भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 296 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 73
  • तालकेतुके कपटसे मरी हुई मदालसाकी नागराजके फणसे उत्पत्ति और ऋतध्वजका पाताललोकमें गमन ४७३

करके इस प्रकार प्रतिज्ञा की।

ऋतध्वज बोले— यदि इस जन्ममें मेरी सुन्दरी पत्नी मदालसा मुझे फिर न मिल सकी तो दूसरी कोई स्त्री मेरी जीवनसङ्गिनी नहीं बन सकती। मृगके समान विशाल नेत्रोंवाली गन्धर्वराजकुमारी मदालसाके अतिरिक्त अन्य किसी स्त्रीके साथ मैं सम्भोग नहीं कर सकता। यह मैंने सर्वथा सत्य कहा है।*

दोनों नागकुमार कहते हैं— पिताजी! इस प्रकार मदालसाके बिना वे स्त्रीसम्बन्धी समस्त भोगोंका परित्याग करके अब अपने समवयस्क मित्रोंके साथ मन बहलाते हैं। यही उनका सबसे बड़ा कार्य है। परन्तु यह तो ईश्वरकोटिमें पहुंचे हुए व्यक्तियोंके लिये भी अत्यन्त दुष्कर है, फिर अन्य लोगोंकी तो बात ही क्या है।

नागराज अश्वतर बोले— पुत्रो! यदि किसी कार्यको असम्भव मानकर मनुष्य उसके लिये उद्योग नहीं करेंगे तो उद्योग छोड़नेसे उनको भारी हानि होगी; इसलिये मनुष्यको अपने पौरुषका त्याग न करते हुए कर्मका आरम्भ करना चाहिये; क्योंकि कर्मकी सिद्धि दैव और पुरुषार्थ दोनोंपर अवलम्बित है। इसलिये मैं तपस्याका आश्रय लेकर ऐसा यत्न करूँगा, जिससे इस कार्यकी शीघ्र ही सिद्धि हो।

यों कहकर नागराज अश्वतर हिमालय पर्वतके प्लक्षावतरण-तीर्थमें, जो सरस्वतीका उद्गमस्थान है, जाकर दुष्कर तपस्या करने लगे। वे तीनों समय स्नान करते और नियमित आहारपर रहते हुए सरस्वतीदेवीमें मन लगाकर उत्तम वाणीमें उनकी स्तुति करते थे।

अश्वतर उवाच

जगद्धात्रीमहं देवीमारिराधयिषुः शुभाम्।
स्तोष्ये प्रणम्य शिरसा ब्रह्मयोनिं सरस्वतीम्॥
सदसद् देवि यत्किंचिन्मोक्षबन्धार्थवत्पदम्।
तत्स्र्वं त्वय्यसंयोगं योगवद् देवि संस्थितम्॥
त्वमक्षरं परं देवि यत्र सर्वं प्रतिष्ठितम्।
अक्षरं परमं देवि संस्थितं परमाणुवत्॥
अक्षरं परमं ब्रह्म जगच्चैतदक्षरात्मकम्।
दारुण्यवस्थितो वह्निर्भौमाश्च परमाणवः॥
तथा त्वयि स्थितं ब्रह्म जगच्चेदमशेषतः।

अश्वतरने कहा— जो सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाली और वेदोंकी जननी हैं, उन कल्याणमयी सरस्वती देवीको प्रसन्न करनेकी इच्छासे मैं उनके चरणोंमें शीश झुकाता और उनकी स्तुति करता हूँ। देवि! मोक्ष और बन्धनरूप अर्थसे युक्त जो कुछ भी सत् और असत् पद है, वह सब तुममें असंयुक्त होकर भी संयुक्तकी भाँति स्थित है। देवि! जिसमें सब कुछ प्रतिष्ठित है, वह परम अक्षर तुम्हीं हो। परम अक्षर परमाणुकी भाँति स्थित है। अक्षररूप परब्रह्म और क्षररूप यह जगत् तुममें ही स्थित है। जैसे काष्ठमें अग्नि तथा पार्थिव सूक्ष्म परमाणु भी रहते हैं, उसी प्रकार ब्रह्म और यह सम्पूर्ण जगत् तुममें स्थित है।

ओङ्काराक्षरसंस्थानं यत्ते देवि स्थिरास्थिरम्॥
तत्र मात्रात्रयं सर्वमस्ति यद्देवि नास्ति च।
त्रयो लोकास्त्रयो वेदास्त्रैविद्यं पावकत्रयम्॥
त्रीणि ज्योतींषि वर्गाश्च त्रयो धर्मादयस्तथा।
त्रयो गुणास्त्रयः शब्दास्त्रयो दोषास्तथाश्रमाः॥
त्रयः कालास्तथावस्थाः पितरोऽहर्निशादयः।
एतन्मात्रात्रयं देवि तव रूपं सरस्वति॥
विभिन्नदर्शिनामाद्या ब्रह्मणो हि सनातनाः।
सोमसंस्था हविःसंस्थाः पाकसंस्थाश्च सप्त याः॥
तास्त्वदुच्चारणाद्देवि क्रियन्ते ब्रह्मवादिभिः।

देवि! ओंकार अक्षरके रूपमें जो तुम्हारा श्रीविग्रह है, वह स्थावर-जङ्गम रूप है। उसमें जो तीन मात्राएँ हैं, वे ही सब कुछ हैं। अस्ति-नास्ति (सत्-असत्) रूपसे व्यवहृत होनेवाला जो कुछ भी है, वह सब उन्हींमें स्थित है। तीन लोक, तीन


* तामृते मृगशाबाक्षीं गन्धर्वतनयामहम। न भोक्ष्ये योषितं काञ्चिदिति सत्यं मयोदितम्॥
(अ० २४। २०)