भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 8


* संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण * ---

महर्षिका यह वचन सुनकर पक्षिरूपधारी इन्द्रके मनमें बड़ा विस्मय हुआ। वे अपने देहरूपमें प्रकट होकर बोले—‘विप्रवर! मैंने आपकी परीक्षाके लिये यह अपराध किया है। शुद्ध बुद्धिवाले महर्षि! आप इसके लिये मुझे क्षमा करें। बताइये, आपको क्या इच्छा है जिसे मैं पूर्ण करूँ? अपने सत्य वचनका पालन करनेसे आपके प्रति मेरा बड़ा प्रेम हो गया है। आजसे आपके हृदयमें इन्द्रसम्बन्धी ज्ञान प्रकट होगा। अब आपकी तपस्या और धर्ममें कोई विघ्न नहीं उपस्थित होगा।’

यों कहकर जब इन्द्र चले गये, तब हमलोगोंने क्रोधमें भरे हुए महामुनि पिताजीके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—‘तात! हम मृत्युसे डर रहे थे। महामते! आप हम दोनोंके अपराधको क्षमा करें। हमलोगोंको जीवन बहुत ही प्रिय है। चमड़े, हड्डी और मांसके समूह तथा पीब और रक्तसे भरे हुए इस शरीरमें जहाँ हमें तनिक भी आसक्ति नहीं रखनी चाहिये, वहीं हमारी इतनी आसक्ति है। महाभाग! काम, क्रोध आदि दोष जीवके प्रबल शत्रु हैं। इनसे विवश होकर यह लोक जिस प्रकार मोहके वशीभूत हो जाता है, उसे आप सुनें। यह शरीर एक बहुत बड़ा नगर है। त्वचा ही इसकी चहारदीवारी है, हड्डियाँ ही इसमें खम्भेका काम देती हैं। चमड़ा ही इस नगरकी दीवार है, जो समूचे नगरको रोके हुए है। मांस और रक्तके पङ्कका इसपर लेप चढ़ा हुआ है। इस नगरमें नौ दरवाजे हैं। इसकी रक्षामें बहुत बड़ा प्रयास करना होता है। नस-नाड़ियाँ इसे सब ओरसे घेरे हुए हैं। चेतन पुरुष ही इस नगरके भीतर राजाके रूपमें विराजमान है। उसके दो मन्त्री हैं—बुद्धि और मन। वे दोनों परस्परविरोधी हैं और आपसमें वैर निकालनेके लिये दोनों ही यत्न करते रहते हैं। चार ऐसे शत्रु हैं, जो उस राजाका नाश चाहते हैं। उनके नाम हैं—काम, क्रोध, लोभ तथा मोह। जब राजा उन नवों दरवाजोंको बंद किये रहता है, तब उसकी शक्ति सुरक्षित रहती है और वह सदा निर्भय बना रहता है; वह सबके प्रति अनुराग रखता है, अतः शत्रु उसका पराभव नहीं कर पाते।

‘परन्तु जब वह नगरके सब दरवाजोंको खुला छोड़ देता है, उस समय राग नामक शत्रु नेत्र आदि द्वारोंपर आक्रमण करता है। वह सर्वत्र व्याप्त रहनेवाला, बहुत विशाल और पाँच दरवाजोंसे नगरमें प्रवेश करनेवाला है। उसके पीछे-पीछे लोभ और भयङ्कर शत्रु इस नगरमें घुस जाते हैं। पाँच इन्द्रिय नामक द्वारोंसे शरीरके भीतर प्रवेश करके राग मन तथा अन्यान्य इन्द्रियोंके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है। इस प्रकार इन्द्रिय और मनको वशमें करके वह दुर्धर्ष हो जाता है और समस्त दरवाजोंको काबूमें करके चहारदीवारीको नष्ट कर देता है। मनको रागके अधीन हुआ देख बुद्धि तत्काल नष्ट हो जाती (पलायन कर जाती) है। जब मन्त्री साथ नहीं रहते, तब अन्य पुरवासी भी उसे छोड़ देते हैं। फिर शत्रुओंको उसके