भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 91
  • श्राद्ध-कर्मका वर्णन * ९१

मृत व्यक्ति जिस दिन (तिथिमें) मरा हो, उस तिथिको एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना चाहिये; उसका वर्णन सुनो। उसमें विश्वेदेवोंकी पूजा नहीं होती। एक ही पवित्रकका उपयोग किया जाता है। आवाहन तथा अग्नौकरणकी क्रिया भी नहीं होती। ब्राह्मणके उच्छिष्टके समीप प्रेतको तिल और जलके साथ अपसव्य होकर (जनेऊको दाहिने कंधेपर डालकर) उसके नाम-गोत्रका स्मरण करते हुए एक पिण्ड देना चाहिये। तत्पश्चात् हाथमें जल लेकर कहे—'अमुकके श्राद्धमें दिया हुआ अन्न-पान आदि अक्षय हो।' यह कहकर वह जल पिण्डपर छोड़ दे; फिर ब्राह्मणोंका विसर्जन करते समय कहे—'अभिरम्यताम्' (आपलोग सब तरहसे प्रसन्न हों)। उस समय ब्राह्मणलोग यह कहें—'अभिरताः स्मः' (हम भलीभाँति सन्तुष्ट हैं)। यह एकोद्दिष्ट श्राद्ध एक वर्षतक प्रतिमास करना उचित है। वर्ष पूरा होनेपर जब भी श्राद्ध किया जाय, पहले सपिण्डीकरण करना आवश्यक होता है। उसकी भी विधि बतलायी जाती है—यह सपिण्डीकरण भी विश्वेदेवोंकी पूजासे रहित होता है। इसमें भी एक ही अर्घ्य और एक ही पवित्रकका विधान है। अग्नौकरण और आवाहनकी क्रिया इसमें भी नहीं होती। इसमें अपसव्य होकर अयुग्म ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। इसमें जो विशेष क्रिया है, उसे बतलाती हूँ, एकाग्रचित्तसे सुनो। इसमें तिल, चन्दन और जलसे युक्त चार पात्र होते हैं; उनमेंसे तीन तो पितरोंके लिये और एक प्रेतके लिये होता है। प्रेतके पात्र और अर्घ्यको लेकर 'ये समानाः समनसः पितरो यमराज्ये' इत्यादि मन्त्रका जप करते हुए पितरोंके तीनों पात्रोंमें सींचना चाहिये। शेष कार्य पूर्ववत् करना चाहिये। स्त्रियोंके लिये भी ऐसे ही एकोद्दिष्टका विधान है। यदि पुत्र न हो तो स्त्रियोंका सपिण्डीकरण नहीं होता। पुरुषोंको उचित है कि वे स्त्रियोंके लिये भी प्रतिवर्ष उनकी मृत्युतिथिको विधिपूर्वक एकोद्दिष्ट श्राद्ध करें। उनके लिये भी पुरुषोंके समान ही विधान है। पुत्रके अभावमें सपिण्ड, सपिण्डके अभावमें सहोदक, उनके भी अभावमें माताके सपिण्ड^१ और सहोदक^२ इस विधिको पूर्ण करें। जिसके कोई पुत्र नहीं है, उसका श्राद्ध उसके दौहित्र कर सकते हैं। पुत्रीके पुत्र नानाका नैमित्तिक श्राद्ध करनेके भी अधिकारी हैं। जिनकी द्व्यामुष्यायण^३ संज्ञा है, ऐसे पुत्र नाना और बाबा दोनोंका नैमित्तिक श्राद्धोंमें भी विधिपूर्वक पूजन कर सकते हैं। कोई भी न हो तो स्त्रियाँ ही अपने पतियोंका मन्त्रोच्चारण किये बिना श्राद्ध कर सकती हैं। वे भी न हों तो राजा अपने कुटुम्बी मनुष्यसे अथवा मृतकके सजातीय पुण्योंद्वारा दाह आदि सम्पूर्ण क्रियाएँ पूर्ण करावें; क्योंकि राजा सब वर्णोंका बन्धु होता है।

सपिण्डीकरणके पश्चात् पिताके प्रपितामह लेपभागभोजी पितरोंकी श्रेणीमें चले जाते हैं। उन्हें पितृ-पिण्ड पानेका अधिकार नहीं रहता। उनसे आरम्भ करके चार पीढ़ी ऊपरके पितर, जो अबतक पुत्रके लेपभागका अन्न ग्रहण करते थे, उसके सम्बन्धसे रहित हो जाते हैं। अब उनको


१. पितासे लेकर ऊपरको सात पीढ़ींतक और मातासे लेकर नाना आदि पाँच पीढ़ींतक सपिण्डता मानी जाती है। किसीके मतमें छः पीढ़ी ऊपर और छः पीढ़ी नीचेतकके लोग सपिण्डकी गणनामें आते हैं।
२. जिनकी सातवींसे लेकर चौदहवीं तक ऊपरकी पीढ़ी एक हो, वे सहोदक या समानोदक कहलाते हैं।
३. वह पुत्र, जो दूसरे तो उत्पन्न हुआ हो और दूसरेके द्वारा दत्तकके रूपमें ग्रहण किया हो और दोनों पिता उसको अपना-अपना पुत्र मानते हों, द्व्यामुष्यायण (दोनोंका) कहलाता है। ऐसा पुत्र दोनोंको पिण्डदान देता है और दोनोंकी सम्पत्तिका अधिकारी होता है।