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संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ
९८* संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

है। इसलिये योगियोंका सर्वदा पूजन करे। हजार ब्राह्मणोंकी अपेक्षा यदि एक ही योगीको पहले भोजन करा दिया जाय तो वह पानीमें नौकाकी भाँति यजमान और श्राद्धभोजी ब्राह्मणोंका भवसागरसे उद्धार कर देता है। इस विषयमें ब्रह्मवादी पुरुष उस पितृगाथाका गान किया करते हैं, जिसे पूर्वकालमें राजा पुरूरवाके पितरोंने गाया था। 'हमारी वंशपरम्परामें किसीको ऐसा श्रेष्ठ पुत्र कब उत्पन्न होगा, जो योगियोंको भोजन करानेसे बचे हुए अन्नको लेकर पृथ्वीपर हमारे लिये पिण्ड देगा। अथवा गयामें जाकर उत्तम हविष्यका पिण्ड, सार्षपिक शाक एवं तिल मिली हुई खिचड़ी देगा। ये वस्तुएँ हमें एक मासतक तृप्त रखनेवाली हैं। त्रयोदशी तिथि और मघा नक्षत्रमें विधिपूर्वक श्राद्ध करे तथा दक्षिणाग्निमें मधु और घीसे मिली हुई खीर दे।'

इसलिये पुत्र! सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति तथा पापसे मुक्ति चाहनेवाले प्रत्येक मनुष्यको उचित है कि वह भक्तिपूर्वक पितरोंकी पूजा करे। श्राद्धमें तृप्त किये हुए पितर मनुष्योंपर वसु, रुद्र, आदित्य, नक्षत्र, ग्रह और तारोंकी प्रसन्नताका संपादन करते हैं। श्राद्धमें तृप्त पितर आयु, प्रजा, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख तथा राज्य प्रदान करते हैं।

बेटा! इस प्रकार गृहस्थ पुरुषको हव्यसे देवताओंका, कव्य (श्राद्ध)से पितरोंका और अन्नसे अतिथियों एवं भाई-बन्धुओंका पूजन करना चाहिये। इनके सिवा भूत, प्रेत, समस्त भृत्यगण, पशु-पक्षी, चींटी, वृक्ष तथा अन्यान्य याचकोंकी तृप्ति भी सदाचारी गृहस्थ पुरुषको करनी चाहिये। जो नित्य-नैमित्तिक क्रियाओंका उल्लङ्घन करके पूजन करता है, वह पाप भोगता है।

अलर्क बोले—माताजी! आपने पुरुषके नित्य, नैमित्तिक तथा नित्य-नैमित्तिक—ये तीन प्रकारके कर्म बतलाये। अब मैं आपके मुँहसे सदाचारका वर्णन सुनना चाहता हूँ, जिसका पालन करनेवाला | मनुष्य इस लोक और परलोकमें भी सुख पाता है।

मदालसाने कहा—बेटा! गृहस्थ पुरुषको सदा ही सदाचारका पालन करना चाहिये। आचारहीन मनुष्यको न इस लोकमें सुख मिलता है, न परलोकमें। जो सदाचारका उल्लङ्घन करके मनमाना बर्ताव करता है, उस पुरुषका कल्याण यज्ञ, दान और तपस्यासे भी नहीं होता। दुराचारी पुरुषको इस लोकमें बड़ी आयु नहीं मिलती। अतः सदाचारके पालनका सदा ही यत्न करे। सदाचार बुरे लक्षणोंका नाश करता है। वत्स! अब मैं सदाचारका स्वरूप बतलाती हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो और उसका पालन करो। गृहस्थको धर्म, अर्थ और काम—तीनोंके साधनका यत्न करना चाहिये। उनके सिद्ध होनेपर उसे इस लोक और परलोकमें भी सिद्धि प्राप्त होती है। मनको वशमें करके अपनी आयका एक चौथाई भाग पारलौकिक लाभके लिये संगृहीत करे। आधे भागसे नित्य नैमित्तिक कार्योंका निर्वाह करते हुए अपना भरण-पोषण करे तथा एक चौथाई भाग अपने लिये मूल पूँजीके रूपमें रखकर उसे बढ़ाये। बेटा! ऐसा करनेसे धन सफल होता है। इसी प्रकार पापकी निवृत्ति तथा पारलौकिक उन्नतिके लिये विद्वान् पुरुष धर्मका अनुष्ठान करे। ब्राह्ममुहूर्तमें उठे। उठकर धर्म और अर्थका चिन्तन करे। अर्थके कारण जो शरीरको कष्ट उठाना पड़ता है, उसका भी विचार करे। फिर वेदके तात्त्विक अर्थ—परब्रह्म परमात्माका स्मरण करे। इसके बाद शयनसे उठकर नित्यकर्मसे निवृत्त हो, स्नान आदिसे पवित्र होकर मनको संयममें रखते हुए पूर्वाभिमुख बैठे और आचमन करके सन्ध्योपासन करे। प्रातःकालकी सन्ध्या उस समय आरम्भ करे, जब तारे दिखायी देते हों। इसी प्रकार सायंकालकी सन्ध्योपासना सूर्यास्तसे पहले ही विधिपूर्वक आरम्भ करे। आपत्कालके सिवा और किसी समय उसका

  • श्राद्धमें विहित और निषिद्ध वस्तुका वर्णन तथा गृहस्थोचित सदाचारका निरूपण * ९७

त्याग न करे।* बुरी-बुरी बातें बकना, झूठ बोलना, कठोर वचन मुँहसे निकालना, असत् शास्त्र पढ़ना, नास्तिकताको अपनाना तथा दुष्ट पुरुषोंकी सेवा करना छोड़ दे। मनको वशमें रखते हुए प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल हवन करे। उदय और अस्तके समय सूर्यमण्डलका दर्शन न करे। बाल सँवारना, आईना देखना, दातुन करना और देवताओंका तर्पण करना—यह सब कार्य पूर्वाह्नकालमें ही करना चाहिये।

ग्राम, निवासस्थान, तीर्थ और क्षेत्रोंके मार्गमें, जोते हुए खेतमें तथा गोशालामें मल-मूत्र न करे। परायी स्त्रीको नंगी अवस्थामें न देखे। अपनी विष्ठापर दृष्टिपात न करे। रजस्वला स्त्रीका दर्शन, स्पर्श तथा उसके साथ भाषण भी वर्जित है। पानीमें मल-मूत्रका त्याग अथवा मैथुन न करे। बुद्धिमान् पुरुष मल-मूत्र, केश, राख, खोपड़ी, भूसी, कोयले, हड्डियोंके चूर्ण, रस्सी, वस्त्र आदिपर तथा केवल पृथ्वीपर और मार्गमें कभी न बैठे। गृहस्थ मनुष्य अपने वैभवके अनुसार देवता, पितर, मनुष्य तथा अन्यान्य प्राणियोंका पूजन करके पीछे भोजन करे। भलीभाँति आचमन करके हाथ-पैर धोकर पवित्र हो पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके भोजनके लिये आसनपर बैठे और हाथोंको घुटनोंके भीतर करके मौनभावसे भोजन करे। भोजनके समय मनको अन्यत्र न ले जाय। यदि अन्न किसी प्रकारकी हानि करनेवाला हो तो उस हानिको ही बतावे। उसके सिवा अन्नके और किसी दोषकी चर्चा न करे। भोजनके साथ पृथक् नमक लेकर न खाय। अधिक गर्म अन्न खाना भी ठीक नहीं है। मनुष्यको चाहिये कि खड़े होकर या चलते-चलते मल-मूत्रका त्याग, आचमन तथा कुछ भी भक्षण न करे। जूठे मुँह वार्तालाप न करे तथा उस अवस्थामें स्वाध्याय भी वर्जित है। जूठे हाथसे गौ, ब्राह्मण, अग्नि तथा अपने मस्तकका भी स्पर्श न करे। जूठी अवस्थामें सूर्य, चन्द्रमा और तारोंकी ओर जान बूझकर न देखे। दूसरेके आसन, शय्या और बर्त्तनका भी स्पर्श न करे।

गुरुजनोंके आनेपर उन्हें बैठनेको आसन दे, उठकर प्रणामपूर्वक उनका स्वागत सत्कार करे। उनके अनुकूल बातचीत करे। जाते समय उनके पीछे पीछे जाय, कोई प्रतिकूल बात न करे। एक वस्त्र धारण करके भोजन तथा देवपूजन न करे। बुद्धिमान् पुरुष ब्राह्मणोंसे बोझ न ढुलाये और आगमें मूत्र-त्याग न करे। नग्न होकर कभी स्नान अथवा शयन न करे। दोनों हाथोंसे सिर न खुजलाये। बिना कारण बारंबार सिरके ऊपरसे स्नान न करे। सिरसे स्नान कर लेनेपर किसी भी अङ्गमें तेल न लगाये। सब अनध्यायोंके दिन स्वाध्याय बंद रखे। ब्राह्मण, अग्नि, गौ तथा सूर्यकी ओर मुँह करके पेशाब न करे। दिनमें उत्तरकी ओर और रात्रिमें दक्षिणकी ओर मुँह करके मल-मूत्रका त्याग करे। जहाँ ऐसा करनेमें कोई बाधा हो, वहाँ इच्छानुसार करे। गुरुके दुष्कर्मकी चर्चा न करे। यदि वे क्रुद्ध हों तो उन्हें विनयपूर्वक प्रसन्न करे। दूसरे लोग भी यदि गुरुकी निन्दा करते हों तो उसे न सुने। ब्राह्मण, राजा, दुःखसे आतुर मनुष्य, विद्या-वृद्ध पुरुष, गर्भिणी स्त्री, बोझसे व्याकुल मनुष्य, गूँगा, अन्धा, बहरा, मत्त, उन्मत्त, व्यभिचारिणी स्त्री, शत्रु, बालक और पतित—ये यदि सामनेसे आते हों तो स्वयं किनारे हटकर इनको जानेके लिये मार्ग देना चाहिये। विद्वान् पुरुष देवालय, चैत्यवृक्ष, चौराहा, विद्या-वृद्ध पुरुष, गुरु और देवता—इनको दाहिने करके चले। दूसरोंके धारण किये हुए जूते और वस्त्र स्वयं न पहने। दूसरोंके उपयोगमें आये हुए


