संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 81, कुल 296 में से
संदर्भ में पढ़ें- ऋतध्वजको मदालसाकी प्राप्ति, बाल्यकालमें अपने पुत्रोंको मदालसाका उपदेश * ८१
यद्यपि समस्त भोग दुःखरूप हैं तथापि मूढ़चित्तमानव उन्हें दुःख दूर करनेवाला तथा सुखकी प्राप्ति करानेवाला समझता है; किन्तु जो विद्वान् हैं, जिनका चित्त मोहसे आच्छन्न नहीं हुआ है, वे उन भोगजनित सुखोंको भी दुःख ही मानते हैं।
हासोऽस्थिसंदर्शनमक्षियुग्म-
मत्त्युज्ज्वलं यत्कलुषं वसायाः।
कुचादि पीनं पिशितं घनं तत्
स्थानं रतेः किं नरकं न योषित्॥
स्त्रियोंकी हँसी क्या है, हड्डियोंका प्रदर्शन। जिसे हम अत्यन्त सुन्दर नेत्र कहते हैं, वह मज्जाकी कलुषता है और मोटे-मोटे कुच आदि घने मांसकी ग्रन्थियाँ हैं; अतः पुरुष जिसपर अनुराग करता है, वह युवती स्त्री क्या नरककी जीती-जागती मूर्ति नहीं है ?
यानं क्षितौ यानगतश्च देहो
देहेऽपि चान्यः पुरुषो निविष्टः।
ममत्वमूर्च्या न तथा यथा स्वे
देहेऽतिमात्रं च विमूढतैषा ॥
पृथ्वीपर सवारी चलती है, सवारीपर यह शरीर रहता है और इस शरीरमें भी एक दूसरा पुरुष बैठा रहता है; किन्तु पृथ्वी और सवारीमें वैसी अधिक ममता नहीं देखी जाती, जैसी कि अपने देहमें दृष्टिगोचर होती है। यही मूर्खता है।
ज्यों-ज्यों वह बालक बढ़ने लगा, त्यों-ही-त्यों महारानी मदालसा प्रतिदिन उसे बहलाने आदिके द्वारा ममताशून्य ज्ञानका उपदेश करने लगी। जैसे-जैसे उसके शरीरमें बल आता गया और जैसे-जैसे वह पितासे व्यावहारिक बुद्धि सीखने लगा, वैसे-ही-वैसे माताके वचनोंसे उसे आत्मतत्वका ज्ञान भी प्राप्त होता गया। इस प्रकार माताने जन्मसे ही अपने पुत्रको ऐसा उपदेश दिया, जिससे ज्ञानी एवं ममताशून्य होकर उसने गार्हस्थ्य-धर्मके प्रति अपने मनको नहीं जाने दिया। इसी प्रकार जब मदालसाके गर्भसे दूसरा पुत्र उत्पन्न हुआ, तब पिताने उसका नाम सुबाहु रखा। इसपर भी मदालसा हँसने लगी। उस बालकको भी वह पहलेकी ही भाँति बहलाते-बहलाते बचपनसे ही ऐसा उपदेश देने लगी, जिससे वह परम बुद्धिमान् ज्ञानी हो गया। तृतीय पुत्र उत्पन्न होनेपर राजाने उसका नाम शत्रुमर्दैन रखा। इसपर भी सुन्दरी मदालसा बहुत देरतक हँसती रही तथा उसको भी उसने पहलेकी ही भाँति बाल्यकालसे ही ज्ञानका उपदेश दिया। बड़ा होनेपर वह निष्काम कर्म करने लगा। सकाम कर्मकी ओर उसकी रुचि नहीं रही। राजा ऋतध्वज जब चौथे पुत्रका नामकरण करने चले, तब सदाचारपरायणा मदालसापर उनकी दृष्टि पड़ी। उस समय वह मन्द-मन्द मुसकरा रही थी। उसे हँसते देख राजाको कुछ कौतूहल हुआ; अतः उन्होंने पूछा—'देवि! जब मैं नामकरण करने चलता हूँ, तब तुम हँसती क्यों हो? इसका कारण बताओ। मैं तो समझता हूँ विक्रान्त, सुबाहु और शत्रुमर्दैन—ये सुन्दर नाम रखे गये हैं। ये क्षत्रियोंके योग्य तथा शौर्यमें उपयोगी हैं; भद्रे! यदि तुम्हारे मनमें यह बात हो कि ये नाम अच्छे नहीं हैं तो मेरे चौथे पुत्रका नाम तुम स्वयं ही रखो।'
मदालसा बोली—महाराज! आपकी आज्ञाका पालन करना मेरा कर्तव्य है; अतः आप जैसा कहते हैं, उसके अनुसार मैं आपके चौथे पुत्रका नाम स्वयं ही रखूँगी। यह धर्मज्ञ बालक इस संसारमें अलर्कके नामसे विख्यात होगा। आपका यह कनिष्ठ पुत्र बड़ा बुद्धिमान् होगा।
माताके द्वारा रखे गये 'अलर्क' इस असम्बद्ध नामको सुनकर राजा ठठाकर हँस पड़े और इस प्रकार बोले—'शुभे! तुमने मेरे पुत्रका जो यह अलर्क नाम रखा है, उसका क्या कारण है? ऐसा असम्बद्ध नाम क्यों रखा? इसका अर्थ क्या है?'