्नी मदालसा मुझे फिर न मिल सकी तो दूसरी कोई स्त्री मेरी जीवनसङ्गिनी नहीं बन सकती। मृगके समान विशाल नेत्रोंवाली गन्धर्वराजकुमारी मदालसाके अतिरिक्त अन्य किसी स्त्रीके साथ मैं सम्भोग नहीं कर सकता। यह मैंने सर्वथा सत्य कहा है।*

दोनों नागकुमार कहते हैं— पिताजी! इस प्रकार मदालसाके बिना वे स्त्रीसम्बन्धी समस्त भोगोंका परित्याग करके अब अपने समवयस्क मित्रोंके साथ मन बहलाते हैं। यही उनका सबसे बड़ा कार्य है। परन्तु यह तो ईश्वरकोटिमें पहुंचे हुए व्यक्तियोंके लिये भी अत्यन्त दुष्कर है, फिर अन्य लोगोंकी तो बात ही क्या है।

नागराज अश्वतर बोले— पुत्रो! यदि किसी कार्यको असम्भव मानकर मनुष्य उसके लिये उद्योग नहीं करेंगे तो उद्योग छोड़नेसे उनको भारी हानि होगी; इसलिये मनुष्यको अपने पौरुषका त्याग न करते हुए कर्मका आरम्भ करना चाहिये; क्योंकि कर्मकी सिद्धि दैव और पुरुषार्थ दोनोंपर अवलम्बित है। इसलिये मैं तपस्याका आश्रय लेकर ऐसा यत्न करूँगा, जिससे इस कार्यकी शीघ्र ही सिद्धि हो।

यों कहकर नागराज अश्वतर हिमालय पर्वतके प्लक्षावतरण-तीर्थमें, जो सरस्वतीका उद्गमस्थान है, जाकर दुष्कर तपस्या करने लगे। वे तीनों समय स्नान करते और नियमित आहारपर रहते हुए सरस्वतीदेवीमें मन लगाकर उत्तम वाणीमें उनकी स्तुति करते थे।

अश्वतर उवाच

जगद्धात्रीमहं देवीमारिराधयिषुः शुभाम्।
स्तोष्ये प्रणम्य शिरसा ब्रह्मयोनिं सरस्वतीम्॥
सदसद् देवि यत्किंचिन्मोक्षबन्धार्थवत्पदम्।
तत्स्र्वं त्वय्यसंयोगं योगवद् देवि संस्थितम्॥
त्वमक्षरं परं देवि यत्र सर्वं प्रतिष्ठितम्।
अक्षरं परमं देवि संस्थितं परमाणुवत्॥
अक्षरं परमं ब्रह्म जगच्चैतदक्षरात्मकम्।
दारुण्यवस्थितो वह्निर्भौमाश्च परमाणवः॥
तथा त्वयि स्थितं ब्रह्म जगच्चेदमशेषतः।

अश्वतरने कहा— जो सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाली और वेदोंकी जननी हैं, उन कल्याणमयी सरस्वती देवीको प्रसन्न करनेकी इच्छासे मैं उनके चरणोंमें शीश झुकाता और उनकी स्तुति करता हूँ। देवि! मोक्ष और बन्धनरूप अर्थसे युक्त जो कुछ भी सत् और असत् पद है, वह सब तुममें असंयुक्त होकर भी संयुक्तकी भाँति स्थित है। देवि! जिसमें सब कुछ प्रतिष्ठित है, वह परम अक्षर तुम्हीं हो। परम अक्षर परमाणुकी भाँति स्थित है। अक्षररूप परब्रह्म और क्षररूप यह जगत् तुममें ही स्थित है। जैसे काष्ठमें अग्नि तथा पार्थिव सूक्ष्म परमाणु भी रहते हैं, उसी प्रकार ब्रह्म और यह सम्पूर्ण जगत् तुममें स्थित है।

ओङ्काराक्षरसंस्थानं यत्ते देवि स्थिरास्थिरम्॥
तत्र मात्रात्रयं सर्वमस्ति यद्देवि नास्ति च।
त्रयो लोकास्त्रयो वेदास्त्रैविद्यं पावकत्रयम्॥
त्रीणि ज्योतींषि वर्गाश्च त्रयो धर्मादयस्तथा।
त्रयो गुणास्त्रयः शब्दास्त्रयो दोषास्तथाश्रमाः॥
त्रयः कालास्तथावस्थाः पितरोऽहर्निशादयः।
एतन्मात्रात्रयं देवि तव रूपं सरस्वति॥
विभिन्नदर्शिनामाद्या ब्रह्मणो हि सनातनाः।
सोमसंस्था हविःसंस्थाः पाकसंस्थाश्च सप्त याः॥
तास्त्वदुच्चारणाद्देवि क्रियन्ते ब्रह्मवादिभिः।

देवि! ओंकार अक्षरके रूपमें जो तुम्हारा श्रीविग्रह है, वह स्थावर-जङ्गम रूप है। उसमें जो तीन मात्राएँ हैं, वे ही सब कुछ हैं। अस्ति-नास्ति (सत्-असत्) रूपसे व्यवहृत होनेवाला जो कुछ भी है, वह सब उन्हींमें स्थित है। तीन लोक, तीन


* तामृते मृगशाबाक्षीं गन्धर्वतनयामहम। न भोक्ष्ये योषितं काञ्चिदिति सत्यं मयोदितम्॥
(अ० २४। २०)

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* संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *


वेद, तीन विद्याएँ, तीन अग्नि, तीन ज्योति, धर्म आदि तीन वर्ग, तीन गुण, तीन शब्द, तीन दोष, तीन आश्रम, तीन काल, तीन अवस्थाएँ, त्रिविध पितर, दिन-रात और सन्ध्या—ये सभी तीन मात्राओंके अन्तर्गत हैं। देवि सरस्वति! इस प्रकार यह सब तुम्हारा ही स्वरूप है। भिन्न-भिन्न प्रकारके दृष्टिकोण रखनेवाले व्यक्तियोंके लिये जो ब्रह्मके आदि एवं सनातन स्वरूपभूत सात प्रकारकी सोमयज्ञसंस्थाएँ, सात प्रकारकी हविर्यज्ञ²-संस्थाएँ तथा सात प्रकारकी पाकयज्ञ³संस्थाएँ वेदमें वर्णित हुई हैं, उन सबका अनुष्ठान ब्रह्मवादी पुरुष तुम्हारे अङ्गभूत मन्त्रोंके उच्चारणसे ही करते हैं।

अनिर्देश्यं तथा चान्यदर्धमात्राश्रितं परम्॥
अविकार्यक्षयं दिव्यं परिणामविवर्जितम्।
तवैव च परं रूपं यन्न शक्यं मयेरितुम्॥
न चास्येन न वा जिह्वाताल्वोष्ठादिभिरुच्यते।
इन्द्रोऽपि वसवो ब्रह्मा चन्द्रार्कौ ज्योतिरेव च॥
विश्वावासं विश्वरूपं विश्वेशं परमेश्वरम्।
सांख्यवेदान्तवेदोक्तं बहुशाखास्थिरीकृतम्॥
अनादिमध्यनिधनं सदसन्न सदैव तु।
एकं त्वनेकं नाप्येकं भवभेदसपाश्रितम्॥
अनाख्यं षड्गुणाख्यं च षट्काख्यं त्रिगुणाश्रयम्।
नानाशक्तिमतामेकं शक्तिर्भवभविकं परम्॥
सुखासुखमहात्सौख्यं रूपं तव विभाव्यते।
एवं देवि त्वया व्याप्तं सकलं निष्कलं च यत्॥
अद्वैतावस्थितं ब्रह्म यच्च द्वैते व्यवस्थितम्।

उक्त तीन मात्राओंसे परे जो अर्धमात्राके आश्रित बिन्दु है, उसका वाणीद्वारा निर्देश नहीं किया जा सकता। वह अविकारी, अक्षय, दिव्य तथा परिणामशून्य है। देवि! वह आपका ही स्वरूप है, जिसका वर्णन मेरे द्वारा असम्भव है। मुख, जीभ, तालु और ओठ आदि किसी भी स्थानसे उसका उच्चारण नहीं हो सकता। इन्द्र, वसु, ब्रह्मा, चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि भी वही है। वही सम्पूर्ण जगत्‌का निवासस्थान, जगत्स्वरूप, जगत्‌का ईश्वर एवं परमेश्वर है। सांख्य, वेदान्त और वेदोंमें उसीका प्रतिपादन हुआ है। अनेकों शाखाओंमें उसीके स्वरूपका निश्चय किया गया है। वह आदि-अन्तसे रहित है तथा सत्-असत्‌से विलक्षण होता हुआ भी सत्स्वरूप ही है। अनेक रूपोंमें प्रतीत होता हुआ भी एक है और एक होकर भी जगत्‌के भेदोंका आश्रय लेकर अनेक है। वह नाम-रूपसे रहित है। छः गुण, छः वर्ग तथा तीन गुण भी उसीके आश्रित हैं। वह एक ही परम शक्तिमान् तत्त्व है, जो नाना प्रकारकी शक्ति रखनेवाले जीवोंमें शक्तिका सञ्चार करता रहता है। सुख, दुःख तथा महासौख्य—सब उसी अर्धमात्रारूप तुरीयपदके स्वरूप हैं। इस प्रकार तीनों मात्राओंसे अतीत जो तुरीय धामरूप ब्रह्म है, वह तुम्हींमें अभिव्यक्त होता है। देवि! इस तरह सकल, निष्कल, अद्वैतनिष्ठ तथा द्वैतनिष्ठ जो ब्रह्म है, वह भी तुमसे व्याप्त है।

येऽर्था नित्या ये विनश्यन्ति चान्ये
  ये वा स्थूला ये च सूक्ष्मातिसूक्ष्माः।
ये वा भूमौ येऽन्तरिक्षेऽन्यतो वा
  तेषां तेषां त्वत्त एवोपलब्धिः॥
यच्चामूर्तं यच्च मूर्तं समस्तं
  यद्वा भूतेष्वेकमेकं च किञ्चित्।
यद्विद्येऽस्ति क्ष्मातले खेऽन्यतो वा
  तत्सम्वद्धं त्वत्स्वरूपाद्यनैश॥