* पूर्वा सन्ध्यां सनक्षत्रां पश्चिमां सदिवाकराम्। उपसीत यथाश्यायं नैतां जह्यादनापदि । (१४। २८)

१८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

यज्ञोपवीत, आभूषण और कमण्डलुका भी त्याग करे। चतुर्दशी, अष्टमी, पूर्णिमा तथा पर्वके दिन तैलाभ्यङ्ग एवं स्त्री-सहवास न करे। बुद्धिमान् मनुष्य कभी पैर और जङ्घा फैलाकर न खड़ा हो। पैरोंको न हिलाये तथा पैरको पैरसे न दबाये। किसीको चुभती बात न कहे। निन्दा और चुगली छोड़ दे। दम्भ, अभिमान और तीखा व्यवहार कदापि न करे। मूर्ख, उन्मत्त, व्यसनी, कुरूप, मायावी, हीनाङ्ग तथा अधिकाङ्ग मनुष्योंकी खिल्ली न उड़ाये। पुत्र और शिष्यको शिक्षा देनेके लिये आवश्यकता होनेपर उन्हींको दण्ड दे, दूसरोंको नहीं। आसनको पैरसे खींचकर न बैठे। सायंकाल और प्रातःकाल पहले अतिथिका सत्कार करके फिर स्वयं भोजन करे।

वत्स ! सदा पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके ही दातुन करे। दातुन करते समय मौन रहे। दातुनके लिये निषिद्ध वृक्षोंका परित्याग करे। उत्तर और पश्चिमकी ओर सिर करके कभी न सोये। दक्षिण या पूर्व दिशाकी ओर ही मस्तक करके सोवे। दुर्गन्धि-युक्त जलमें स्नान न करे। रात्रिमें न नहावे, ग्रहणके समय रात्रिमें भी स्नान करना बहुत उत्तम है; इसके सिवा अन्य समयमें दिनमें ही स्नानका विधान है। स्नान कर लेनेके बाद हाथ या कपड़ेसे शरीरको न मले। बालों और वस्त्रोंको न फटकारे। विद्वान् पुरुष बिना स्नान किये कभी चन्दन न लगाये। लाल, रंगबिरंगे और काले रंगके कपड़े न पहने। जिसमें बाल, थूक या कीड़े पड़ गये हों, जिसपर कुत्तेकी दृष्टि पड़ी हो, जिसको किसीने चाट लिया हो अथवा जो सारभाग निकाल लेनेके कारण दूषित हो गया हो, ऐसे अन्नको न खाय। बहुत देरके बने हुए और बासी भातको त्याग दे। पीठी, साग, ईखके रस और दूधकी बनी हुई वस्तुएँ भी यदि बहुत दिनोंकी हों तो उन्हें न खाये। सूर्यके उदय और अस्तके समय शयन न करे। बिना नहाये, बिना बैठे, अन्यमनस्क होकर, शय्यापर बैठकर या सोकर, केवल पृथ्वीपर बैठकर, बोलते हुए, एक कपड़ा पहनकर तथा भोजनकी ओर देखनेवाले पुरुषोंको न देकर मनुष्य कदापि भोजन न करे। सवेरे-शाम दोनों समय भोजनकी यही विधि है।

विद्वान् पुरुषको कभी परायी स्त्रीके साथ समागम नहीं करना चाहिये। परस्त्री-संगम मनुष्योंके इष्ट, पूर्त और आयुका नाश करनेवाला है। इस संसारमें परस्त्री-समागमके समान मनुष्यकी आयुका विघातक कार्य दूसरा कोई नहीं है। देवपूजा, अग्निहोत्र, गुरुजनोंको प्रणाम तथा भोजन भलीभाँति आचमन करके करना चाहिये। स्वच्छ, फेनरहित, दुर्गन्धशून्य और पवित्र जल लेकर पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके आचमन करना चाहिये। जलके भीतरकी, घरकी, बाँबीकी, चूहेके बिलकी और शौचसे बची हुई—ये पाँच प्रकारकी मिट्टियाँ त्याग देने योग्य हैं। हाथ-पैर धोकर एकाग्रचित्तसे मार्जन करके, घुटनोंको समेटकर, दो बार मुँहके दोनों किनारोंको पोंछे; फिर सम्पूर्ण इन्द्रियों और मस्तकका स्पर्श करके जलसे भलीभाँति तीन बार आचमन करे। इस प्रकार पवित्र होकर समाहित-चित्तसे सदा देवताओं, पितरों और ऋषियोंकी क्रिया करनी चाहिये। थूकने, खँखारने और कपड़ा पहननेपर बुद्धिमान् पुरुष आचमन करे। छींकने, चाटने, वमन करने, थूकने आदिके पश्चात् आचमन, गायके पीठका स्पर्श, सूर्यका दर्शन करना तथा दाहिने कानको छू लेना चाहिये। इनमें पहलेके अभावमें दूसरा उपाय करना चाहिये।

दाँतोंको न कटकटाये। अपने शरीरपर ताल न दे। दोनों संध्याओंके समय अध्ययन, भोजन और शयनका त्याग करे। सन्ध्याकालमें मैथुन और रास्ता चलना भी निषिद्ध है। बेटा ! पूर्वाह्नकालमें देवताओंका, मध्याह्नकालमें मनुष्यों (अतिथियों) का तथा अपराह्नकालमें पितरोंका भक्तिपूर्वक

  • श्राद्धमें विहित और निषिद्ध वस्तुका वर्णन तथा गृहस्थोचित सदाचारका निरूपण * ९९

पूजन करना चाहिये। सिरसे स्नान करके देवकार्य या पितृकार्यमें प्रवृत्त होना उचित है। पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके शौच कराये। उत्तम कुलमें उत्पन्न होनेपर भी जो कन्या किसी अङ्गसे हीन, रोगिणी, विकृत रूपवाली, पीले रंगकी, अधिक बोलनेवाली तथा सबके द्वारा निन्दित हो, उसके साथ विवाह न करे। जो किसी अङ्गसे हीन न हो, जिसकी नासिका सुन्दर हो तथा जो सभी उत्तम लक्षणोंसे सुशोभित हो, वैसी ही कन्याके साथ कल्याणकामी पुरुषको विवाह करना चाहिये। पुरुषको उचित है कि स्त्रीकी रक्षा करे, दिनमें शयन और मैथुन न करे। दूसरोंको कष्ट देनेवाला कार्य न करे, किसी जीवको पीड़ा न दे। रजस्वला स्त्री चार रातोंतक सभी वर्णके पुरुषोंके लिये त्याज्य है। यदि कन्याका जन्म रोकना हो तो पाँचवीं रातमें भी स्त्री-सहवास न करे। छठी रात आनेपर स्त्रीके पास जाय; क्योंकि युग्म रात्रियाँ ही इसके लिये श्रेष्ठ हैं। युग्म रात्रियोंमें स्त्री-सहवाससे पुत्रका जन्म होता है और अयुग्म रात्रियोंमें गर्भाधान करनेसे कन्या उत्पन्न होती है; अतः पुत्रकी इच्छा रखनेवाला पुरुष युग्म रात्रियोंमें ही स्त्रीके साथ शयन करे। पूर्वाह्नमें मैथुन करनेसे विधर्मी और सन्ध्याकालमें करनेसे नपुंसक पुत्र उत्पन्न होता है।

बेटा! हजामत बनवाने, वमन होने, स्त्री- प्रसङ्ग करने तथा श्मशानभूमिमें जानेपर वस्त्रसहित स्नान करे। देवता, वेद, द्विज, साधु, सच्चे महात्मा, गुरु, पतिव्रता, यज्ञकर्ता और तपस्वी—इनकी निन्दा अथवा परिहास न करे। यदि कोई उद्दण्ड मनुष्य ऐसा करता हो तो उसकी बात सुने भी नहीं। अपनेसे श्रेष्ठ और अपनेसे नीचे व्यक्तियोंकी शय्या और आसनपर न बैठे। अमङ्गलमय वेश न धारण करे और मुखसे अमाङ्गलिक वचन भी न बोले। स्वच्छ वस्त्र पहने और श्वेत पुष्पोंकी माला धारण करे। उद्दण्ड, उन्मत्त, अविनीत, शीलहीन, चोरी आदिसे दूषित, अधिक अपव्ययी, लोभी, वैरी, कुलटाके पति, अधिक बलवान्, अधिक दुर्बल, लोकमें निन्दित तथा सबपर सन्देह करनेवाले लोगोंसे कभी मित्रता न करे। साधु, सदाचारी, विद्वान्, चुगली न करनेवाले, सामर्थ्यवान् तथा उद्योगी पुरुषोंसे मित्रता स्थापित करे। विद्वान् पुरुष वेद-विद्या एवं व्रतमें निष्णात पुरुषोंके साथ बैठे। मित्र, दीक्षाप्राप्त पुरुष, राजा, स्नातक, श्वशुर तथा ऋत्विक्—इन छः पूजनीय पुरुषोंका घर आनेपर पूजन करे। जो द्विज संवत्सरव्रतको पूरा करके घरपर आवें, उनकी अपने वैभवके अनुसार यथासमय आलस्य त्याग करके पूजा करे और कल्याणकामी पुरुष उनकी आज्ञाका पालन करनेके लिये सदा उद्यत रहे। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि उन ब्राह्मणोंके फटकारनेपर भी कभी उनके साथ विवाद न करे।

घरके देवताओंका यथास्थान भलीभाँति पूजन करके अग्नि-स्थापनपूर्वक उसमें आहुति दे। पहली आहुति ब्रह्माको, दूसरी प्रजापतिको, तीसरी गुह्यकोंको, चौथी कश्यपको तथा पाँचवीं अनुमतिको दे। फिर पूर्वकथनानुसार गृहबलि देकर वैश्वदेवबलि दे। देवताओंके लिये पृथक्-पृथक् स्थानका विभाग करके उनके लिये बलि अर्पित करे। उसका क्रम बतलाती हूँ, सुनो। एक पात्रमें पहले पर्जन्य, जल और पृथ्वीको तीन बलि दे। फिर प्राची आदि प्रत्येक दिशामें वायुको बलि देकर क्रमशः उन- उन दिशाओंके नामसे भी बलि समर्पित करे। तत्पश्चात् ब्रह्मा, अन्तरिक्ष, सूर्य, विश्वेदेव, विश्वभूत, उषा तथा भूतपतिको क्रमशः बलि दे। फिर 'पितृभ्यः स्वधा नमः' कहकर दक्षिण दिशामें अपसव्य होकर पितरोंके निमित्त बलि दे। फिर पात्रसे अन्नका शेष भाग और जल लेकर 'यक्ष्मैतत्ते निर्णेजनम्' इस मन्त्रसे वायव्य दिशामें उसे विधिपूर्वक छोड़ दे। तदनन्तर रसोईके अन्नसे अग्राशन तथा हन्तकार निकालकर उन्हें विधिपूर्वक ब्राह्मणको

