संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२ * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *
महारानी क्यों हुई? इस विषयमें मुझे महान् सन्देह है। द्रौपदीके पाँचों महारथी पुत्र, जिनका अभी विवाह भी नहीं हुआ था और पाण्डव-जैसे वीर जिनके रक्षक थे, अनाथोंकी भाँति कैसे मारे गये? ये सारी बातें आप मुझे विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें।'
मार्कण्डेयजी बोले— मुनिश्रेष्ठ! यह मेरे लिये संध्या-वन्दन आदि कर्म करनेका समय है। तुम्हारे प्रश्नोंका उत्तर विस्तारपूर्वक देना है, अतः उसके लिये यह समय उत्तम नहीं है। जैमिने! मैं तुम्हें ऐसे पक्षियोंका परिचय देता हूँ, जो तुम्हारे प्रश्नोंका उत्तर देंगे और तुम्हारे सन्देहका निवारण करेंगे। द्रोण नामक पक्षीके चार पुत्र हैं, जो सब पक्षियोंमें श्रेष्ठ, तत्त्वज्ञ तथा शास्त्रोंका चिन्तन करनेवाले हैं। उनके नाम हैं—पिङ्गाक्ष, विबोध, सुपुत्र और सुमुख। वेदों और शास्त्रोंके तात्पर्यको समझनेमें उनकी बुद्धि कभी कुण्ठित नहीं होती। वे चारों पक्षी विन्ध्यपर्वतकी कन्दरामें निवास करते हैं। तुम उन्हींके पास जाकर ये सभी बातें पूछो।
जैमिनिने कहा— ब्रह्मन्! यह तो बड़ी अद्भुत बात है कि पक्षियोंकी बोली मनुष्योंके समान हो। पक्षी होकर भी उन्होंने अत्यन्त दुर्लभ विज्ञान प्राप्त किया है। यदि तिर्यक्-योनिमें उनका जन्म हुआ है, तो उन्हें ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ? वे चारों पक्षी द्रोणके पुत्र कैसे बतलाये जाते हैं? विख्यात पक्षी द्रोण कौन है, जिसके चार पुत्र ऐसे ज्ञानी हुए? उन गुणवान् महात्मा पक्षियोंको धर्मका ज्ञान किस प्रकार हुआ?
मार्कण्डेयजी बोले— मुने! ध्यान देकर सुनो। पूर्वकालमें नन्दनवनके भीतर जब देवर्षि नारद, इन्द्र और अप्सराओंका समागम हुआ था, उसी समयकी घटना है। एक बार नारदजीने नन्दनवनमें देवराज इन्द्रसे भेंट की। उनकी दृष्टि पड़ते ही इन्द्र उठकर खड़े हो गये और बड़े आदरके साथ अपना सिंहासन उन्हें बैठनेको दिया। वहाँ खड़ी हुई अप्सराओंने भी देवर्षि नारदको विनीत भावसे मस्तक झुकाया। उनके द्वारा पूजित हो नारदजीने इन्द्रके बैठ जानेपर यथायोग्य कुशल प्रश्नके अनन्तर बड़ी मनोहर कथाएँ सुनायीं। उस बातचीतके प्रसङ्गमें ही इन्द्रने महामुनि नारदसे कहा—'देवर्षे! इन अप्सराओंमें जो आपको प्रिय जान पड़े, उसे आज्ञा दीजिये, यहाँ नृत्य करे। रम्भा, मिश्रकेशी, उर्वशी, तिलोत्तमा, घृताची अथवा मेनका—जिसमें आपकी रुचि हो, उसीका नृत्य देखिये।' इन्द्रकी यह बात सुनकर द्विजश्रेष्ठ नारदजीने विनयपूर्वक खड़ी हुई अप्सराओंसे कुछ सोचकर कहा—'तुम सब लोगोंमेंसे जो अपनेको रूप और उदारता आदि गुणोंमें सबसे श्रेष्ठ मानती हो, वही मेरे सामने यहाँ नृत्य करे।'
मार्कण्डेयजी कहते हैं— मुनिकी यह बात सुनते ही वे विनीत अप्सराएँ एक-एक करके आपसमें कहने लगीं—'अरी! मैं ही गुणोंमें सबसे श्रेष्ठ हूँ, तू नहीं।' इसपर दूसरी कहती, 'तू नहीं, मैं श्रेष्ठ हूँ।' उनका वह अज्ञानपूर्ण विवाद देखकर इन्द्रने कहा—'अरी! मुनिसे ही पूछो, वे ही बतायेंगे
क्रमशः भूर्लोक, भुवर्लोक तथा स्वर्गलोकको भी लाँघ गये थे, श्रीहरिके वे दोनों चरणकमल आपलोगोंको पवित्र करते रहें। जो समस्त पापोंका संहार करनेमें समर्थ हैं, जिनका श्रीविग्रह क्षीरसागरके गर्भमें शेषनागकी शय्यापर शयन करता है, उन्हीं शेषनागका श्वास-वायुसे कम्पित हुए जलकी उत्ताल तरङ्गोंके कारण विकराल प्रतीत होनेवाला समुद्र जिनका सङ्ग पाकर प्रसन्नताके मारे नृत्य-सा करता जान पड़ता है, वे भगवान् नारायण आपलोगोंकी रक्षा करते रहें। भगवान् नारायण, पुरुषश्रेष्ठ नर, उनकी लीला प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वती तथा उसके वक्ता महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके 'जय' (इतिहास-पुराण) का पाठ करना चाहिये।
- जैमिनि मार्कण्डेय-संवाद—वपुको दुर्वासाका शाप * ३
कि तुमलोगोंमें सबसे अधिक गुणवती कौन है।' इस प्रकार उनके पूछनेपर नारदजीने कहा—'जो गिरिराज हिमालयपर तपस्या करनेवाले मुनिश्रेष्ठ दुर्वासाको अपनी चेष्टासे क्षुब्ध कर देगी, उसीको मैं सबसे अधिक गुणवती मानूँगा।' उनकी बात सुनकर सबकी गर्दन हिल गयी। सबने एक-दूसरीसे कहना आरम्भ किया—'हमारे लिये यह कार्य असम्भव है।' उन अप्सराओंमें एकका नाम वपु था। उसके मनमें मुनियोंको विचलित कर देनेका गर्व था। उसने नारदजीको उत्तर दिया, 'जहाँ दुर्वासा मुनि रहते हैं, वहाँ आज मैं जाऊँगी। दुर्वासा मुनिको, जो शरीररूपी रथका सञ्चालन करते हैं, जिन्होंने इन्द्रियरूपी घोड़ोंको उस रथमें जोत रखा है, एक अयोग्य सारथि सिद्ध कर दिखाऊँगी। अपने कामबाणके प्रहारसे उनके मनरूपी लगामको गिरा दूँगी—उनके काबूके बाहर कर दूँगी।'
यों कहकर वपु हिमालय पर्वतपर गयी। वहाँ महर्षिके आश्रममें उनकी तपस्याके प्रभावसे हिंसक जीव भी अपनी स्वाभाविक हिंसावृत्ति छोड़कर परम शान्त रहते थे। महामुनि दुर्वासा जहाँ निवास करते थे, उस स्थानसे एक कोसकी दूरीपर वह सुन्दरी अप्सरा ठहर गयी और गीत गाने लगी। उसकी वाणीमें कोकिलके कलरवका-सा मिठास था। उसके संगीतकी मधुर ध्वनि कानमें पड़ते ही दुर्वासा मुनिके मनमें बड़ा विस्मय हुआ। वे उसी स्थानकी ओर गये, जहाँ वह मृदुभाषिणी बाला संगीतकी तान छेड़े हुए थी। उसे देखकर महर्षिने अपने मनको बलपूर्वक रोका और यह जानकर कि यह मुझे लुभानेके लिये आयी है, उन्हें क्रोध और अमर्ष हो आया। फिर तो वे महातपस्वी महर्षि उस अप्सरासे इस प्रकार बोले—'आकाशमें विचरनेवाली मतवाली अप्सरा! तू बड़े कष्टसे उपार्जित किये हुए मेरे तपमें विघ्न डालनेके लिये आयी है, अतः मेरे क्रोधसे कलङ्कित होकर तू पक्षीके कुलमें जन्म लेगी। ओ खोटी बुद्धिवाली नीच अप्सरा! अपना यह मनोहर रूप छोड़कर तुझे सोलह वर्षोंतक पक्षिणीके रूपमें रहना पड़ेगा। उस समय तेरे गर्भसे चार पुत्र उत्पन्न होंगे। किन्तु तू उनके प्रति होनेवाले प्रेमजनित सुखसे वञ्चित ही रहेगी और शस्त्रद्वारा वधको प्राप्त होकर शापमुक्त हो पुनः स्वर्गलोकमें अपना स्थान प्राप्त करेगी। बस, अब इसके विपरीत तू कुछ भी किसी प्रकार भी उत्तर न देना।' क्रोधसे लाल नेत्र किये महर्षि दुर्वासाने मधुर खनखनाहटसे युक्त चञ्चल कङ्कण धारण करनेवाली उस मानिनी अप्सराको ये दुःसह वचन सुनाकर इस पृथ्वीको छोड़ दिया और विश्वविश्रुत गुणोंसे गौरवान्वित एवं उत्ताल तरङ्गोंवाली आकाशगङ्गाके तटपर चले गये।
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- संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *
सुकृश मुनिके पुत्रोंके पक्षीकी योनिमें जन्म लेनेका कारण
