भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 79
  • ऋतध्वजको मदालसाकी प्राप्ति, बाल्यकालमें अपने पुत्रोंको मदालसाका उपदेश * ७१

जो मेरे मस्तकपर अपना स्थान बनाया है, उसीसे मैंने क्या नहीं पा लिया। यदि आपको मुझे मनोवाञ्छित वर देना ही है तो यही दीजिये कि मेरे हृदयसे पुण्यकर्मोंका संस्कार कभी दूर न हो।

अश्वतर बोले—विद्वन्! ऐसा ही होगा। तुम्हारी बुद्धि धर्ममें लगी रहेगी। तथापि इस समय तुम मेरे घरमें आये हो; इसलिये तुम्हें मनुष्यलोकमें जो वस्तु दुर्लभ प्रतीत होती हो, वही मुझसे माँग लो।

उनकी यह बात सुनकर राजकुमार ऋतध्वज अपने दोनों मित्र नागकुमारोंके मुखकी ओर देखने लगे। तब उन दोनोंने पिताको प्रणाम करके राजपुत्रका जो अभीष्ट था, उसे स्पष्ट रूपसे कहना आरम्भ किया।

नागकुमार बोले—पिताजी! गन्धर्वराजकुमारी मदालसा इनकी प्यारी पत्नी थी। उसको किसी दुष्ट बुद्धिवाले दुरात्मा दानवने, जो इनके साथ वैर रखता था, धोखा दिया। उसने उसी दानवके मुखसे इनकी मृत्युका समाचार सुनकर अपने प्यारे प्राणोंको त्याग दिया। तब इन्होंने अपनी पत्नीके प्रति कृतज्ञ होकर यह प्रतिज्ञा कर ली कि अब मदालसाको छोड़कर दूसरी कोई स्त्री मेरी पत्नी नहीं हो सकती। पिताजी! ये वीर ऋतध्वज आज उसी सर्वाङ्गसुन्दरी मदालसाको देखना चाहते हैं। यदि ऐसा किया जा सके तो इनका मनोरथ पूर्ण हो सकता है।

तब नागराज घरमें छिपायी हुई मदालसाको ले आये और राजकुमारको उसे दिखाया तथा पूछा—'ऋतध्वज! यह तुम्हारी पत्नी मदालसा है या नहीं?' उसे देखते ही राजकुमार लज्जा छोड़कर उठे और 'हा प्रिये!' कहते हुए उसकी ओर बढ़े। तब नागराजने उसे रोका और मदालसाके मरकर जीवित होने आदिकी सारी कथा कह सुनायी। फिर तो राजकुमारने प्रसन्न होकर अपनी प्यारी पत्नीको ग्रहण किया। तदनन्तर उनके स्मरण करते ही उनका प्यारा अश्व वहाँ आ पहुँचा। उस समय नागराजको प्रणाम करके वे अश्वपर आरूढ़ हुए और मदालसाके साथ अपने नगरको चल दिये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने अपने पिता-मातासे उसके मरकर जीवित होनेका सब समाचार निवेदन किया। कल्याणमयी मदालसाने भी सास-ससुरके चरणोंमें प्रणाम किया तथा अन्य स्वजनोंको भी यथायोग्य सम्मान दिया। तत्पश्चात् उस नगरमें पुरवासियोंके यहाँ बहुत बड़ा उत्सव हुआ।

इसके बाद बहुत समय बीतनेके पश्चात् महाराज शत्रुजित् पृथ्वीका भलीभाँति पालन करके परलोकवासी हो गये; तब पुरवासियोंने उनके महात्मा पुत्र ऋतध्वजको, जिनके आचरण तथा व्यवहार बड़े ही उदार थे, राजपदपर अभिषिक्त किया। वे भी अपनी प्रजाका औरस पुत्रोंकी भाँति पालन करने लगे। तदनन्तर मदालसाके गर्भसे प्रथम पुत्र उत्पन्न हुआ।