भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 7
  • सुकृश मुनिके पुत्रोंके पक्षीकी योनिमें जन्म लेनेका कारण * ७

पुनः उनसे पूछा—'मुझे तुम्हारे लिये कैसे आहारकी व्यवस्था करनी चाहिये।' उन्होंने कहा— 'मुने! मनुष्यके मांससे मुझे विशेष तृप्ति होती है।'

ऋषिने कहा—'अरे! कहाँ मनुष्यका मांस और कहाँ तुम्हारी वृद्धावस्था। जान पड़ता है, जीवकी दूषित भावनाओंका सर्वथा अन्त कभी नहीं होता। अथवा मुझे यह सब कहनेकी क्या आवश्यकता। जिसे देनेकी प्रतिज्ञा कर ली गयी, उसे सदा देना ही चाहिये; मेरे मनमें सदा ऐसा ही भाव रहता है।

इन्द्रसे यों कहते हुए अपनी प्रतिज्ञा पूरी करनेका निश्चय करके विप्रवर सुकृशने हम सबको शीघ्र ही बुलाया और हमारे गुणोंकी बारंबार प्रशंसा करते हुए कहा—'पुत्रो! यदि तुमलोगोंके विचारसे पिता परम गुरु और पूजनीय हो तो निष्कपट भावसे मेरे वचनका पालन करो।' उनकी यह बात सुनते ही हम सब लोगोंने बड़े आदरके साथ कहा—'पिताजी! आप जो कुछ भी कहेंगे, जिस कार्यके लिये भी हमें आज्ञा देंगे, उसे हमारे द्वारा पूर्ण किया हुआ ही समझिये।'

**ऋषि बोले—**यह पक्षी भूख प्याससे पीड़ित होकर मेरी शरणमें आया है। तुमलोग शीघ्र ही ऐसा करो, जिससे तुम्हारे शरीरके मांससे क्षणभर इसकी तृप्ति और तुम्हारे रक्तसे इसकी प्यास बुझ जाय।

यह सुनकर हमें बड़ी व्यथा हुई। हमारे शरीरमें कम्प और मनमें भय छा गया, हम सहसा बोल उठे—'इसमें तो बड़ा कष्ट है, बड़ा कष्ट है। यह काम हमसे नहीं हो सकता। कोई भी समझदार मनुष्य दूसरेके शरीरके लिये अपने शरीरका नाश अथवा वध कैसे करा सकता है। अतः हमलोग यह काम नहीं करेंगे।' हमारी ऐसी बातें सुनकर वे मुनि क्रोधसे जल उठे और अपनी लाल-लाल आँखोंसे हमें दग्ध करते हुए-से पुनः इस प्रकार बोले—'अरे! मुझसे इसके लिये प्रतिज्ञा करके भी तुमलोग यह कार्य नहीं करना चाहते; अतः मेरे शापसे दग्ध होकर तुमलोग पक्षियोंकी योनिमें जन्म लोगे।' हमसे यों कहकर उन्होंने शास्त्रके अनुसार अपनी अन्त्येष्टि-क्रिया की—और्ध्वदेहिक संस्कारकी विधि पूर्ण की। इसके बाद वे उस पक्षीसे बोले—'खगश्रेष्ठ! अब तुम निश्चिन्त होकर मुझे भक्षण करो। मैंने अपना यह शरीर तुम्हें आहारके रूपमें समर्पित कर दिया है। पक्षिरज! जबतक अपने सत्यका पूर्णरूपसे पालन होता रहे, वही ब्राह्मणका ब्राह्मणत्व कहलाता है। ब्राह्मण दक्षिणायुक्त यज्ञों अथवा अन्य कर्मोंके अनुष्ठानसे भी वह महान् पुण्य नहीं प्राप्त कर सकते, जो उन्हें सत्यकी रक्षा करनेसे प्राप्त होता है।'*


* एतावदेव विप्रस्य ब्राह्मण्यं प्रचक्षते। यावत् पतङ्गजवर स्वसत्यपरिपालनम्॥
न यज्ञैर्दक्षिणोद्दिष्टैस्तत् पुण्यं प्राप्यते महत्। कर्मणान्येन वा विप्रेर्यत् सत्यपरिपालनात्॥
(अ० ३ । ४६-४८)