जो पदार्थ नित्य हैं, जो विनाशशील हैं, जो स्थूल हैं तथा जो सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं, जो इस पृथ्वीपर, अन्तरिक्षमें या और किसी


१. अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र तथा आप्तोर्याम—ये सात सोमयज्ञसंस्थाएँ हैं।
२. अन्वाधान, अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्य, आग्रयणेटि, निरूढपशुबन्ध तथा सौत्रामणी—ये सात हविर्यज्ञसंस्थाएँ हैं।
३. हुत, प्रहुत, आहुत, शूलगव, बलिहरण, प्रत्यवरोहण तथा अष्टकाहोम—ये सात पाकयज्ञसंस्थाएँ हैं।

• तालकेतुके कपटसे मरी हुई मदालसाकी नागराजके फणसे उत्पत्ति और ऋतध्वजका पाताललोकमें गमन • ७५


स्थानमें देखे जाते हैं, उन सबकी उपलब्धि तुम्हींसे होती है। मूर्त, अमूर्त, समस्त भूत अथवा एक-एक भूत जो कुछ भी द्युलोक, पृथ्वी, आकाश या अन्य स्थानमें उपलब्ध होता है, वह सब तुम्हारे ही स्वर और व्यञ्जनोंसे सम्बद्ध है।

इस प्रकार स्तुति करनेपर श्रीविष्णुकी जिह्वारूपा सरस्वतीदेवीने प्रकट हो महात्मा अश्वतर नागसे कहा—‘कम्बलके भाई नागराज अश्वतर! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसे बताओ। मैं तुम्हें वर दूँगी।’

अश्वतर बोले—देवि! पहले तो आप कम्बलको ही मुझे सहायकरूपमें दीजिये और हम दोनों भाइयोंको सङ्गीतके समस्त स्वरोंका ज्ञान करा दीजिये।

सरस्वतीने कहा—नागराज! सात स्वर, सातों ग्राम, राग, सातों गीत, सातों मूर्च्छनाएँ, उनचास प्रकारकी तानें और तीन ग्राम—इन सबको तुम और कम्बल भी गा सकते हो। इसके सिवा मेरी कृपासे तुम्हें चार प्रकारके पद, तीन ताल और तीन लयोंका भी ज्ञान हो जायगा। मैंने तीनों यति और चारों प्रकारके बाजोंका ज्ञान भी तुम्हें दे दिया। यह सब तो मेरे प्रसादसे तुम्हें मिलेगा ही; और भी इसके अन्तर्गत जो स्वर-व्यञ्जनसम्बन्धी विज्ञान है, वह सब भी तुमको और कम्बलको मैंने प्रदान किया। तुम दोनों भाई सङ्गीतकी सम्पूर्ण कलामें जितने कुशल होओगे, वैसा भूलोक, देवलोक और पाताललोकमें भी दूसरा कोई नहीं होगा।

सत्रकी जिह्वारूपा सरस्वतीदेवी यों कहकर तत्काल अन्तर्धान हो गयीं। उन दोनों भाइयोंको सरस्वतीजीके कथनानुसार पद, ताल और स्वर आदिका उत्तम ज्ञान प्राप्त हुआ। तदनन्तर वे कैलाशशिखरपर निवास करनेवाले भगवान् शङ्करकी आराधना करनेके लिये वहाँ गये और वीणाकी लयके साथ सात प्रकारके गीतोंसे शङ्करजीको प्रसन्न करनेके लिये पूर्ण प्रयत्न करने लगे। प्रातःकाल, रात्रिमें, मध्याह्नके समय और दोनों सन्ध्याओंमें वे भगवत्परायण होकर भगवान् शङ्करकी स्तुति करने लगे। बहुत समयतक स्तुति करनेके बाद उनके गीतसे भगवान् शङ्कर प्रसन्न हुए और बोले—‘वर माँगो।’ तब कम्बलसहित अश्वतरने महादेवजीको प्रणाम करके कहा—‘भगवन्! यदि

७६* संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *

आप हम दोनोंपर प्रसन्न हैं तो हमें मनोवाञ्छित वर दें। कुवलयाश्वकी पत्नी मदालसा, जो अब मर चुकी है, पहलेकी ही अवस्था में मेरी कन्याके रूपमें प्रकट हो। उसे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण हो, पहले ही जैसी उसकी कान्ति हो तथा वह योगिनी एवं योगविद्याकी जननी होकर मेरे घरमें उत्पन्न हो।'

महादेवजीने कहा— नागराज! तुमने जो कुछ कहा है, वह सब मेरे प्रसादसे निश्चय ही पूर्ण होगा। श्राद्धका दिन आनेपर तुम उसमें दिये हुए मध्यम पिण्डको शुद्ध एवं पवित्रचित्त होकर खा लेना। उसके खा लेनेपर तुम्हारे मध्यम फणसे कल्याणी मदालसा जैसे मरी है, उसी रूपमें उत्पन्न होगी। तुम इसी कामनाको मनमें लेकर उस दिन पितरोंका तर्पण करना, इससे वह तत्काल ही तुम्हारे मध्यम फणसे प्रकट हो जायगी।

यह सुनकर वे दोनों भाई महादेवजीके चरणोंमें प्रणाम करके बड़े सन्तोषके साथ पुनः रसातलमें लौट आये। अश्वतरने उसी प्रकार श्राद्ध किया और मध्यम पिण्डका विधिपूर्वक भोजन किया। फिर जब उक्त मनोरथको लेकर वे तर्पण करने लगे, उस समय उनके साँस लेते हुए मध्यम फणसे सुन्दरी मदालसा तत्काल प्रकट हो गयी। नागराजने यह रहस्य किसीको नहीं बताया। मदालसाको महलके भीतर गुप्तरूपसे स्त्रियोंके संरक्षणमें रख दिया। इधर नागराजके पुत्र प्रतिदिन द्युलोकमें जाते और ऋतध्वजके साथ देवताओंकी भाँति क्रीड़ा करते थे। एक दिन नागराजने प्रसन्न होकर अपने पुत्रोंसे कहा—'मैंने पहले तुमलोगोंको जो कार्य बताया था, उसे तुम क्यों नहीं करते? पुत्रो! राजकुमार ऋतध्वज हमारे उपकारी और सम्मानदाता हैं, फिर उनका भी उपकार करनेके लिये तुमलोग उन्हें मेरे पास क्यों नहीं ले आते?'

अपने स्नेही पिताके यों कहनेपर वे दोनों मित्रके नगरमें गये और कुछ बातचीतका प्रसङ्ग चलाकर उन्होंने कुवलयाश्वको अपने घर चलनेके लिये कहा। तब राजकुमारने उन दोनोंसे कहा—'सखे! यह घर भी तो आप ही दोनोंका है। धन, वाहन, वस्त्र आदि जो कुछ भी मेरा है, वह सब आपका भी है। यदि आपका मुझपर प्रेम है तो आप धन-रत्न आदि जो कुछ किसीको देना चाहें, यहाँसे लेकर दें। दुर्देवने मुझे आपके स्नेहसे इतना वञ्चित कर दिया कि आप मेरे घरको अपना नहीं समझते। यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हों, अथवा यदि आपका मुझपर अनुग्रह हो तो मेरे धन और गृहको आपलोग अपना ही समझें। आपलोगोंका जो कुछ है, वह मेरा है और मेरा आपलोगोंका है। आपलोग मेरे बाहरी प्राण हैं, इस बातको सत्य मानें। मैं अपने हृदयकी शपथ दिलाकर कहता हूँ, आप मुझपर कृपा करके फिर ऐसी भेदभावको सूचित करनेवाली बात कभी मुँहसे न निकालें।'

यह सुनकर उन दोनों नागकुमारोंके मुख स्नेहके आँसुओंसे भींग गये और वे कुछ प्रेमपूर्ण रोषसे बोले—'ऋतध्वज! तुम जो कुछ कहते हो, उसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। हमारे मनमें भी

  • तालकेतुके कपटसे मरी हुई मदालसाकी नागराजके फणसे उत्पत्ति और ऋतध्वजका पाताललोकमें गमन * ५७

वैसा ही भाव है; परन्तु हमारे महात्मा पिताने बार-बार कहा है कि मैं कुवलयाश्वको देखना चाहता हूँ।' इतना सुनते ही कुवलयाश्व अपने सिंहासनसे उठकर खड़े हो गये और यह कहकर कि 'पिताजीकी जैसी आज्ञा है, वही करूँगा' वे पृथ्वीपर उनके उद्देश्यसे प्रणाम करने लगे।

कुवलयाश्व बोले—मैं धन्य हूँ, अत्यन्त पुण्यात्मा हूँ, मेरे समान भाग्यशाली दूसरा कौन है; क्योंकि आज पिताजी मुझे देखनेकी इच्छा करते हैं। अतः मित्रो! आपलोग उठें और उनके पास चलें। मैं पिताजीके चरणोंकी शपथ खाकर कहता हूँ, उनकी इस आज्ञाका क्षणभर भी उल्लङ्घन करना नहीं चाहता।

