संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- सुकृष मुनिके पुत्रोंके पक्षीकी योनिमें जन्म लेनेका कारण * ५
निश्चित कर दी है। विधाताके इच्छानुसार जबतक जीवकी आयु पूर्ण नहीं हो जाती, तबतक उसे कोई मार नहीं सकता। कोई अपने घरमें मरते हैं, कोई भागते हुए प्राणत्याग करते हैं, कुछ लोग अन्न खाते और पानी पीते हुए ही कालके गालमें चले जाते हैं। इसी प्रकार कुछ लोग ऐसे हैं, जो भोग-विलासका आनन्द ले रहे हैं, इच्छानुसार वाहनोंपर विचरते हैं, शरीरसे नीरोग हैं तथा अस्त्र-शस्त्रोंसे जिनका शरीर कभी घायल नहीं हुआ है; वे भी यमराजके वशमें हो जाते हैं। कुछ लोग निरन्तर तपस्यामें ही लगे रहते थे, किन्तु उन्हें भी यमराजके दूत उठा ले गये। निरन्तर योगाभ्यासमें प्रवृत्त रहनेवाले लोग भी शरीरसे अमर न हो सके। पहलेकी बात है, वज्रपाणि इन्द्रने एक बार शम्बरासुरके ऊपर अपने वज्रका प्रहार किया था। उस वज्रने उसकी छातीमें चोट पहुँचायी, तथापि वह असुर मर न सका। परन्तु काल आनेपर उन्हीं इन्द्रने उसी वज्रसे जब-जब दानवोंको मारा, वे तत्काल मृत्युको प्राप्त हो गये। यह समझकर तुम्हें भय नहीं करना चाहिये! तुम सब लोग लौट आओ।' उनके इस प्रकार समझानेपर वे दैत्य मृत्युका भय त्यागकर रणभूमिमें लौट आये। शुक्राचार्यकी कही हुई उपर्युक्त बातोंको इन श्रेष्ठ पक्षियोंने सत्य कर दिखाया; क्योंकि उस अलौकिक युद्धमें पड़कर भी इनकी मृत्यु नहीं हुई। ब्राह्मणो! भला, सोचो तो सही—कहाँ अण्डोंका गिरना, कहाँ उसके साथ ही घंटेका भी टूट पड़ना और कहाँ मांस, मज्जा तथा रक्तसे भरी हुई भूमिका बिछौना बन जाना—ये सभी बातें अद्भुत हैं। विप्रगण! ये कोई सामान्य पक्षी नहीं हैं। संसारमें दैवका अनुकूल होना महान् सौभाग्यका सूचक होता है।'
यों कहकर शमीक मुनिने उन बच्चोंको भलीभाँति देखा और फिर अपने शिष्योंसे इस प्रकार कहा—'अब तुमलोग इन पक्षिशावकोंको लेकर आश्रमको लौट चलो और ऐसे स्थानपर रखो जहाँ इन्हें बिल्ली, चूहे, बाज अथवा नेवले आदिसे कोई भय न हो। ब्राह्मणो! यद्यपि यह ठीक है कि किसीकी रक्षाके लिये अधिक प्रयत्न करनेकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि सम्पूर्ण जीव अपने कर्मोंसे ही मारे जाते हैं और कर्मोंसे ही उनकी रक्षा होती है—ठीक उसी प्रकार, जैसे इस समय ये पक्षिशावक इस युद्धभूमिमें बच गये हैं, तथापि सब मनुष्योंको सभी कार्योंके लिये यत्न अवश्य करना चाहिये, क्योंकि जो पुरुषार्थ करता है, वह (असफल होनेपर भी) सत्पुरुषोंकी निन्दाका पात्र नहीं होता।' मुनिवर शमीकके इस प्रकार कहनेपर वे मुनिकुमार उन पक्षियोंको लेकर अपने आश्रमको चले गये, जहाँ भाँति-भाँतिके वृक्षोंकी शाखाओंपर बैठे हुए भौंरे फलोंका रस ले रहे थे और अनेक तपस्वियोंके रहनेसे जहाँकी रमणीयता बहुत बढ़ गयी थी।
विप्रवर जैमिने! मुनिश्रेष्ठ शमीक प्रतिदिन अन्न और जल देकर तथा सब प्रकारसे रक्षाकी