भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९८* संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

है। इसलिये योगियोंका सर्वदा पूजन करे। हजार ब्राह्मणोंकी अपेक्षा यदि एक ही योगीको पहले भोजन करा दिया जाय तो वह पानीमें नौकाकी भाँति यजमान और श्राद्धभोजी ब्राह्मणोंका भवसागरसे उद्धार कर देता है। इस विषयमें ब्रह्मवादी पुरुष उस पितृगाथाका गान किया करते हैं, जिसे पूर्वकालमें राजा पुरूरवाके पितरोंने गाया था। 'हमारी वंशपरम्परामें किसीको ऐसा श्रेष्ठ पुत्र कब उत्पन्न होगा, जो योगियोंको भोजन करानेसे बचे हुए अन्नको लेकर पृथ्वीपर हमारे लिये पिण्ड देगा। अथवा गयामें जाकर उत्तम हविष्यका पिण्ड, सार्षपिक शाक एवं तिल मिली हुई खिचड़ी देगा। ये वस्तुएँ हमें एक मासतक तृप्त रखनेवाली हैं। त्रयोदशी तिथि और मघा नक्षत्रमें विधिपूर्वक श्राद्ध करे तथा दक्षिणाग्निमें मधु और घीसे मिली हुई खीर दे।'

इसलिये पुत्र! सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति तथा पापसे मुक्ति चाहनेवाले प्रत्येक मनुष्यको उचित है कि वह भक्तिपूर्वक पितरोंकी पूजा करे। श्राद्धमें तृप्त किये हुए पितर मनुष्योंपर वसु, रुद्र, आदित्य, नक्षत्र, ग्रह और तारोंकी प्रसन्नताका संपादन करते हैं। श्राद्धमें तृप्त पितर आयु, प्रजा, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख तथा राज्य प्रदान करते हैं।

बेटा! इस प्रकार गृहस्थ पुरुषको हव्यसे देवताओंका, कव्य (श्राद्ध)से पितरोंका और अन्नसे अतिथियों एवं भाई-बन्धुओंका पूजन करना चाहिये। इनके सिवा भूत, प्रेत, समस्त भृत्यगण, पशु-पक्षी, चींटी, वृक्ष तथा अन्यान्य याचकोंकी तृप्ति भी सदाचारी गृहस्थ पुरुषको करनी चाहिये। जो नित्य-नैमित्तिक क्रियाओंका उल्लङ्घन करके पूजन करता है, वह पाप भोगता है।

अलर्क बोले—माताजी! आपने पुरुषके नित्य, नैमित्तिक तथा नित्य-नैमित्तिक—ये तीन प्रकारके कर्म बतलाये। अब मैं आपके मुँहसे सदाचारका वर्णन सुनना चाहता हूँ, जिसका पालन करनेवाला | मनुष्य इस लोक और परलोकमें भी सुख पाता है।

मदालसाने कहा—बेटा! गृहस्थ पुरुषको सदा ही सदाचारका पालन करना चाहिये। आचारहीन मनुष्यको न इस लोकमें सुख मिलता है, न परलोकमें। जो सदाचारका उल्लङ्घन करके मनमाना बर्ताव करता है, उस पुरुषका कल्याण यज्ञ, दान और तपस्यासे भी नहीं होता। दुराचारी पुरुषको इस लोकमें बड़ी आयु नहीं मिलती। अतः सदाचारके पालनका सदा ही यत्न करे। सदाचार बुरे लक्षणोंका नाश करता है। वत्स! अब मैं सदाचारका स्वरूप बतलाती हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो और उसका पालन करो। गृहस्थको धर्म, अर्थ और काम—तीनोंके साधनका यत्न करना चाहिये। उनके सिद्ध होनेपर उसे इस लोक और परलोकमें भी सिद्धि प्राप्त होती है। मनको वशमें करके अपनी आयका एक चौथाई भाग पारलौकिक लाभके लिये संगृहीत करे। आधे भागसे नित्य नैमित्तिक कार्योंका निर्वाह करते हुए अपना भरण-पोषण करे तथा एक चौथाई भाग अपने लिये मूल पूँजीके रूपमें रखकर उसे बढ़ाये। बेटा! ऐसा करनेसे धन सफल होता है। इसी प्रकार पापकी निवृत्ति तथा पारलौकिक उन्नतिके लिये विद्वान् पुरुष धर्मका अनुष्ठान करे। ब्राह्ममुहूर्तमें उठे। उठकर धर्म और अर्थका चिन्तन करे। अर्थके कारण जो शरीरको कष्ट उठाना पड़ता है, उसका भी विचार करे। फिर वेदके तात्त्विक अर्थ—परब्रह्म परमात्माका स्मरण करे। इसके बाद शयनसे उठकर नित्यकर्मसे निवृत्त हो, स्नान आदिसे पवित्र होकर मनको संयममें रखते हुए पूर्वाभिमुख बैठे और आचमन करके सन्ध्योपासन करे। प्रातःकालकी सन्ध्या उस समय आरम्भ करे, जब तारे दिखायी देते हों। इसी प्रकार सायंकालकी सन्ध्योपासना सूर्यास्तसे पहले ही विधिपूर्वक आरम्भ करे। आपत्कालके सिवा और किसी समय उसका