भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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  • जैमिनि मार्कण्डेय-संवाद—वपुको दुर्वासाका शाप * ३

कि तुमलोगोंमें सबसे अधिक गुणवती कौन है।' इस प्रकार उनके पूछनेपर नारदजीने कहा—'जो गिरिराज हिमालयपर तपस्या करनेवाले मुनिश्रेष्ठ दुर्वासाको अपनी चेष्टासे क्षुब्ध कर देगी, उसीको मैं सबसे अधिक गुणवती मानूँगा।' उनकी बात सुनकर सबकी गर्दन हिल गयी। सबने एक-दूसरीसे कहना आरम्भ किया—'हमारे लिये यह कार्य असम्भव है।' उन अप्सराओंमें एकका नाम वपु था। उसके मनमें मुनियोंको विचलित कर देनेका गर्व था। उसने नारदजीको उत्तर दिया, 'जहाँ दुर्वासा मुनि रहते हैं, वहाँ आज मैं जाऊँगी। दुर्वासा मुनिको, जो शरीररूपी रथका सञ्चालन करते हैं, जिन्होंने इन्द्रियरूपी घोड़ोंको उस रथमें जोत रखा है, एक अयोग्य सारथि सिद्ध कर दिखाऊँगी। अपने कामबाणके प्रहारसे उनके मनरूपी लगामको गिरा दूँगी—उनके काबूके बाहर कर दूँगी।'

यों कहकर वपु हिमालय पर्वतपर गयी। वहाँ महर्षिके आश्रममें उनकी तपस्याके प्रभावसे हिंसक जीव भी अपनी स्वाभाविक हिंसावृत्ति छोड़कर परम शान्त रहते थे। महामुनि दुर्वासा जहाँ निवास करते थे, उस स्थानसे एक कोसकी दूरीपर वह सुन्दरी अप्सरा ठहर गयी और गीत गाने लगी। उसकी वाणीमें कोकिलके कलरवका-सा मिठास था। उसके संगीतकी मधुर ध्वनि कानमें पड़ते ही दुर्वासा मुनिके मनमें बड़ा विस्मय हुआ। वे उसी स्थानकी ओर गये, जहाँ वह मृदुभाषिणी बाला संगीतकी तान छेड़े हुए थी। उसे देखकर महर्षिने अपने मनको बलपूर्वक रोका और यह जानकर कि यह मुझे लुभानेके लिये आयी है, उन्हें क्रोध और अमर्ष हो आया। फिर तो वे महातपस्वी महर्षि उस अप्सरासे इस प्रकार बोले—'आकाशमें विचरनेवाली मतवाली अप्सरा! तू बड़े कष्टसे उपार्जित किये हुए मेरे तपमें विघ्न डालनेके लिये आयी है, अतः मेरे क्रोधसे कलङ्कित होकर तू पक्षीके कुलमें जन्म लेगी। ओ खोटी बुद्धिवाली नीच अप्सरा! अपना यह मनोहर रूप छोड़कर तुझे सोलह वर्षोंतक पक्षिणीके रूपमें रहना पड़ेगा। उस समय तेरे गर्भसे चार पुत्र उत्पन्न होंगे। किन्तु तू उनके प्रति होनेवाले प्रेमजनित सुखसे वञ्चित ही रहेगी और शस्त्रद्वारा वधको प्राप्त होकर शापमुक्त हो पुनः स्वर्गलोकमें अपना स्थान प्राप्त करेगी। बस, अब इसके विपरीत तू कुछ भी किसी प्रकार भी उत्तर न देना।' क्रोधसे लाल नेत्र किये महर्षि दुर्वासाने मधुर खनखनाहटसे युक्त चञ्चल कङ्कण धारण करनेवाली उस मानिनी अप्सराको ये दुःसह वचन सुनाकर इस पृथ्वीको छोड़ दिया और विश्वविश्रुत गुणोंसे गौरवान्वित एवं उत्ताल तरङ्गोंवाली आकाशगङ्गाके तटपर चले गये।