भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण -

लेपभागका अन्न पानेका भी अधिकार नहीं रहता। वे सम्बन्धहीन अन्नका उपभोग करते हैं। पिता, पितामह और प्रपितामह—इन तीन पुरुषोंको पिण्डके अधिकारी समझना चाहिये। इनसे अर्थात् पिताके पितामहसे ऊपर जो तीन पीढ़ीके पुरुष हैं, वे लेपभागके अधिकारी हैं। इस प्रकार छः ये और सातवाँ यजमान, सब मिलाकर सात पुरुषोंका घनिष्ठ सम्बन्ध होता है—ऐसा मुनियोंका कथन है। यह सम्बन्ध यजमानसे लेकर ऊपरके लेपभागभोजी पितरोंतक माना जाता है। इनसे ऊपरके सभी पितर पूर्वज कहलाते हैं। इनमेंसे जो नरकमें निवास करते हैं, जो पशु-पक्षियोंकी योनिमें पड़े हैं तथा जो भूत-प्रेत आदिके रूपमें स्थित हैं, उन सबको विधिपूर्वक श्राद्ध करनेवाला यजमान तृप्त करता है। किस प्रकार तृप्त करता है, यह बतलाती हूँ; सुनो। मनुष्य पृथ्वीपर जो अन्न बिखेरते हैं, उससे पिशाच-योनिमें पड़े हुए पितरोंकी तृप्ति होती है। बेटा! स्नानके वस्त्रसे जो जल पृथ्वीपर टपकता है, उससे वृक्ष-योनिमें पड़े हुए पितर तृप्त होते हैं। नहानेपर अपने शरीरसे जो जलके कण इस पृथ्वीपर गिरते हैं, उनसे उन पितरोंकी तृप्ति होती है, जो देवभावको प्राप्त हुए हैं। पिण्डोंके उठानेपर जो अन्नके कण पृथ्वीपर गिरते हैं, उनसे पशु-पक्षीकी योनिमें पड़े हुए पितरोंकी तृप्ति होती है। कुलमें जो बालक श्राद्धकर्मके योग्य होकर भी संस्कारसे वञ्चित रह गये हैं अथवा जलकर मरे हैं, वे बिखेरे हुए अन्न और सम्मार्जनके जलको ग्रहण करते हैं। ब्राह्मणलोग भोजन करके जब हाथ-मुँह धोते हैं और चरणोंका प्रक्षालन करते हैं, उस जलसे भी अन्यान्य पितरोंकी तृप्ति होती है। बेटा! उत्तम विधिसे श्राद्ध करनेवाले पुरुषोंके अन्य पितर यदि दूसरी-दूसरी योनियोंमें चले गये हों तो भी उस श्राद्धसे उन्हें बड़ी तृप्ति होती है। अन्यायोपार्जित धनसे जो श्राद्ध किया जाता है, उससे चाण्डाल आदि योनियोंमें पड़े हुए पितर तृप्त होते हैं। वत्स! इस प्रकार यहाँ श्राद्ध करनेवाले भाई-बन्धु अन्न और जलके कणमात्रसे अनेक पितरोंको तृप्त करते हैं। इसलिये मनुष्यको उचित है कि वह पितरोंके प्रति भक्ति रखते हुए शाकमात्रके द्वारा भी विधिपूर्वक श्राद्ध करे। श्राद्ध करनेवाले पुरुषके कुलमें कोई दुःख नहीं भोगता।

अब मैं नित्य-नैमित्तिक श्राद्धोंके काल बतलाती हूँ और मनुष्य जिस विधिसे श्राद्ध करते हैं, उसका भी वर्णन करती हूँ; सुनो। प्रत्येक मासकी अमावस्याको जिस दिन चन्द्रमाकी सम्पूर्ण कलाएँ क्षीण हो गयी हों तथा अष्टका^१ तिथियोंको अवश्य श्राद्ध करना चाहिये। अब श्राद्धका इच्छानुकूल काल सुनो। किसी विशिष्ट ब्राह्मणके आनेपर, सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहणमें, अयन आरम्भ होनेपर, विषुवयोगमें^२, सूर्यकी संक्रान्तिके दिन, व्यतीपात योगमें, श्राद्धके योग्य सामग्रीकी प्राप्ति होनेपर, दुःस्वप्न दिखायी देनेपर, जन्म-नक्षत्रके दिन एवं ग्रहजनित पीड़ा होनेपर स्वेच्छासे श्राद्धका अनुष्ठान करे।

श्रेष्ठ ब्राह्मण, श्रोत्रिय, योगी, वेदज्ञ, ज्येष्ठ सामग, त्रिणाचिकेत,^३ त्रिमधु^४, त्रिसुपर्ण^५, षडङ्गवेत्ता, दौहित्र, ऋत्विक्, जामाता, भानजा, पञ्चाग्नि-कर्ममें तत्पर, तपस्वी, मामा, माता-पिताके भक्त,


१. पौष, माघ, फाल्गुन तथा चैत्रके कृष्णपक्षकी अष्टमीयोंको अष्टका कहते हैं।
२. जिस समय सूर्य विषुव रेखापर पहुँचते और दिन-रात बराबर होते हैं, उसे 'विषुव' कहते हैं।
३. द्वितीय कठके अन्तर्गत 'अयं वाव यः पवते' इत्यादि तीन त्रिणाचिकेत नामक अनुवाकोंको पढ़ने या उसका अनुष्ठान करनेवाला
४. 'मधु वाता०' इत्यादि ऋचाका अध्येता और मधुव्रतका आचरण करनेवाला।
५. 'ब्रह्म मेतु माम्' इत्यादि तीन अनुवाकोंका अध्ययन और तत्सम्बन्धी व्रत करनेवाला।

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