भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *


वेद, तीन विद्याएँ, तीन अग्नि, तीन ज्योति, धर्म आदि तीन वर्ग, तीन गुण, तीन शब्द, तीन दोष, तीन आश्रम, तीन काल, तीन अवस्थाएँ, त्रिविध पितर, दिन-रात और सन्ध्या—ये सभी तीन मात्राओंके अन्तर्गत हैं। देवि सरस्वति! इस प्रकार यह सब तुम्हारा ही स्वरूप है। भिन्न-भिन्न प्रकारके दृष्टिकोण रखनेवाले व्यक्तियोंके लिये जो ब्रह्मके आदि एवं सनातन स्वरूपभूत सात प्रकारकी सोमयज्ञसंस्थाएँ, सात प्रकारकी हविर्यज्ञ²-संस्थाएँ तथा सात प्रकारकी पाकयज्ञ³संस्थाएँ वेदमें वर्णित हुई हैं, उन सबका अनुष्ठान ब्रह्मवादी पुरुष तुम्हारे अङ्गभूत मन्त्रोंके उच्चारणसे ही करते हैं।

अनिर्देश्यं तथा चान्यदर्धमात्राश्रितं परम्॥
अविकार्यक्षयं दिव्यं परिणामविवर्जितम्।
तवैव च परं रूपं यन्न शक्यं मयेरितुम्॥
न चास्येन न वा जिह्वाताल्वोष्ठादिभिरुच्यते।
इन्द्रोऽपि वसवो ब्रह्मा चन्द्रार्कौ ज्योतिरेव च॥
विश्वावासं विश्वरूपं विश्वेशं परमेश्वरम्।
सांख्यवेदान्तवेदोक्तं बहुशाखास्थिरीकृतम्॥
अनादिमध्यनिधनं सदसन्न सदैव तु।
एकं त्वनेकं नाप्येकं भवभेदसपाश्रितम्॥
अनाख्यं षड्गुणाख्यं च षट्काख्यं त्रिगुणाश्रयम्।
नानाशक्तिमतामेकं शक्तिर्भवभविकं परम्॥
सुखासुखमहात्सौख्यं रूपं तव विभाव्यते।
एवं देवि त्वया व्याप्तं सकलं निष्कलं च यत्॥
अद्वैतावस्थितं ब्रह्म यच्च द्वैते व्यवस्थितम्।

उक्त तीन मात्राओंसे परे जो अर्धमात्राके आश्रित बिन्दु है, उसका वाणीद्वारा निर्देश नहीं किया जा सकता। वह अविकारी, अक्षय, दिव्य तथा परिणामशून्य है। देवि! वह आपका ही स्वरूप है, जिसका वर्णन मेरे द्वारा असम्भव है। मुख, जीभ, तालु और ओठ आदि किसी भी स्थानसे उसका उच्चारण नहीं हो सकता। इन्द्र, वसु, ब्रह्मा, चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि भी वही है। वही सम्पूर्ण जगत्‌का निवासस्थान, जगत्स्वरूप, जगत्‌का ईश्वर एवं परमेश्वर है। सांख्य, वेदान्त और वेदोंमें उसीका प्रतिपादन हुआ है। अनेकों शाखाओंमें उसीके स्वरूपका निश्चय किया गया है। वह आदि-अन्तसे रहित है तथा सत्-असत्‌से विलक्षण होता हुआ भी सत्स्वरूप ही है। अनेक रूपोंमें प्रतीत होता हुआ भी एक है और एक होकर भी जगत्‌के भेदोंका आश्रय लेकर अनेक है। वह नाम-रूपसे रहित है। छः गुण, छः वर्ग तथा तीन गुण भी उसीके आश्रित हैं। वह एक ही परम शक्तिमान् तत्त्व है, जो नाना प्रकारकी शक्ति रखनेवाले जीवोंमें शक्तिका सञ्चार करता रहता है। सुख, दुःख तथा महासौख्य—सब उसी अर्धमात्रारूप तुरीयपदके स्वरूप हैं। इस प्रकार तीनों मात्राओंसे अतीत जो तुरीय धामरूप ब्रह्म है, वह तुम्हींमें अभिव्यक्त होता है। देवि! इस तरह सकल, निष्कल, अद्वैतनिष्ठ तथा द्वैतनिष्ठ जो ब्रह्म है, वह भी तुमसे व्याप्त है।

येऽर्था नित्या ये विनश्यन्ति चान्ये
  ये वा स्थूला ये च सूक्ष्मातिसूक्ष्माः।
ये वा भूमौ येऽन्तरिक्षेऽन्यतो वा
  तेषां तेषां त्वत्त एवोपलब्धिः॥
यच्चामूर्तं यच्च मूर्तं समस्तं
  यद्वा भूतेष्वेकमेकं च किञ्चित्।
यद्विद्येऽस्ति क्ष्मातले खेऽन्यतो वा
  तत्सम्वद्धं त्वत्स्वरूपाद्यनैश॥

जो पदार्थ नित्य हैं, जो विनाशशील हैं, जो स्थूल हैं तथा जो सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं, जो इस पृथ्वीपर, अन्तरिक्षमें या और किसी


१. अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र तथा आप्तोर्याम—ये सात सोमयज्ञसंस्थाएँ हैं।
२. अन्वाधान, अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्य, आग्रयणेटि, निरूढपशुबन्ध तथा सौत्रामणी—ये सात हविर्यज्ञसंस्थाएँ हैं।
३. हुत, प्रहुत, आहुत, शूलगव, बलिहरण, प्रत्यवरोहण तथा अष्टकाहोम—ये सात पाकयज्ञसंस्थाएँ हैं।