१०० • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •

दे। देवता आदिके सब कर्म उन-उनके तीर्थसे ही करने चाहिये। ब्राह्मतीर्थसे आचमन करना चाहिये, दाहिने हाथमें अंगूठेके उत्तर ओर जो एक रेखा होती है, वह ब्राह्मतीर्थके नामसे प्रसिद्ध है। उसीसे आचमन करना उचित है। तर्जनी और अंगूठेके बीचका भाग पितृतीर्थ कहलाता है। नान्दीमुख पितरोंको छोड़कर अन्य सब पितरोंको उसी तीर्थसे जल आदि देना चाहिये। अँगुलियोंके अग्रभागमें देवतीर्थ है। उससे देवकार्य करनेका विधान है। कनिष्ठिकाके मूल भागमें कायतीर्थ है। उससे प्रजापतिका कार्य किया जाता है।

इस प्रकार इन तीर्थोंसे सदा देवताओं और पितरोंके कार्य करने चाहिये, अन्य तीर्थोंसे कदापि नहीं। ब्राह्मतीर्थसे आचमन उत्तम माना गया है। पितरोंका तर्पण पितृतीर्थसे, देवताओंका देवतीर्थसे और प्रजापतिका कायतीर्थसे करना श्रेष्ठ बताया गया है। नान्दीमुखके पितरोंके लिये पिण्डदान और तर्पण प्राजापत्य तीर्थसे करना चाहिये। विद्वान् पुरुष एक साथ जल और अग्नि न ले। गुरुजनों तथा देवताओंकी ओर पाँव न फैलावे। बछड़ेको दूध पिलाती हुई गायको न छेड़े। अञ्जलिसे पानी न पिये। शौचके समय विलम्ब न करे। मुखसे आग न फूँके। बेटा! जहाँ ऋण देनेवाला धनी, वैद्य, श्रोत्रिय ब्राह्मण तथा जलपूर्ण नदी—ये चार न हों, वहाँ निवास नहीं करना चाहिये। जहाँ शत्रुविजयी, बलवान् और धर्मपरायण राजा हो, वहीं विद्वान् पुरुषको निवास करना चाहिये। दुष्ट राजाके राज्यमें सुख कहाँ। जहाँ दुर्धर्ष राजा, उपजाऊ भूमि, संयमी एवं न्यायशील पुरवासी और ईर्ष्या न करनेवाले लोग हों, वहाँका निवास भविष्यमें सुखदायक होता है। जिस राष्ट्रमें किसान बहुत हों, किन्तु वे अधिक भोगपरायण न हों तथा जहाँ सब तरहके अन्न पैदा होते हों, वहीं बुद्धिमान् पुरुषको रहना चाहिये। बेटा! जहाँ विजयका इच्छुक, पहलेका शत्रु तथा सदा उत्सव मनानेमें ही लगे रहनेवाले लोग—ये तीन सदा रहते हों, वहाँ निवास न करे। विद्वान् पुरुषको ऐसे ही स्थानोंपर सदा निवास करना चाहिये, जहाँके सहवासी सुशील हों।


त्याज्य-ग्राह्य, द्रव्यशुद्धि, अशौच-निर्णय तथा कर्तव्याकर्तव्यका वर्णन

मदालसा कहती है—बेटा! अब त्याज्य और ग्राह्य वस्तुओंका प्रकरण आरम्भ करती हूँ, सुनो। घी अथवा तेलमें पका हुआ अन्न बहुत देरका बना हुआ अथवा बासी भी हो तो वह भोजन करने योग्य है। गेहूँ, जौ तथा गोरसकी बनी हुई वस्तुएँ तेल-घीमें न बनी हों तो भी वे पूर्ववत् ग्राह्य हैं।* शङ्ख, पत्थर, सोना, चाँदी, रस्सी, कपास, शाक, मूल, फल, विदल (बाँसके बने हुए टोकरे आदि), मणि, हीरा, मूँगा, मोती तथा मनुष्योंके शरीरकी शुद्धि जलसे होती है। लोहेके हथियारोंकी शुद्धि पानीसे धोने तथा पत्थर या सानपर रगड़नेसे होती है। जिस पात्रमें तेल या घी रखा गया हो, उसकी सफाई गरम जलसे होती है। सूप, धान्यराशि, मृगचर्म, मूसल, ओखली तथा कपड़ोंके ढेरकी शुद्धि जल छिड़कनेमात्रसे हो जाती है। वल्कल-वस्त्र जल और मिट्टीसे शुद्ध होते हैं। तृण, काष्ठ और ओषधियोंकी शुद्धि जल छिड़कनेसे होती है। भेड़के ऊनसे बने कपड़े और केश यदि दोषयुक्त हो गये हों तो उनकी शुद्धि सरसों अथवा तिलकी खली और जलसे


* भक्ष्यमन्नं प्रयुक्तं स्यात्तत् स्नेहाक्तं चिरसम्भृतम्। अस्नेहाश्चापि गोधूमयवगोरसविक्रियाः। (३५। ६-३)

  • त्याज्य-ग्राह्य, द्रव्यशुद्धि, अशौच-निर्णय तथा कर्त्तव्याकर्त्तव्यका वर्णन * ६०१

होती है। इसी प्रकार रूईके बने कपड़े पानी और क्षारसे शुद्ध होते हैं। मिट्टीके बर्तन दोबारा पकानेसे शुद्ध होते हैं। भिक्षामें प्राप्त अन्न, कारीगरका हाथ, बाजारमें बिकनेके लिये आयी हुई शाक आदि वस्तुएँ, स्त्रियोंका मुख, गलीमें आयी हुई वस्तु, जिसके गुण-दोषका ज्ञान न हो—ऐसी वस्तु और सेवकोंकी लायी हुई चीज सदा शुद्ध मानी गयी है। जिसके शिशुने अभी दूध पीना नहीं छोड़ा हो, ऐसी स्त्री तथा दुर्गन्ध और बुद्बुदोंसे रहित बहता हुआ जल स्वाभाविक शुद्ध है। समयानुसार अग्निसे तपाने, बुहारने, गायोंके चलने-फिरने, लीपने, जोतने और सींचनेसे भूमिकी शुद्धि होती है। बुहारनेसे और देवताओंकी पूजा करनेसे घर शुद्ध होता है। जिस पात्रमें बाल या कीड़े पड़े हों, जिसे गायने सूंघ लिया हो तथा जिसमें मक्खियाँ पड़ी हों, उसकी शुद्धि राख और मिट्टीसे मलकर जलद्वारा धोनेसे होती है। ताँबेका बर्तन खटाईसे, राँगा और सीसा राखसे और काँसेके बर्तनोंकी शुद्धि राख और जलसे होती है। जिस पात्रमें कोई अपवित्र वस्तु पड़ गयी हो, उसे मिट्टी और जलसे तबतक धोये, जबतक कि उसकी दुर्गन्ध दूर न हो जाय। इससे वह शुद्ध होता है। पृथ्वीपर प्राकृतिक रूपसे वर्तमान जल, जिससे एक गायकी प्यास बुझ सके, शुद्ध माना गया है। गलीमें पड़ा हुआ वस्त्र वायुके लगनेसे शुद्ध होता है। धूल, अग्नि, घोड़ा, गाय, छाया, किरणें, वायु, जलके छींटे और मक्खी आदि—ये सब अशुद्ध वस्तुके संसर्गमें आनेपर भी शुद्ध ही रहते हैं। बकरे और घोड़ेका मुख शुद्ध माना गया है; किन्तु गायका नहीं। बछड़ेका मुख तथा माताका स्तन भी पवित्र बताया गया है। फल गिरानेमें पक्षीकी चोंच भी शुद्ध मानी गयी है। आसन, शय्या, सवारी, नाव और मार्गके तृण—ये सब बाजारमें बिकनेवाली वस्तुओंकी तरह सूर्य और चन्द्रमाकी किरणों तथा वायुके स्पर्शसे शुद्ध होते हैं। गलियोंमें घूमने-फिरने, स्नान करने, छींक आने, पानी पीने, भोजन करने तथा वस्त्र बदलनेपर विधिपूर्वक आचमन करना चाहिये। अस्पृश्य वस्तुओंसे जिनका स्पर्श हो गया हो उनकी, रास्तेके कीचड़ और जलकी तथा ईंटकी बनी हुई वस्तुओंकी वायुके संसर्गसे शुद्धि होती है।

अनजानेमें यदि दूषित अन्न भोजन कर ले तो तीन रात उपवास करे और यदि जान-बूझकर किया हो तो उसके दोषकी शान्तिके लिये प्रायश्चित्त करे। मनुष्यकी गीली हड्डीका स्पर्श करके स्नान करनेसे शुद्धि होती है और सूखी हड्डीका स्पर्श कर लेनेपर केवल आचमन करके गायका स्पर्श या सूर्यका दर्शन करनेसे मनुष्य शुद्ध हो सकता है। बुद्धिमान् पुरुष रक्त, खँखार तथा उबटनको न लाँघे और असमर्थमें उद्यान आदिके भीतर कदापि न ठहरे। लोकनिन्दित विधवा स्त्रीसे वार्तालाप न करे। जूठन, मल-मूत्र और पैरोंके धोवनको घरसे बाहर फेंके। दूसरेके खुदाये हुए पोखरे आदिके जलमें पाँच लोंदा मिट्टी निकाले बिना स्नान न करे। देवसम्बन्धी सरोवरों तथा गङ्गा आदि नदियोंमें सदा ही स्नान करे। देवता, पितर, उत्तम शास्त्र, यज्ञ और मन्त्र आदिकी निन्दा करनेवाले पुरुषोंसे स्पर्श और वार्तालाप करनेपर सूर्यके दर्शनसे शुद्धि होती है। रजस्वला स्त्री, अन्त्यज, पतित, सूतक, विधर्मी, प्रसूता स्त्री, नपुंसक, वस्त्रहीन, चाण्डाल, मुर्दा ढोनेवाले तथा परस्त्रीगामी पुरुषोंको देखकर विद्वान् पुरुषोंको इसी प्रकार सूर्यके दर्शनसे आत्मशुद्धि करनी चाहिये। अभक्ष्य पदार्थ, नवप्रसूता स्त्री, नपुंसक, बिलाव, चूहा, कुत्ता, मुर्गा, पतित, जाति-बहिष्कृत, चाण्डाल, मुर्दा ढोनेवाले, रजस्वला स्त्री, ग्रामीण सूअर तथा अशौचदूषित मनुष्योंको छू लेनेपर स्नान करनेसे शुद्धि होती है। जिसके घरमें प्रतिदिन नित्यकर्मकी अवहेलना होती हो तथा जिसे ब्राह्मणोंने त्याग दिया हो, वह नराधम

