भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 75

• तालकेतुके कपटसे मरी हुई मदालसाकी नागराजके फणसे उत्पत्ति और ऋतध्वजका पाताललोकमें गमन • ७५


स्थानमें देखे जाते हैं, उन सबकी उपलब्धि तुम्हींसे होती है। मूर्त, अमूर्त, समस्त भूत अथवा एक-एक भूत जो कुछ भी द्युलोक, पृथ्वी, आकाश या अन्य स्थानमें उपलब्ध होता है, वह सब तुम्हारे ही स्वर और व्यञ्जनोंसे सम्बद्ध है।

इस प्रकार स्तुति करनेपर श्रीविष्णुकी जिह्वारूपा सरस्वतीदेवीने प्रकट हो महात्मा अश्वतर नागसे कहा—‘कम्बलके भाई नागराज अश्वतर! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसे बताओ। मैं तुम्हें वर दूँगी।’

अश्वतर बोले—देवि! पहले तो आप कम्बलको ही मुझे सहायकरूपमें दीजिये और हम दोनों भाइयोंको सङ्गीतके समस्त स्वरोंका ज्ञान करा दीजिये।

सरस्वतीने कहा—नागराज! सात स्वर, सातों ग्राम, राग, सातों गीत, सातों मूर्च्छनाएँ, उनचास प्रकारकी तानें और तीन ग्राम—इन सबको तुम और कम्बल भी गा सकते हो। इसके सिवा मेरी कृपासे तुम्हें चार प्रकारके पद, तीन ताल और तीन लयोंका भी ज्ञान हो जायगा। मैंने तीनों यति और चारों प्रकारके बाजोंका ज्ञान भी तुम्हें दे दिया। यह सब तो मेरे प्रसादसे तुम्हें मिलेगा ही; और भी इसके अन्तर्गत जो स्वर-व्यञ्जनसम्बन्धी विज्ञान है, वह सब भी तुमको और कम्बलको मैंने प्रदान किया। तुम दोनों भाई सङ्गीतकी सम्पूर्ण कलामें जितने कुशल होओगे, वैसा भूलोक, देवलोक और पाताललोकमें भी दूसरा कोई नहीं होगा।

सत्रकी जिह्वारूपा सरस्वतीदेवी यों कहकर तत्काल अन्तर्धान हो गयीं। उन दोनों भाइयोंको सरस्वतीजीके कथनानुसार पद, ताल और स्वर आदिका उत्तम ज्ञान प्राप्त हुआ। तदनन्तर वे कैलाशशिखरपर निवास करनेवाले भगवान् शङ्करकी आराधना करनेके लिये वहाँ गये और वीणाकी लयके साथ सात प्रकारके गीतोंसे शङ्करजीको प्रसन्न करनेके लिये पूर्ण प्रयत्न करने लगे। प्रातःकाल, रात्रिमें, मध्याह्नके समय और दोनों सन्ध्याओंमें वे भगवत्परायण होकर भगवान् शङ्करकी स्तुति करने लगे। बहुत समयतक स्तुति करनेके बाद उनके गीतसे भगवान् शङ्कर प्रसन्न हुए और बोले—‘वर माँगो।’ तब कम्बलसहित अश्वतरने महादेवजीको प्रणाम करके कहा—‘भगवन्! यदि