संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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व्यवस्था करके उन बच्चोंका पालन-पोषण करने लगे। एक ही महीना बीतनेपर वे पक्षियोंके बच्चे आकाशमें इतने ऊँचे उड़ गये, जितनेपर सूर्यके रथके आने-जानेका मार्ग है। उस समय आश्रमवासी मुनिकुमार कौतूहलभरे चञ्चल नेत्रोंसे उन्हें देख रहे थे। उन पक्षिशावकोंने नगर, समुद्र और बड़ी-बड़ी नदियोंसहित पृथ्वीको वहाँसे रथके पहियेके बराबर देखा और फिर आश्रमपर लौट आये। तिर्यक्-योनिमें उत्पन्न हुए वे महात्मा पक्षी अधिक उड़नेके कारण परिश्रमसे थक गये थे। एक दिन महर्षि शमीक अपने शिष्योंपर कृपा करनेके लिये उन्हें धर्मके तत्त्वका उपदेश कर रहे थे। उस समय वहाँ महर्षिके प्रभावसे उन पक्षियोंके अन्तःकरणमें स्थित ज्ञान प्रकट हो गया। फिर तो उन सबने महर्षिकी परिक्रमा की और उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया। तत्पश्चात् वे बोले—‘मुने! आपने भयानक मृत्युसे हमारा उद्धार किया है। आपने हमें रहनेके लिये स्थान, भोजन और जल प्रदान किया है। आप ही हमारे पिता और गुरु हैं। हमलोग जब गर्भमें थे, तभी माताकी मृत्यु हो गयी। पिताने भी हमारी रक्षा नहीं की। आपने ही पधारकर हमें जीवनदान दिया और शैशव-अवस्थामें हमलोगोंकी रक्षा की। हम कीड़ोंकी तरह सूख रहे थे, आपने हाथोंके घण्टेको उठाकर हमारे सङ्कटका निवारण किया। अब हम बड़े हो गये, हमें ज्ञान भी हो गया; अतः आज्ञा दीजिये, हम आपकी क्या सेवा करें?’
महर्षि शमीक अपने पुत्र शृङ्गी ऋषि तथा समस्त शिष्योंसे घिरे हुए बैठे थे; उन्होंने जब उन पक्षिशावकोंकी यह शुद्ध संस्कृतमयी स्पष्ट वाणी सुनी, तब उन्हें बड़ा कौतूहल हुआ। उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। उन्होंने पूछा—‘बच्चो! तुमलोग ठीक-ठीक बताओ, तुम्हें किस कारणसे ऐसी वाणी प्राप्त हुई है। पक्षियोंका रूप और मनुष्यकी-सी वाणी प्राप्त होनेका क्या रहस्य है?’
पक्षी बोले—‘मुनिवर! प्राचीन कालमें विपुलस्वान् नामक एक श्रेष्ठ मुनि रहते थे, जिनके दो पुत्र हुए—सुकृष और तुम्बुरु। सुकृष अपने चित्तको वशमें रखनेवाले महात्मा थे। उन्हींसे हम चार पुत्रोंका जन्म हुआ। हम सब लोग विनय, सदाचार एवं भक्तिवश सदा विनीत भावसे रहते थे। पिताजी सदा तपस्यामें संलग्न रहते और इन्द्रियोंको काबूमें रखते थे। उस समय उन्हें जब जिस वस्तुकी अभिलाषा होती, हम उसे उनकी सेवामें प्रस्तुत करते थे। एक दिनकी बात है, देवराज इन्द्र पक्षीका रूप धारण करके वहाँ आये। उनका शरीर बहुत बड़ा था, पंख टूट गये थे। बुढ़ापेने उनपर अधिकार जमा लिया था। उनकी आँखें कुछ-कुछ लाल हो रही थीं और सारा शरीर शिथिल जान पड़ता था। वे सत्य, शौच और क्षमाका पालन करनेवाले अत्यन्त उदारचित्त महात्मा मुनिश्रेष्ठ सुकृषकी परीक्षा लेने आये थे। उनका आगमन ही हमारे लिये शापका कारण बन गया।
पक्षीरूपधारी इन्द्रने कहा—विप्रवर! मुझे बड़े जोरकी भूख सता रही है, मेरी रक्षा कीजिये; महाभाग! मैं भोजनकी इच्छासे यहाँ आया हूँ। आप मेरे लिये अनुपम सहारा बनें। मैं विन्ध्यपर्वतके शिखरपर रहता था। वहाँसे किसी प्रबल पक्षीके पंखसे प्रकट हुई अत्यन्त वेगयुक्त वायुके झोंके खाकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और मूर्च्छित हो गया। एक सप्ताह तक मुझे होश नहीं हुआ। आठवें दिन मेरी चेतना लौटी। सचेत होनेपर मैं भूखसे व्याकुल हो गया और भोजनकी इच्छासे आपकी शरणमें आया हूँ। इस समय मुझे तनिक भी चैन नहीं है। मेरे मनमें बड़ी व्यथा हो रही है। विमल बुद्धिवाले महर्षे! अब आप मेरी रक्षाके लिये भोजन दीजिये, जिससे मेरी जीवन-यात्रा चालू रहे।
यह सुनकर महर्षिने उन पक्षीरूपधारी इन्द्रसे कहा—‘मैं तुम्हारे प्राणोंकी रक्षाके लिये तुम्हें यथेष्ट भोजन दूँगा।’ यों कहकर द्विजश्रेष्ठ सुकृषने