मार्कण्डेयजी कहते हैं—जैमिने! अरिष्टनेमिके पुत्र पक्षिराज गरुड़ हुए। गरुड़के पुत्र सम्पातिके नामसे विख्यात हुए। सम्पातिके पुत्र शूरवीर सुपार्श्व था। सुपार्श्वका पुत्र कुम्भि और कुम्भिका पुत्र प्रलोलुप हुआ। उसके भी दो पुत्र हुए, उनमें एकका नाम कङ्क और दूसरेका नाम कन्धर था। कन्धरके तार्क्षी नामकी कन्या हुई, जो पूर्वजन्ममें श्रेष्ठ अप्सरा वपु थी और दुर्वासा मुनिके शापाग्निसे दग्ध हो पक्षिणीके रूपमें प्रकट हुई थी। मन्दपाल पक्षीके पुत्र द्रोणने कन्धरकी अनुमतिसे उस कन्याके साथ विवाह किया। कुछ कालके अनन्तर तार्क्षी गर्भवती हुई। उसका गर्भ अभी साढ़े तीन महीनेका ही था कि वह कुरुक्षेत्रमें गयी। वहाँ कौरव और पाण्डवोंमें बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ा था, भवितव्यतावश वह पक्षिणी उस युद्धक्षेत्रमें प्रवेश कर गयी। वहाँ उसने देखा—भगदत्त और अर्जुनमें युद्ध हो रहा है। सारा आकाश टिड्डियोंकी भाँति बाणोंसे खचाखच भर गया है। इतनेमें ही अर्जुनके धनुषसे छूटा हुआ एक बाण बड़े वेगसे उसके समीप आया और उसके पेटमें घुस गया। पेट फट जानेसे चन्द्रमाके समान श्वेत रंगवाले चार अंडे पृथ्वीपर गिरे। किन्तु उनकी आयु शेष थी, अतः वे फूट न सके; बल्कि पृथ्वीपर ऐसे गिरे, मानो रूईके ढेरपर पड़े हों। उन अण्डोंके गिरते ही भगदत्तके सुप्रतीक नामक गजराजकी पीठसे एक बहुत बड़ा घंटा भी टूटकर गिरा, जिसका बन्धन बाणोंके आघातसे कट गया था। यद्यपि वह अण्डोंके साथ ही गिरा था, तथापि उन्हें चारों ओरसे ढकता हुआ गिरा और धरतीमें थोड़ा-थोड़ा धँस भी गया।
युद्ध समाप्त होनेपर जहाँ घंटेके नीचे अण्डे पड़े थे, उस स्थानपर शमीक नामके एक संयमी महात्मा गये। उन्होंने वहाँ चिड़ियोंके बच्चोंकी आवाज सुनी। यद्यपि उन सबको परम विज्ञान प्राप्त था, तथापि निरे बच्चे होनेके कारण अभी वे स्पष्ट वाक्य नहीं बोल सकते थे। उन बच्चोंकी आवाजसे शिष्योंसहित महर्षि शमीकको बड़ा विस्मय हुआ और उन्होंने घंटेको उखाड़कर उसके भीतर पड़े हुए उन माता, पिता और पंखसे रहित पक्षिशावकोंको देखा। उन्हें इस प्रकार भूमिपर पड़ा देख महामुनि शमीक आश्चर्यमें डूब गये और अपने साथ आये हुए द्विजोंसे बोले—'देवासुरसंग्राममें जब दैत्योंकी सेना देवताओंसे पीड़ित होकर भागने लगी, तब उसकी ओर देखकर स्वयं विप्रवर शुक्राचार्यने यह ठीक ही कहा था—'ओ कायरो! क्यों पीठ दिखाकर जा रहे हो। न जाओ, लौट आओ। अरे! शौर्य और सुयशका परित्याग करके ऐसे किस स्थानमें जाओगे, जहाँ तुम्हारी मृत्यु न होगी। कोई भागे या युद्ध करे; वह तभीतक जीवित रह सकता है, जबतकके लिये पहले विधाताने उसकी आयु
- सुकृष मुनिके पुत्रोंके पक्षीकी योनिमें जन्म लेनेका कारण * ५
निश्चित कर दी है। विधाताके इच्छानुसार जबतक जीवकी आयु पूर्ण नहीं हो जाती, तबतक उसे कोई मार नहीं सकता। कोई अपने घरमें मरते हैं, कोई भागते हुए प्राणत्याग करते हैं, कुछ लोग अन्न खाते और पानी पीते हुए ही कालके गालमें चले जाते हैं। इसी प्रकार कुछ लोग ऐसे हैं, जो भोग-विलासका आनन्द ले रहे हैं, इच्छानुसार वाहनोंपर विचरते हैं, शरीरसे नीरोग हैं तथा अस्त्र-शस्त्रोंसे जिनका शरीर कभी घायल नहीं हुआ है; वे भी यमराजके वशमें हो जाते हैं। कुछ लोग निरन्तर तपस्यामें ही लगे रहते थे, किन्तु उन्हें भी यमराजके दूत उठा ले गये। निरन्तर योगाभ्यासमें प्रवृत्त रहनेवाले लोग भी शरीरसे अमर न हो सके। पहलेकी बात है, वज्रपाणि इन्द्रने एक बार शम्बरासुरके ऊपर अपने वज्रका प्रहार किया था। उस वज्रने उसकी छातीमें चोट पहुँचायी, तथापि वह असुर मर न सका। परन्तु काल आनेपर उन्हीं इन्द्रने उसी वज्रसे जब-जब दानवोंको मारा, वे तत्काल मृत्युको प्राप्त हो गये। यह समझकर तुम्हें भय नहीं करना चाहिये! तुम सब लोग लौट आओ।' उनके इस प्रकार समझानेपर वे दैत्य मृत्युका भय त्यागकर रणभूमिमें लौट आये। शुक्राचार्यकी कही हुई उपर्युक्त बातोंको इन श्रेष्ठ पक्षियोंने सत्य कर दिखाया; क्योंकि उस अलौकिक युद्धमें पड़कर भी इनकी मृत्यु नहीं हुई। ब्राह्मणो! भला, सोचो तो सही—कहाँ अण्डोंका गिरना, कहाँ उसके साथ ही घंटेका भी टूट पड़ना और कहाँ मांस, मज्जा तथा रक्तसे भरी हुई भूमिका बिछौना बन जाना—ये सभी बातें अद्भुत हैं। विप्रगण! ये कोई सामान्य पक्षी नहीं हैं। संसारमें दैवका अनुकूल होना महान् सौभाग्यका सूचक होता है।'
यों कहकर शमीक मुनिने उन बच्चोंको भलीभाँति देखा और फिर अपने शिष्योंसे इस प्रकार कहा—'अब तुमलोग इन पक्षिशावकोंको लेकर आश्रमको लौट चलो और ऐसे स्थानपर रखो जहाँ इन्हें बिल्ली, चूहे, बाज अथवा नेवले आदिसे कोई भय न हो। ब्राह्मणो! यद्यपि यह ठीक है कि किसीकी रक्षाके लिये अधिक प्रयत्न करनेकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि सम्पूर्ण जीव अपने कर्मोंसे ही मारे जाते हैं और कर्मोंसे ही उनकी रक्षा होती है—ठीक उसी प्रकार, जैसे इस समय ये पक्षिशावक इस युद्धभूमिमें बच गये हैं, तथापि सब मनुष्योंको सभी कार्योंके लिये यत्न अवश्य करना चाहिये, क्योंकि जो पुरुषार्थ करता है, वह (असफल होनेपर भी) सत्पुरुषोंकी निन्दाका पात्र नहीं होता।' मुनिवर शमीकके इस प्रकार कहनेपर वे मुनिकुमार उन पक्षियोंको लेकर अपने आश्रमको चले गये, जहाँ भाँति-भाँतिके वृक्षोंकी शाखाओंपर बैठे हुए भौंरे फलोंका रस ले रहे थे और अनेक तपस्वियोंके रहनेसे जहाँकी रमणीयता बहुत बढ़ गयी थी।
विप्रवर जैमिने! मुनिश्रेष्ठ शमीक प्रतिदिन अन्न और जल देकर तथा सब प्रकारसे रक्षाकी
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व्यवस्था करके उन बच्चोंका पालन-पोषण करने लगे। एक ही महीना बीतनेपर वे पक्षियोंके बच्चे आकाशमें इतने ऊँचे उड़ गये, जितनेपर सूर्यके रथके आने-जानेका मार्ग है। उस समय आश्रमवासी मुनिकुमार कौतूहलभरे चञ्चल नेत्रोंसे उन्हें देख रहे थे। उन पक्षिशावकोंने नगर, समुद्र और बड़ी-बड़ी नदियोंसहित पृथ्वीको वहाँसे रथके पहियेके बराबर देखा और फिर आश्रमपर लौट आये। तिर्यक्-योनिमें उत्पन्न हुए वे महात्मा पक्षी अधिक उड़नेके कारण परिश्रमसे थक गये थे। एक दिन महर्षि शमीक अपने शिष्योंपर कृपा करनेके लिये उन्हें धर्मके तत्त्वका उपदेश कर रहे थे। उस समय वहाँ महर्षिके प्रभावसे उन पक्षियोंके अन्तःकरणमें स्थित ज्ञान प्रकट हो गया। फिर तो उन सबने महर्षिकी परिक्रमा की और उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया। तत्पश्चात् वे बोले—‘मुने! आपने भयानक मृत्युसे हमारा उद्धार किया है। आपने हमें रहनेके लिये स्थान, भोजन और जल प्रदान किया है। आप ही हमारे पिता और गुरु हैं। हमलोग जब गर्भमें थे, तभी माताकी मृत्यु हो गयी। पिताने भी हमारी रक्षा नहीं की। आपने ही पधारकर हमें जीवनदान दिया और शैशव-अवस्थामें हमलोगोंकी रक्षा की। हम कीड़ोंकी तरह सूख रहे थे, आपने हाथोंके घण्टेको उठाकर हमारे सङ्कटका निवारण किया। अब हम बड़े हो गये, हमें ज्ञान भी हो गया; अतः आज्ञा दीजिये, हम आपकी क्या सेवा करें?’
महर्षि शमीक अपने पुत्र शृङ्गी ऋषि तथा समस्त शिष्योंसे घिरे हुए बैठे थे; उन्होंने जब उन पक्षिशावकोंकी यह शुद्ध संस्कृतमयी स्पष्ट वाणी सुनी, तब उन्हें बड़ा कौतूहल हुआ। उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। उन्होंने पूछा—‘बच्चो! तुमलोग ठीक-ठीक बताओ, तुम्हें किस कारणसे ऐसी वाणी प्राप्त हुई है। पक्षियोंका रूप और मनुष्यकी-सी वाणी प्राप्त होनेका क्या रहस्य है?’
