भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 4, कुल 296 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 4

  • संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *

सुकृश मुनिके पुत्रोंके पक्षीकी योनिमें जन्म लेनेका कारण

मार्कण्डेयजी कहते हैं—जैमिने! अरिष्टनेमिके पुत्र पक्षिराज गरुड़ हुए। गरुड़के पुत्र सम्पातिके नामसे विख्यात हुए। सम्पातिके पुत्र शूरवीर सुपार्श्व था। सुपार्श्वका पुत्र कुम्भि और कुम्भिका पुत्र प्रलोलुप हुआ। उसके भी दो पुत्र हुए, उनमें एकका नाम कङ्क और दूसरेका नाम कन्धर था। कन्धरके तार्क्षी नामकी कन्या हुई, जो पूर्वजन्ममें श्रेष्ठ अप्सरा वपु थी और दुर्वासा मुनिके शापाग्निसे दग्ध हो पक्षिणीके रूपमें प्रकट हुई थी। मन्दपाल पक्षीके पुत्र द्रोणने कन्धरकी अनुमतिसे उस कन्याके साथ विवाह किया। कुछ कालके अनन्तर तार्क्षी गर्भवती हुई। उसका गर्भ अभी साढ़े तीन महीनेका ही था कि वह कुरुक्षेत्रमें गयी। वहाँ कौरव और पाण्डवोंमें बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ा था, भवितव्यतावश वह पक्षिणी उस युद्धक्षेत्रमें प्रवेश कर गयी। वहाँ उसने देखा—भगदत्त और अर्जुनमें युद्ध हो रहा है। सारा आकाश टिड्डियोंकी भाँति बाणोंसे खचाखच भर गया है। इतनेमें ही अर्जुनके धनुषसे छूटा हुआ एक बाण बड़े वेगसे उसके समीप आया और उसके पेटमें घुस गया। पेट फट जानेसे चन्द्रमाके समान श्वेत रंगवाले चार अंडे पृथ्वीपर गिरे। किन्तु उनकी आयु शेष थी, अतः वे फूट न सके; बल्कि पृथ्वीपर ऐसे गिरे, मानो रूईके ढेरपर पड़े हों। उन अण्डोंके गिरते ही भगदत्तके सुप्रतीक नामक गजराजकी पीठसे एक बहुत बड़ा घंटा भी टूटकर गिरा, जिसका बन्धन बाणोंके आघातसे कट गया था। यद्यपि वह अण्डोंके साथ ही गिरा था, तथापि उन्हें चारों ओरसे ढकता हुआ गिरा और धरतीमें थोड़ा-थोड़ा धँस भी गया।

युद्ध समाप्त होनेपर जहाँ घंटेके नीचे अण्डे पड़े थे, उस स्थानपर शमीक नामके एक संयमी महात्मा गये। उन्होंने वहाँ चिड़ियोंके बच्चोंकी आवाज सुनी। यद्यपि उन सबको परम विज्ञान प्राप्त था, तथापि निरे बच्चे होनेके कारण अभी वे स्पष्ट वाक्य नहीं बोल सकते थे। उन बच्चोंकी आवाजसे शिष्योंसहित महर्षि शमीकको बड़ा विस्मय हुआ और उन्होंने घंटेको उखाड़कर उसके भीतर पड़े हुए उन माता, पिता और पंखसे रहित पक्षिशावकोंको देखा। उन्हें इस प्रकार भूमिपर पड़ा देख महामुनि शमीक आश्चर्यमें डूब गये और अपने साथ आये हुए द्विजोंसे बोले—'देवासुरसंग्राममें जब दैत्योंकी सेना देवताओंसे पीड़ित होकर भागने लगी, तब उसकी ओर देखकर स्वयं विप्रवर शुक्राचार्यने यह ठीक ही कहा था—'ओ कायरो! क्यों पीठ दिखाकर जा रहे हो। न जाओ, लौट आओ। अरे! शौर्य और सुयशका परित्याग करके ऐसे किस स्थानमें जाओगे, जहाँ तुम्हारी मृत्यु न होगी। कोई भागे या युद्ध करे; वह तभीतक जीवित रह सकता है, जबतकके लिये पहले विधाताने उसकी आयु

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण · पृष्ठ 4, कुल 296 में से · BharatKosha