संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
राजाने उसका नाम विक्रान्त रखा। इससे कुटुम्बके सब लोग बड़े प्रसन्न हुए, किन्तु मदालसा वह नाम सुनकर हँसने लगी। उसने उत्तान सोकर जोर-जोरसे रोते हुए शिशुको बहलानेके व्याजसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—
शुद्धोऽसि रे तात न तेऽस्ति नाम कृतं हि ते कल्पनयाधुनैव। पञ्चात्मकं देहमिदं न तेऽस्ति नैवास्य त्वं रोदिषि कस्य हेतोः॥
हे तात! तू तो शुद्ध आत्मा है, तेरा कोई नाम नहीं है। यह कल्पित नाम तो तुझे अभी मिला है। यह शरीर भी पाँच भूतोंका बना हुआ है। न यह तेरा है, न तू इसका है। फिर किसलिये रो रहा है?
न वा भवान् रोदिति नैव स्वजन्मा शब्दोऽयमासाद्य महीशसूनुम्। विकल्प्यमाना विविधा गुणास्ते- गुणाश्च भौताः सकलेन्द्रियेषु॥
अथवा तू नहीं रोता है, यह शब्द तो राजकुमारके पास पहुँचकर अपने-आप ही प्रकट होता है। तेरी सम्पूर्ण इन्द्रियोंमें जो भाँति-भाँतिके गुण-अवगुणोंकी कल्पना होती है, वे भी पाञ्चभौतिक ही हैं?
भूतानि भूतैः परिदुर्बलानि वृद्धिं समायान्ति यथेह पुंसः। अन्नाम्बुदानादिभिरेव कस्य न तेऽस्ति वृद्धिर्न च तेऽस्ति हानिः॥
जैसे इस जगत्में अत्यन्त दुर्बल भूत अन्य भूतोंके सहयोगसे वृद्धिको प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार अन्न और जल आदि भौतिक पदार्थोंके देनेसे पुरुषके पाञ्चभौतिक शरीरकी ही पुष्टि होती है। इससे तुझ शुद्ध आत्माकी न तो वृद्धि होती है और न हानि ही होती है।
त्वं कञ्चुके शीर्यमाणे निजेऽस्मि- स्तस्मिंश्च देहे मूढतां मा व्रजेथाः॥ शुभाशुभैः कर्मभिर्देहमेत- न्मदादिमूढैः कञ्चुकस्ते पिनद्धः॥
तू अपने उस चोले तथा इस देहरूपो चोलेके जीर्ण-शीर्ण होनेपर मोह न करना। शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार यह देह प्राप्त हुआ है। तेरा यह चोला मद आदिसे बँधा हुआ है (तू तो सर्वथा इससे मुक्त है)।
तातेति किंचित् तनयेति किंचि- दम्बेति किंचिद्दयितेति किंचित्। ममेति किंचिन्न ममेति किंचित् त्वं भूतसङ्घं बहु मानयेथाः॥
कोई जीव पिताके रूपमें प्रसिद्ध है, कोई पुत्र कहलाता है, किसीको माता और किसीको प्यारी स्त्री कहते हैं; कोई 'यह मेरा है' कहकर अपनाया जाता है और कोई 'मेरा नहीं है' इस भावसे पराया माना जाता है। इस प्रकार ये भूतसमुदायके ही नाना रूप हैं, ऐसा तुझे मानना चाहिये।
दुःखानि दुःखोपगमाय भोगान् सुखाय जानाति विमूढचेताः। तान्येव दुःखानि पुनः सुखानि जानाति विद्वानविमूढचेताः॥