पक्षी बोले—‘मुनिवर! प्राचीन कालमें विपुलस्वान् नामक एक श्रेष्ठ मुनि रहते थे, जिनके दो पुत्र हुए—सुकृष और तुम्बुरु। सुकृष अपने चित्तको वशमें रखनेवाले महात्मा थे। उन्हींसे हम चार पुत्रोंका जन्म हुआ। हम सब लोग विनय, सदाचार एवं भक्तिवश सदा विनीत भावसे रहते थे। पिताजी सदा तपस्यामें संलग्न रहते और इन्द्रियोंको काबूमें रखते थे। उस समय उन्हें जब जिस वस्तुकी अभिलाषा होती, हम उसे उनकी सेवामें प्रस्तुत करते थे। एक दिनकी बात है, देवराज इन्द्र पक्षीका रूप धारण करके वहाँ आये। उनका शरीर बहुत बड़ा था, पंख टूट गये थे। बुढ़ापेने उनपर अधिकार जमा लिया था। उनकी आँखें कुछ-कुछ लाल हो रही थीं और सारा शरीर शिथिल जान पड़ता था। वे सत्य, शौच और क्षमाका पालन करनेवाले अत्यन्त उदारचित्त महात्मा मुनिश्रेष्ठ सुकृषकी परीक्षा लेने आये थे। उनका आगमन ही हमारे लिये शापका कारण बन गया।
पक्षीरूपधारी इन्द्रने कहा—विप्रवर! मुझे बड़े जोरकी भूख सता रही है, मेरी रक्षा कीजिये; महाभाग! मैं भोजनकी इच्छासे यहाँ आया हूँ। आप मेरे लिये अनुपम सहारा बनें। मैं विन्ध्यपर्वतके शिखरपर रहता था। वहाँसे किसी प्रबल पक्षीके पंखसे प्रकट हुई अत्यन्त वेगयुक्त वायुके झोंके खाकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और मूर्च्छित हो गया। एक सप्ताह तक मुझे होश नहीं हुआ। आठवें दिन मेरी चेतना लौटी। सचेत होनेपर मैं भूखसे व्याकुल हो गया और भोजनकी इच्छासे आपकी शरणमें आया हूँ। इस समय मुझे तनिक भी चैन नहीं है। मेरे मनमें बड़ी व्यथा हो रही है। विमल बुद्धिवाले महर्षे! अब आप मेरी रक्षाके लिये भोजन दीजिये, जिससे मेरी जीवन-यात्रा चालू रहे।
यह सुनकर महर्षिने उन पक्षीरूपधारी इन्द्रसे कहा—‘मैं तुम्हारे प्राणोंकी रक्षाके लिये तुम्हें यथेष्ट भोजन दूँगा।’ यों कहकर द्विजश्रेष्ठ सुकृषने
- सुकृश मुनिके पुत्रोंके पक्षीकी योनिमें जन्म लेनेका कारण * ७
पुनः उनसे पूछा—'मुझे तुम्हारे लिये कैसे आहारकी व्यवस्था करनी चाहिये।' उन्होंने कहा— 'मुने! मनुष्यके मांससे मुझे विशेष तृप्ति होती है।'
ऋषिने कहा—'अरे! कहाँ मनुष्यका मांस और कहाँ तुम्हारी वृद्धावस्था। जान पड़ता है, जीवकी दूषित भावनाओंका सर्वथा अन्त कभी नहीं होता। अथवा मुझे यह सब कहनेकी क्या आवश्यकता। जिसे देनेकी प्रतिज्ञा कर ली गयी, उसे सदा देना ही चाहिये; मेरे मनमें सदा ऐसा ही भाव रहता है।
इन्द्रसे यों कहते हुए अपनी प्रतिज्ञा पूरी करनेका निश्चय करके विप्रवर सुकृशने हम सबको शीघ्र ही बुलाया और हमारे गुणोंकी बारंबार प्रशंसा करते हुए कहा—'पुत्रो! यदि तुमलोगोंके विचारसे पिता परम गुरु और पूजनीय हो तो निष्कपट भावसे मेरे वचनका पालन करो।' उनकी यह बात सुनते ही हम सब लोगोंने बड़े आदरके साथ कहा—'पिताजी! आप जो कुछ भी कहेंगे, जिस कार्यके लिये भी हमें आज्ञा देंगे, उसे हमारे द्वारा पूर्ण किया हुआ ही समझिये।'
**ऋषि बोले—**यह पक्षी भूख प्याससे पीड़ित होकर मेरी शरणमें आया है। तुमलोग शीघ्र ही ऐसा करो, जिससे तुम्हारे शरीरके मांससे क्षणभर इसकी तृप्ति और तुम्हारे रक्तसे इसकी प्यास बुझ जाय।
यह सुनकर हमें बड़ी व्यथा हुई। हमारे शरीरमें कम्प और मनमें भय छा गया, हम सहसा बोल उठे—'इसमें तो बड़ा कष्ट है, बड़ा कष्ट है। यह काम हमसे नहीं हो सकता। कोई भी समझदार मनुष्य दूसरेके शरीरके लिये अपने शरीरका नाश अथवा वध कैसे करा सकता है। अतः हमलोग यह काम नहीं करेंगे।' हमारी ऐसी बातें सुनकर वे मुनि क्रोधसे जल उठे और अपनी लाल-लाल आँखोंसे हमें दग्ध करते हुए-से पुनः इस प्रकार बोले—'अरे! मुझसे इसके लिये प्रतिज्ञा करके भी तुमलोग यह कार्य नहीं करना चाहते; अतः मेरे शापसे दग्ध होकर तुमलोग पक्षियोंकी योनिमें जन्म लोगे।' हमसे यों कहकर उन्होंने शास्त्रके अनुसार अपनी अन्त्येष्टि-क्रिया की—और्ध्वदेहिक संस्कारकी विधि पूर्ण की। इसके बाद वे उस पक्षीसे बोले—'खगश्रेष्ठ! अब तुम निश्चिन्त होकर मुझे भक्षण करो। मैंने अपना यह शरीर तुम्हें आहारके रूपमें समर्पित कर दिया है। पक्षिरज! जबतक अपने सत्यका पूर्णरूपसे पालन होता रहे, वही ब्राह्मणका ब्राह्मणत्व कहलाता है। ब्राह्मण दक्षिणायुक्त यज्ञों अथवा अन्य कर्मोंके अनुष्ठानसे भी वह महान् पुण्य नहीं प्राप्त कर सकते, जो उन्हें सत्यकी रक्षा करनेसे प्राप्त होता है।'*
* एतावदेव विप्रस्य ब्राह्मण्यं प्रचक्षते। यावत् पतङ्गजवर स्वसत्यपरिपालनम्॥
न यज्ञैर्दक्षिणोद्दिष्टैस्तत् पुण्यं प्राप्यते महत्। कर्मणान्येन वा विप्रेर्यत् सत्यपरिपालनात्॥
(अ० ३ । ४६-४८)
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* संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *
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महर्षिका यह वचन सुनकर पक्षिरूपधारी इन्द्रके मनमें बड़ा विस्मय हुआ। वे अपने देहरूपमें प्रकट होकर बोले—‘विप्रवर! मैंने आपकी परीक्षाके लिये यह अपराध किया है। शुद्ध बुद्धिवाले महर्षि! आप इसके लिये मुझे क्षमा करें। बताइये, आपको क्या इच्छा है जिसे मैं पूर्ण करूँ? अपने सत्य वचनका पालन करनेसे आपके प्रति मेरा बड़ा प्रेम हो गया है। आजसे आपके हृदयमें इन्द्रसम्बन्धी ज्ञान प्रकट होगा। अब आपकी तपस्या और धर्ममें कोई विघ्न नहीं उपस्थित होगा।’
यों कहकर जब इन्द्र चले गये, तब हमलोगोंने क्रोधमें भरे हुए महामुनि पिताजीके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—‘तात! हम मृत्युसे डर रहे थे। महामते! आप हम दोनोंके अपराधको क्षमा करें। हमलोगोंको जीवन बहुत ही प्रिय है। चमड़े, हड्डी और मांसके समूह तथा पीब और रक्तसे भरे हुए इस शरीरमें जहाँ हमें तनिक भी आसक्ति नहीं रखनी चाहिये, वहीं हमारी इतनी आसक्ति है। महाभाग! काम, क्रोध आदि दोष जीवके प्रबल शत्रु हैं। इनसे विवश होकर यह लोक जिस प्रकार मोहके वशीभूत हो जाता है, उसे आप सुनें। यह शरीर एक बहुत बड़ा नगर है। त्वचा ही इसकी चहारदीवारी है, हड्डियाँ ही इसमें खम्भेका काम देती हैं। चमड़ा ही इस नगरकी दीवार है, जो समूचे नगरको रोके हुए है। मांस और रक्तके पङ्कका इसपर लेप चढ़ा हुआ है। इस नगरमें नौ दरवाजे हैं। इसकी रक्षामें बहुत बड़ा प्रयास करना होता है। नस-नाड़ियाँ इसे सब ओरसे घेरे हुए हैं। चेतन पुरुष ही इस नगरके भीतर राजाके रूपमें विराजमान है। उसके दो मन्त्री हैं—बुद्धि और मन। वे दोनों परस्परविरोधी हैं और आपसमें वैर निकालनेके लिये दोनों ही यत्न करते रहते हैं। चार ऐसे शत्रु हैं, जो उस राजाका नाश चाहते हैं। उनके नाम हैं—काम, क्रोध, लोभ तथा मोह। जब राजा उन नवों दरवाजोंको बंद किये रहता है, तब उसकी शक्ति सुरक्षित रहती है और वह सदा निर्भय बना रहता है; वह सबके प्रति अनुराग रखता है, अतः शत्रु उसका पराभव नहीं कर पाते।
‘परन्तु जब वह नगरके सब दरवाजोंको खुला छोड़ देता है, उस समय राग नामक शत्रु नेत्र आदि द्वारोंपर आक्रमण करता है। वह सर्वत्र व्याप्त रहनेवाला, बहुत विशाल और पाँच दरवाजोंसे नगरमें प्रवेश करनेवाला है। उसके पीछे-पीछे लोभ और भयङ्कर शत्रु इस नगरमें घुस जाते हैं। पाँच इन्द्रिय नामक द्वारोंसे शरीरके भीतर प्रवेश करके राग मन तथा अन्यान्य इन्द्रियोंके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है। इस प्रकार इन्द्रिय और मनको वशमें करके वह दुर्धर्ष हो जाता है और समस्त दरवाजोंको काबूमें करके चहारदीवारीको नष्ट कर देता है। मनको रागके अधीन हुआ देख बुद्धि तत्काल नष्ट हो जाती (पलायन कर जाती) है। जब मन्त्री साथ नहीं रहते, तब अन्य पुरवासी भी उसे छोड़ देते हैं। फिर शत्रुओंको उसके
