संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- तालकेतुके कपटसे मरी हुई मदालसाकी नागराजके फणसे उत्पत्ति और ऋतध्वजका पाताललोकमें गमन * ७१
कारण है। इसी प्रकार उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई यह मेरी पुत्रवधू यदि इस प्रकार अपने स्वामीमें अनुरक्त हो परलोकमें उसके पास गयी है तो उसके लिये भी शोक करना कैसे उचित हो सकता है; क्योंकि स्त्रियोंके लिये पतिके अतिरिक्त दूसरा कोई देवता नहीं है। यदि यह पतिके न रहनेपर भी जीवित रहती तो हमारे लिये, बन्धु-बान्धवोंके लिये तथा अन्य दयालु पुरुषोंके लिये शोकके योग्य हो सकती थी। वह तो अपने स्वामीके वधका समाचार सुनकर तुरंत ही उनके पीछे चली गयी है, अतः विद्वान् पुरुषोंके लिये शोकके योग्य नहीं है।* शोक तो उन स्त्रियोंके लिये करना चाहिये, जो पतिवियोगिनी होकर भी जीवित हों। जो पतिके साथ ही प्राण त्याग देती हैं, वे कदापि शोकके योग्य नहीं हैं। मदालसा बड़ी कृतज्ञ थी; इसलिये इसने पतिवियोगका दुःख नहीं भोगा। जो इहलोक तथा परलोकमें सब प्रकारके सौख्य प्रदान करनेवाला है, उस पतिको कौन स्त्री मनुष्य समझेगी। अतः मेरा वह पुत्र ऋतध्वज, यह पुत्रवधू मैं तथा ऋतध्वजकी माता-इनमेंसे कोई भी शोकके योग्य नहीं है। मेरे पुत्रने ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये अपने प्राण त्यागकर हम सबका उद्धार कर दिया। संग्राममें ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये प्राणत्याग करके मेरे पुत्रने अपनी माताके सतीत्व, वंशकी निर्मलता तथा अपने पराक्रमका त्याग नहीं किया है।'
तदनन्तर कुवलयाश्वकी माताने अपने पतिकी ओर देखकर कहा-
'राजन्! मेरी माता और बहिनको भी ऐसी प्रसन्नता नहीं प्राप्त हुई, जैसी कि मुनियोंकी रक्षाके लिये पुत्रका वध सुनकर मुझे हुई है। जो शोकमें पड़े हुए बन्धु-बान्धवोंके सामने रोगसे क्लेश उठाते और अत्यन्त दुःखी होकर लंबी साँसें खींचते हुए प्राणत्याग करते हैं, उनकी माताका सन्तान उत्पन्न करना व्यर्थ है। जो गौ और ब्राह्मणोंकी रक्षामें तत्पर हो रणभूमिमें निर्भयतापूर्वक युद्ध करते हुए शस्त्रोंसे आहत होकर मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे ही इस पृथ्वीपर धन्य मनुष्य हैं। जो याचकों, मित्रों तथा शत्रुओंसे कभी विमुख नहीं होता, उसीसे पिता वस्तुतः पुत्रवान् होता है और माता उसीके कारण वीर पुत्रकी जननी मानी जाती है। पुत्रके जन्मकालमें माताको जो क्लेश उठाना पड़ता है, वह तभी सफल होता है जब पुत्र शत्रुओंपर विजय प्राप्त करे अथवा युद्धमें लड़ता हुआ मारा जाय।'†
* राजा च तां गतां दृष्ट्वा विना भर्त्रा मदालसाम्। प्रत्युवाच जनं सर्वं विमृश्य सुस्थमानसः॥
न रोदितव्यं पश्यामि भवतामात्मनस्तथा। सर्वथागेव संचिन्त्य सम्बन्धानामनित्यताम्॥
किं नु शोचामि तनयं किं नु शोच्याऽहं स्नुषाम्। विमृश्य कृतकृत्यत्वान्नान्येऽशोच्याबुभावपि॥
यच्छ्रुश्रूषुर्द्वदचनाद् द्विजरक्षणतत्परः। प्राप्तो मे यः सुतो मृत्युं कथं शोच्यः स धीमताम्॥
अवश्यं याति तद्देहं तद् द्विजानां कृते यदि। मम पुत्रेण सन्त्यक्तं नन्वभ्युदयकारि तत्॥
इयं च सत्कुलोत्पन्ना भर्तुर्भावानुव्रता। कथं नु शोच्या नारीणां भर्तुरन्यन्न दैवतम्॥
अस्माकं बान्धवानां च तथान्येषां दयावताम्। शोच्या ह्येषा भवेदेवं यदि भर्त्रा वियोगिनी॥
सा तु भर्तुर्वधं श्रुत्वा तत्क्षणादेव भामिनी। भर्तारमनुयातेयं न शोच्यासौ विपश्चिताम्॥
(अ० २२। २७—३४)
† न मे मात्रा न मे स्वस्त्रा प्राप्ता प्रीतिर्नृपेदृशी। श्रुत्वा मुनिपरित्राणे हतं पुत्रं यथा मया॥
शोचतां बान्धवानां ये निश्वसन्तोऽतिदुःखिताः। म्रियन्ते व्याधिना क्लिष्टास्तेषां माता वृथाप्रजा॥
संग्रामे युध्यमाना येऽभीता गोद्विजरक्षणे। क्षुण्णाः शस्त्रैर्विपद्यन्ते त एव भुवि मानवाः॥
अर्थिनां मित्रवर्गस्य विद्धिषां च पराङ्मुखम्। यो न याति पिता तेन पुत्री माता च वीरसूः॥
गर्भक्लेशः स्त्रियो मन्ये साफल्पं भजते तदा। यदारिविजयी वा स्यात् संग्रामे वा हतः सुतः॥
(अ० २२। ४१—४५)