यों कहकर राजकुमार ऋतध्वज उन दोनों नागकुमारोंके साथ नगरसे बाहर निकले और पुण्यसलिला गोमतीके तटपर गये। फिर वे सब लोग गोमतीकी बीच धारामें उतरकर चलने लगे। राजकुमारने सोचा—'नदीके उस पार इन दोनोंका घर होगा।' इतनेमें ही उन नागकुमारोंने उन्हें खींचकर पाताल पहुँचा दिया। वहाँ जानेपर उन्होंने अपने दोनों मित्रोंको स्वस्तिकके लक्षणोंसे सुशोभित सुन्दर नागकुमारोंके रूपमें देखा। वे फणोंकी मणिसे देदीप्यमान हो रहे थे। उन्हें इस रूपमें देखकर राजकुमारके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। उन्होंने मुसकाते हुए प्रेमपूर्वक कहा—'वाह, यह तो अच्छा रहा।' पातालमें कहीं तो वीणा और वेणुकी मधुर ध्वनिके साथ सङ्गीतके शब्द सुनायी देते थे। कहीं मृदङ्ग और ढोल आदि बाजे बज रहे थे। सैकड़ों मनोहर भवन चारों ओर दृष्टिगोचर होते थे। इस प्रकार अपने प्रिय नागकुमारोंके साथ पातालकी शोभा निहारते हुए राजकुमार ऋतध्वज आगे बढ़ने लगे। कुछ दूर जानेके बाद सबने नागराजके महलमें प्रवेश किया। नागराज अश्वतर सोनेके सिंहासनपर, जिसमें मणि, मूँगे और वैदूर्य आदि रत्नोंकी झालरें लगी थीं, विराजमान थे। उनके अङ्गोंमें दिव्य हार एवं दिव्य वस्त्र शोभा पा रहे थे। कानोंमें मणिमय कुण्डल झिलमिला रहे थे। सफेद मोतियोंका मनोहर हार वक्षःस्थलकी शोभा बढ़ा रहा था और भुजाओंमें भुजबंद सुशोभित थे। दोनों नागकुमारोंने 'यही हमारे पिताजी हैं' यों कहकर राजकुमारको उनका दर्शन कराया और पिताजीसे यह निवेदन किया कि 'यही हमारे मित्र वीर कुवलयाश्व हैं।' ऋतध्वजने नागराजके चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। नागराजने उन्हें आदरपूर्वक उठाया और खूब कसकर छातीसे लगा लिया। फिर उनका मस्तक सूँघकर कहा—'बेटा! चिरजीवी रहो। शत्रुओंका नाश करके पिता-माताकी सेवा करो। वत्स! तुम धन्य हो; क्योंकि मेरे पुत्रोंने परोक्षमें भी मुझसे तुम्हारे असाधारण गुणोंकी प्रशंसा की है। तुम मन, वाणी और शरीरकी चेष्टाओंके साथ अपने गुण-गौरवसहित सदा बढ़ते रहो। गुणवान्‌का ही जीवन प्रशंसनीय है। गुणहीन मनुष्य तो जीते-जी ही मरेके समान है। गुणवान् पुत्र पिता-माताको शान्ति एवं सन्तोष प्रदान करता है। देवता, पितर, ब्राह्मण, मित्र, याचक, दुःखी तथा

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  • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

बन्धु-बान्धव भी गुणवान् पुरुषके चिरंजीवी होनेकी अभिलाषा करते हैं। जिनकी कभी निन्दा नहीं हुई, जो दीन-दुखियोंपर दया करते तथा आपत्तिग्रस्त मनुष्य जिनकी शरण लेते हैं, ऐसे गुणवान् पुरुषोंका ही जन्म सफल है।'

वीर कुवलयाश्वसे यों कहकर उनका स्वागत-सत्कार करनेके लिये नागराज अपने पुत्रोंसे बोले—'बेटा! क्रमशः स्नान आदि सब कार्य पूरा करके इन्हें इच्छानुसार भोजन कराओ। उसके बाद हमलोग इनसे मनको प्रसन्न करनेवाली बातें करते हुए कुछ कालतक एक साथ बैठेंगे।' राजा शत्रुजित्‌के पुत्रने चुपचाप उनकी आज्ञा स्वीकार की। तत्पश्चात् सत्यवादी नागराजने अपने पुत्रों तथा राजकुमारके साथ प्रसन्नतापूर्वक भोजन किया।


ऋतध्वजको मदालसाकी प्राप्ति, बाल्यकालमें अपने पुत्रोंको मदालसाका उपदेश

सुमति कहते हैं—नागराज महात्मा अश्वतर जब भोजन कर चुके, तब उनके पुत्र और राजकुमार ऋतध्वज—तीनों उनके पास आकर बैठे। नागराजने मनको प्रिय लगनेवाली बातें कहकर अपने पुत्रोंके सखाको प्रसन्न किया और पूछा—'आयुष्मन्! आज तुम मेरे घरपर आये हो। अतः जिससे तुम्हें सुख मिले, ऐसी किसी वस्तुके लिये यदि तुम्हारी इच्छा हो तो बताओ। जैसे पुत्र अपने पितासे मनकी बात कहता है, उसी प्रकार तुम भी निःशङ्क होकर मुझसे अपना मनोरथ कहो। सोना, चाँदी, वस्त्र, वाहन, आसन अथवा और कोई अत्यन्त दुर्लभ एवं मनोवाञ्छित वस्तु मुझसे माँगो।'

कुवलयाश्वने कहा—भगवन्! आपके प्रसादसे मेरे पिताके घरमें आज भी सुवर्ण आदि सभी बहुमूल्य वस्तुएँ मौजूद हैं। इन सब वस्तुओंकी मुझे आवश्यकता नहीं है। जबतक पिताजी हजारों वर्षोंतक पृथ्वीका शासन करते हैं और आप पाताललोकका राज्य करते हैं, तबतक मेरा मन याचना करनेके लिये उत्सुक नहीं हो सकता। जिनके पिता जीवित हैं, वे परम सौभाग्यशाली और पुण्यात्मा हैं। भला, मेरे पास क्या नहीं है। सज्जन मित्र, नीरोग शरीर, धन और यौवन—सभी कुछ तो है। जो इस बातकी चिन्ता न करके कि मेरे घरमें धन है या नहीं—पिताकी भुजाओंकी छत्रच्छायामें रहते हैं, वे ही सुखी हैं। जो लोग बचपनसे ही पितृहीन होकर कुटुम्बका भार वहन करते हैं, उनका सुखभोग छिन जानेके कारण मैं तो यही समझता हूँ कि विधाताने ही उन्हें सौभाग्यसे वंचित कर रखा है। मैं तो आपकी कृपासे पिताजीके दिये हुए धन-रत्न आदिके भंडारमेंसे प्रतिदिन याचकोंको, उनकी इच्छाके अनुसार दान देता रहता हूँ। यहाँ आकर मैंने अपने मुकुटसे जो आपके दोनों चरणोंका स्पर्श किया तथा आपके शरीरसे मेरा स्पर्श हुआ, इसीसे मैं सब कुछ पा गया।

राजकुमारका यह विनययुक्त वचन सुनकर नागराज अश्वतरने प्रेमपूर्वक कहा—'यदि मुझसे रत्न और सुवर्ण आदि लेनेका तुम्हारा मन नहीं होता तो और ही कोई वस्तु जो तुम्हारे मनको प्रसन्न कर सके, माँगो। मैं तुम्हें दूँगा।'

कुवलयाश्वने कहा—भगवन्! आपके प्रसादसे मेरे घरमें सब कुछ है, विशेषतः आपके दर्शनसे मुझे सब मिल गया। आप देवता हैं और मैं मनुष्य। आपने अपने शरीरसे जो मेरा आलिङ्गन किया—इसीसे मैं कृतकृत्य हूँ। मेरा जीवन सफल हो गया। नागराज! आपकी चरण-धूलिने

  • ऋतध्वजको मदालसाकी प्राप्ति, बाल्यकालमें अपने पुत्रोंको मदालसाका उपदेश * ७१

जो मेरे मस्तकपर अपना स्थान बनाया है, उसीसे मैंने क्या नहीं पा लिया। यदि आपको मुझे मनोवाञ्छित वर देना ही है तो यही दीजिये कि मेरे हृदयसे पुण्यकर्मोंका संस्कार कभी दूर न हो।

अश्वतर बोले—विद्वन्! ऐसा ही होगा। तुम्हारी बुद्धि धर्ममें लगी रहेगी। तथापि इस समय तुम मेरे घरमें आये हो; इसलिये तुम्हें मनुष्यलोकमें जो वस्तु दुर्लभ प्रतीत होती हो, वही मुझसे माँग लो।

उनकी यह बात सुनकर राजकुमार ऋतध्वज अपने दोनों मित्र नागकुमारोंके मुखकी ओर देखने लगे। तब उन दोनोंने पिताको प्रणाम करके राजपुत्रका जो अभीष्ट था, उसे स्पष्ट रूपसे कहना आरम्भ किया।

नागकुमार बोले—पिताजी! गन्धर्वराजकुमारी मदालसा इनकी प्यारी पत्नी थी। उसको किसी दुष्ट बुद्धिवाले दुरात्मा दानवने, जो इनके साथ वैर रखता था, धोखा दिया। उसने उसी दानवके मुखसे इनकी मृत्युका समाचार सुनकर अपने प्यारे प्राणोंको त्याग दिया। तब इन्होंने अपनी पत्नीके प्रति कृतज्ञ होकर यह प्रतिज्ञा कर ली कि अब मदालसाको छोड़कर दूसरी कोई स्त्री मेरी पत्नी नहीं हो सकती। पिताजी! ये वीर ऋतध्वज आज उसी सर्वाङ्गसुन्दरी मदालसाको देखना चाहते हैं। यदि ऐसा किया जा सके तो इनका मनोरथ पूर्ण हो सकता है।

तब नागराज घरमें छिपायी हुई मदालसाको ले आये और राजकुमारको उसे दिखाया तथा पूछा—'ऋतध्वज! यह तुम्हारी पत्नी मदालसा है या नहीं?' उसे देखते ही राजकुमार लज्जा छोड़कर उठे और 'हा प्रिये!' कहते हुए उसकी ओर बढ़े। तब नागराजने उसे रोका और मदालसाके मरकर जीवित होने आदिकी सारी कथा कह सुनायी। फिर तो राजकुमारने प्रसन्न होकर अपनी प्यारी पत्नीको ग्रहण किया। तदनन्तर उनके स्मरण करते ही उनका प्यारा अश्व वहाँ आ पहुँचा। उस समय नागराजको प्रणाम करके वे अश्वपर आरूढ़ हुए और मदालसाके साथ अपने नगरको चल दिये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने अपने पिता-मातासे उसके मरकर जीवित होनेका सब समाचार निवेदन किया। कल्याणमयी मदालसाने भी सास-ससुरके चरणोंमें प्रणाम किया तथा अन्य स्वजनोंको भी यथायोग्य सम्मान दिया। तत्पश्चात् उस नगरमें पुरवासियोंके यहाँ बहुत बड़ा उत्सव हुआ।