- धर्मपक्षीद्वारा जैमिनिके प्रश्नोंका उत्तर * ९
छिद्रका ज्ञान हो जानेसे राजा उनके द्वारा नाशको प्राप्त होता है। इस प्रकार राग, मोह, लोभ तथा क्रोध—ये दुरात्मा शत्रु मनुष्यकी स्मरण-शक्तिका नाश करनेवाले हैं। रागसे काम होता है, कामसे लोभका जन्म होता है, लोभसे सम्मोह—अविवेक होता है और सम्मोहसे स्मरण-शक्ति भ्रान्त हो जाती है। स्मृतिकी भ्रान्तिसे बुद्धिका नाश होता है और बुद्धिका नाश होनेसे मनुष्य स्वयं भी नष्ट—कर्तव्यभ्रष्ट हो जाता है।* इस प्रकार जिनकी बुद्धि नष्ट हो चुकी है, जो राग और लोभके पीछे चलनेवाले हैं तथा जिन्हें जीवनका बहुत लोभ है, ऐसे हमलोगोंपर आप प्रसन्न होइये। मुनिश्रेष्ठ! यह जो शाप आपने दिया है, वह हमें लागू न हो। तामसी योनि बड़ी कष्टदायिनी होती है। हम उसे कभी प्राप्त न हों।'
ऋषिने कहा—'पुत्रो! आजतक मेरे मुखसे कभी झूठी बात नहीं निकली; अतः मैंने जो कुछ कहा है, वह कभी मिथ्या नहीं होगा। मैं यहाँ दैवको ही प्रधान मानता हूँ। उसके सामने पौरुष व्यर्थ है। आज दैवने मुझसे बलपूर्वक यह अयोग्य कर्म करा डाला, जिसकी मैंने कभी मनमें कल्पना भी नहीं की थी। पुत्रो! तुमलोगोंने प्रणाम करके मुझे प्रसन्न किया है; इसलिये तिर्यक्-योनिमें जन्म लेनेपर भी तुम्हें परम ज्ञान प्राप्त होगा। ज्ञानसे ही तुम्हें सन्मार्गका दर्शन होगा। तुम्हारे क्लेश और पाप धुल जायेंगे तथा तुम्हारे मनमें किसी प्रकारका संशय नहीं रहेगा। इस प्रकार मेरे प्रसादसे ज्ञान पाकर तुम परम सिद्धिको प्राप्त कर लोगे।
भगवन्! इस प्रकार पूर्वकालमें दैववश पिताने हमें शाप दे दिया। तबसे बहुत कालके बाद हम दूसरी योनिमें आये, युद्धभूमिमें उत्पन्न हुए और फिर आपके द्वारा हमलोगोंका पालन हुआ। द्विजश्रेष्ठ! यही हमारे पक्षी-योनिमें आनेकी कहानी है। संसारमें कोई भी जीव ऐसा नहीं है, जिसे दैवके द्वारा बाधा न पहुँचती हो, क्योंकि समस्त जीव-जन्तुओंकी चेष्टा दैवके ही अधीन है।†
मार्कण्डेयजी कहते हैं—उनकी बात सुनकर महाभाग शमीक मुनिने अपने पास बैठे हुए द्विजोंसे कहा—'मैंने तुमलोगोंको पहले ही बताया था कि ये साधारण पक्षी नहीं हैं, कोई श्रेष्ठ द्विज हैं, जो कि अलौकिक युद्धमें जन्म लेकर भी मृत्युको नहीं प्राप्त हुए।' तदनन्तर महात्मा शमीकने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्हें जानेकी आज्ञा दी। फिर वे वृक्षों और लताओंसे सुशोभित पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्यगिरिपर चले गये। तबसे आजतक वे धर्मात्मा पक्षी तपस्या और स्वाध्यायमें संलग्न हो समाधिके लिये दृढ़ निश्चय करके उस पर्वतपर ही निवास करते हैं।
धर्मपक्षीद्वारा जैमिनिके प्रश्नोंका उत्तर
मार्कण्डेयजी कहते हैं—जैमिनि! इस प्रकार वे द्रोणके पुत्र चारों पक्षी ज्ञानी हैं और विन्ध्यगिरिपर निवास करते हैं। तुम उनकी सेवामें जाओ और उनसे ज्ञातव्य बातें पूछो।
मार्कण्डेय मुनिकी यह बात सुनकर महर्षि जैमिनि, विन्ध्यपर्वतपर, जहाँ वे धर्मात्मा पक्षी रहते थे, गये। उस पर्वतके निकट पहुँचनेपर पाठ करते हुए उन पक्षियोंकी ध्वनि उनके कानोंमें
* रागात् कामः प्रभवति कामाल्लोभोऽभिजायते। लोभाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः॥
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति॥ (२। ७१-७२)
†नास्त्यसाविह संसारे यो न दैवेन बाध्यते। सर्वेषामेव जन्तूनां दैवाधीनं हि चेष्टितम्॥ (३। ८१)
१० * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *
पड़ी। उसे सुनकर जैमिनि बड़े विस्मयमें पड़े और इस प्रकार सोचने लगे—'अहो! ये श्रेष्ठ पक्षी बहुत ही स्पष्ट उच्चारण करते हुए पाठ कर रहे हैं; जिस अक्षरका कण्ठ-तालु आदि जो स्थान है, उसका वहींसे उच्चारण हो रहा है। बोलनेमें कितनी शुद्धता और सफाई है। ये अविराम पाठ करते जा रहे हैं, रुककर साँसतक नहीं लेते। श्वासकी गतिपर इन्होंने विजय प्राप्त कर ली है। किसी भी शब्दके उच्चारणमें कोई दोष नहीं दिखायी देता। ये यद्यपि निन्दित योनिको प्राप्त हुए हैं, तथापि सरस्वतीदेवी इनको नहीं त्याग रही हैं! यह मुझे बड़े आश्चर्यकी बात जान पड़ती है। बन्धु-बान्धवजन, मित्रगण तथा घरमें और जो प्रिय वस्तुएँ हैं, वे सभी साथ छोड़कर चली जाती हैं; परन्तु सरस्वती कभी त्याग नहीं करतीं।'*
इस प्रकार सोचते-विचारते हुए महर्षि जैमिनिने विन्ध्यपर्वतकी कन्दरामें प्रवेश किया। वहाँ जाकर उन्होंने देखा, वे पक्षी शिलाखण्डपर बैठे हुए पाठ कर रहे हैं। उनपर दृष्टि पड़ते ही महर्षि जैमिनि हर्षमें भरकर बोले—'श्रेष्ठ पक्षियो! आपका कल्याण हो। मुझे व्यासजीका शिष्य जैमिनि समझिये। मैं आपलोगोंका दर्शन करनेके लिये उत्कण्ठित होकर यहाँ आया हूँ। आपके पिताने अत्यन्त क्रोधमें आकर जो आपलोगोंको शाप दे दिया और आपको पक्षियोंकी योनिमें आना पड़ा, उसके लिये खेद नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह सर्वथा दैवका ही विधान था। तपस्याका क्षय हो जानेपर मनुष्य दाता होकर भी याचक बन जाते हैं। स्वयं मारकर भी दूसरोंके हाथसे मारे जाते हैं तथा पहले दूसरोंको गिराकर भी स्वयं दूसरोंके द्वारा गिराये जाते हैं। इस प्रकार आनेवाली विपरीत दशाएँ मैंने अनेक बार देखी हैं। भावके बाद अभाव तथा अभावके बाद भाव, इस प्रकार भावाभावकी परम्परासे संसारके लोग निरन्तर व्याकुल रहते हैं। आपलोगोंको भी अपने मनमें ऐसा ही विचार करके कभी शोक नहीं करना चाहिये। शोक और हर्षके वशीभूत न होना ही ज्ञानका फल है।'
तदनन्तर उन धर्मात्मा पक्षियोंने पाद्य और अर्घ्यके द्वारा महर्षि जैमिनिका पूजन किया और उन्हें प्रणाम करके उनको कुशल पूछी। फिर अपने पंखोंसे हवा करके उनकी थकावट दूर की। जब वे सुखपूर्वक बैठकर विश्राम ले चुके, तब पक्षियोंने कहा—'ब्रह्मन्! आज हमारा जन्म सफल हो गया। यह जीवन भी उत्तम जीवन बन गया; क्योंकि आज हमें आपके दोनों चरण-कमलोंका दर्शन मिला, जो देवताओंके लिये भी वन्दनीय हैं। हमारे शरीरमें पिताजीके क्रोधसे प्रकट हुई जो अग्नि जल रही है, वह आज आपके दर्शनरूपी जलसे सिंचकर शान्त हो गयी। ब्रह्मन्! आप कुशलसे तो हैं न? आपके आश्रममें रहनेवाले मृग, पक्षी, वृक्ष, लता, गुल्म, बाँस और भाँति-भाँतिके तृण—इन सबकी कुशल है न? इनपर कोई संकट तो नहीं है? अब हमपर कृपा कीजिये और यहाँ अपने आगमनका कारण बतलाइये। हमारा कोई बहुत बड़ा भाग्य था, जो आप इन नेत्रोंके अतिथि हुए।'
जैमिनि बोले—'श्रेष्ठ पक्षीगण! मुझे महाभारत-शास्त्रमें कई सन्देह हैं। उन सबको पूछनेके लिये पहले मैं भृगुकुलश्रेष्ठ महात्मा मार्कण्डेय मुनिके पास गया था। मेरे पूछनेपर उन्होंने कहा—'विन्ध्यपर्वतपर द्रोणके पुत्र महात्मा पक्षी रहते हैं। वे तुम्हारे प्रश्नोंका विस्तारपूर्वक उत्तर देंगे।' उनकी आज्ञासे ही मैं इस महान् पर्वतपर आया हूँ। आपलोग हमारे प्रश्नोंको पूर्णरूपसे सुनकर उनका विश्लेषण करें।
* बन्धुवर्गस्तथा मित्रं यच्चेष्टमपरं गृहे । त्यक्त्वा गच्छति तत्सर्वं न जहाति सरस्वती ॥ (४। ६)
