भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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२ * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *

महारानी क्यों हुई? इस विषयमें मुझे महान् सन्देह है। द्रौपदीके पाँचों महारथी पुत्र, जिनका अभी विवाह भी नहीं हुआ था और पाण्डव-जैसे वीर जिनके रक्षक थे, अनाथोंकी भाँति कैसे मारे गये? ये सारी बातें आप मुझे विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें।'

मार्कण्डेयजी बोले— मुनिश्रेष्ठ! यह मेरे लिये संध्या-वन्दन आदि कर्म करनेका समय है। तुम्हारे प्रश्नोंका उत्तर विस्तारपूर्वक देना है, अतः उसके लिये यह समय उत्तम नहीं है। जैमिने! मैं तुम्हें ऐसे पक्षियोंका परिचय देता हूँ, जो तुम्हारे प्रश्नोंका उत्तर देंगे और तुम्हारे सन्देहका निवारण करेंगे। द्रोण नामक पक्षीके चार पुत्र हैं, जो सब पक्षियोंमें श्रेष्ठ, तत्त्वज्ञ तथा शास्त्रोंका चिन्तन करनेवाले हैं। उनके नाम हैं—पिङ्गाक्ष, विबोध, सुपुत्र और सुमुख। वेदों और शास्त्रोंके तात्पर्यको समझनेमें उनकी बुद्धि कभी कुण्ठित नहीं होती। वे चारों पक्षी विन्ध्यपर्वतकी कन्दरामें निवास करते हैं। तुम उन्हींके पास जाकर ये सभी बातें पूछो।

जैमिनिने कहा— ब्रह्मन्! यह तो बड़ी अद्भुत बात है कि पक्षियोंकी बोली मनुष्योंके समान हो। पक्षी होकर भी उन्होंने अत्यन्त दुर्लभ विज्ञान प्राप्त किया है। यदि तिर्यक्-योनिमें उनका जन्म हुआ है, तो उन्हें ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ? वे चारों पक्षी द्रोणके पुत्र कैसे बतलाये जाते हैं? विख्यात पक्षी द्रोण कौन है, जिसके चार पुत्र ऐसे ज्ञानी हुए? उन गुणवान् महात्मा पक्षियोंको धर्मका ज्ञान किस प्रकार हुआ?

मार्कण्डेयजी बोले— मुने! ध्यान देकर सुनो। पूर्वकालमें नन्दनवनके भीतर जब देवर्षि नारद, इन्द्र और अप्सराओंका समागम हुआ था, उसी समयकी घटना है। एक बार नारदजीने नन्दनवनमें देवराज इन्द्रसे भेंट की। उनकी दृष्टि पड़ते ही इन्द्र उठकर खड़े हो गये और बड़े आदरके साथ अपना सिंहासन उन्हें बैठनेको दिया। वहाँ खड़ी हुई अप्सराओंने भी देवर्षि नारदको विनीत भावसे मस्तक झुकाया। उनके द्वारा पूजित हो नारदजीने इन्द्रके बैठ जानेपर यथायोग्य कुशल प्रश्नके अनन्तर बड़ी मनोहर कथाएँ सुनायीं। उस बातचीतके प्रसङ्गमें ही इन्द्रने महामुनि नारदसे कहा—'देवर्षे! इन अप्सराओंमें जो आपको प्रिय जान पड़े, उसे आज्ञा दीजिये, यहाँ नृत्य करे। रम्भा, मिश्रकेशी, उर्वशी, तिलोत्तमा, घृताची अथवा मेनका—जिसमें आपकी रुचि हो, उसीका नृत्य देखिये।' इन्द्रकी यह बात सुनकर द्विजश्रेष्ठ नारदजीने विनयपूर्वक खड़ी हुई अप्सराओंसे कुछ सोचकर कहा—'तुम सब लोगोंमेंसे जो अपनेको रूप और उदारता आदि गुणोंमें सबसे श्रेष्ठ मानती हो, वही मेरे सामने यहाँ नृत्य करे।'

मार्कण्डेयजी कहते हैं— मुनिकी यह बात सुनते ही वे विनीत अप्सराएँ एक-एक करके आपसमें कहने लगीं—'अरी! मैं ही गुणोंमें सबसे श्रेष्ठ हूँ, तू नहीं।' इसपर दूसरी कहती, 'तू नहीं, मैं श्रेष्ठ हूँ।' उनका वह अज्ञानपूर्ण विवाद देखकर इन्द्रने कहा—'अरी! मुनिसे ही पूछो, वे ही बतायेंगे


क्रमशः भूर्लोक, भुवर्लोक तथा स्वर्गलोकको भी लाँघ गये थे, श्रीहरिके वे दोनों चरणकमल आपलोगोंको पवित्र करते रहें। जो समस्त पापोंका संहार करनेमें समर्थ हैं, जिनका श्रीविग्रह क्षीरसागरके गर्भमें शेषनागकी शय्यापर शयन करता है, उन्हीं शेषनागका श्वास-वायुसे कम्पित हुए जलकी उत्ताल तरङ्गोंके कारण विकराल प्रतीत होनेवाला समुद्र जिनका सङ्ग पाकर प्रसन्नताके मारे नृत्य-सा करता जान पड़ता है, वे भगवान् नारायण आपलोगोंकी रक्षा करते रहें। भगवान् नारायण, पुरुषश्रेष्ठ नर, उनकी लीला प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वती तथा उसके वक्ता महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके 'जय' (इतिहास-पुराण) का पाठ करना चाहिये।

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