इसके बाद बहुत समय बीतनेके पश्चात् महाराज शत्रुजित् पृथ्वीका भलीभाँति पालन करके परलोकवासी हो गये; तब पुरवासियोंने उनके महात्मा पुत्र ऋतध्वजको, जिनके आचरण तथा व्यवहार बड़े ही उदार थे, राजपदपर अभिषिक्त किया। वे भी अपनी प्रजाका औरस पुत्रोंकी भाँति पालन करने लगे। तदनन्तर मदालसाके गर्भसे प्रथम पुत्र उत्पन्न हुआ।

८० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


राजाने उसका नाम विक्रान्त रखा। इससे कुटुम्बके सब लोग बड़े प्रसन्न हुए, किन्तु मदालसा वह नाम सुनकर हँसने लगी। उसने उत्तान सोकर जोर-जोरसे रोते हुए शिशुको बहलानेके व्याजसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—

शुद्धोऽसि रे तात न तेऽस्ति नाम कृतं हि ते कल्पनयाधुनैव। पञ्चात्मकं देहमिदं न तेऽस्ति नैवास्य त्वं रोदिषि कस्य हेतोः॥

हे तात! तू तो शुद्ध आत्मा है, तेरा कोई नाम नहीं है। यह कल्पित नाम तो तुझे अभी मिला है। यह शरीर भी पाँच भूतोंका बना हुआ है। न यह तेरा है, न तू इसका है। फिर किसलिये रो रहा है?

न वा भवान् रोदिति नैव स्वजन्मा शब्दोऽयमासाद्य महीशसूनुम्। विकल्प्यमाना विविधा गुणास्ते- गुणाश्च भौताः सकलेन्द्रियेषु॥

अथवा तू नहीं रोता है, यह शब्द तो राजकुमारके पास पहुँचकर अपने-आप ही प्रकट होता है। तेरी सम्पूर्ण इन्द्रियोंमें जो भाँति-भाँतिके गुण-अवगुणोंकी कल्पना होती है, वे भी पाञ्चभौतिक ही हैं?

भूतानि भूतैः परिदुर्बलानि वृद्धिं समायान्ति यथेह पुंसः। अन्नाम्बुदानादिभिरेव कस्य न तेऽस्ति वृद्धिर्न च तेऽस्ति हानिः॥

जैसे इस जगत्में अत्यन्त दुर्बल भूत अन्य भूतोंके सहयोगसे वृद्धिको प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार अन्न और जल आदि भौतिक पदार्थोंके देनेसे पुरुषके पाञ्चभौतिक शरीरकी ही पुष्टि होती है। इससे तुझ शुद्ध आत्माकी न तो वृद्धि होती है और न हानि ही होती है।

त्वं कञ्चुके शीर्यमाणे निजेऽस्मि- स्तस्मिंश्च देहे मूढतां मा व्रजेथाः॥ शुभाशुभैः कर्मभिर्देहमेत- न्मदादिमूढैः कञ्चुकस्ते पिनद्धः॥

तू अपने उस चोले तथा इस देहरूपो चोलेके जीर्ण-शीर्ण होनेपर मोह न करना। शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार यह देह प्राप्त हुआ है। तेरा यह चोला मद आदिसे बँधा हुआ है (तू तो सर्वथा इससे मुक्त है)।

तातेति किंचित् तनयेति किंचि- दम्बेति किंचिद्दयितेति किंचित्। ममेति किंचिन्न ममेति किंचित् त्वं भूतसङ्घं बहु मानयेथाः॥

कोई जीव पिताके रूपमें प्रसिद्ध है, कोई पुत्र कहलाता है, किसीको माता और किसीको प्यारी स्त्री कहते हैं; कोई 'यह मेरा है' कहकर अपनाया जाता है और कोई 'मेरा नहीं है' इस भावसे पराया माना जाता है। इस प्रकार ये भूतसमुदायके ही नाना रूप हैं, ऐसा तुझे मानना चाहिये।

दुःखानि दुःखोपगमाय भोगान् सुखाय जानाति विमूढचेताः। तान्येव दुःखानि पुनः सुखानि जानाति विद्वानविमूढचेताः॥

  • ऋतध्वजको मदालसाकी प्राप्ति, बाल्यकालमें अपने पुत्रोंको मदालसाका उपदेश * ८१

यद्यपि समस्त भोग दुःखरूप हैं तथापि मूढ़चित्तमानव उन्हें दुःख दूर करनेवाला तथा सुखकी प्राप्ति करानेवाला समझता है; किन्तु जो विद्वान् हैं, जिनका चित्त मोहसे आच्छन्न नहीं हुआ है, वे उन भोगजनित सुखोंको भी दुःख ही मानते हैं।

हासोऽस्थिसंदर्शनमक्षियुग्म-
मत्त्युज्ज्वलं यत्कलुषं वसायाः।
कुचादि पीनं पिशितं घनं तत्
स्थानं रतेः किं नरकं न योषित्॥

स्त्रियोंकी हँसी क्या है, हड्डियोंका प्रदर्शन। जिसे हम अत्यन्त सुन्दर नेत्र कहते हैं, वह मज्जाकी कलुषता है और मोटे-मोटे कुच आदि घने मांसकी ग्रन्थियाँ हैं; अतः पुरुष जिसपर अनुराग करता है, वह युवती स्त्री क्या नरककी जीती-जागती मूर्ति नहीं है ?

यानं क्षितौ यानगतश्च देहो
देहेऽपि चान्यः पुरुषो निविष्टः।
ममत्वमूर्च्या न तथा यथा स्वे
देहेऽतिमात्रं च विमूढतैषा ॥

पृथ्वीपर सवारी चलती है, सवारीपर यह शरीर रहता है और इस शरीरमें भी एक दूसरा पुरुष बैठा रहता है; किन्तु पृथ्वी और सवारीमें वैसी अधिक ममता नहीं देखी जाती, जैसी कि अपने देहमें दृष्टिगोचर होती है। यही मूर्खता है।

ज्यों-ज्यों वह बालक बढ़ने लगा, त्यों-ही-त्यों महारानी मदालसा प्रतिदिन उसे बहलाने आदिके द्वारा ममताशून्य ज्ञानका उपदेश करने लगी। जैसे-जैसे उसके शरीरमें बल आता गया और जैसे-जैसे वह पितासे व्यावहारिक बुद्धि सीखने लगा, वैसे-ही-वैसे माताके वचनोंसे उसे आत्मतत्वका ज्ञान भी प्राप्त होता गया। इस प्रकार माताने जन्मसे ही अपने पुत्रको ऐसा उपदेश दिया, जिससे ज्ञानी एवं ममताशून्य होकर उसने गार्हस्थ्य-धर्मके प्रति अपने मनको नहीं जाने दिया। इसी प्रकार जब मदालसाके गर्भसे दूसरा पुत्र उत्पन्न हुआ, तब पिताने उसका नाम सुबाहु रखा। इसपर भी मदालसा हँसने लगी। उस बालकको भी वह पहलेकी ही भाँति बहलाते-बहलाते बचपनसे ही ऐसा उपदेश देने लगी, जिससे वह परम बुद्धिमान् ज्ञानी हो गया। तृतीय पुत्र उत्पन्न होनेपर राजाने उसका नाम शत्रुमर्दैन रखा। इसपर भी सुन्दरी मदालसा बहुत देरतक हँसती रही तथा उसको भी उसने पहलेकी ही भाँति बाल्यकालसे ही ज्ञानका उपदेश दिया। बड़ा होनेपर वह निष्काम कर्म करने लगा। सकाम कर्मकी ओर उसकी रुचि नहीं रही। राजा ऋतध्वज जब चौथे पुत्रका नामकरण करने चले, तब सदाचारपरायणा मदालसापर उनकी दृष्टि पड़ी। उस समय वह मन्द-मन्द मुसकरा रही थी। उसे हँसते देख राजाको कुछ कौतूहल हुआ; अतः उन्होंने पूछा—'देवि! जब मैं नामकरण करने चलता हूँ, तब तुम हँसती क्यों हो? इसका कारण बताओ। मैं तो समझता हूँ विक्रान्त, सुबाहु और शत्रुमर्दैन—ये सुन्दर नाम रखे गये हैं। ये क्षत्रियोंके योग्य तथा शौर्यमें उपयोगी हैं; भद्रे! यदि तुम्हारे मनमें यह बात हो कि ये नाम अच्छे नहीं हैं तो मेरे चौथे पुत्रका नाम तुम स्वयं ही रखो।'

मदालसा बोली—महाराज! आपकी आज्ञाका पालन करना मेरा कर्तव्य है; अतः आप जैसा कहते हैं, उसके अनुसार मैं आपके चौथे पुत्रका नाम स्वयं ही रखूँगी। यह धर्मज्ञ बालक इस संसारमें अलर्कके नामसे विख्यात होगा। आपका यह कनिष्ठ पुत्र बड़ा बुद्धिमान् होगा।

माताके द्वारा रखे गये 'अलर्क' इस असम्बद्ध नामको सुनकर राजा ठठाकर हँस पड़े और इस प्रकार बोले—'शुभे! तुमने मेरे पुत्रका जो यह अलर्क नाम रखा है, उसका क्या कारण है? ऐसा असम्बद्ध नाम क्यों रखा? इसका अर्थ क्या है?'

