संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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आप हम दोनोंपर प्रसन्न हैं तो हमें मनोवाञ्छित वर दें। कुवलयाश्वकी पत्नी मदालसा, जो अब मर चुकी है, पहलेकी ही अवस्था में मेरी कन्याके रूपमें प्रकट हो। उसे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण हो, पहले ही जैसी उसकी कान्ति हो तथा वह योगिनी एवं योगविद्याकी जननी होकर मेरे घरमें उत्पन्न हो।'
महादेवजीने कहा— नागराज! तुमने जो कुछ कहा है, वह सब मेरे प्रसादसे निश्चय ही पूर्ण होगा। श्राद्धका दिन आनेपर तुम उसमें दिये हुए मध्यम पिण्डको शुद्ध एवं पवित्रचित्त होकर खा लेना। उसके खा लेनेपर तुम्हारे मध्यम फणसे कल्याणी मदालसा जैसे मरी है, उसी रूपमें उत्पन्न होगी। तुम इसी कामनाको मनमें लेकर उस दिन पितरोंका तर्पण करना, इससे वह तत्काल ही तुम्हारे मध्यम फणसे प्रकट हो जायगी।
यह सुनकर वे दोनों भाई महादेवजीके चरणोंमें प्रणाम करके बड़े सन्तोषके साथ पुनः रसातलमें लौट आये। अश्वतरने उसी प्रकार श्राद्ध किया और मध्यम पिण्डका विधिपूर्वक भोजन किया। फिर जब उक्त मनोरथको लेकर वे तर्पण करने लगे, उस समय उनके साँस लेते हुए मध्यम फणसे सुन्दरी मदालसा तत्काल प्रकट हो गयी। नागराजने यह रहस्य किसीको नहीं बताया। मदालसाको महलके भीतर गुप्तरूपसे स्त्रियोंके संरक्षणमें रख दिया। इधर नागराजके पुत्र प्रतिदिन द्युलोकमें जाते और ऋतध्वजके साथ देवताओंकी भाँति क्रीड़ा करते थे। एक दिन नागराजने प्रसन्न होकर अपने पुत्रोंसे कहा—'मैंने पहले तुमलोगोंको जो कार्य बताया था, उसे तुम क्यों नहीं करते? पुत्रो! राजकुमार ऋतध्वज हमारे उपकारी और सम्मानदाता हैं, फिर उनका भी उपकार करनेके लिये तुमलोग उन्हें मेरे पास क्यों नहीं ले आते?'
अपने स्नेही पिताके यों कहनेपर वे दोनों मित्रके नगरमें गये और कुछ बातचीतका प्रसङ्ग चलाकर उन्होंने कुवलयाश्वको अपने घर चलनेके लिये कहा। तब राजकुमारने उन दोनोंसे कहा—'सखे! यह घर भी तो आप ही दोनोंका है। धन, वाहन, वस्त्र आदि जो कुछ भी मेरा है, वह सब आपका भी है। यदि आपका मुझपर प्रेम है तो आप धन-रत्न आदि जो कुछ किसीको देना चाहें, यहाँसे लेकर दें। दुर्देवने मुझे आपके स्नेहसे इतना वञ्चित कर दिया कि आप मेरे घरको अपना नहीं समझते। यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हों, अथवा यदि आपका मुझपर अनुग्रह हो तो मेरे धन और गृहको आपलोग अपना ही समझें। आपलोगोंका जो कुछ है, वह मेरा है और मेरा आपलोगोंका है। आपलोग मेरे बाहरी प्राण हैं, इस बातको सत्य मानें। मैं अपने हृदयकी शपथ दिलाकर कहता हूँ, आप मुझपर कृपा करके फिर ऐसी भेदभावको सूचित करनेवाली बात कभी मुँहसे न निकालें।'
यह सुनकर उन दोनों नागकुमारोंके मुख स्नेहके आँसुओंसे भींग गये और वे कुछ प्रेमपूर्ण रोषसे बोले—'ऋतध्वज! तुम जो कुछ कहते हो, उसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। हमारे मनमें भी