• धर्मपक्षीद्वारा जैमिनिके प्रश्नोंका उत्तर • ११
पक्षियोंने कहा— ब्रह्मन्! आपका प्रश्न यदि हमारी बुद्धिके बाहर न होगा तो हम अवश्य उसका समाधान करेंगे। आप निःशङ्क होकर सुनें। विप्रवर! चारों वेद, धर्मशास्त्र, सम्पूर्ण वेदाङ्ग तथा और भी जो वेदोंके समान माननीय इतिहास-पुराणादि हैं, उन सबमें हमारी बुद्धिका प्रवेश है; तथापि हम कोई प्रतिज्ञा नहीं कर सकते। आपको महाभारतमें जो-जो सन्दिग्ध बात जान पड़े, उसे निर्भीक होकर पूछिये।
जैमिनि बोले— पक्षियो! आपलोगोंका अन्तःकरण निर्मल है। महाभारतमें मेरे लिये जो संदिग्ध बातें हैं, उन्हें बताता हूँ; सुनिये और सुनकर उनकी व्याख्या कीजिये। सर्वव्यापी भगवान् जनार्दन सम्पूर्ण जगत्के आधार, समस्त कारणोंके भी कारण और निर्गुण होते हुए भी मनुष्य-शरीरको कैसे प्राप्त हुए? द्रुपदकुमारी कृष्णा अकेली ही पाँच पाण्डवोंकी महारानी क्योंकर हुई? इस विषयमें मुझे महान् सन्देह है। इसके सिवा द्रौपदीके पाँच महारथी पुत्र, जिनका अभी विवाहस्तक नहीं हुआ था, समस्त पाण्डव जिनके रक्षक थे तथा जो स्वयं भी बड़े बलवान् थे, अनाथकी भाँति कैसे मारे गये? महाभारतके विषयमें यह मेरा सन्देह है। आपलोग इसका निवारण करें।
पक्षियोंने कहा— जो सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी, सर्वव्यापक, सबकी उत्पत्तिके कारण, अन्तर्यामी, प्रमाणोंके अधिपत्य, सनातन, अविनाशी, चतुर्व्यूह-स्वरूप, त्रिगुणमय, निर्गुण, सबसे बड़े, अत्यन्त गौरवशाली, सर्वश्रेष्ठ तथा अमृतस्वरूप हैं, उन भगवान् विष्णुको हम सबसे पहले नमस्कार करते हैं। जिनसे बढ़कर सूक्ष्म तथा जिनसे अधिक बड़ा भी कोई नहीं है, जिनके द्वारा यह सम्पूर्ण विश्व व्याप्त है, जो इस जगत्के आदिकारण और अजन्मा हैं, जो उत्पत्ति, लय, प्रत्यक्ष और परोक्ष—सबसे विलक्षण हैं, इस सम्पूर्ण जगत्को जिनकी रचना बतलाते हैं तथा अन्तमें जिनके भीतर इसका संहार होता है, उन परमेश्वरको हमारा नमस्कार है। तत्पश्चात् जो अपने चारों मुखोंसे ऋक्-साम आदि वेदोंका उच्चारण करते हुए तीनों लोकोंको पवित्र करते हैं, उन आदिदेव ब्रह्माजीको भी हम एकाग्रचित्तसे नमस्कार करते हैं। इसी प्रकार जिनके एका ही बाणसे पराजित होकर असुरगण कभी ऋषियोंके यज्ञोंका विनाश नहीं करते, उन भगवान् शङ्करको भी मस्तक झुकाते हैं। इसके बाद हम अद्भुत कर्म करनेवाले व्यासजीके सम्पूर्ण मतोंकी व्याख्या करेंगे, जिन्होंने महाभारतके उद्देश्यसे धर्म आदिका रहस्य प्रकट किया है। तत्त्वदर्शी मुनियोंने जलको 'नारा' कहा है। वह नारा ही पूर्वकालमें भगवान्का निवासस्थान रहा, इसलिये वे नारायण कहे गये हैं।* ब्रह्मन्! ये सर्वव्यापी भगवान् नारायणदेव सबको व्याप्त
* आपो नारा इति प्रोक्ता मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः । अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ॥ (१। ३३)
६२ • संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण •
करके स्थित हैं। वे सगुण भी हैं और निर्गुण भी। उनका प्रथम स्वरूप ऐसा है कि जिसका शब्दोंद्वारा प्रतिपादन नहीं किया जा सकता। विद्वान् पुरुष उसे शुक्ल (शुद्धस्वरूप) देखते हैं। भगवान्का वह दिव्य विग्रह ज्योतिःपुञ्जसे परिपूर्ण है। वही योगी पुरुषोंकी परानिष्ठा (अन्तिम लक्ष्य) है। वह दिव्यस्वरूप दूर भी है और समीप भी। उसे सब गुणोंसे अतीत जानना चाहिये। उस दिव्यस्वरूपका ही नाम वासुदेव है। अहंता और ममताका त्याग करनेसे ही उसका साक्षात्कार होता है। रूप और वर्ण आदि काल्पनिक भाव उसमें नहीं हैं। वह सदा परम शुद्ध एवं उत्तम अधिष्ठानस्वरूप है। भगवान्का दूसरा स्वरूप शेषके नामसे प्रसिद्ध है, जो पाताललोकमें रहकर पृथ्वीको अपने मस्तकपर धारण करता है। इसे तिर्यक्स्वरूपको प्राप्त हुई तामसी मूर्ति कहते हैं। श्रीहरिकी तीसरी मूर्ति समस्त प्रजाके पालन-पोषणमें तत्पर रहती है। वही इस पृथ्वीपर धर्मकी निश्चित व्यवस्था करती है। धर्मका नाश करनेवाले उद्दण्ड असुरोंको मारती तथा धर्मकी रक्षामें संलग्न रहनेवाले देवताओं और साधु-संतोंकी रक्षा करती है। जैमिनिजी! संसारमें जब-जब धर्मका ह्रास और अधर्मका उत्थान होता है, तब-तब वह अपनेको यहाँ प्रकट करती है।
पूर्वकालमें वही वाराहरूप धारण करके अपने थूथुनसे जलको हटाकर इस पृथ्वीको एक ही दाँतसे जलके ऊपर ऐसे उठा लायीं मानो वह कोई कमलका फूल हो। उन्हीं भगवान्ने नृसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुका वध किया और विप्रचित्ति आदि अन्य दानवोंको मार गिराया। इसी प्रकार भगवान्के वामन आदि और भी बहुत-से अवतार हैं, जिनकी गणना करनेमें हम असमर्थ हैं। इस समय भगवान्ने मथुरामें श्रीकृष्णरूपमें अवतार लिया है। इस तरह भगवान्की वह सात्त्विकी मूर्ति ही भिन्न-भिन्न अवतार धारण करती है। यह आपके पहले प्रश्नका उत्तर बतलाया गया कि भगवान् पूर्णकाम होते हुए भी धर्म आदिकी रक्षाके लिये सदा स्वेच्छासे ही अवतीर्ण होते हैं।
ब्रह्मन्! पूर्वकालमें त्वष्टा प्रजापतिके पुत्र विश्वरूप इन्द्रके हाथसे मारे गये थे, इसलिये ब्रह्महत्याने इन्द्रको धर दबाया। इससे उनके तेजकी बड़ी क्षति हुई। इस अन्यायके कारण इन्द्रका तेज धर्मराजके शरीरमें प्रवेश कर गया, अतः इन्द्र निस्तेज हो गये। तदनन्तर अपने पुत्रके मारे जानेका समाचार सुनकर त्वष्टा प्रजापतिको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने अपने मस्तकसे एक जटा उखाड़कर सबको सुनाते हुए यह बात कही—'आज देवताओंसहित तीनों लोक मेरे पराक्रमको देखें। वह खोटी बुद्धिवाला ब्रह्मघाती इन्द्र भी मेरी शक्तिका साक्षात्कार कर ले; क्योंकि उस दुष्टने अपने ब्राह्मणोचित कर्ममें लगे हुए मेरे पुत्रका वध किया है।' यों कहकर क्रोधसे लाल आँखें किये प्रजापतिने वह जटा अग्निमें होम दी। फिर तो उस होमकुण्डसे वृत्र नामक महान् असुर
• धर्मपक्षीद्वारा जैमिनिके प्रश्नोंका उत्तर • १३
प्रकट हुआ, जिसके शरीरसे सब ओर आगकी लपटें निकल रहीं थीं। विशाल देह, बड़ी-बड़ी दाढ़ें और कटे-छाँटे कोयलेके ढेरकी भाँति शरीरका रंग था। उस महान् असुर वृत्रासुरको अपने वधके लिये उत्पन्न देख इन्द्र भयसे व्याकुल हो उठे। उन्होंने सन्धिकी इच्छासे सप्तर्षियोंको उसके पास भेजा। सम्पूर्ण भूतोंके हितसाधनमें संलग्न रहनेवाले वे महर्षि बड़ी प्रसन्नताके साथ गये और उन्होंने कुछ शर्तोंके साथ इन्द्र और वृत्रासुरमें मित्रता करा दी। इन्द्रने सन्धिकी शर्तोंका उल्लङ्घन करके जब वृत्रासुरको मार डाला, तब पुनः उनपर ब्रह्महत्याका आक्रमण हुआ। उस समय उनका सारा बल नष्ट हो गया। इन्द्रके शरीरसे निकला हुआ बल वायुदेवतामें समा गया। तदनन्तर जब इन्द्रने गौतमका रूप धारण करके उनकी पत्नी अहल्याके सतीत्वका नाश किया, उस समय उनका रूप भी नष्ट हो गया। उनके अङ्ग-प्रत्यङ्गका लावण्य, जो बड़ा ही मनोरम था, व्यभिचार-दोषसे दूषित देवराज इन्द्रको छोड़कर दोनों अश्विनीकुमारोंके पास चला गया। इस प्रकार इन्द्र अपने धर्म, तेज, बल और रूपसे वञ्चित हो गये। यह जानकर दैत्योंने उन्हें जीतनेका उद्योग आरम्भ किया।