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  • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

मदालसाने कहा— महाराज! यह तो व्यावहारिक कल्पना है; लौकिक व्यवहार चलानेके लिये कोई-सा नाम रख लिया जाता है, इससे पुरुषका कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। आपने भी जो नाम रखे हैं, वे भी निरर्थक ही हैं। कैसे, सो बतलाती हूँ; सुनिये। ज्ञानीलोग पुरुष (आत्मा)-को व्यापक बतलाते हैं। आपने प्रथम पुत्रका नाम विक्रान्त रखा है, इसके अर्थपर विचार कीजिये। क्रान्तिका अर्थ है गति। एक स्थानसे दूसरे स्थानमें जानेको गति कहते हैं। जब इस देहका ईश्वर आत्मा सर्वत्र व्यापक है, तब वह दूसरी जगह जा नहीं सकता; अतः उसका नाम विक्रान्त रखना मुझे निरर्थक ही जान पड़ता है। पृथ्वीनाथ! दूसरे पुत्रका जो सुबाहु नाम रखा गया है, वह भी व्यर्थ ही है; क्योंकि आत्मा निराकार है, उसको बाँह कहाँसे आयी। तृतीय पुत्रका जो अरिमर्दन नाम नियत किया गया है, मेरी समझसे वह भी असम्बद्ध ही है। इसका कारण भी सुनिये। अरिमर्दनका अर्थ है—शत्रुका मर्दन करनेवाला। जब सब शरीरोंमें एक ही आत्मा रहता है, तब उसका कौन शत्रु है और कौन मित्र। मूर्तिमान् भूतोंके द्वारा मूर्तिमान् भूतोंका ही मर्दन होता है। आत्मा तो अमूर्त है, उसका मर्दन कैसे हो सकता है। क्रोध आदि आत्मासे पृथक् रहते हैं; अतः यह अरिमर्दनकी कल्पना निरर्थक ही है। यदि व्यवहारका भलीभाँति निर्वाह करनेके लिये ऐसे असङ्गत नामोंकी कल्पना हो सकती है तो 'अलर्क' नाममें ही क्यों आपको निरर्थकता प्रतीत होती है?

रानी मदालसाके द्वारा इस प्रकार भलीभाँति समझाये जानेपर परम बुद्धिमान् महाराज ऋतध्वजने अपनी प्राणवल्लभाको यथार्थवादिनी मानकर कहा—'तुम्हारा कथन सत्य है।' तदनन्तर उसने पहले पुत्रोंकी भाँति उसको भी ज्ञानजनक बातें सुनानी आरम्भ कीं। तब राजाने उसे रोककर कहा।

**राजा बोले—**अरी यह क्या करती हो? पहले पुत्रोंकी भाँति इसे भी ज्ञानका उपदेश देकर मेरी वंश-परम्पराका उच्छेद करनेपर क्यों तुली हो। यदि तुम्हें मेरा प्रिय कार्य करना हो और यदि मेरी बातोंको मानना तुम्हें उचित प्रतीत होता हो तो मेरे इस पुत्रको प्रवृत्तिमार्गमें लगाओ। देवि! ऐसा करनेसे कर्ममार्गका उच्छेद नहीं होगा तथा पितरोंके पिण्डदानका लोप नहीं होगा। जो पितर देवलोकमें हैं, जो तिर्यग्योनिमें पड़े हैं, जो मनुष्ययोनिमें एवं भूतवर्गमें स्थित हैं, वे पुण्यात्मा हों या पापात्मा, जब भूख-प्याससे विकल होते हैं तो अपने कर्मोंमें लगा हुआ मनुष्य पिण्डदान तथा जलदानके द्वारा उन्हें तृप्त करता है। इसी तरह वह देवताओं और अतिथियोंको भी सन्तुष्ट रखता है। देवता, मनुष्य, पितर, भूत, प्रेत, गुह्यक, पक्षी, कृमि और कीट आदि भी मनुष्यसे ही जीविका चलाते हैं; अतः सुन्दरि! तुम मेरे पुत्रको ऐसा उपदेश दो, जिससे इहलोक और परलोकमें उत्तम फल देनेवाले क्षत्रियोचित कर्तव्यका उसे ठीक-ठीक ज्ञान हो।

* मदालसाका अलर्कको राजनीतिका उपदेश *७३
पतिके यों कहनेपर श्रेष्ठ नारी मदालसा अपने पुत्र अलर्कको बहलाती हुई इस प्रकार उपदेश देने लगी—मनमें सदा श्रीविष्णुभगवान्‌का चिन्तन करना, उनके ध्यानसे अन्तःकरणके काम क्रोध आदि छहों शत्रुओंको जीतना, ज्ञानके द्वारा मायाका निवारण करना और जगत्‌की अनित्यताका विचार करते रहना। धनकी आपके लिये राजाओंपर विजय प्राप्त करना, यशके लिये धनका सद्व्यय करना, परायी निन्दा सुननेसे डरते रहना तथा विपत्तिके समुद्रमें पड़े हुए लोगोंका उद्धार करना।
धन्योऽसि रे यो वसुधामशत्रु-<br>  रेकश्चिरं पालयितासि पुत्र।<br>तत्पालनादस्तु सुखोपभोगो<br>  धर्मात् फलं प्राप्स्यसि चामरत्वम् ॥<br>धरामरान् पर्वसु तर्पयेथाः<br>  समीहितं बन्धुषु पूरयेथाः।<br>हितं परस्मै हृदि चिन्तयेथा<br>  मनः परस्त्रीषु निवर्त्तयेथाः ॥<br>सदा मुरारिं हृदि चिन्तयेथा-<br>  स्तद्ध्यानतोऽन्तःषडरीञ्जयेथाः ।<br>मायां प्रबोधेन निवारयेथा<br>  ह्यनित्यतामेव विचिन्तयेथाः ॥<br>अर्थागमाय क्षितिपाञ्जयेथा<br>  यशोऽर्जनायार्थमपि व्ययेथाः ।<br>परापवादश्रवणाद्विभीथा<br>  विपत्समुद्राज्जनमुद्धरेथाः ॥वीर! तू अनेक यज्ञोंके द्वारा देवताओंको तथा धनके द्वारा ब्राह्मणों एवं शरणागतोंको सन्तुष्ट करना। कामनापूर्तिके द्वारा स्त्रियोंको प्रसन्न रखना और युद्धके द्वारा शत्रुओंके छक्के छुड़ाना। बाल्यावस्थामें तू भाई-बन्धुओंको आनन्द देना, कुमारावस्थामें आज्ञापालनके द्वारा गुरुजनोंको सन्तुष्ट रखना। युवावस्थामें उत्तम कुलको सुशोभित करनेवाली स्त्रीको प्रसन्न रखना और वृद्धावस्थामें वनके भीतर निवास करते हुए वनवासियोंको सुख देना।
राज्यं कुर्वन् सुहृदो नन्दयेथाः<br>  साधून् रक्षंस्तात यज्ञैर्यजेथाः।<br>दुष्टान् निघ्नन् बैरिणश्चाजिमध्ये<br>  गोविप्रार्थे वत्स मृत्युं व्रजेथाः ॥
बेटा ! तू धन्य है, जो शत्रुरहित होकर अकेला ही चिरकालतक इस पृथ्वीका पालन करता रहेगा। पृथ्वीके पालनसे तुझे सुखोपभोगकी प्राप्ति हो और धर्मके फलस्वरूप तुझे अमरत्व मिले। पर्वोंके दिन ब्राह्मणोंको भोजनके द्वारा तृप्त करना, बन्धु-बान्धवोंकी इच्छा पूर्ण करना, अपने हृदयमें दूसरोंकी भलाईका ध्यान रखना और परायी स्त्रियोंकी ओर कभी मनको न जाने देना। अपनेतात ! राज्य करते हुए अपने सुहृदोंको प्रसन्न रखना, साधु पुरुषोंकी रक्षा करते हुए यज्ञोंद्वारा भगवान्‌का भजन करना, संग्राममें दुष्ट शत्रुओंका संहार करते हुए गौ और ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये अपने प्राण निछावर कर देना।

मदालसाका अलर्कको राजनीतिका उपदेश

सुमति कहते हैं— इस प्रकार माताके द्वारा प्रतिदिन बहलाया जाता हुआ बालक अलर्क कुछ बड़ी अवस्थाको प्राप्त हुआ। कुमारावस्थामें पहुँचनेपर उसका उपनयन-संस्कार हुआ। तत्पश्चात् उस बुद्धिमान् राजकुमारने माताको प्रणाम करके कहा—'माँ!मुझे इस लोक और परलोकमें सुख प्राप्त करनेके लिये यहाँ क्या करना चाहिये? यह सब मुझे बताओ।'<br>मदालसा बोली— बेटा ! राज्याभिषेक होनेपर राजाको उचित है कि वह अपने धर्मके अनुकूल

