भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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५४ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


अन्न आपलोग सुखसे भोजन कीजिये। फिर उन ब्राह्मणोंको चाहिये कि वे एकाग्रचित्त एवं मौन होकर सुखपूर्वक भोजन करें। जो-जो अन्न उन्हें अत्यन्त प्रिय लगे, वह-वह तुरंत उनके सामने प्रस्तुत करे। उस समय क्रोधको त्याग दे और ब्राह्मणोंको आग्रहपूर्वक प्रलोभन दे-दे भोजन करावे। उनके भोजनकालमें रक्षाके लिये पृथ्वीपर तिल और सरसों बिखेरे तथा रक्षोघ्न मन्त्रोंका पाठ करे; क्योंकि श्राद्धमें अनेक प्रकारके विघ्न उपस्थित होते हैं। जब ब्राह्मणलोग पूर्ण भोजन कर लें तो पूछे—'क्या आपलोग भलीभाँति तृप्त हो गये?' इसके उत्तरमें ब्राह्मण कहें—'हाँ, हम पूर्ण तृप्त हो गये।' फिर उनकी आज्ञा लेकर पृथ्वीपर सब ओर कुछ अन्न बिखेरे। इसी प्रकार आचमन करानेके लिये एक-एक ब्राह्मणको बारी बारीसे जल दे। तत्पश्चात् फिर उनकी आज्ञा ले मन, वाणी और शरीरको संयममें रखकर तिलसहित सम्पूर्ण अन्नसे पितरोंके लिये पृथक्-पृथक् पिण्ड दे। वह पिण्डदान ब्राह्मणोंके उच्छिष्टके समीप ही कुशोंपर करना चाहिये; फिर पितृतीर्थसे¹ उन पिण्डोंपर एकाग्रचित्तसे जल दे। इसी प्रकार मातामह आदिके लिये भी विधिपूर्वक पिण्डदान देकर गन्ध-माला आदिके साथ आचमनके लिये जल दे। अन्तमें यथाशक्ति दक्षिणा देकर ब्राह्मणोंसे कहे—'सुस्वधा अस्तु' (यह श्राद्धकर्म भलीभाँति सम्पन्न हो)। ब्राह्मण भी सन्तुष्ट होकर 'तथास्तु' कहें। फिर विश्वेदेव-सम्बन्धी ब्राह्मणोंसे कहे—'हे विश्वेदेवगण ! आपका कल्याण हो। आपलोग प्रसन्न रहें।' तब ब्राह्मणलोग 'तथास्तु' कहें। इसके बाद उनसे आशीर्वादकी याचना करे और प्रिय वचन कहते हुए भक्तिपूर्वक प्रणाम करके उन्हें विदा दे। दरवाजेतक उन्हें पहुँचानेके लिये पीछे-पीछे जाय और उनकी आज्ञा लेकर लौटे।

तदनन्तर नित्यक्रिया करे और अतिथियोंको भोजन कराये। किन्हीं-किन्हीं श्रेष्ठ पुरुषोंका विचार है कि यह नित्यकर्म भी पितरोंके ही उद्देश्यसे होता है। दूसरे लोग ऐसा कहते हैं कि इससे पितरोंका कोई सम्बन्ध नहीं है। शेष कार्य पूर्ववत् करे। किन्हीं-किन्हींका मत है कि पितरोंके लिये पृथक् पाक बनाकर श्राद्ध करना चाहिये। कुछ लोगोंका विचार है—ऐसा नहीं करना चाहिये।

इसके बाद यजमान अपने भृत्य आदिके साथ अवशिष्ट अन्न भोजन करे। धर्मज्ञ पुरुषको इसी प्रकार एकाग्रचित्त होकर पितरोंका श्राद्ध करना चाहिये और जिस प्रकार ब्राह्मणोंको सन्तोष हो, वैसी चेष्टा करनी चाहिये। श्राद्धमें दौहित्र (पुत्रीका पुत्र), कुतप (दिनके पंद्रह भागोंमेंसे आठवाँ भाग) और तिल—ये तीन अत्यन्त पवित्र माने गये हैं। श्राद्धमें आये ब्राह्मणोंको तीन बातें छोड़ देनी चाहिये—क्रोध, मार्गका चलना और उतावली।* बेटा! श्राद्धमें चाँदीका पात्र बहुत उत्तम माना गया है। उसमें चाँदीका दर्शन या दान अवश्य करना चाहिये। सुना जाता है, पितरोंने चाँदीके पात्रमें ही गोरूपधारिणी पृथ्वीसे स्वधाका दोहन किया था। अतः पितरोंको चाँदीका दान अभीष्ट एवं प्रसन्नता बढ़ानेवाला है।


१ अँगूठा और तर्जनीके बीचका भाग।
* त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रं कुतपस्तिलाः। वर्ज्यानि चाहुर्विप्रेन्द्रैः क्रोधोऽध्वगमनं त्वरा॥ (३१। ६४)