भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

बन्धु-बान्धव भी गुणवान् पुरुषके चिरंजीवी होनेकी अभिलाषा करते हैं। जिनकी कभी निन्दा नहीं हुई, जो दीन-दुखियोंपर दया करते तथा आपत्तिग्रस्त मनुष्य जिनकी शरण लेते हैं, ऐसे गुणवान् पुरुषोंका ही जन्म सफल है।'

वीर कुवलयाश्वसे यों कहकर उनका स्वागत-सत्कार करनेके लिये नागराज अपने पुत्रोंसे बोले—'बेटा! क्रमशः स्नान आदि सब कार्य पूरा करके इन्हें इच्छानुसार भोजन कराओ। उसके बाद हमलोग इनसे मनको प्रसन्न करनेवाली बातें करते हुए कुछ कालतक एक साथ बैठेंगे।' राजा शत्रुजित्‌के पुत्रने चुपचाप उनकी आज्ञा स्वीकार की। तत्पश्चात् सत्यवादी नागराजने अपने पुत्रों तथा राजकुमारके साथ प्रसन्नतापूर्वक भोजन किया।


ऋतध्वजको मदालसाकी प्राप्ति, बाल्यकालमें अपने पुत्रोंको मदालसाका उपदेश

सुमति कहते हैं—नागराज महात्मा अश्वतर जब भोजन कर चुके, तब उनके पुत्र और राजकुमार ऋतध्वज—तीनों उनके पास आकर बैठे। नागराजने मनको प्रिय लगनेवाली बातें कहकर अपने पुत्रोंके सखाको प्रसन्न किया और पूछा—'आयुष्मन्! आज तुम मेरे घरपर आये हो। अतः जिससे तुम्हें सुख मिले, ऐसी किसी वस्तुके लिये यदि तुम्हारी इच्छा हो तो बताओ। जैसे पुत्र अपने पितासे मनकी बात कहता है, उसी प्रकार तुम भी निःशङ्क होकर मुझसे अपना मनोरथ कहो। सोना, चाँदी, वस्त्र, वाहन, आसन अथवा और कोई अत्यन्त दुर्लभ एवं मनोवाञ्छित वस्तु मुझसे माँगो।'

कुवलयाश्वने कहा—भगवन्! आपके प्रसादसे मेरे पिताके घरमें आज भी सुवर्ण आदि सभी बहुमूल्य वस्तुएँ मौजूद हैं। इन सब वस्तुओंकी मुझे आवश्यकता नहीं है। जबतक पिताजी हजारों वर्षोंतक पृथ्वीका शासन करते हैं और आप पाताललोकका राज्य करते हैं, तबतक मेरा मन याचना करनेके लिये उत्सुक नहीं हो सकता। जिनके पिता जीवित हैं, वे परम सौभाग्यशाली और पुण्यात्मा हैं। भला, मेरे पास क्या नहीं है। सज्जन मित्र, नीरोग शरीर, धन और यौवन—सभी कुछ तो है। जो इस बातकी चिन्ता न करके कि मेरे घरमें धन है या नहीं—पिताकी भुजाओंकी छत्रच्छायामें रहते हैं, वे ही सुखी हैं। जो लोग बचपनसे ही पितृहीन होकर कुटुम्बका भार वहन करते हैं, उनका सुखभोग छिन जानेके कारण मैं तो यही समझता हूँ कि विधाताने ही उन्हें सौभाग्यसे वंचित कर रखा है। मैं तो आपकी कृपासे पिताजीके दिये हुए धन-रत्न आदिके भंडारमेंसे प्रतिदिन याचकोंको, उनकी इच्छाके अनुसार दान देता रहता हूँ। यहाँ आकर मैंने अपने मुकुटसे जो आपके दोनों चरणोंका स्पर्श किया तथा आपके शरीरसे मेरा स्पर्श हुआ, इसीसे मैं सब कुछ पा गया।

राजकुमारका यह विनययुक्त वचन सुनकर नागराज अश्वतरने प्रेमपूर्वक कहा—'यदि मुझसे रत्न और सुवर्ण आदि लेनेका तुम्हारा मन नहीं होता तो और ही कोई वस्तु जो तुम्हारे मनको प्रसन्न कर सके, माँगो। मैं तुम्हें दूँगा।'

कुवलयाश्वने कहा—भगवन्! आपके प्रसादसे मेरे घरमें सब कुछ है, विशेषतः आपके दर्शनसे मुझे सब मिल गया। आप देवता हैं और मैं मनुष्य। आपने अपने शरीरसे जो मेरा आलिङ्गन किया—इसीसे मैं कृतकृत्य हूँ। मेरा जीवन सफल हो गया। नागराज! आपकी चरण-धूलिने