महामुने! उन दिनों पृथ्वीपर जो अधिक पराक्रमी राजा थे, उन्हींके कुलोंमें देवराजको जीतनेकी इच्छा रखनेवाले अत्यन्त बलशाली दैत्य उत्पन्न हुए। कुछ कालके अनन्तर यह पृथ्वी पापके भारी भारसे पीड़ित हो मेरु पर्वतके शिखरपर, जहाँ देवताओंकी दिव्य सभा है, गयी। वहाँ पहुँचकर उसने दानवों और दैत्योंसे होनेवाले अपने खेदका कारण बतलाया। वह बोली—'देवताओ! आपने पूर्वकालमें जिन महापराक्रमी असुरोंका वध किया है, वे सब इस समय मनुष्यलोकमें जाकर राजाओंके घरमें उत्पन्न हुए हैं। ऐसे दैत्योंकी अनेक अक्षौहिणी सेनाएँ हैं। मैं उनके भारसे पीड़ित होकर नीचेकी ओर धँसी जाती हूँ। आपलोग ऐसा कोई उपाय करें, जिससे मुझे शान्ति मिले।'
पक्षी कहते हैं—पृथ्वीके यों कहनेपर सम्पूर्ण देवता अपने-अपने तेजके अंशसे पृथ्वीपर अवतार लेने लगे। उनके अवतारके दो ही उद्देश्य थे—प्रजाजनोंका उपकार और पृथ्वीके भारका अपहरण। इन्द्रके शरीरसे जो तेज प्राप्त हुआ था, उसे स्वयं धर्मराजने कुन्तीके गर्भमें स्थापित किया। उसीसे महातेजस्वी राजा युधिष्ठिरका जन्म हुआ। फिर वायु देवताने इन्द्रके ही बलको कुन्तीके उदरमें स्थापित किया। उससे भीम उत्पन्न हुए। इन्द्रके आधे अंशसे अर्जुनका जन्म हुआ। इसी प्रकार इन्द्रका ही सुन्दर रूप अश्विनीकुमारोंद्वारा माद्रीके गर्भमें स्थापित किया गया था, जिससे अत्यन्त कान्तिमान् नकुल और सहदेव उत्पन्न हुए। इस प्रकार देवराज इन्द्र पाँच रूपोंमें अवतीर्ण हुए। उनकी पत्नी शची ही महाभागा कृष्णाके रूपमें अग्निसे प्रकट हुई। अतः कृष्णा एकमात्र इन्द्रकी ही पत्नी थी और किसीकी नहीं। योगेश्वर भी अनेक शरीर धारण कर लेते हैं। फिर इन्द्र तो देवता हैं, उनके पाँच शरीर धारण कर लेनेमें क्या सन्देह है। इस प्रकार पाँच पाण्डवोंकी जो एक पत्नी हुई, उसका रहस्य बताया गया।
१४
- संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *
राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र
पक्षी कहते हैं—पहलेकी बात है, त्रेतायुगमें हरिश्चन्द्र नामसे प्रसिद्ध एक राजर्षि रहते थे। वे बड़े धर्मात्मा, भूमण्डलके पालक, सुन्दर कीर्तिसे युक्त और सब प्रकारसे श्रेष्ठ थे। उनके राज्यकालमें कभी अकाल नहीं पड़ा, किसीको रोग नहीं हुआ, मनुष्योंकी अकालमृत्यु नहीं हुई और पुरवासियोंकी कभी अधर्ममें रुचि नहीं हुई। उस समय प्रजावर्गके लोग धन, वीर्य और तपस्याके मदसे उन्मत्त नहीं होते थे। कोई भी स्त्री ऐसी नहीं देखी जाती थी, जो पूर्ण यौवनावस्थाको प्राप्त किये बिना ही सन्तानको जन्म देती रही हो। एक दिन महाबाहु राजा हरिश्चन्द्र जंगलमें शिकार खेलने गये थे। वहाँ शिकारके पीछे दौड़ते हुए उन्होंने बारंबार कुछ स्त्रियोंकी कातरवाणी सुनी। वे कह रही थीं, 'हमें बचाओ, बचाओ।' राजाने शिकारका पीछा छोड़ दिया और उन स्त्रियोंको लक्ष्य करके कहा—'डरो मत, डरो मत। कौन ऐसा दुष्टबुद्धिवाला पुरुष है जो मेरे शासनकालमें भी ऐसा अन्याय करता है?' यों कहकर स्त्रियोंके रोनेके शब्दका अनुसरण करते हुए राजा उसी ओर चल दिये। इसी बीचमें प्रत्येक कार्यके आरम्भमें बाधा उपस्थित करनेवाला रुद्रकुमार विघ्नराज इस प्रकार सोचने लगा—'ये महर्षि विश्वामित्र बड़े पराक्रमी हैं और अनुपम तपस्याका आश्रय लेकर उत्तम व्रतका पालन करते हुए उन भवादि विद्याओंका साधन करते हैं, जो पहले इन्हें सिद्ध नहीं हो सकी हैं। ये महर्षि क्षमा, मौन तथा आत्मसंयमपूर्वक जिन विद्याओंका साधन करते हैं, वे उनके भयसे पीड़ित होकर यहाँ विलाप कर रही हैं। इनके उद्धारका कार्य मुझे किस प्रकार करना चाहिये?' इस प्रकार विचार करते हुए रुद्रकुमार विघ्नराजने राजाके शरीरमें प्रवेश किया। उनके आवेशसे युक्त होनेपर राजाने क्रोधपूर्वक ये बात कही—'वह कौन पापाचारी मनुष्य है, जो कपड़ेके गठरोमें अग्निको बाँध रहा है? बल और प्रचण्ड तेजसे उद्दीप्त मुझ राजाके उपस्थित रहते हुए आज कौन ऐसा पापी है, जो मेरे धनुषसे छूटकर सम्पूर्ण दिशाओंको देदीप्यमान करनेवाले बाणोंसे सर्वाङ्गमें छिन्न-भिन्न होकर कभी न टूटनेवाली निद्रामें प्रवेश करना चाहता है?'
राजाकी यह बात सुनकर तपस्वी विश्वामित्र कुपित हो उठे। उनके मनमें क्रोधका उदय होते ही वे सम्पूर्ण विद्याएँ, जो स्त्रियोंके रूपमें रो रही थीं, क्षणभरमें अन्तर्धान हो गयीं। तदनन्तर राजाने उन तपस्याके भण्डार महर्षि विश्वामित्रकी ओर दृष्टिपात किया तो वे बड़े भयभीत हुए और सहसा पीपलके पत्तेकी भाँति थरथर काँपने लगे। इतनेमें विश्वामित्र बोल उठे—'ओ दुरात्मा! खड़ा तो रह!' तब राजाने विनयपूर्वक मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया और कहा—'भगवन्! यह मेरा धर्म था। प्रभो! इसे आप मेरा अपराध न मानें। मुने! अपने धर्मकी रक्षामें लगे हुए मुझ राजापर आपको
- राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र * १५
क्रोध नहीं करना चाहिये। धर्मज्ञ राजाको तो यह उचित ही है कि वह धर्मशास्त्रके अनुसार दान दे, रक्षा करे और धनुष उठाकर युद्ध करे।'
विश्वामित्र बोले- 'राजन्! यदि तुम्हें अधर्मका डर है, तो शीघ्र बताओ—किसको दान देना चाहिये? किनकी रक्षा करनी चाहिये और किनके साथ युद्ध करना चाहिये?
हरिश्चन्द्रने कहा- श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको तथा जिनकी जीविका नष्ट हो गयी हो, ऐसा अन्य मनुष्योंको भी दान देना चाहिये। भयभीत प्राणियोंकी रक्षा करनी चाहिये और शत्रुओंके साथ सदा युद्ध करना चाहिये।*
विश्वामित्र बोले-यदि तुम राजा हो और राजधर्मको भलीभाँति जानते हो तो मैं प्रतिग्रहकी इच्छा रखनेवाला ब्राह्मण हूँ, मुझे इच्छानुसार दक्षिणा दो।
पक्षीगण कहते हैं- महर्षिकी यह बात सुनकर राजाने अपना नया जन्म हुआ माना और प्रसन्नचित्तसे कहा।
हरिश्चन्द्र बोले— भगवन्! आपको मैं क्या दूँ, आप निःशङ्क होकर कहिये। यदि कोई दुर्लभ-से-दुर्लभ वस्तु हो तो उसे भी दी हुई ही समझें।
विश्वामित्रने कहा— वीरवर! तुम समुद्र, पर्वत, ग्राम और नगरोंसहित यह सारी पृथ्वी मुझे दे दो। रथ, घोड़े, हाथी, कोठार और खजानेसहित सारा राज्य भी मुझे समर्पित कर दो। इसके अतिरिक्त भी जो कुछ तुम्हारे पास है, वह मुझे दे दो। केवल अपनी स्त्री, पुत्र और शरीरको अपने पास रख लो। साथ ही अपने धर्मको भी तुम्हीं रखो; क्योंकि वह सदा कर्ताके ही साथ रहता है, परलोकमें जानेपर भी वह साथ जाता है।
मुनिका यह वचन सुनकर राजाने प्रसन्नचित्तसे 'तथास्तु' कहा। हाथ जोड़कर उनकी आज्ञा स्वीकार की। उस समय उनके मुखपर शोक या चिन्ताका कोई चिह्न नहीं था।
विश्वामित्र बोले- राजर्षे! यदि तुमने अपना राज्य, पृथ्वी, सेना और धन आदि सर्वस्व मुझे समर्पित कर दिया तो मुझ तपस्वीके इस राज्यमें रहते किसका प्रभुत्व रहा?
हरिश्चन्द्रने कहा— 'ब्रह्मन्! मैंने जिस समय यह पृथ्वी दी है, उसी समय आप मेरे भी स्वामी हो गये। फिर आपके इस पृथ्वीके राजा होनेकी तो बात ही क्या है।
विश्वामित्र बोले— राजन्! यदि तुमने यह सारी पृथ्वी मुझे दान कर दी तो जहाँ-जहाँ मेरा प्रभुत्व हो, वहाँसे तुम्हें निकल जाना चाहिये। करधनी आदि समस्त आभूषणोंका संग्रह यहीं छोड़कर तुम वल्कलका वस्त्र लपेट लो और अपनी पत्नी तथा पुत्रके साथ चले जाओ।
'बहुत अच्छा' कहकर राजा हरिश्चन्द्र अपनी पत्नी शैव्या तथा पुत्र रोहिताश्वको साथ ले वहाँसे जाने लगे। उस समय विश्वामित्रने उनका मार्ग रोककर कहा—'मुझे राजसूय-यज्ञकी दक्षिणा दिये बिना ही तुम कहाँ जा रहे हो?'