१०२ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


महापापी हैं। नित्यकर्मका त्याग कभी न करे। उसे न करनेका बन्धन तो केवल जननाशौच और मरणाशौचमें ही है।* अशौच प्राप्त होनेपर ब्राह्मण दस दिन, क्षत्रिय बारह दिन तथा वैश्य पंद्रह दिनोंतक दान-होम आदि कर्मोंसे अलग रहे। शूद्र एक मासतक अपना कर्म बंद रखे। तदनन्तर सब लोग अपने-अपने शास्त्रोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करें।

मृतकको गाँवसे बाहर ले जाकर उसका दाह-संस्कार करनेके बाद समान गोत्रवाले भाई-बन्धुओंको पहले, चौथे, सातवें और नवें दिन प्रेतके लिये जल देना चाहिये तथा चौथे दिन उसकी चितासे राख और हड्डियोंका सञ्चय करना चाहिये। अस्थिसञ्चयके बाद उनका अङ्ग-स्पर्श किया जा सकता है। फिर समानोदक पुरुष अपने सब कर्म कर सकते हैं, किन्तु सपिण्ड लोग केवल स्पर्शके अधिकारी होते हैं। जिस दिन मृत्यु हुई हो, उस दिन समानोदक और सपिण्ड दोनोंका स्पर्श किया जा सकता है। वृक्ष, सर्प, गौ, दाढ़ोंवाले जीव, शस्त्र, जल, फाँसी, अग्नि, विष, पर्वत गिरने तथा उपवास आदिके द्वारा मृत्यु होनेपर अथवा बालक, परदेशी एवं परिव्राजककी मृत्यु होनेपर तत्काल अशौच निवृत्त हो जाता है तथा कुछ लोगोंका मत है कि तीन दिनोंतक अशौच रहता है। यदि सपिण्डोंमेंसे एककी मृत्यु होनेके बाद थोड़े ही दिनोंमें दूसरेकी भी मृत्यु हो जाय तो पहलेके अशौचमें जितने दिन बाकी हों उतने ही दिनोंके भीतर दूसरेका भी श्राद्ध आदि कर्म पूर्ण कर देना चाहिये। जननाशौचमें भी यही विधि देखी जाती है। सपिण्ड तथा समानोदक व्यक्तियोंमें एकके बाद दूसरेका जन्म होनेपर पहलेके ही साथ दूसरेका भी अशौच निवृत्त हो जाता है।†

पुत्रका जन्म होनेपर पिताको वस्त्रसहित स्नान करना चाहिये। उसमें भी यदि एकके जन्मके बाद दूसरेका जन्म हो जाय तो पहले जन्मे हुए बालकके दिनपर ही दूसरेकी भी शुद्धि बतायी गयी है।‡ लोकमें जो-जो वस्तु अधिक प्रिय हो तथा घरमें भी जो वस्तु अत्यन्त प्रिय जान पड़े, उसको अक्षय बनानेकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको उचित है कि वह उसे गुणवान् व्यक्तिको दे। अशौचके दिन पूरे हो जानेपर जल, वाहन, आयुध, चाबुक और दण्डका स्पर्श करके सब वर्णोंके लोग पवित्र हो अपने-अपने वर्णधर्मका अनुष्ठान करें, क्योंकि वह इस लोक और परलोकमें भी कल्याण देनेवाला है। तीनों वेदोंका सर्वदा स्वाध्याय करे, विद्वान् बने। धर्मानुसार धनका उपार्जन करे और उसे यत्नपूर्वक यज्ञमें लगावे। जिस कर्मको करते समय अपने मनमें घृणा न हो और जिसे महापुरुषोंके सामने प्रकट करनेमें कोई संकोच न हो, ऐसा कर्म निःशङ्क होकर करना चाहिये। बेटा! ऐसे आचरणवाले गृहस्थ पुरुषको धर्म, अर्थ और कामकी प्राप्ति होती है तथा इस लोक और परलोकमें भी उसका कल्याण होता है।

मातासे इस प्रकार उपदेश ग्रहण करके राजा ऋतध्वजके पुत्र अलर्कने युवावस्थामें विधिपूर्वक अपना विवाह किया। उससे अनेक पुत्र उत्पन्न हुए। उसने यज्ञोंद्वारा भगवान्‌का यजन किया और हर समय वह पिताकी आज्ञाका पालन करनेमें संलग्न रहता था। तदनन्तर बहुत समयके बाद बुढ़ापा आनेपर धर्मपरायण महाराज ऋतध्वजने अपनी पत्नीके साथ तपस्याके लिये वनमें जानेका विचार किया और पुत्रका राज्याभिषेक कर दिया।


* नित्यस्य कर्मणो हानिं न कुर्यात् कदाचन। तस्य त्याकरणे बन्धः केवलं मृतजन्मसु॥ (३५। ३९)
† सपिण्डानां सपिण्डेषु मृतेष्वस्मिन् मृते यदि। पूर्वाशौचसमाप्त्यान्तः कार्या तस्य दिनैः क्रिया॥
एष एव विधिर्दृष्टो जनन्यामपि हि सूतके। सोपग्रहाणां सपिण्डेषु तथानलोदकेषु च॥ (३५। ४७-४८)
‡ तत्रापि यदि चान्यस्मिञ्जाते जायेत चान्तरः। तत्रापि शुद्धिरुद्दिष्टा पूर्वजन्मवतो दिनैः॥ (३५। ५०)

  • सुबाहुकी प्रेरणासे काशिराजका अलर्कपर आक्रमण, अलर्कका दत्तात्रेयजीकी शरणमें जाना और उनसे योगका उपदेश लेना * १०३

उस समय मदालसाने अपने पुत्रकी विषयभोगविषयक आसक्तिको हटानेके लिये उससे यह अन्तिम वचन कहा—'बेटा! गृहस्थ-धर्मका अवलम्बन करके राज्य करते समय यदि तुम्हारे ऊपर प्रिय बन्धुके वियोगसे, शत्रुओंकी बाधासे अथवा धनके नाशसे होनेवाला कोई असह्य दुःख आ पड़े तो मेरी दी हुई इस अँगूठीसे यह उपदेशपत्र निकालकर, जो रेशमी वस्त्रपर बहुत सूक्ष्म अक्षरोंमें लिखा गया है, तुम अवश्य पढ़ना; क्योंकि ममतामें बँधा रहनेवाला गृहस्थ दुःखोंका केन्द्र होता है।

सुमति कहते हैं—यों कहकर मदालसाने अपने पुत्रको सोनेकी अँगूठी दी और गृहस्थ पुरुषके योग्य अनेकानेक आशीर्वाद भी दिये। तत्पश्चात् पुत्रको राज्य सौंपकर महाराज कुवलयाश्व और महारानी मदालसा तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये।


सुबाहुकी प्रेरणासे काशिराजका अलर्कपर आक्रमण, अलर्कका दत्तात्रेयजीकी शरणमें जाना और उनसे योगका उपदेश लेना

सुमति कहते हैं—पिताजी! धर्मात्मा राजा अलर्कने भी पुत्रकी भाँति प्रजाका न्यायपूर्वक पालन किया। उनके राज्यमें प्रजा बहुत प्रसन्न थी और सब लोग अपने-अपने कर्मोंमें लगे रहते थे। वे दुष्ट पुरुषोंको दण्ड देते और सज्जन पुरुषोंकी भलीभाँति रक्षा करते थे। राजाने बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान भी किया। इन सब कार्योंमें उन्हें बड़ा आनन्द मिलता था। महाराजको अनेक पुत्र हुए, जो महान् बलवान्, अत्यन्त पराक्रमी, धर्मात्मा, महात्मा तथा कुमार्गके विरोधी थे। उन्होंने धर्मपूर्वक धनका उपार्जन किया और धनसे धर्मका अनुष्ठान किया तथा धर्म और धन दोनोंके अनुकूल रहकर ही विषयोंका उपभोग किया। इस प्रकार धर्म, अर्थ और काममें आसक्त हो पृथ्वीका पालन करते हुए राजा अलर्कको अनेक वर्ष बीत गये; किन्तु उन्हें ये एक दिनके समान ही जान पड़े। मनको प्रिय लगनेवाले विषयोंका भोग करते हुए उन्हें कभी भी उनकी ओरसे वैराग्य नहीं हुआ। उनके मनमें कभी ऐसा विचार नहीं उठा कि अब धर्म और धनका उपार्जन पूरा हो गया। उनकी ओरसे उन्हें अतृप्ति ही बनी रही।

उनके इस प्रकार भोगमें आसक्त, प्रमादी और अजितेन्द्रिय होनेका समाचार उनके भाई सुबाहुने भी सुना, जो वनमें निवास करते थे। अलर्कको किसी तरह ज्ञान प्राप्त हो, इस अभिलाषासे उन्होंने बहुत देरतक विचार किया। अन्तमें उन्हें यही ठीक मालूम हुआ कि अलर्कके साथ शत्रुता रखनेवाले किसी राजाका सहारा लिया जाय। ऐसा निश्चय करके वे अपना राज्य प्राप्त करनेका उद्देश्य लेकर असंख्य बल-वाहनोंसे सम्पन्न काशिराजकी शरणमें आये। काशिराजने अपनी सेनाके साथ अलर्कपर आक्रमण करनेकी तैयारी की और दूत

