भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 9
  • धर्मपक्षीद्वारा जैमिनिके प्रश्नोंका उत्तर * ९

छिद्रका ज्ञान हो जानेसे राजा उनके द्वारा नाशको प्राप्त होता है। इस प्रकार राग, मोह, लोभ तथा क्रोध—ये दुरात्मा शत्रु मनुष्यकी स्मरण-शक्तिका नाश करनेवाले हैं। रागसे काम होता है, कामसे लोभका जन्म होता है, लोभसे सम्मोह—अविवेक होता है और सम्मोहसे स्मरण-शक्ति भ्रान्त हो जाती है। स्मृतिकी भ्रान्तिसे बुद्धिका नाश होता है और बुद्धिका नाश होनेसे मनुष्य स्वयं भी नष्ट—कर्तव्यभ्रष्ट हो जाता है।* इस प्रकार जिनकी बुद्धि नष्ट हो चुकी है, जो राग और लोभके पीछे चलनेवाले हैं तथा जिन्हें जीवनका बहुत लोभ है, ऐसे हमलोगोंपर आप प्रसन्न होइये। मुनिश्रेष्ठ! यह जो शाप आपने दिया है, वह हमें लागू न हो। तामसी योनि बड़ी कष्टदायिनी होती है। हम उसे कभी प्राप्त न हों।'

ऋषिने कहा—'पुत्रो! आजतक मेरे मुखसे कभी झूठी बात नहीं निकली; अतः मैंने जो कुछ कहा है, वह कभी मिथ्या नहीं होगा। मैं यहाँ दैवको ही प्रधान मानता हूँ। उसके सामने पौरुष व्यर्थ है। आज दैवने मुझसे बलपूर्वक यह अयोग्य कर्म करा डाला, जिसकी मैंने कभी मनमें कल्पना भी नहीं की थी। पुत्रो! तुमलोगोंने प्रणाम करके मुझे प्रसन्न किया है; इसलिये तिर्यक्-योनिमें जन्म लेनेपर भी तुम्हें परम ज्ञान प्राप्त होगा। ज्ञानसे ही तुम्हें सन्मार्गका दर्शन होगा। तुम्हारे क्लेश और पाप धुल जायेंगे तथा तुम्हारे मनमें किसी प्रकारका संशय नहीं रहेगा। इस प्रकार मेरे प्रसादसे ज्ञान पाकर तुम परम सिद्धिको प्राप्त कर लोगे।

भगवन्! इस प्रकार पूर्वकालमें दैववश पिताने हमें शाप दे दिया। तबसे बहुत कालके बाद हम दूसरी योनिमें आये, युद्धभूमिमें उत्पन्न हुए और फिर आपके द्वारा हमलोगोंका पालन हुआ। द्विजश्रेष्ठ! यही हमारे पक्षी-योनिमें आनेकी कहानी है। संसारमें कोई भी जीव ऐसा नहीं है, जिसे दैवके द्वारा बाधा न पहुँचती हो, क्योंकि समस्त जीव-जन्तुओंकी चेष्टा दैवके ही अधीन है।†

मार्कण्डेयजी कहते हैं—उनकी बात सुनकर महाभाग शमीक मुनिने अपने पास बैठे हुए द्विजोंसे कहा—'मैंने तुमलोगोंको पहले ही बताया था कि ये साधारण पक्षी नहीं हैं, कोई श्रेष्ठ द्विज हैं, जो कि अलौकिक युद्धमें जन्म लेकर भी मृत्युको नहीं प्राप्त हुए।' तदनन्तर महात्मा शमीकने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्हें जानेकी आज्ञा दी। फिर वे वृक्षों और लताओंसे सुशोभित पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्यगिरिपर चले गये। तबसे आजतक वे धर्मात्मा पक्षी तपस्या और स्वाध्यायमें संलग्न हो समाधिके लिये दृढ़ निश्चय करके उस पर्वतपर ही निवास करते हैं।


धर्मपक्षीद्वारा जैमिनिके प्रश्नोंका उत्तर

मार्कण्डेयजी कहते हैं—जैमिनि! इस प्रकार वे द्रोणके पुत्र चारों पक्षी ज्ञानी हैं और विन्ध्यगिरिपर निवास करते हैं। तुम उनकी सेवामें जाओ और उनसे ज्ञातव्य बातें पूछो।

मार्कण्डेय मुनिकी यह बात सुनकर महर्षि जैमिनि, विन्ध्यपर्वतपर, जहाँ वे धर्मात्मा पक्षी रहते थे, गये। उस पर्वतके निकट पहुँचनेपर पाठ करते हुए उन पक्षियोंकी ध्वनि उनके कानोंमें


* रागात् कामः प्रभवति कामाल्लोभोऽभिजायते। लोभाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः॥
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति॥ (२। ७१-७२)
†नास्त्यसाविह संसारे यो न दैवेन बाध्यते। सर्वेषामेव जन्तूनां दैवाधीनं हि चेष्टितम्॥ (३। ८१)