संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- श्राद्ध-कर्मका वर्णन * ९३
शिष्य, सम्बन्धी एवं भाई-बन्धु—ये सभी श्राद्धमें उत्तम माने गये हैं। इन्हें निमन्त्रित करना चाहिये। धर्मभ्रष्ट, रोगी, हीनाङ्ग, अधिकाङ्ग, दो बार ब्याही गयी स्त्रीके गर्भसे उत्पन्न, काना, पतिके जीते-जी जार पुरुषसे पैदा की हुई सन्तान, पतिके मरनेपर परपुरुषसे उत्पन्न हुई सन्तान, मित्रद्रोही, खराब नखोंवाला, नपुंसक, काले दाँतोंवाला, कुरूप, पिताके द्वारा कलङ्कित, चुगलखोर, सोमरस बेचनेवाला, कन्याको दूषित करनेवाला, वैद्य, गुरु एवं माता-पिताका त्याग करनेवाला, वेतन लेकर पढ़ानेवाला, शत्रु, जो पहले दूसरे पुरुषकी पत्नी रह चुकी हो, ऐसी स्त्रीका पति, वेदाध्ययन तथा अग्निहोत्रका त्याग करनेवाला, शूद्रजातीय स्त्रीके पति होनेके दोषसे दूषित तथा शास्त्रविरुद्ध कर्ममें लगे रहनेवाले अन्यान्य द्विज श्राद्धमें त्याग देने योग्य हैं।
पहले बताये हुए श्रेष्ठ द्विजोंको देवयज्ञ अथवा श्राद्धमें एक दिन पहले ही निमन्त्रण देना चाहिये। उसी समयसे ब्राह्मणों तथा श्राद्धकर्ताको भी संयमसे रहना चाहिये। जो श्राद्धमें दान देकर अथवा श्राद्धमें भोजन करके मैथुन करता है, उसके रज-वीर्यमें एक मासतक पितरोंको शयन करना पड़ता है। जो स्त्री-सहवास करके श्राद्धमें जाता और खाता है, उसके पितर उसीके वीर्य और मूत्रका एक मासतक आहार करते हैं। इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको एक दिन पहले ही ब्राह्मणोंके पास निमन्त्रण भेजना चाहिये। यदि पहले दिन ब्राह्मण न मिल सकें तो भी श्राद्धके दिन स्त्री-प्रसंगी ब्राह्मणोंको कदापि भोजन न कराये। बल्कि समयपर भिक्षाके लिये स्वतः पधारे हुए संयमी यतियोंको नमस्कार आदिसे प्रसन्न करके शुद्ध चित्तसे भोजन कराये। जैसे शुक्ल पक्षकी अपेक्षा कृष्णपक्ष पितरोंको विशेष प्रिय है, वैसे ही पूर्वाह्नकी अपेक्षा अपराह्न उन्हें अधिक प्रिय है। घरपर आये हुए ब्राह्मणोंका स्वागतपूर्वक पूजन करके उन्हें पवित्रयुक्त हाथसे आचमन करानेके बाद आसनोंपर बिठाये। श्राद्धमें विषम और देवयज्ञमें सम संख्याके ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे अथवा अपनी शक्तिके अनुसार दोनों कार्योंमें एक-ही-एक ब्राह्मणको भोजन कराये। यही बात मातामहोंके श्राद्धमें भी होनी चाहिये। विश्वेदेवोंका श्राद्ध भी ऐसा ही है। कुछ लोगोंका ऐसा मत है कि पितरों और मातामहोंके विश्वेदेव कर्म पृथक्-पृथक् हैं। देव-श्राद्धमें ब्राह्मणोंको पूर्वाभिमुख और पितृ-श्राद्धमें उत्तराभिमुख बिठाना चाहिये। मातामहोंके श्राद्धमें भी मनीषी पुरुषोंने इसी विधिका प्रतिपादन किया है। पहले ब्राह्मणोंको बैठनेके लिये कुश देकर विद्वान् पुरुष अर्घ्य आदिसे उनकी पूजा करे। फिर उन्हें पवित्रक आदि दे उनसे आज्ञा लेकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक देवताओंका आवाहन करे। तत्पश्चात् जौ और जल आदिसे विश्वेदेवोंको अर्घ्य देकर गन्ध, पुष्प, माला, जल, धूप और दीप आदि विधिपूर्वक निवेदन करे।
पितरोंके लिये ये सारी वस्तुएँ अपसव्य होकर प्रस्तुत करनी चाहिये। पितृ-श्राद्धमें बैठे हुए ब्राह्मणोंको आसनके लिये द्विगुणभुग्न (दोहरे मुड़े हुए) कुश देकर उनकी आज्ञा ले विद्वान् पुरुष मन्त्रोच्चारणपूर्वक पितरोंका आवाहन करे और अपसव्य होकर पितरोंकी प्रसन्नताके लिये तत्पर हो उन्हें अर्घ्य निवेदन करे। उसमें जौके स्थानपर तिलोंका उपयोग करना चाहिये। तदनन्तर ब्राह्मणोंके आज्ञा देनेपर अग्निकार्य करे। नमक और व्यञ्जनसे रहित अन्न लेकर विधिपूर्वक अग्निमें आहुति दे। 'अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा' इस मन्त्रसे पहली आहुति दे, 'सोमाय पितृमते स्वाहा' इस मन्त्रसे दूसरी आहुति दे तथा 'यमाय प्रेतपतये स्वाहा' इस मन्त्रसे तीसरी आहुतिको अग्निमें डाले। आहुतिसे बचे हुए अन्नको ब्राह्मणोंके पात्रमें परोसे। फिर पात्रमें हाथका सहारा दे विधिपूर्वक कुश और अन्न डालें एवं कोमल वचनोंमें प्रार्थना करे कि