१०४ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

भेजकर यह कहलाया कि अपने बड़े भाई सुबाहुको राज्य दे दो। अलर्क राजधर्मके ज्ञाता थे। उन्हें शत्रुके इस प्रकार आज्ञापूर्वक सन्देश देनेपर सुबाहुको राज्य देनेकी इच्छा नहीं हुई। उन्होंने काशिराजके दूतको उत्तर दिया कि 'मेरे बड़े भाई मेरे ही पास आकर प्रेमपूर्वक राज्य माँग लें। मैं किसीके आक्रमणके भयसे थोड़ी-सी भी भूमि नहीं दूँगा।' बुद्धिमान् सुबाहुने भी अलर्कके पास याचना नहीं की। उन्होंने सोचा, 'याचना क्षत्रियका धर्म नहीं है। क्षत्रिय तो पराक्रमका ही धनी होता है।' तब काशिराजने अपनी समस्त सेनाके साथ राजा अलर्कके राज्यपर चढ़ाई करनेके लिये यात्रा की। उन्होंने अपने समीपवर्ती राजाओंसे मिलकर उनके सैनिकोंद्वारा आक्रमण किया और अलर्कके सीमावर्ती नरेशको अपने अधीन कर लिया। फिर अलर्कके राज्यपर घेरा डालकर उनके सामन्त राजाओंको सताना आरम्भ किया। दुर्ग और दुर्गके रक्षकोंको भी काबूमें कर लिया। किन्हींको धन देकर, किन्हींको फूट डालकर और किन्हींको समझा-बुझाकर ही अपना वशवर्ती बना लिया। इस प्रकार शत्रुमण्डलीसे पीड़ित राजा अलर्कके पास बहुत थोड़ी-सी सेना रह गयी। खजाना भी घटने लगा और शत्रुने उनके नगरपर घेरा डाल दिया। इस तरह प्रतिदिन कष्ट पाने और कोश क्षीण होनेसे राजाको बड़ा खेद हुआ। उनका चित्त व्याकुल हो उठा। जब वे अत्यन्त वेदनासे व्यथित हो उठे, तब सहसा उन्हें उस अँगूठीका स्मरण हो आया, जिसे ऐसे ही अवसरोंपर उपयोग करनेके लिये उनकी माता मदालसाने दिया था। तब स्नान करके पवित्र हो उन्होंने ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया और अँगूठीसे वह उपदेशपत्र निकालकर देखा। उसके अक्षर बहुत स्पष्ट थे। राजाने उसमें लिखे हुए माताके उपदेशको पढ़ा, जिससे उनके समस्त शरीरमें रोमाञ्च हो आया और आँखें प्रसन्नतासे खिल उठीं। वह उपदेश इस प्रकार था—

सङ्गः सर्वात्मना त्याज्यः स चेत् त्यक्तुं न शक्यते।
स सद्भिः सह कर्तव्यः सतां सङ्गो हि भेषजम्॥
कामः सर्वात्मना हेयो हातुं चेच्छक्यते न सः।
मुमुक्षां प्रति तत्कार्यं सैव तस्यापि भेषजम्॥

'सङ्ग (आसक्ति)-का सब प्रकारसे त्याग करना चाहिये; किन्तु यदि उसका त्याग न किया जा सके तो सत्पुरुषोंका सङ्ग करना चाहिये; क्योंकि सत्पुरुषोंका सङ्ग ही उसकी ओषधि है। कामनाको सर्वथा छोड़ देना चाहिये; परन्तु यदि वह छोड़ी न जा सके तो मुमुक्षा (मुक्तिकी इच्छा)-के प्रति कामना करनी चाहिये; क्योंकि मुमुक्षा ही उस कामनाको मिटानेकी दवा है।'

इस उपदेशको अनेक बार पढ़कर राजाने सोचा, 'मनुष्योंका कल्याण कैसे होगा? मुक्तिकी इच्छा जाग्रत् करनेपर। और मुक्तिकी इच्छा जाग्रत् होगी सत्सङ्गसे।' ऐसा निश्चय करके वे सत्सङ्गके लिये चिन्तित हुए और अत्यन्त आर्तभावसे आसक्तिरहित, पापशून्य तथा परम सौभाग्यशाली महात्मा दत्तात्रेयजीकी शरणमें गये। उनके चरणोंमें

  • सुबाहुकी प्रेरणासे काशिराजका अलर्कपर आक्रमण, अलर्कका दत्तात्रेयजीसे योगका उपदेश लेना * १०५

हाथी-घोड़े आदिकी सेना न सुबाहुकी है, न दूसरे किसीकी है और न मेरी ही है। जैसे कलसी, घट और कमण्डलुमें एक ही आकाश है तो भी पात्रभेदसे अनेक-सा दिखायी देता है, उसी प्रकार सुबाहु, काशिराज और मैं भिन्न-भिन्न शरीरोंमें रहकर भी एक ही हैं। शरीरोंके भेदसे ही भेदकी प्रतीति होती है। पुरुषकी बुद्धि जिस-जिस वस्तुमें आसक्त होती है, वहाँ-वहाँसे वह दुःख ही लाकर देती है। मैं तो प्रकृतिसे परे हूँ; अतः न दुःखी हूँ, न सुखी। प्राणियोंका भूतोंके द्वारा जो पराभव होता है, वही दुःखमय है। तात्पर्य यह कि जो भौतिक भोगोंमें ममताके कारण आसक्त हैं, वही सुख-दुःखका अनुभव करता है।

प्रणाम करके राजाने उनका पूजन किया और न्यायके अनुसार कहा—‘ब्रह्मन्! आप शरणार्थियोंको शरण देनेवाले हैं। मुझपर कृपा कीजिये। मैं भोगोंमें अत्यन्त आसक्त एवं दुःखसे आतुर हूँ, आप मेरा दुःख दूर कीजिये।'

दत्तात्रेयजी बोले— राजन्! मैं अभी तुम्हारा दुःख दूर करता हूँ। सच-सच बताओ, तुम्हें किसलिये दुःख हुआ है?

अलर्कने कहा— भगवन् ! इस शरीरके बड़े भाई यदि राज्य लेनेकी इच्छा रखते हैं तो यह शरीर तो पाँच भूतोंका समुदायमात्र है। गुणकी ही गुणोंमें प्रवृत्ति हो रही है; अतः मेरा उसमें क्या है। शरीरमें रहकर भी वे और मैं दोनों ही शरीरसे भिन्न हैं। यह हाथ आदि कोई भी अङ्ग जिसका नहीं है, मांस, हड्डी और नाड़ियोंके विभागसे भी जिसका कोई सम्पर्क नहीं है, उस पुरुषका इस राज्यमें हाथी, घोड़े, रथ और कोश आदिसे किञ्चित् भी क्या सम्बन्ध है। इसलिये न तो मेरा कोई शत्रु है, न मुझे दुःख या सुख होता और न नगर तथा कोशसे ही मेरा कोई सम्बन्ध है। यह हाथी-घोड़े आदिकी सेना न सुबाहुकी है, न दूसरे किसीकी है और न मेरी ही है। जैसे कलसी, घट और कमण्डलुमें एक ही आकाश है तो भी पात्रभेदसे अनेक-सा दिखायी देता है, उसी प्रकार सुबाहु, काशिराज और मैं भिन्न-भिन्न शरीरोंमें रहकर भी एक ही हैं। शरीरोंके भेदसे ही भेदकी प्रतीति होती है। पुरुषकी बुद्धि जिस-जिस वस्तुमें आसक्त होती है, वहाँ-वहाँसे वह दुःख ही लाकर देती है। मैं तो प्रकृतिसे परे हूँ; अतः न दुःखी हूँ, न सुखी। प्राणियोंका भूतोंके द्वारा जो पराभव होता है, वही दुःखमय है। तात्पर्य यह कि जो भौतिक भोगोंमें ममताके कारण आसक्त हैं, वही सुख-दुःखका अनुभव करता है।

दत्तात्रेयजी बोले— नरश्रेष्ठ! वास्तवमें ऐसी ही बात है। तुमने जो कुछ कहा है, ठीक है; ममता ही दुःखका और ममताका अभाव ही सुखका कारण है। मेरे प्रश्न करनेमात्रसे तुम्हें यह उत्तम ज्ञान प्राप्त हो गया, जिसने ममताकी प्रतीतिको सेमरकी रूईकी भाँति उड़ा दिया। मनुष्यके हृदयदेशमें अज्ञानरूपो महान् वृक्ष खड़ा है। वह अहंतारूपी अङ्कूरसे उत्पन्न हुआ है। ममता ही उसका तना है। गृह और क्षेत्र उसकी ऊँची-ऊँची शाखाएँ हैं। स्त्री और पुत्र आदि पल्लव हैं। धन-धान्यरूप बड़े-बड़े पत्ते हैं। वह अनादिकालसे बढ़ता चला आ रहा है। पुण्य और पाप उसके आदि पुष्प हैं। सुख और दुःख महान् फल हैं। वह मोक्षके मार्गको रोककर खड़ा है। अज्ञानियोंका सङ्ग ही उस वृक्षके लिये सिंचाईका काम देता है। सकाम कर्म करनेकी प्रबल इच्छा ही उस वृक्षपर भ्रमरोंकी भाँति मँडराती रहती है। जो लोग संसार मार्गकी यात्रासे थककर उस वृक्षका आश्रय लेते हैं, वे भ्रमपूर्ण ज्ञान एवं मिथ्या सुखके वशीभूत हो जाते हैं। ऐसे लोगोंको आत्यन्तिक सुख (मोक्ष) कैसे मिल सकता है। परन्तु जो सत्सङ्गरूपी पत्थरपर घिसकर तेज किये

१०६ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


हुए विद्यारूपी कुठारसे उस ममतारूपी वृक्षको काट डालते हैं, वे विद्वान् पुरुष ही उस मोक्षमार्गसे जाते हैं और धूल तथा काँटोंसे रहित शीतल ब्रह्मवनमें पहुँचकर सब प्रकारकी वृत्तियोंसे रहित हो परमानन्दको प्राप्त होते हैं।*