८४ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

चलता हुआ आरम्भसे ही प्रजाको प्रसन्न रखे। सातों^१ व्यसनोंका परित्याग कर दे; क्योंकि वे राजाका मूलोच्छेद करनेवाले हैं। अपनी गुप्त मन्त्रणाके बाहर फूटनेसे उसके द्वारा लाभ उठाकर शत्रु आक्रमण कर देते हैं; अतः ऐसा न होने देकर शत्रुओंसे अपनी रक्षा करे। जैसे रथी रथकी गति वक्र होनेपर आठों प्रकारसे नाशको प्राप्त होता है, उसके ऊपर आठों दिशाओंसे प्रहार होने लगते हैं, उसी प्रकार गुप्त मन्त्रणाके बाहर फूटनेपर राजाके आठों^२ वर्गोंका निश्चय ही नाश होता है। राजाको इस बातका भी पता लगाते रहना चाहिये कि शत्रुद्वारा उत्पन्न किये गये दोषसे अथवा शत्रुओंके बहकावेमें आकर अपने मन्त्रियोंमेंसे कौन दुष्ट हो गया है और कौन अदुष्ट—कौन अपना साथी है और कौन शत्रुसे मिला हुआ। इसी प्रकार बुद्धिमान् चर नियुक्त करके शत्रुके चरोंपर भी प्रयत्नपूर्वक दृष्टि रखनी चाहिये। राजाको अपने मित्रों तथा माननीय बन्धु-बान्धवोंपर भी पूर्णतः विश्वास नहीं करना चाहिये। किन्तु काम आ पड़नेपर उसे शत्रुपर भी विश्वास कर लेना चाहिये। किस अवस्थामें शत्रुपर चढ़ाई न करके अपने स्थानपर स्थित रहना उचित है, क्या करनेसे अपनी वृद्धि होगी और किस कार्यसे अपनी हानि होनेकी सम्भावना है— इन सब बातोंका राजाको ज्ञान होना चाहिये। वह छः^३ गुणोंका उपयोग करना जाने और कभी कामके अधीन न हो। राजा पहले अपने आत्माको, फिर मन्त्रियोंको जीते। तत्पश्चात् अपनेसे भरण-पोषण पानेवाले कुटुम्बीजनों एवं सेवकोंके हृदयपर अधिकार प्राप्त करे। तदनन्तर पुरवासियोंको अपने गुणोंसे जीते। यह सब हो जानेपर शत्रुओंके साथ विरोध करे। जो इन सबको जीते बिना ही शत्रुओंपर विजय पाना चाहता है, वह अपने आत्मा तथा मन्त्रियोंपर अधिकार न रखनेके कारण शत्रुसमुदायके वशमें पड़कर कष्ट भोगता है।^*

इसलिये बेटा! पृथ्वीका पालन करनेवाले


१. कटु वचन बोलना, कठोर दण्ड देना, धनका अपव्यय करना, मदिरा पीना, स्त्रियोंमें आसक्ति रखना, शिकार खेलनेमें व्यर्थ समय लगाना और जुआ खेलना—ये राजाके सात व्यसन हैं।

२. खेतीकी उन्नति, व्यापारकी वृद्धि, दुर्गनिर्माण, पुल बनाना, जंगलसे हाथी पकड़कर मँगवाना, खानोंपर अधिकार प्राप्त करना, अधीन राजाओंसे कर लेना और निर्जन प्रदेशको आबाद करना—ये आठ वर्ग कहलाते हैं।

३. सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय—ये छः गुण हैं। इनमें शत्रुसे मेल रखना सन्धि, उससे लड़ाई छेड़ना विग्रह, आक्रमण करना यान, अवसरकी प्रतीक्षा में बैठे रहना आसन, दुरंगी नीति बरतना द्वैधीभाव और अपनेसे बलवान् राजाकी शरण लेना समाश्रय कहलाता है।

^* वत्स राज्येऽभिषिक्तेन प्रजारञ्जनमादितः। कर्तव्यमविरोधेन स्वधर्मस्य महीभृता ॥
व्यसनानि परित्यज्य सप्त मूलहराणि वै। आत्मा रिपुभ्यः संरक्ष्यो बहिर्मन्त्रविनिर्गमात् ॥

  • मदालसाका अलर्कको राजनीतिका उपदेश * ८५

राजाको पहले काम आदि शत्रुओंको जीतनेकी चेष्टा करनी चाहिये। उनके जीत लेनेपर विजय अवश्यम्भावी है। यदि राजा ही उनके वशमें हो गया तो वह नष्ट हो जाता है। काम, क्रोध, लोभ, मद, पान और हर्ष—ये राजाका विनाश करनेवाले शत्रु हैं। राजा पाण्डु काममें आसक्त होनेके कारण मारे गये तथा अनुह्लाद क्रोधके कारण ही अपने पुत्रसे हाथ धो बैठा। यह विचारकर अपनेको काम और क्रोधसे अलग रखे। राजा पुरूरवा लोभसे मारे गये और वेनको मदके कारण ही ब्राह्मणोंने मार डाला। अनायुषके पुत्रको मानके कारण प्राणोंसे हाथ धोना पड़ा तथा पुरञ्जयकी मृत्यु हर्षके कारण हुई; किन्तु महात्मा मरुत्तने इन सबको जीत लिया था, इसलिये वे सम्पूर्ण विश्वपर विजयी हुए। यह सोचकर राजा उपर्युक्त दोषोंका सर्वथा त्याग करे। वह कौवे, कोयल, भौरे हरिन, साँप, मोर, हंस, मुर्गे और लोहेके व्यवहारसे शिक्षा ग्रहण करे।* राजा अपने शत्रुके प्रति उल्लूका-सा बर्ताव करे। जैसे उल्लू पक्षी रातमें सोये कौओंपर चुपचाप धावा करता है, उसी प्रकार राजा शत्रुको असावधान-दशामें ही उसपर आक्रमण करे तथा समयानुसार चींटीकी-सी चेष्टा करे—धीरे-धीरे आवश्यक वस्तुओंका संग्रह करता रहे।†

राजाको आगकी चिनगारियों तथा सेमलके बीजसे कर्त्तव्यकी शिक्षा लेनी चाहिये। जैसे आगकी छोटी-सी चिनगारी बड़े-से बड़े वनको जला डालनेकी शक्ति रखती है, उसी प्रकार


अदृष्टं नाशमाप्नोति स्रवन्नात् स्यन्दनाद्यथा। तथा राज्यात्सन्दिग्धे बहिर्यन्त्रविनिर्गमात् ॥
दुष्टादुष्टांश्च जानेयादप्यात्मानारेद्वांस्तथा। चरैश्चारांश्च शत्रोरन्वेष्टव्याः प्रयत्नतः ॥
विश्वासो न तु कर्तव्यो राज्ञा मित्रासखेष्वपि। कार्ययोगादमित्रेऽपि विश्वसीत नराधिपः ॥
स्थानवृद्धिक्षयज्ञेन षाड्गुण्यविदितात्मना। भवितव्यं नरेन्द्रेण न कामवशवर्तिना ॥
प्रणम्य मन्त्रिणाञ्चैव ततो भूत्वा नराधिपाः। ज्ञेयाश्चान्तरं पीय विश्वस्येत ततोऽरिभिः ॥
यस्त्वेतानविजिल्यैव वैरिणो विजिगीषते। सोऽजितात्माजितामात्यः शत्रुवर्गेण बाध्यते ॥
(२७। ४-११)


* तात्पर्य यह कि राजा कौवेके समान आलस्यरहित और सावधान हो। जैसे कोयल अपने अण्डेका कौवोंसे पालन करती है, वैसे ही राजा भी दूसरोंसे अपना कार्य साधन करे। वह भौंरोंके समान रसग्राही और मृगके समान सदा चौकन्ना रहे। जैसे सर्प बड़ा-बड़ा फन निकालकर दूसरोंको डराता और मेढकको चुपके-से निगल जाता है, उसी प्रकार राजा दूसरोंपर आतङ्क जमाये रहे और सहसा आक्रमण करके शत्रुको अपने अधीन कर ले। जैसे मोर अपने समेटे हुए पंखको कभी-कभी फैलाता है, उसी प्रकार राजा भी समयानुसार अपने संकुचित सैन्य और बलका विस्तार करे। वह हंसोंके समान नीर-क्षीरका विवेक करनेवाला गुणग्राही हो। मुर्गोंके समान रात रहते ही शयनसे उठकर कर्तव्यका विचार करे और लोहेकी भाँति शत्रुओंके लिये अभेद्य एवं कर्तव्यपालनमें कठोर हो।

† अस्मात्कामादयः पूर्वं जेयाः पुत्र महीभुजा। लभ्यते हि जयोऽवश्यं राज्ञा नश्यति तैर्जितः ॥
कामः क्रोधश्च लोभश्च मदो मानस्तथैव च। हर्षश्च शत्रवो ह्येते विनाशाय महीभृताम् ॥
कामरक्तोऽभवन्नाशं स्मृत्वा पाण्डुं निपातितम्। निवर्त्तयेत्तथा क्रोधादनुह्लादं हतात्मजम् ॥
हतमैलं तथा लोभान्मदाद्वैनं द्विजैर्हतम्। मानादनायुषः पुत्रं हतं हर्षात्पुरञ्जयम् ॥
एभिर्जितैर्जितं सर्वं मरुत्तेन महात्मना। स्मृत्वा विवर्जयेदेतान्दोषान् स्वीयान्यहीपतिः ॥
काककोकिलभृङ्गाणां मृगव्यालशिखण्डिनाम्। हंसकुक्कुटलोहानां शिक्षेत चरितं नृपः ॥
कौशिकस्य क्रियां कुर्याद् विपक्षे मनुजेश्वरः। चेष्टां पिपीलिकानां च काले भूयः प्रदर्शयेत् ॥
(२७। १२ १८)