हरिश्चन्द्र बोले— भगवन्! यह अकण्टक राज्य
* दातव्यं विप्रमुख्येभ्यो ये चान्ये कृशवृत्तयः। रक्ष्या भीताः सदा युद्धं कर्तव्यं परिपन्थिभिः ॥ (७। २७)
९६ • संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण •
तो मैंने आपको दे ही दिया, अब तो मेरे पास ये तीन शरीर ही शेष बचे हैं।
विश्वामित्रने कहा—तो भी तुम्हें मुझे यज्ञकी दक्षिणा तो देनी ही चाहिये। विशेषतः ब्राह्मणोंको कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके यदि न दिया जाय तो वह प्रतिज्ञा-भङ्गका दोष उस व्यक्तिका नाश कर डालता है। राजन्! राजसूय-यज्ञमें ब्राह्मणोंको जितनेसे सन्तोष हो, उस यज्ञकी उतनी ही दक्षिणा देनी चाहिये। तुमने ही पहले प्रतिज्ञा की है कि देनेकी घोषणा कर देनेपर अवश्य देना चाहिये, आततायियोंसे युद्ध करना चाहिये तथा आर्तजनोंकी रक्षा करनी चाहिये।
हरिश्चन्द्र बोले—भगवन्! इस समय मेरे पास कुछ भी नहीं है। समयानुसार अवश्य आपको दूँगा।
विश्वामित्रने कहा—राजन् ! इसके लिये मुझे कितने समयतक प्रतीक्षा करनी होगी, शीघ्र बताओ।
हरिश्चन्द्र बोले—ब्रह्मर्षे ! मैं एक महीनेमें आपको दक्षिणाके लिये धन दूँगा। इस समय मेरे पास धन नहीं है, अतः मुझे जानेकी आज्ञा दीजिये।
विश्वामित्रने कहा—नृपश्रेष्ठ ! जाओ, जाओ! अपने धर्मका पालन करो। तुम्हारा मार्ग कल्याणमय हो।
पक्षी कहते हैं—विश्वामित्रने जब 'जाओ' कहकर जानेकी आज्ञा दी, तब राजा हरिश्चन्द्र नगरसे चले। उनके पीछे उनकी प्यारी पत्नी शैब्या भी चली, जो पैदल चलनेके योग्य कदापि नहीं थी। रानी और राजकुमारसहित राजा हरिश्चन्द्रको नगरसे निकलते देख उनके अनुयायी सेवकगण तथा पुरवासी मनुष्य विलाप करने लगे—'हा नाथ! हम पीड़ितोंका आप क्यों परित्याग कर रहे हैं? राजन् ! आप धर्ममें तत्पर रहनेवाले तथा पुरवासियोंपर कृपा रखनेवाले हैं। राजर्षे ! यदि आप धर्म समझें तो हमें भी अपने साथ ले चलें। महाराज ! दो घड़ी तो ठहर जाइये। हमारे नेत्ररूपी भ्रमर आपके मुखारविन्दकी रूपसुधाका पान कर लें। फिर हमें कब आपके दर्शनका सौभाग्य प्राप्त होगा। हाय! जिन महाराजके आगे-आगे चलनेपर पीछेसे कितने ही राजा चला करते थे, आज उन्हींके पीछे उनकी यह रानी अपने बालक पुत्रको गोद लेकर चल रही है। यात्राके समय जिनके सेवक भी हाथियोंपर बैठकर आगे जाते थे, वे ही महाराज हरिश्चन्द्र आज पैदल चल रहे हैं! हा राजन्! मनोहर भौंहों, चिकनी त्वचा तथा ऊँची नासिकासे सुशोभित आपका सुकुमार मुख मार्गमें धूलिसे धूसरित एवं क्लेशयुक्त होकर न जाने कैसी दशाको प्राप्त होगा। नृपश्रेष्ठ ! ठहर जाइये, ठहर जाइये; यहाँ अपने धर्मका पालन कीजिये। क्रूरताका परित्याग ही सबसे बड़ा धर्म है। विशेषतः क्षत्रियोंके लिये तो यही सबसे उत्तम है। नाथ ! अब हमें स्त्री, पुत्र, धन धान्य आदिसे क्या लेना है। यह सब छोड़कर हमलोग आपके साथ छायाकी भाँति रहेंगे। हा नाथ! हा महाराज !!
- राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र * १७
हा स्वामिन् ! ! ! आप हमें क्यों त्याग रहे हैं ? जहाँ आप रहेंगे, वहीं हम भी रहेंगे। जहाँ आप हैं, वहीं सुख है। जहाँ आप हैं, वहीं नगर है और जहाँ हमारे महाराज आप हैं, वहीं हमारे लिये स्वर्ग है !'
पुरवासियोंकी ये बातें सुनकर राजा हरिश्चन्द्र शोकमग्न हो उनपर दया करनेके लिये ही मार्गमें उस समय ठहर गये। विश्वामित्रने देखा, राजाका चित्त पुरवासियोंके वचनोंसे व्याकुल हो उठा है; तब वे उनके पास आ पहुँचे और रोष तथा अमर्षसे आँखें फाड़कर बोले—'अरे ! तू तो बड़ा दुराचारी, झूठा और कपटपूर्ण बातें करनेवाला है। धिक्कार है तुझे, जो मुझे राज्य देकर फिर उसे वापस ले लेना चाहता है।' विश्वामित्रका यह कठोर वचन सुनकर राजा काँप उठे और 'जाता हूँ, जाता हूँ' कहकर अपनी पत्नीका हाथ पकड़कर खींचते हुए शीघ्रतापूर्वक चले। राजा अपनी पत्नीको खींच रहे थे। वह सुकुमारी अबला चलनेके परिश्रमसे थककर व्याकुल हो रही थी तो भी विश्वामित्रने सहसा उसकी पीठपर डंडेसे प्रहार किया। महारानीको इस प्रकार मार खाते देख महाराज हरिश्चन्द्र दुःखसे आतुर होकर केवल इतना ही कह सके, 'भगवन् ! जाता हूँ।' उनके मुखसे और कोई बात नहीं निकल सकी। उस समय परम दयालु पाँच विश्वेदेव आपसमें इस प्रकार कहने लगे—'ओह ! यह विश्वामित्र तो बड़ा पापी है। न जाने किन लोकोंमें जायगा। इसने यज्ञकर्ताओंमें श्रेष्ठ इन महाराजको अपने राज्यसे नीचे उतार दिया है।'
विश्वेदेवोंकी यह बात सुनकर विश्वामित्रको बड़ा रोष हुआ। उन्होंने उन सबको शाप देते हुए कहा—'तुम सब लोग मनुष्य हो जाओ।' फिर उनके अनुनय-विनयसे प्रसन्न होकर उन महामुनिने कहा—'मनुष्य होनेपर भी तुम्हारे कोई सन्तान नहीं होगी, तुम विवाह भी नहीं करोगे। तुम्हारे मनमें किसीके प्रति ईर्ष्या और द्वेष भी नहीं होगा। तुम पुनः काम-क्रोधसे मुक्त होकर देवत्वको प्राप्त कर लोगे।' तदनन्तर वे विश्वेदेव अपने अंशसे कुरुवंशियोंके घरमें अवतीर्ण हुए। वे ही द्रौपदीके गर्भसे उत्पन्न पाँचों पाण्डवकुमार थे। महामुनि विश्वामित्रके शापसे ही उनका विवाह नहीं हुआ। जैमिनि ! इस प्रकार हमने पाण्डवकुमारोंकी कथासे सम्बन्ध रखनेवाली बातें तुम्हें बतला दीं। अब और क्या सुनना चाहते हो ?
**जैमिनि बोले—**आपलोगोंने क्रमशः मेरे प्रश्नोंके उत्तरमें ये सारी बातें बतायीं। अब मुझे हरिश्चन्द्रकी शेष कथा सुननेके लिये बड़ा कौतूहल हो रहा है। अहो, उन महात्माने बहुत बड़ा कष्ट उठाया। श्रेष्ठ पक्षियो! क्या उन्हें इस दुःखके अनुरूप ही कोई सुख भी कभी प्राप्त हुआ?
**पक्षियोंने कहा—**विश्वामित्रकी बात सुनकर राजा दुःखी हो धीरे-धीरे आगे बढ़े। उनके पीछे नन्हें-से पुत्रको गोद लिये रानी शैव्या चल रही थीं। दिव्य वाराणसीपुरीके पास पहुँचकर राजाने विचार किया कि यह काशी मनुष्योंको भोग्य भूमि
१८ • संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण •
नहीं है, इसपर केवल शूलपाणि भगवान् शङ्करका अधिकार है; अतः यह मेरे राज्यसे बाहर है। ऐसा निश्चय करके दुःखसे पीड़ित हो उन्होंने अपनी अनुकूल पत्नीके साथ पैदल ही काशीमें प्रवेश किया। पुरमें प्रवेश करते ही उन्हें महर्षि विश्वामित्र सामने खड़े दिखायी दिये। उन्हें उपस्थित देख राजा हरिश्चन्द्र हाथ जोड़कर विनीत भावसे खड़े हो गये और बोले—'मुने ! ये मेरे प्राण, यह पुत्र और यह पत्नी यहाँ प्रस्तुत हैं। इनमेंसे जिसकी आपको आवश्यकता हो, उसे उत्तम अर्घ्यके रूपमें स्वीकार कीजिये अथवा हमलोग यदि आपकी और कोई सेवा कर सकते हों तो उसके लिये भी आज्ञा दीजिये।'
विश्वामित्र बोले—राजर्षे ! आज एक मास पूर्ण हो गया। यदि आपको अपनी बातका स्मरण हो तो मुझे राजसूय यज्ञके लिये दक्षिणा दीजिये।
हरिश्चन्द्रने कहा—तपोधन ! अभी आज ही महीना पूरा हो रहा है। उसमें आधा दिन शेष है। इतने समयतक और प्रतीक्षा कीजिये। अब अधिक देरी नहीं होगी।
विश्वामित्र बोले—महाराज ! ऐसा ही सही। मैं फिर आऊँगा। यदि आज मुझे दक्षिणा न दोगे तो मैं तुम्हें शाप दे दूँगा।
यों कहकर विश्वामित्र चले गये। उस समय राजा इस चिन्तामें पड़े कि पहले स्वीकार की हुई दक्षिणा मैं इन्हें किस प्रकार दूँ। क्या मैं अपने प्राण त्याग दूँ ? इस अकिञ्चन दशामें किधर जाऊँ ? यदि प्रतिज्ञा की हुई दक्षिणा दिये बिना ही मर जाऊँ तो ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेके कारण पापात्मा समझा जाऊँगा और मुझे अधम-से-अधम कीटयोनिमें जन्म लेना पड़ेगा। अथवा यह दक्षिणा चुकानेके लिये अपनेको बेचकर किसीकी दासता स्वीकार कर लूँ ? बस, अपनेको बेचना ही ठीक है।
राजा हरिश्चन्द्र अत्यन्त व्याकुल एवं दीन होकर नीचा मुख किये जब इस प्रकार चिन्ता कर रहे थे, उस समय उनकी पत्नीने नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए गद्गदवाणीमें कहा—'महाराज ! चिन्ता छोड़िये। अपने सत्यकी रक्षा कीजिये। जो मनुष्य सत्यसे विचलित होता है, वह श्मशानकी भाँति त्याग देने योग्य है। नरश्रेष्ठ ! पुरुषके लिये अपने सत्यकी रक्षासे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं बतलाया गया है। जिसका वचन निरर्थक (मिथ्या) हो जाता है, उसके अग्निहोत्र, स्वाध्याय तथा दान आदि सम्पूर्ण कर्म निष्फल हो जाते हैं। धर्मशास्त्रोंमें बुद्धिमान् पुरुषोंने सत्यको ही संसारसागरसे तारनेके लिये सर्वोत्तम साधन बताया है। इसी प्रकार जिनका मन अपने वशमें नहीं है, ऐसे पुरुषोंको पतनके गर्तमें गिरानेके लिये असत्यको ही प्रधान कारण बताया गया है।* कृति नामके राजा सात