अलर्कने कहा—भगवन्! आपकी कृपासे मुझे ऐसा उत्तम ज्ञान प्राप्त हुआ, जो जड़ प्रकृति और चेतन शक्तिका विवेक करानेवाला है; किन्तु मेरा मन विषयोंके वशीभूत है, अतः वह इस ज्ञानमें स्थिर नहीं हो पाता। मैं नहीं जानता कि इस प्रकृतिके बन्धनसे कैसे छूट सकूँगा। कैसे मेरा इस संसारमें फिर जन्म न हो? किस प्रकार मैं निर्गुण भावको प्राप्त होऊँ और कैसे सनातन ब्रह्मके साथ एकता प्राप्त करूँ? ब्रह्मन्! मुझे ऐसा ही उत्तम योग बताइये, जिससे मैं मुक्त हो सकूँ। इसके लिये आपके चरणोंमें मस्तक रखकर याचना करता हूँ; क्योंकि आप-जैसे संतोंका सङ्ग ही मनुष्योंका परम उपकार करनेवाला है।

दत्तात्रेयजी बोले—राजन्! योगीको ज्ञानकी प्राप्ति होकर जो उसका अज्ञानसे वियोग होता है, वही मुक्ति है और वही ब्रह्मके साथ एकता एवं प्राकृत गुणोंसे पृथक् होना है। मुक्ति होती है योगसे। योग प्राप्त होता है सम्यक् ज्ञानसे, सम्यक् ज्ञान होता है वैराग्यजनक दुःखसे और दुःख होता है ममताके कारण स्त्री, पुत्र, धन आदिमें चित्तकी आसक्ति होनेसे। अतः मुक्तिकी इच्छा रखनेवाला पुरुष आसक्तिको दुःखका मूल समझकर यत्नपूर्वक त्याग दे। आसक्ति न होनेपर 'यह मेरा है' ऐसी धारणा दूर हो जाती है। ममताका अभाव सुखका ही साधक है। वैराग्यसे सांसारिक विषयोंमें दोषका दर्शन होता है। ज्ञानसे वैराग्य और वैराग्यसे ज्ञान होता है। जहाँ रहना हो, वही घर है। जिससे जीवन चले, वही भोजन है और जिससे मोक्ष मिले, वही ज्ञान बताया गया है। इसके सिवा सब अज्ञान है। राजन्! पुण्य और पापोंको भोग लेनेसे, नित्यकर्मोंका निष्कामभावसे अनुष्ठान करनेसे, अपूर्वका संग्रह न होनेसे तथा पूर्वजन्मके किये हुए कर्मोंका क्षय हो जानेसे मनुष्य बारंबार देहके बन्धनमें नहीं पड़ता। राजन्! यह तुमसे ज्ञानके विषयमें कुछ बातें बतलायी गयीं। अब उस योगका वर्णन सुनो, जिसे प्राप्त कर योगी पुरुष सनातन ब्रह्मसे कभी पृथक् नहीं होता।

योगियोंको पहले आत्मा (बुद्धि)-के द्वारा आत्मा (मन)-को जीतनेकी चेष्टा करनी चाहिये; क्योंकि उसको जीतना बहुत कठिन है। अतः उसपर विजय पानेके लिये सदा ही यत्न करना चाहिये। उसका उपाय बतलाता हूँ, सुनो। प्राणायामके द्वारा राग आदि दोषोंका, धारणाके<sup></sup> द्वारा पापका, प्रत्याहारके<sup></sup> द्वारा विषयोंका और ध्यानके द्वारा ईश्वरविरोधी गुणोंका निवारण करे। जैसे पर्वतीय


* अज्ञानावृतरूढोऽयं ममेतित्वान्वयान् महान्। गृहक्षेत्रोत्थशाखश्च पुत्रदारादिपल्लवः॥
धनधान्यमहापत्रो नैरुज्याग्र्यप्रवर्धितः। पुण्यापुण्यप्रसूनश्च सुखदुःखमहाफलः ॥
तत्र मुक्तिरथव्याधो गृहासक्तमवेक्षतः। विविक्त्याभुक्तमासाद्यो ह्यज्ञानावहहारः ॥
संसाराध्वपरिश्रान्ता ये ह्यस्याधां समाश्रिताः। भ्रान्तिज्ञानसुखाधीनास्तेषामत्यन्तिकं कुतः॥
येस्तु रुत्खङ्गपाषाणशितेन ममतारुः। छिन्नो विद्याकुठारेण ते गतास्तेन वर्त्मना ॥
प्राप्य ब्रह्मवनं शीतं नीरजाकण्टकास्पदम्। प्राप्नुवन्ति परां प्रज्ञां निर्वृता वृत्तिवर्जिताः ॥
(३८। ८-१३)

१. देशबन्धाश्चित्तस्य धारणा—किसी एक स्थानमें चित्तको बाँधना अर्थात् परमात्मामें मनको स्थापित करना 'धारणा' है।
२. इन्द्रियोंके विषयोंकी ओरसे हटाकर चित्तमें लीन करना 'प्रत्याहार' कहलाता है।

  • सुबाहुकी प्रेरणासे काशिराजका अलर्कपर आक्रमण, अलर्कका दत्तात्रेयजीसे योगका उपदेश लेना * १०७

धातुओंको आगमें तपानेसे उनके दोष जल जाते हैं, उसी प्रकार प्राणायाम करनेसे इन्द्रियजनित दोष दूर हो जाते हैं। अतः योगके ज्ञाता पुरुषको पहले प्राणायामका ही साधन करना चाहिये। प्राण और अपानवायुको रोकनेका नाम ही प्राणायाम है। यह लघु, मध्य और उत्तरीयके भेदसे तीन प्रकारका बताया गया है। अलर्क! अब मैं उसकी मात्रा बतलाता हूँ, सुनो। लघु प्राणायाम बारह मात्राका होता है। इससे दूनी मात्राका मध्यम और तिगुनी मात्राका उत्तरीय अथवा उत्तम बताया गया है। पलकोंको उठाने और गिरानेमें जितना समय लगता है, वही प्राणायामकी संख्याके लिये मात्रा कहा गया है। ऐसी ही बारह मात्राओंका लघुनामक प्राणायाम होता है। प्रथम प्राणायामके द्वारा स्वेद (पसीने) को, मध्यमके द्वारा कम्पको और तृतीय प्राणायामके द्वारा विषादको जीते। इस प्रकार क्रमशः इन तीनों दोषोंपर विजय प्राप्त करे। जैसे सिंह, व्याघ्र और हाथी सेवाके द्वारा कोमल हो जाते हैं, उनकी कठोरता दब जाती है, उसी प्रकार प्राणायाम करनेसे प्राण योगीके वशमें हो जाता है। जैसे हाथीवान मत्तवाले हाथीको भी वशमें करके उसे इच्छानुसार चलाता है, उसी प्रकार योगी वशमें किये हुए प्राणको अपनी इच्छाके अधीन रखता है। जैसे वशमें किया हुआ सिंह केवल मृगोंको ही मारता है, मनुष्योंको नहीं, उसी प्रकार प्राणायामके द्वारा वशमें किया हुआ प्राण केवल पापोंका नाश करता है, मनुष्यके शरीरका नहीं। इसलिये योगी पुरुषको सदा प्राणायाममें संलग्न रहना चाहिये।

राजन्! ध्वस्ति, प्राप्ति, संवित् और प्रसाद—ये मोक्षरूपी फल प्रदान करनेवाली प्राणायामकी चार अवस्थाएँ हैं। अब क्रमशः इनके स्वरूपका वर्णन सुनो। जिस अवस्थामें शुभ और अशुभ सभी कर्मोंका फल क्षीण हो जाय और जिनकी वासना नष्ट हो जाय, उसका नाम 'ध्वस्ति' है। जब योगी इस लोक और परलोकके भोगोंके प्रति लोभ और मोह उत्पन्न करनेवाली समस्त कामनाओंको रोककर सदा अपने-आपमें ही संतुष्ट रहता है, वह निरन्तर रहनेवाली 'प्राप्ति' नामक अवस्था है। जिस समय योगी सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र तथा ग्रहोंके समान प्रभावशाली होकर उत्तम ज्ञान-सम्पत्ति प्राप्त करता है और उस ज्ञान-सम्पत्तिसे भूत-भविष्यकी बातोंको तथा दूर स्थित एवं अदृश्य वस्तुओंको भी जान लेता है, उस समय प्राणायामकी 'संवित्' नामक अवस्था होती है। जिस प्राणायामसे मन, पाँच प्राणवायु, सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंके विषय प्रसादको प्राप्त होते हैं, वह उसकी 'प्रसाद' अवस्था है।

राजन्! अब प्राणायामका लक्षण तथा योगाभ्यासमें निरन्तर प्रवृत्त रहनेवाले योगीके लिये विहित आसन बतलाता हूँ, सुनो। पद्मासन, अर्धासन, स्वस्तिकासन आदि आसनोंसे बैठकर मन ही मन प्रणवका चिन्तन करते हुए योगाभ्यास करे। शरीरको समभावसे रखे, आसन भी सम हो। दोनों पैरोंको समेटकर दोनों जाँघोंको आगेकी ओर स्थिर करे। मुँहको बंद किये रहे। एड़ियोंको इस प्रकार रखे, जिससे वे लिङ्ग और अण्डकोषका स्पर्श न कर सकें। मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए स्थिर रहे। मस्तकको कुछ ऊँच किये रहे। दाँतोंका दाँतोंसे स्पर्श न होने दे। अपनी नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि रखते हुए अन्य दिशाओंकी ओर न देखे। रजोगुणसे तमोगुणको और सत्त्वगुणसे रजोगुणकी वृत्तिको भलीभाँति आच्छादित करके निर्मल सत्त्वमें स्थित हो योगवेत्ता पुरुष योगका अभ्यास करे। इन्द्रिय, प्राण आदि और मनको उनके विषयोंसे हटाकर प्रत्याहार आरम्भ करे। जैसे कछुआ अपने सब अङ्गोंको समेट लेता है, उसी प्रकार जो समस्त कामनाओंको संकुचित कर लेता है, वह निरन्तर आत्मामें ही रमण करनेवाला और एकमात्र परमात्मामें स्थित