८६ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


छोटा-सा शत्रु भी यदि दबाया न जाय तो बहुत बड़ी हानि कर सकता है। जैसे छोटा-सा सेमलका बीज एक महान् वृक्षके रूपमें परिणत होता है, उसी प्रकार लघु शत्रु भी समय आनेपर अत्यन्त प्रबल हो जाता है। अतः दुर्बलावस्थामें ही उसे उखाड़ फेंकना चाहिये। जैसे चन्द्रमा और सूर्य अपनी किरणोंका सर्वत्र समान रूपसे प्रसार करते हैं, उसी प्रकार नीतिके लिये राजाको भी समस्त प्रजापर समान भाव रखना चाहिये। वेश्या, कमल, शरभ, शूलिका, गर्भिणी स्त्रीके स्तन तथा ग्वालेकी स्त्रीसे भी राजाको बुद्धि सीखनी चाहिये। राजा वेश्याकी भाँति सबको प्रसन्न रखनेकी चेष्टा करे, कमल-पुष्पके समान सबको अपनी ओर आकृष्ट करे, शरभके समान पराक्रमी बने, शूलिकाकी भाँति सहसा शत्रुंका विध्वंस करे। जैसे गर्भिणीके स्तनमें भावी सन्तानके लिये दूधका संग्रह होने लगता है, उसी प्रकार राजा भविष्यके लिये संग्रहशील बने और जिस प्रकार ग्वालेकी स्त्री दूधसे नाना प्रकारके खाद्य पदार्थ तैयार करती है, वैसे ही राजाको भी भाँति-भाँतिकी कल्पनामें पटु होना चाहिये। वह पृथ्वीका पालन करते समय इन्द्र, सूर्य, यम, चन्द्रमा तथा वायु—इन पाँचोंके रूप धारण करे। जैसे इन्द्र चार महीने वर्षा करके पृथ्वीपर रहनेवाले प्राणियोंको तृप्त करते हैं, उसी प्रकार राजा दानके द्वारा प्रजाजनोंको सन्तुष्ट करे। जिस प्रकार सूर्य आठ महीनोंतक अपनी किरणोंसे पृथ्वीका जल सोखते रहते हैं, इसी प्रकार सूक्ष्म उपायोंसे धीरे-धीरे कर आदिका संग्रह करे। जैसे यमराज समय आनेपर प्रिय-अप्रिय सभीको मृत्युपाशमें बाँधते हैं, उसी प्रकार राजा भी प्रिय-अप्रिय तथा साधु और दुष्टके प्रति समान भावसे राजनीतिका प्रयोग करे। जैसे पूर्ण चन्द्रमा देखकर सब मनुष्य प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार जिस राजाके प्रति समस्त प्रजाको समानरूपसे सन्तोष हो, वही श्रेष्ठ एवं चन्द्रमाके व्रतका पालन करनेवाला है। जैसे वायु गुप्तरूपसे समस्त प्राणियोंके भीतर सञ्चार करती रहती है, उसी प्रकार राजा भी गुप्तचरके द्वारा पुरवासियों, मन्त्रियों तथा बन्धु-बान्धवोंके मनका भाव जाननेकी चेष्टा करे।*

बेटा! जिसके चित्तको दूसरे लोग लोभ, कामना अथवा अर्थसे नहीं खींच सकते, वह राजा स्वर्गलोकमें जाता है। जो अपने धर्मसे विचलित हो कुमार्गपर जानेवाले मूर्ख मनुष्योंको फिर धर्ममें लगाता है, वह राजा स्वर्गमें जाता है। वत्स! जिसके राज्यमें वर्णधर्म और आश्रमधर्मको हानि नहीं पहुँचती, उसे इस लोक और परलोकमें भी सनातन सुख प्राप्त होता है। स्वयं दुष्टबुद्धि पुरुषोंद्वारा धर्मसे विचलित न होकर ऐसे लोगोंको अपने धर्ममें लगाना ही राजाका सबसे बड़ा कर्तव्य है और


* लेशोऽपि रिपुर्नोपेक्ष्यो वर्धते बीजं शाल्मलेः। चन्द्रसूर्यस्वरूपेण नीत्यर्थे पृथिवीक्षिता॥
वेश्यालीलाशरभशूलिकागर्भिणीस्तनात् । प्रज्ञा नृपेण ग्राह्या तथा गोपायनयोषितः॥
शक्रादितन्ववत्तैर्भातं देहं धार्यं महीपतेः। रूपाणि पञ्च कुर्वीत महीपालनकर्मणि॥
दत्तेऽमृतमृते मासान् वृष्ट्याप्याययते प्रजाः। आप्याययेत् तथा लोके पर्जन्योऽयं महीपतिः॥
नायनर्तुं यथा सूर्यस्तोयं हरति रश्मिभिः। सूक्ष्मेणोपायभावेन तथा शुल्कादिकं नृपः॥
यथा दण्डं प्रियद्वेष्ये यमः काले नियच्छति। तथा प्रियेऽप्रिये राजा दुष्टादुष्टे समो भवेत्॥
पूर्णेन्दुमालोक्य यथा प्रीतिमान् जायते नरः। एवं यत्र प्रजाः सर्वा निर्वृतास्तच्छिशिव्रतः॥
मारुतः सर्वभूतेषु निगूढश्चरते यथा। एवं गुप्तैश्चरैर्बाह्यैः पौरमात्यादिबन्धुषु॥
(२७। १९-२६)

  • मदालसाके द्वारा वर्णाश्रमधर्म एवं गृहस्थके कर्तव्यका वर्णन * ८७

यही उसे सिद्धि प्रदान करनेवाला है। राजा सब प्राणियोंका पालन करनेसे ही कृतकृत्य होता है। जो यत्नपूर्वक भलीभाँति प्रजाका पालन करनेवाला है, वह प्रजाके धर्मका भागी होता है। जो राजा इस प्रकार चारों वर्णोंकी रक्षामें तत्पर रहता है, वह सर्वत्र सुखी होकर विचरता है और अन्तमें उसे इन्द्रलोककी प्राप्ति होती है।*


मदालसाके द्वारा वर्णाश्रमधर्म एवं गृहस्थके कर्तव्यका वर्णन

**अलर्कने कहा—**महाभागे! आपने राजनीति-सम्बन्धी धर्मका वर्णन किया। अब मैं वर्णाश्रमधर्म सुनना चाहता हूँ।

**मदालसा बोली—**दान, अध्ययन और यज्ञ—ये ब्राह्मणके तीन धर्म हैं तथा यज्ञ कराना, विद्या पढ़ाना और पवित्र दान लेना—यह तीन प्रकारकी उसकी आजीविका बतायी गयी है। दान, अध्ययन और यज्ञ—ये तीन क्षत्रियके भी धर्म हैं। पृथ्वीकी रक्षा तथा शस्त्र ग्रहण करके जीवननिर्वाह करना यह उसकी जीविका है। वैश्यके भी दान, अध्ययन और यज्ञ—ये तीनों ही धर्म हैं। व्यापार, पशुपालन और खेती—ये उसकी जीविका हैं। दान, यज्ञ और द्विजातियोंकी सेवा—यह तीन प्रकारका धर्म शूद्रके लिये बताया गया है। शिल्पकर्म, द्विजातियोंकी सेवा और खरीद-बिक्री—ये उसकी जीविका है। इस प्रकार ये वर्णधर्म बतलाये गये हैं। अब आश्रमधर्मोंका वर्णन सुनो। यदि मनुष्य अपने वर्णधर्मसे भ्रष्ट न हो तो वह उसके द्वारा उत्तम सिद्धिको प्राप्त होता है और निषिद्धकर्मोंके आचरणसे वह मृत्युके पश्चात् नरकमें पड़ता है।

उपनयन संस्कार होनेपर ब्रह्मचारी बालक गुरुके घरमें निवास करे। वहाँ उसके लिये जो धर्म बताया गया है, वह सुने। ब्रह्मचारी वेदोंका स्वाध्याय करे, अग्निहोत्र करे, त्रिकाल स्नान करे, भिक्षाके लिये भ्रमण करे, भिक्षामें मिला हुआ अन्न गुरुको निवेदन करके उनकी आज्ञाके अनुसार ही सदा उसका उपयोग करे, गुरुके कार्यमें सदा उद्यत रहे, भलीभाँति उन्हें प्रसन्न रखे, गुरुके बुलानेपर एकाग्रचित्तसे तत्परतापूर्वक पढ़े, गुरुके मुखसे एक, दो या सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान प्राप्त करके गुरुके चरणोंमें प्रणाम करे और उन्हें गुरुदक्षिणा देकर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करे। इस आश्रममें आनेका उद्देश्य होना चाहिये—गृहस्थाश्रम-सम्बन्धी धर्मोंका पालन। अथवा अपनी इच्छाके अनुसार वह वानप्रस्थ या संन्यास-आश्रममें प्रवेश करे अथवा वहीं गुरुके घरमें सदा निवास करते हुए ब्रह्मचर्यनिष्ठताको प्राप्त हो—नैष्ठिक ब्रह्मचारी बन जाय। गुरुके न रहनेपर उनके पुत्रकी और पुत्रके न रहनेपर उनके प्रधान शिष्यकी सेवा करे। अभिमानशून्य होकर ब्रह्मचर्य-आश्रममें रहे।

जब गृहस्थाश्रममें आनेकी इच्छा लेकर ब्रह्मचर्य


* न लोभाद्वा न कामाद्वा नार्थाद्वा यस्य मानसम्। अधर्म्यैः कुरुते वत्स स राजा स्वर्गमृच्छति॥
उत्पथग्राहिणो मूढान् स्वधर्माच्चलितान्नरान्। यः करोति विजे धर्मे स राजा स्वर्गमृच्छति॥
वर्णधर्मा न सीदन्ति यस्य राज्ञो तथाश्रमाः। तस्य तस्य सुखं प्रेत्य परत्रेह च शाश्वतम्॥
एतद्राज्ञः परं कृत्यं तथैतत् सिद्धिकारकम्। स्वधर्मस्थान् नृणां यद्वर्ते न कुबुद्धिभिः॥
पालनेनैव भूतानां कृतकृत्यो महीपतिः। सम्यक् पालित धर्मस्यांशे यत्नतः।
एवं यो वर्तते राजा चातुर्वर्ण्यस्य रक्षणे। स सुखं विचरत्येव शक्रस्यैति सलोकताम्॥
(२७। २७—३२)

८८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


आश्रमसे निकले, तब अपने अनुरूप नीरोग स्त्रीसे विधिपूर्वक विवाह करे। वह स्त्री अपने समान गोत्र और प्रवरकी न हो। उसके किसी अङ्गमें न्यूनाधिकता अथवा कोई विकार न हो। गृहस्थाश्रमका ठीक ठीक सञ्चालन करनेके लिये ही विवाह करना चाहिये। अपने पराक्रमसे धन पैदा करके देवता, पितर एवं अतिथियोंको भक्तिपूर्वक भलीभाँति तृप्त करे तथा अपने आश्रितोंका भरण-पोषण करता रहे। भृत्य, पुत्र, कुलकी स्त्रियाँ, दीन, अन्ध और पतित मनुष्योंको तथा पशु-पक्षियोंको भी यथाशक्ति अन्न देकर उनका पालन करे। गृहस्थका यह धर्म है कि वह ऋतुकालमें स्त्री-सहवास करे। अपनी शक्तिके अनुसार पाँचों यज्ञोंका अनुष्ठान न छोड़े। अपने विभवके अनुसार पितर, देवता, अतिथि एवं कुटुम्बीजनोंके भोजन करनेसे बचे हुए अन्नको ही स्वयं भृत्यजनोंके साथ बैठकर आदरपूर्वक ग्रहण करे। यह मैंने संक्षेपसे गृहस्थाश्रमके धर्मका वर्णन किया है।