* त्यज चिन्तां महाराज स्वसत्यमनुपालय। श्मशानवद्वर्जनीयो नरः सत्यबहिष्कृतः ॥
यतः परतरं धर्मं वदन्ति पुरुषस्य तु। तादृशं पुरुषव्याघ्र स्वसत्यपरिपालनम् ॥
- राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र * ११
अश्वमेध और एक राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान करके भी एक ही बार असत्य बोलनेके कारण स्वर्गसे गिर गये थे। महाराज ! मुझसे पुत्रका जन्म हो चुका है.......।' इतना कहकर रानी शैव्या फूट-फूटकर रोने लगी।
हरिश्चन्द्र बोले—कल्याणि ! यह सन्ताप छोड़ो और जो कुछ कहना चाहती थी, उसे साफ-साफ कहो।
रानीने कहा—महाराज ! मुझसे पुत्रका जन्म हो चुका है। श्रेष्ठ पुरुष स्त्री संग्रहका फल पुत्र ही बतलाते हैं। वह फल आपको मिल चुका है, अतः मुझको बेंचकर ब्राह्मणको दक्षिणा चुका दीजिये।
महारानीका यह वचन सुनकर राजा हरिश्चन्द्र मूर्च्छित हो गये। फिर होशमें आनेपर वे अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगे—'कल्याणी ! वह महान् दुःखकी बात है, जो तुम मुझसे ऐसा कह रही हो।' यों कहकर नरश्रेष्ठ हरिश्चन्द्र पृथ्वीपर गिर पड़े और मूर्च्छित हो गये। महाराज हरिश्चन्द्रको पृथ्वीपर पड़ा देख रानी अत्यन्त दुःखित होकर बड़ी करुणाके साथ बोलीं—'हा महाराज! यह किसका चीता हुआ अनिष्ट फल आपको प्राप्त हुआ ? आप तो रंकुनामक मृगके रोएँसे बने हुए कोमल एवं चिकने वस्त्रपर शयन करने योग्य हैं, किन्तु आज भूमिपर पड़े हैं। जिन्होंने करोड़ोंसे भी अधिक गोधन ब्राह्मणोंको दान दिया है, वे ही ये मेरे प्राणनाथ महाराज इस समय धरतीपर सो रहे हैं! हाय! कितने कष्टकी बात है। अरे ओ दुर्दैव! इन महाराजने तेरा क्या बिगाड़ा था, जो इन्द्र और भगवान् विष्णुके तुल्य होकर भी ये यहाँ मूर्च्छित दशामें पड़े हैं' इतना कहकर सुन्दरी शैव्या पतिके दुःखोंके असह्य बोझसे पीड़ित हो स्वयं भी गिरकर मूर्च्छित हो गयी।
इसी बीचमें महातपस्वी विश्वामित्रजी भी आ धमके। उन्होंने राजा हरिश्चन्द्रको मूर्च्छित होकर भूमिपर पड़ा देख उनपर जलके छींटे डाले और इस प्रकार कहा—'राजेन्द्र ! उठो, उठो। यदि तुम्हारी दृष्टि धर्मपर हो तो मुझे पूर्वोक्त दक्षिणा दे दो। सत्यसे ही सूर्य तप रहा है। सत्यपर ही पृथ्वी टिकी हुई है। सत्य-भाषण सबसे बड़ा धर्म है। सत्यपर ही स्वर्ग प्रतिष्ठित है। एक हजार अश्वमेध और एक सत्यको यदि तराजूपर तोला जाय तो हजार अश्वमेधसे सत्य ही भारी सिद्ध होगा।*
अग्निहोत्रमधीतं वा दानाद्याश्चाखिलाः क्रियाः। भजन्ते तस्य वैफल्यं यस्य वाक्यमकारणम्॥
सत्यन्वयन्तमुदितं धर्मशास्त्रेषु धीमताम्। तपसावानृतं तद्वत् पतनायाकृतात्मनाम्॥
(अ० ८। १७–२०)
* सत्येनार्कः प्रतपति सत्ये तिष्ठति मेदिनी। सत्यं चोक्तं परो धर्मः स्वर्गः सत्ये प्रतिष्ठितः ॥
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम्। अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥
(अ० ८। ४१-४२)
२०
- संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *
राजन्! यदि आज तुम मुझे दक्षिणा न दोगे तो सूर्यास्त होनेपर तुम्हें निश्चय ही शाप दे दूँगा।' इतना कहकर विश्वामित्र चले गये। इधर राजा हरिश्चन्द्र उनके भयसे व्याकुल हो उठे। सोचने लगे—'हाय! मैं अधम कहाँ भागकर जाऊँ।' उनकी दशा क्रूर स्वभाववाले धनीसे पीड़ित निर्धन पुरुषकी-सी हो रही थी। उस समय उनकी पत्नीने फिर कहा—'नाथ! मेरी बात मानकर वैसा ही कीजिये, अन्यथा आपको शापाग्निसे दग्ध होकर मरना पड़ेगा।' जब पत्नीने बार-बार उन्हें प्रेरित किया, तब राजा बोले—'कल्याणी! मैं बड़ा निर्दयी हूँ। लो, अब तुम्हें बेचने चलता हूँ। क्रूर-से-क्रूर मनुष्य भी जो कार्य नहीं कर सकते, वही आज मैं करूँगा।' पत्नीसे यों कहकर राजा व्याकुलचित्तसे नगरमें गये और नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए गद्गदकण्ठसे बोले।
राजा ने कहा—ओ नागरिको! तुम सब लोग मेरी बात सुनो, क्या तुम मेरा परिचय पूछ रहे हो? लो, सुनो, मैं मनुष्य नहीं, अत्यन्त क्रूर प्राणी हूँ; क्योंकि अपनी प्राणप्यारी पत्नीको यहाँ बेचनेके लिये आया हूँ। यदि आपलोगोंमेंसे किसीको मेरी इस प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतमा पत्नीसे दासीका काम लेनेकी आवश्यकता हो तो वह शीघ्र बोले; इस असह्य दुःखमें भी जबतक मैं जीवन धारण किये हुए हूँ, तभीतक बात कर ले।
तदनन्तर कोई बूढ़ा ब्राह्मण सामने आकर राजासे बोला—'दासीको मेरे हवाले करो। मैं इसे धन देकर खरीदता हूँ। मेरे पास धन बहुत है और मेरी प्यारी पत्नी अत्यन्त सुकुमारी है। वह घरके काम-काज नहीं कर सकती। इसलिये यह दासी मुझे दे दो। तुम अपनी इस पत्नीकी कार्यदक्षता, अवस्था, रूप और स्वभावके अनुरूप यह धन लो और इसे मेरे हवाले करो।' ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर राजा हरिश्चन्द्रका हृदय दुःखसे विदीर्ण हो गया। वे उसे कोई उत्तर न दे सके। तब उस ब्राह्मणने राजाके वल्कल-वस्त्रमें उस धनको अच्छी तरह बाँध दिया और उनकी पत्नीको खींचकर वह अपने साथ ले चला। माताको इस दशामें देखकर बालक रोहिताश्व रो उठा और हाथसे उसका वस्त्र पकड़कर अपनी ओर खींचने
- राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र * २१
लगा। उस समय रानीने अपने पुत्रसे कहा—'बेटा! आओ, जी भरकर देख लो। तुम्हारी माता अब दासी हो गयी। तुम राजपुत्र हो, मेरा स्पर्श न करो। अब मैं तुम्हारे स्पर्श करनेयोग्य न रही।' फिर सहसा अपनी माताको खींचकर ले जाये जाते हुए देख बालक रोहिताश्व 'मा, मा' कहकर रोता हुआ दौड़ा। उस समय उसके नेत्रोंसे आँसू बह रहे थे। जब बालक पास आया, तब उस ब्राह्मणने क्रोधमें भरकर उसे लातसे मारा तो भी उसने अपनी मांको नहीं छोड़ा। केवल 'माई, माई' कहकर बिलखता रहा।
तब रानीने ब्राह्मणसे कहा—स्वामिन् ! आप मुझपर कृपा कीजिये। इस बालकको भी खरीद लीजिये। यद्यपि आपने मुझे खरीद लिया है, तथापि इस बालकके बिना मैं आपके कार्यको अच्छी तरह नहीं कर सकती। मैं बड़ी अभागिनी हूँ। आप मुझपर दया करके प्रसन्न हों और बछड़ेसे गायकी तरह इस बालकसे मुझे मिलाइये।
ब्राह्मण बोला—राजन् ! यह धन लो और इस बालकको भी मेरे हवाले करो।
यों कहकर उसने पूर्ववत् राजाके उत्तरीय-खण्डमें वह धन बाँध दिया और बालकको उसकी माताके साथ लेकर चल दिया। इस प्रकार पत्नी और पुत्रको ले जाये जाते देख राजा हरिश्चन्द्र अत्यन्त दुःखसे कातर हो गये और विलाप करने लगे—'हाय! पहले जिसे वायु, सूर्य, चन्द्रमा तथा बाहरी लोग कभी नहीं देख पाते थे, वही मेरी पत्नी आज दासी बन गयी। जिसके हाथोंकी अँगुलियाँ अत्यन्त सुकुमार हैं, यह सूर्यवंशमें उत्पन्न मेरा बालक आज बेच दिया गया। हा प्रिये ! हा पुत्र !! हा वत्स !!! मुझ नीचके अन्यायसे तुम्हें दैवाधीन दशाको प्राप्त होना पड़ा। फिर भी मेरी मृत्यु नहीं होती—मुझे धिक्कार है।'
राजा हरिश्चन्द्र इस प्रकार विलाप कर रहे थे, इतनेमें ही वह ब्राह्मण उन दोनोंको साथ ले ऊँचे-ऊँचे वृक्ष और गृह आदिकी ओटमें छिप गया। वह बड़ी शीघ्रतासे चल रहा था। तदनन्तर विश्वामित्रने वहाँ पहुँचकर राजासे धन माँगा। हरिश्चन्द्रने भी वह धन उन्हें समर्पित कर दिया। पत्नी और पुत्रको बेचनेसे प्राप्त हुए उस धनको थोड़ा देखकर कौशिक मुनिने शोकाकुल राजासे कुपित होकर कहा—'क्षत्रियाधम ! क्या तू इसको मेरे यज्ञके अनुरूप दक्षिणा मानता है ? यदि ऐसी बात है तो मेरे महान् बलको देख। अपनी भलीभाँति की हुई तपस्याका, निर्मल ब्राह्मणत्वका, उग्र प्रभावका तथा विशुद्ध स्वाध्यायका बल तुझे दिखाता हूँ।'
हरिश्चन्द्रने कहा—भगवन् ! कुछ काल और प्रतीक्षा कीजिये और भी दक्षिणा दूँगा। इस समय नहीं है। मेरी पत्नी और पुत्र बिक चुके हैं।
विश्वामित्रने कहा—राजन् ! दिनका चौथा भाग शेष है। इतने ही समयतक मुझे प्रतीक्षा करनी है। बस, इसके उत्तरमें तुम्हें कुछ कहनेकी आवश्यकता नहीं है।
राजा हरिश्चन्द्रसे इस प्रकार निर्दयतापूर्ण निष्ठुर वचन कहकर और उस धनको लेकर कोपमें भरे हुए विश्वामित्र तुरंत वहाँसे चल दिये। उनके