१०८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


हुआ पुरुष अपने आत्मामें ही आत्माका साक्षात्कार करता है। विद्वान् पुरुष बाहर-भीतरकी शुद्धिका सम्पादन करके कण्ठसे लेकर नाभितक शरीरको प्राणवायुसे परिपूर्ण करते हुए प्राणायाम आरम्भ करे। प्राणायाम बारह हैं। उन्हींको धारणा भी कहते हैं। तत्त्वदर्शी योगियोंने योगमें दो धारणाएँ बतलायी हैं। उनके अनुसार योगमें प्रवृत्त हुए नियतात्मा योगीके सभी दोष नष्ट हो जाते हैं तथा वह स्वस्थ भी हो जाता है। वह परब्रह्म परमात्माको और प्राकृत गुणोंको पृथक्-पृथक् देखता है, व्योमसे लेकर परमाणुतकका साक्षात्कार करता है तथा निष्पाप आत्माका भी दर्शन कर लेता है। इस प्रकार प्राणायामपरायण एवं मिताहारी योगी पुरुष धीरे-धीरे एक-एक भूमिको वशमें करके दूसरेपर पैर बढ़ाये, जैसे महलमें जाते समय एक-एक सीढ़ीको पार करके दूसरेपर चढ़ा जाता है। जो भूमि अपने वशमें नहीं हुई है, उसमें जानेसे वह दोष, रोग आदि दुःख तथा मोहको बढ़ाती है; अतः उसपर न चढ़े। प्राणवायुके निरोधको प्राणायाम कहते हैं। अपने मनको संयममें रखनेवाले योगी पुरुष शब्दादि विषयोंकी ओर जानेवाली इन्द्रियोंको उनकी ओरसे योगद्वारा प्रत्याहृत-निवृत्त करते हैं, इसलिये वह प्रत्याहार कहलाता है।

योगी महर्षियोंने इस विषयमें ऐसा उपाय भी बताया है, जिससे योगाभ्यासी पुरुषको रोग आदि दोष नहीं होते। जैसे जलार्थी मनुष्य यन्त्र और नली आदिकी सहायतासे धीरे-धीरे जल पीते हैं, उसी प्रकार योगी पुरुष श्रमको जीतकर धीरे-धीरे वायुका पान करे। पहले नाभिमें, फिर हृदयमें, तदनन्तर तीसरे स्थान—वक्षःस्थलमें। उसके बाद क्रमशः कण्ठ, मुख, नासिकाके अग्रभाग, नेत्र, भौंहोंके मध्यभाग तथा मस्तकमें प्राणवायुको धारण करे। उसके बाद परब्रह्म परमात्मामें उसकी धारणा करनी चाहिये। वह सबसे उत्तम धारणा मानी गयी है। इन दसों धारणाओंको प्राप्त होकर योगी अविनाशी ब्रह्मकी सत्ताको प्राप्त होता है।

राजन्! सिद्धिकी इच्छा रखनेवाला योगी पुरुष बड़े आदरके साथ योगमें प्रवृत्त हो। वह अधिक खाये हुए अथवा खाली पेट, थका और व्याकुलचित्त न हो। जब अधिक सर्दी या अधिक गर्मी पड़ती हो, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंकी प्रबलता हो अथवा बड़े जोरकी आँधी चलती हो, ऐसे अवसरोंपर ध्यानपरायण होकर योगका अभ्यास नहीं करना चाहिये। कोलाहलपूर्ण स्थानमें, आग और पानीके समीप, पुरानी गोशालामें, चौराहेपर, सूखे पत्तोंके ढेरपर, नदीमें, श्मशानभूमिमें, जहाँ सर्पोंका निवास हो वहाँ, भयपूर्ण स्थानमें, कुएँके तटपर, मन्दिरमें तथा दीमकोंकी मिट्टीके ढेरपर—इन सब स्थानोंमें तत्त्वज्ञ पुरुष योगाभ्यास न करे। जहाँ सात्त्विकभावकी सिद्धि न हो, ऐसे देश-कालका परित्याग करे। योगमें असत् वस्तुका दर्शन भी निषिद्ध है; अतः उसे भी छोड़ दे। जो मूर्खतावश उक्त स्थानोंकी परवा न करके वहीं योगाभ्यास आरम्भ करता है, उसके कार्यमें विघ्न डालनेके लिये बहरापन, जड़ता, स्मरणशक्तिका नाश, गूँगापन, अंधापन और ज्वर आदि अनेक दोष तत्काल प्रकट होते हैं।

यदि प्रमादवश योगीके सामने ये दोष प्रकट हों तो उनका नाश करनेके लिये जिस चिकित्साकी आवश्यकता है, उसे सुनो। यदि वातरोग, गुल्मरोग, उदावर्त (गुदा-सम्बन्धी रोग) तथा और कोई उदरसम्बन्धी रोग हो जाय तो उसकी शान्तिके लिये घी मिलायी हुई जौकी गरम-गरम लपसी खा ले अथवा केवल उसकी धारणा करे। वह रुकी हुई वायुको निकालती और वायुगोलाको दूर करती है। इसी प्रकार जब शरीरमें कम्प पैदा हो तो मनमें बड़े भारी पर्वतकी धारणा करे। बोलनेमें रुकावट होनेपर वाग्देवीकी और बहरापन आनेपर श्रवणशक्तिकी धारणा करे। इसी प्रकार प्याससे पीड़ित होनेपर ऐसी धारणा करे कि जिह्वापर आमका फल रखा हुआ है और उससे रस मिल

  • योगके विघ्न, उनसे बचनेके उपाय, सात धारणा, आठ ऐश्वर्य तथा योगीकी मुक्ति * १०९

रहा है। तात्पर्य यह कि जिस-जिस अङ्गमें रोग पैदा हो, वहाँ-वहाँ उसमें लाभ पहुँचानेवाली धारणा करे। गर्मीमें सर्दीकी और सर्दीमें गर्मीकी धारणा करे। धारणाके द्वारा ही अपने मस्तकपर काष्ठकी कील रखकर दूसरे काष्ठके द्वारा उसे ठोंकनेकी भावना करे। इससे योगीकी लुप्त हुई स्मरणशक्तिका तत्काल ही आविर्भाव हो जाता है। इसके सिवा सर्वत्र व्यापक द्युलोक, पृथ्वी, वायु और अग्निकी भी धारणा करे। इससे अमानवीय शक्तियों तथा जीव-जन्तुओंसे होनेवाली बाधाओंकी चिकित्सा होती है। यदि कोई मानवेतर जीव योगीके भीतर प्रवेश कर जाय तो वह वायु और अग्निकी धारणा करके उसे अपने शरीरके भीतर ही जला डाले। राजन्! इस प्रकार योगवेत्ता पुरुषको सब प्रकारसे अपनी रक्षा करनी चाहिये। क्योंकि यह शरीर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंका साधक है।

योग-प्रवृत्तिके लक्षणोंको बतलाने तथा उनपर गर्व करनेसे योगीका विज्ञान लुप्त हो जाता है; इसलिये उन प्रवृत्तियोंको गुप्त ही रखना चाहिये। चञ्चलताका न होना, नीरोग रहना, निष्ठुरता न धारण करना, उत्तम सुगन्धका आना, मल-मूत्र कम होना, शरीरमें कान्ति, मनमें प्रसन्नता और वाणीके स्वरमें कोमलताका उदय होना—ये सब योगप्रवृत्तिके प्रारम्भिक चिह्न हैं। यदि योगीको देखकर लोगोंके मनमें अनुराग हो, परोक्षमें सब लोग उसके गुणोंका बखान करने लगें और कोई भी जीव-जन्तु उससे भयभीत न हो तो वह योगमें सिद्धि प्राप्त होनेकी उत्तम पहचान है। जिसे अत्यन्त भयानक सर्दी-गर्मी आदिसे कोई कष्ट नहीं होता तथा जो दूसरोंसे भयभीत नहीं होता, सिद्धि उसके निकट खड़ी है।


योगके विघ्न, उनसे बचनेके उपाय, सात धारणा, आठ ऐश्वर्य तथा योगीकी मुक्ति

दत्तात्रेयजी कहते हैं—आत्मसाक्षात्कारके समय योगी पुरुषके समक्ष जो विघ्न उपस्थित होते हैं, उनका संक्षेपसे वर्णन करता हूँ; सुनो। उस समय वह सकाम कर्म करना चाहता है और मानवीय भोगोंकी अभिलाषा करता है। दानके उत्तमोत्तम फल, स्त्री, विद्या, माया, सोना-चाँदी आदि धन, याने आदिके अतिरिक्त वैभव, स्वर्गलोक, देवत्व, इन्द्रत्व, रसायनसंग्रह, उसे बनानेकी क्रियाएँ, हवामें उड़नेकी शक्ति, यज्ञ, जल और अग्निमें प्रवेश करना, श्राद्धों तथा समस्त दानोंका फल तथा नियम, व्रत, इष्ट, पूर्त एवं देव-पूजा आदिसे मिलनेवाले फलोंकी इच्छा करता है। जब चित्तकी ऐसी अवस्था हो तो योगी उसे कामनाओंकी ओरसे हटाये और परब्रह्मके चिन्तनमें लगाये। ऐसा करनेपर उसे विघ्नोंसे छुटकारा मिल जाता है।

इन विघ्नोंपर विजय पा लेनेके बाद योगीके सामने फिर दूसरे-दूसरे सात्त्विक, राजस और तामस विघ्न उपस्थित होते हैं। प्रतिभा, श्रावण, दैव, भ्रम और आवर्त—ये पाँच उपसर्ग योगियोंके योगमें विघ्न डालनेके लिये प्रकट होते हैं। इनका परिणाम बड़ा कटु होता है। जब सम्पूर्ण वेदोंके अर्थ, काव्य और शास्त्रोंके अर्थ, सम्पूर्ण विद्याएँ और शिल्पकला आदि अपने-आप योगीकी समझमें आ जायें तो प्रतिभासे सम्बन्ध रखनेके कारण वह 'प्रतिभ' उपसर्ग कहलाता है। जब योगी सहस्रों योजन दूरसे भी सम्पूर्ण शब्दोंको सुनने और उनके अभिप्रायको समझने लगता है, तब वह श्रवण-शक्तिसे सम्बन्ध रखनेके कारण 'श्रावण'

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  • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