अब वानप्रस्थके धर्मका वर्णन करती हूँ, ध्यान देकर सुनो। बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि वह अपनी सन्तानको देखकर तथा देह झुकी जा रही है, इस बातका विचार करके आत्मशुद्धिके लिये वानप्रस्थ-आश्रममें जाय। वहाँ वनके फल-मूलोंका उपभोग करे और तपस्यासे शरीरको सुखाता रहे। पृथ्वीपर सोये, ब्रह्मचर्यका पालन करे, देवताओं, पितरों और अतिथियोंकी सेवामें संलग्न रहे। अग्निहोत्र, त्रिकाल-स्नान तथा जटा-वल्कल धारण करे; सदा योगाभ्यासमें लगा रहे और वनवासियोंपर स्नेह रखे। इस प्रकार यह पापोंकी शुद्धि तथा आत्माका उपकार करनेके लिये वानप्रस्थ-आश्रमका वर्णन किया है।

अब चतुर्थ आश्रमका स्वरूप बतलाती हूँ, सुनो। धर्मज्ञ महात्माओंने इस आश्रमके लिये जो धर्म बतलाया है, वह इस प्रकार है। सब प्रकारकी आसक्तियोंका त्याग, ब्रह्मचर्यका पालन, क्रोधशून्यता, जितेन्द्रियता, एक स्थानपर अधिक दिनोंतक न रहना, किसी कर्मका आरम्भ न करना, भिक्षामें मिले हुए अन्नका एक बार भोजन करना, आत्मज्ञान होनेकी इच्छाको जगाये रखना तथा सर्वत्र आत्माका दर्शन करना। यह मैंने चतुर्थ आश्रमका धर्म बतलाया है।

अब अन्यान्य वर्णों तथा आश्रमोंके सामान्य धर्मका वर्णन सुनो। सत्य, शौच, अहिंसा, दोषदृष्टिका अभाव, क्षमा, क्रूरताका अभाव, दीनताका न होना तथा सन्तोष धारण करना—ये वर्ण और आश्रमोंके धर्म संक्षेपसे बताये गये हैं। जो पुरुष अपने वर्ण और आश्रम-सम्बन्धी धर्मको छोड़कर उसके विपरीत आचरण करता है, वह राजाके लिये दण्डनीय है। जो मानव अपने धर्मका त्याग करके पापकर्ममें लग जाते हैं, उनकी उपेक्षा करनेवाले राजाके इष्ट१ और आपूर्त२ धर्म नष्ट हो जाते हैं।

बेटा! गृहस्थ-धर्मका आश्रय लेकर मनुष्य इस सम्पूर्ण जगत्‌का पोषण करता है और उससे मनोवाञ्छित लोकोंको जीत लेता है। पितर, मुनि, देवता, भूत, मनुष्य, कृमि, कीट, पतङ्ग, पशु-पक्षी तथा असुर—ये सभी गृहस्थसे ही जीविका चलाते हैं। उसीके दिये हुए अन्न-पानसे तृप्ति लाभ करते हैं तथा 'क्या यह हमें भी कुछ देगा?' इस आशासे सदा उसका मुँह ताकते रहते हैं। वत्स! वेदत्रयीरूप धेनु सबकी आधारभूता है, उसीमें सम्पूर्ण विश्व प्रतिष्ठित है तथा वही विश्वकी उत्पत्तिका कारण मानी गयी है। ऋग्वेद उसकी पीठ, यजुर्वेद उसका मध्यभाग तथा सामवेद उसका मुख और गर्दन है। इष्ट और आपूर्त धर्म


१. देवपूजा, अग्निहोत्र तथा यज्ञ-यागादि कर्म 'इष्ट' कहलाते हैं।
२. कुआँ और बावली खुदवाना, बगीचे लगवाना तथा धर्मशाला बनवाना आदि कार्य 'आपूर्त' धर्मके अन्तर्गत हैं।

५. स्वायम्भुव आदि मन्वन्तर वर्णन

  • मदालसाके द्वारा वर्णाश्रमधर्म एवं गृहस्थके कर्तव्यका वर्णन * ८९

ही उसके दो सींग हैं। अच्छी-अच्छी सूक्तियाँ ही उस धेनुके रोम हैं, शान्तिकर्म गोबर और पुष्टिकर्म उसका मूत्र है। अकार आदि वर्ण उसके अङ्गोंके आधारभूत चरण हैं। सम्पूर्ण जगत्‌का जीवन उसीसे चलता है। वह वेदत्रयीरूप धेनु अक्षय है, उसका कभी क्षय नहीं होता। स्वाहा (देवयज्ञ), स्वधा (पितृयज्ञ), वषट्कार (ऋषि आदिकी प्रसन्नताके लिये किये जानेवाले यज्ञ) तथा हन्तकार (अतिथियज्ञ) -ये उसके चार स्तन हैं। स्वाहारूप स्तनको देवता, स्वधाको पितर, वषट्कारको मुनि तथा हन्तकाररूप स्तनको मनुष्य सदा पीते हैं। इस प्रकार यह त्रयीमयी धेनु सबको तृप्त करती है। जो मनुष्य उन देवता आदिकी वृत्तिका उच्छेद करता है, वह अत्यन्त पापाचारी है। उसे अन्धतामिस्र एवं तामिस्र नरकमें गिरना पड़ता है। जो इस धेनुको इसके देवता आदि बछड़ोंसे मिलाता है और उन्हें उचित समयपर पीनेका अवसर देता है, वह स्वर्गमें जाता है। अतः बेटा! जैसे अपने शरीरका पालन-पोषण किया जाता है, उसी प्रकार मनुष्यको प्रतिदिन देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य तथा अन्य भूतोंका भी पोषण करना चाहिये। इसलिये प्रातःकाल स्नान करके पवित्र हो एकाग्रचित्तसे जलद्वारा देवता, ऋषि, पितर और प्रजापतिको तर्पण करना चाहिये। मनुष्य फूल, गन्ध और धूप आदि सामग्रियोंसे देवताओंकी पूजा करके आहुतिके द्वारा अग्निको तृप्त करे। तत्पश्चात् बलि दे।

ब्रह्मा और विश्वेदेवोंके उद्देश्यसे घरके मध्यभागमें बलि (पूजोपहार) अर्पण करे। पूर्व और उत्तरके कोणमें मन्वन्तरके लिये बलि प्रस्तुत करे। पूर्व दिशामें इन्द्रको, दक्षिण दिशामें यमको, पश्चिममें वरुणको तथा उत्तरमें सोमको बलि दे। घरके दरवाजेपर धाता और विधाताके लिये बलि अर्पण करे। घरके बाहर चारों ओर अर्यमा देवताके निमित्त बलि प्रस्तुत करे। निशान्चरों और भूतोंको आकाशमें बलि दे। गृहस्थ पुरुष एकाग्रचित्त हो दक्षिण दिशाकी ओर मुँह करके तत्परतापूर्वक पितरोंके उद्देश्यसे पिण्ड दे। तदनन्तर विद्वान् पुरुष जल लेकर उन्हीं-उन्हीं स्थानोंपर उन्हीं-उन्हीं देवताओंके उद्देश्यसे आचमनके लिये जल छोड़े। इस प्रकार गृहस्थ पुरुष घरमें पवित्रतापूर्वक गृह-देवताओंके उद्देश्यसे बलि देकर अन्य भूतोंकी तृप्तिके लिये आदरपूर्वक अन्नका त्याग करे। कुत्तों, चाण्डालों तथा पक्षियोंके लिये पृथ्वीपर अन्न रख दे। यह वैश्वदेव नामक कर्म है। इसे प्रातःकाल और सायंकाल आवश्यक बताया गया है।

इसके बाद बुद्धिमान् पुरुष आचमन करके कुछ कालतक अतिथिकी प्रतीक्षा करते हुए घरके दरवाजेकी ओर दृष्टि रखे। यदि कोई अतिथि वहाँ आ जाय तो यथाशक्ति अन्न, जल, गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा उसका सत्कार करे। अपने ग्रामवासी पुरुषको या मित्रको अतिथि न बनाये। जिसके कुल और नाम आदिका ज्ञान न हो, जो उसी समय वहाँ उपस्थित हुआ हो, भोजनकी इच्छा रखता हो, थका-माँदा आया हो, अन्न माँगता हो, ऐसे अकिञ्चन ब्राह्मणको अतिथि कहते हैं। विद्वान् पुरुषोंको उचित है कि वे अपनी शक्तिके अनुसार उस अतिथिका पूजन करें। उसका गोत्र और शाखा न पूछें। उसने कहाँतक अध्ययन किया है, इसकी जिज्ञासा भी न करें। उसकी आकृति सुन्दर हो या असुन्दर, उसे साक्षात् प्रजापति समझें। वह नित्य स्थित नहीं रहता, इसीलिये उसे अतिथि कहते हैं। उसकी तृप्ति होनेपर गृहस्थ पुरुष मनुष्य-यज्ञके ऋणसे मुक्त हो जाता है। जो उस अतिथिको अन्न दिये बिना ही स्वयं भोजन करता है, वह मनुष्य पापभोजी है; वह केवल पाप भोजन करता है और दूसरे जन्ममें उसे विष्ठा खानी पड़ती है। अतिथि जिसके घरसे निराश होकर लौटता है, उसको अपना पाप दे स्वयं उसका

[539] सं० मा० पु०-४