उपसर्ग कहा जाता है। जब वह देवताओंकी भाँति आठों दिशाओंकी वस्तुओंको प्रत्यक्ष देखने लगता है, तब उसे 'दैव' उपसर्ग कहते हैं। जब योगीका मन दोषके कारण सब प्रकारके आचारोंसे भ्रष्ट हो निराधार भटकने लगता है, तब वह 'भ्रम' कहलाता है। जलमें उठती हुई भँवरकी तरह जब ज्ञानका आवर्त्त सब ओर व्याप्त होकर चित्तको नष्ट कर देता है, तब वह 'आवर्त' नामक उपसर्ग कहा जाता है। इन महाघोर उपसर्गोंसे योगका नाश हो जानेके कारण सम्पूर्ण योगी देवतुल्य होकर भी बारंबार आवागमनके चक्रमें घूमते हैं। इसलिये योगी पुरुष शुद्ध मनोमय उज्ज्वल केवल ओङ्कार परब्रह्म परमात्मामें मनको लगाकर सदा उन्हींका चिन्तन करे।

पृथ्वी आदि सात प्रकारकी सूक्ष्म धारणाएँ हैं, जिन्हें योगी मस्तकमें धारण करे। सबसे पहले पृथ्वीकी धारणा है। उसे धारण करनेसे योगीको सुख प्राप्त होता है। वह अपनेको साक्षात् पृथ्वी मानता है, अतः पार्थिव विषय गन्धका त्याग कर देता है। इसी प्रकार वह जलकी धारणासे सूक्ष्म रसका, तेजकी धारणासे सूक्ष्म रूपका, वायुकी धारणासे स्पर्शका तथा आकाशकी धारणासे सूक्ष्म प्रवृत्ति तथा शब्दका त्याग करता है। जब अपने मनसे धारणाके द्वारा सम्पूर्ण भूतोंके मनमें प्रवेश करता है, तब उस मानसी धारणाको धारण करनेके कारण उसका मन अत्यन्त सूक्ष्म हो जाता है। इसी प्रकार योगवेत्ता पुरुष सम्पूर्ण जीवोंकी बुद्धिमें प्रवेश करके परम उत्तम सूक्ष्म बुद्धिको प्राप्त करता और फिर उसे त्याग देता है। अलर्क! जो योगी इन सातों सूक्ष्म धारणाओंका अनुभव करके उन्हें त्याग देता है, उसको इस संसारमें फिर नहीं आना पड़ता। जितात्मा पुरुष क्रमशः इन सातों धारणाओंके सूक्ष्म रूपको देखे और त्याग करता जाय। ऐसा करनेसे वह परम सिद्धिको प्राप्त होता है। राजन्! योगी पुरुष जिस-जिस भूतमें राग करता है, उसी-उसीमें आसक्त होकर नष्ट हो जाता है। इसलिये इन समस्त सूक्ष्म भूतोंको परस्पर संसक्त जानकर जो इन्हें त्याग देता है, उसे परमपदकी प्राप्ति होती है। पाँचों भूत और मन-बुद्धिके इन सातों सूक्ष्म रूपोंका विचार कर लेनेपर उनके प्रति वैराग्य होता है, जो सद्भावका ज्ञान रखनेवाले पुरुषकी मुक्तिका कारण बनता है। जो गन्ध आदि विषयोंमें आसक्त होता है, उसका विनाश हो जाता है और उसे बारंबार संसारमें जन्म लेना पड़ता है। योगी पुरुष इन सातों धारणाओंको जीत लेनेके बाद यदि चाहे तो किसी भी सूक्ष्म भूतमें लीन हो सकता है। देवता, असुर, गन्धर्व, नाग और राक्षसोंके शरीरमें भी वह लीन हो जाता है, किन्तु कहीं भी आसक्त नहीं होता।

अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व और कामावसायित्व—इन आठ ईश्वरीय गुणोंको जो निर्वाणकी सूचना देनेवाले हैं, योगी प्राप्त करता है। सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म रूप धारण करना 'अणिमा' है और शीघ्र-से-शीघ्र कोई काम कर लेना 'लघिमा' नामक गुण है। सबके लिये पूजनीय हो जाना 'महिमा' कहलाता है। जब कोई भी वस्तु अप्राप्य न रहे तो वह 'प्राप्ति' नामक सिद्धि है। सर्वत्र व्यापक होनेसे योगीको 'प्राकाम्य' नामक सिद्धिकी प्राप्ति मानी जाती है। जब वह सब कुछ करनेमें समर्थ—ईश्वर हो जाता है तो उसकी वह सिद्धि 'ईशित्व' कहलाती है। सबको वशमें कर लेनेसे 'वशित्व' की सिद्धि होती है। यह योगीका सातवाँ गुण है। जिसके द्वारा इच्छाके अनुसार कहीं भी रहना आदि सब काम हो सके, उसका नाम 'कामावसायित्व' है। ये ऐश्वर्यके साधनभूत आठ गुण हैं।

मुक्त होनेसे उसका कभी जन्म नहीं होता। वह वृद्धि और नाशको भी नहीं प्राप्त होता। न तो

  • योगचर्या, प्रणवकी महिमा तथा अरिष्टोंका वर्णन और उनसे सावधान होना * | १९१ ---|---

उसका क्षय होता है और न परिणाम। पृथ्वी आदि भूतसमुदायसे न तो वह काटा जाता है, न भीगकर गलता है, न जलता है और न सूखता ही है। शब्द आदि विषय भी उसको लुभा नहीं सकते। उसके लिये शब्द आदि विषय हैं ही नहीं। न तो वह उनका भोक्ता है और न उनसे उसका संयोग होता है। जैसे अन्य खोटे द्रव्योंसे मिला और खण्ड-खण्ड हुआ सुवर्ण जब आगमें तपाया जाता है, तब उसका दोष जल जाता है और वह शुद्ध होकर अपने दूसरे टुकड़ोंसे मिलकर एक हो जाता है, उसी प्रकार बलशील योगी जब योगाग्निसे तपता है, तब अन्तःकरणके समस्त दोष जल जानेके कारण ब्रह्मके साथ एकताको प्राप्त हो जाता है। फिर वह किसीसे पृथक् नहीं रहता। जैसे आगमें डाली हुई आग उसमें मिलकर एक हो जाती है, उसका वही नाम और वही स्वरूप हो जाता है, फिर उसको विशेष रूपसे पृथक् नहीं किया जा सकता, उसी तरह जिसके पाप दग्ध हो गये हैं, वह योगी परब्रह्मके साथ एकताको प्राप्त होनेपर फिर कभी उनसे पृथक् नहीं होता। जैसे जलमें डाला हुआ जल उसके साथ मिलकर एक हो जाता है, उसी प्रकार योगीका आत्मा परमात्मामें मिलकर तदाकार हो जाता है।


योगचर्या, प्रणवकी महिमा तथा अरिष्टोंका वर्णन और उनसे सावधान होना

अलर्क बोले— भगवन्! अब मैं योगीके आचार-व्यवहारका यथार्थ वर्णन सुनना चाहता हूँ। वह किस प्रकार ब्रह्मके मार्गका अनुसरण करके कभी क्लेशमें नहीं पड़ता?

दत्तात्रेयजीने कहा— राजन्! ये जो मान और अपमान हैं, ये साधारण मनुष्योंको प्रसन्नता और उद्वेग देनेवाले होते हैं। उन्हें मानसे प्रसन्नता और अपमानसे उद्वेग होता है; किन्तु योगी उन दोनोंको ही ठीक उलटे अर्थमें ग्रहण करता है। अतः वे उसकी सिद्धिमें सहायक होते हैं। योगके लिये मान और अपमानको विष एवं अमृतके रूपमें बताया गया है। इनमें अपमान तो अमृत है और मान भयंकर विष। योगी मार्गको भलीभाँति देखकर पैर रखे। वस्त्रसे छानकर जल पीये, सत्य वचन बोले और बुद्धिसे विचार करके जो ठीक जान पड़े, उसीका चिन्तन करे।* योगवेत्ता पुरुष आतिथ्य, श्राद्ध, यज्ञ, देवयात्रा तथा उत्सवोंमें न जाय। कार्यकी सिद्धिके लिये किसी बड़े आदमीके यहाँ भी कभी न जाय। जब गृहस्थके यहाँ रसोई घरसे धुआँ न निकलता हो, आग बुझ गयी हो और घरके सब लोग खा-पी चुके हों, उस समय योगी भिक्षाके लिये जाय; परन्तु प्रतिदिन एक ही घरपर न जाय। योगमें प्रवृत्त रहनेवाला पुरुष सत्पुरुषोंके मार्गको कलङ्कित न करते हुए प्रायः ऐसा व्यवहार करे, जिससे लोग उसका सम्मान न करें, तिरस्कार ही करें। वह गृहस्थोंके यहाँसे अथवा घूमते-फिरते रहनेवाले लोगोंके घरोंसे भिक्षा ग्रहण करे; इनमें भी पहली अर्थात् गृहस्थके घरकी भिक्षा ही सर्वश्रेष्ठ एवं मुख्य है। जो गृहस्थ विनीत, श्रद्धालु, जितेन्द्रिय, श्रोत्रिय एवं उदार हृदयवाले हों, उन्हींके यहाँ योगीको सदा भिक्षाके लिये जाना चाहिये। इनके बाद जो दुष्ट और पतित न हों, ऐसे अन्य लोगोंके


* मानापमानौ बालेतौ प्रीत्युद्वेगकरौ नृणाम्। तावेव विपरीतार्थौ योगिनः सिद्धिकारकौ॥
मानापमानौ यावेतौ तयोरेतद्विचिन्तयेत्। अपमानोऽमृतं तत्र मानस्तु विषमं विषम्॥
चक्षुःपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्। सत्यपूतां वदेद्वाणीं बुद्धिपूतं च चिन्तयेत्॥ (४१ । २—४)

१९२ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •

यहाँ भी वह भिक्षाके लिये जा सकता है; परन्तु छोटे वर्णके लोगोंके यहाँ भिक्षा माँगना निकृष्ट वृत्ति मानी गयी है। योगीके लिये भिक्षाप्राप्त अन्न, जौकी लपसी, छाछ, दूध, जौकी खिचड़ी, फल, मूल, कँगनी, कण, तिलका चूर्ण और सत्तू—ये आहार उत्तम और सिद्धिदायक हैं। अतः योगी इन्हें भक्तिपूर्वक एकाग्रचित्तसे भोजनके काममें ले। पहले एक बार जलसे आचमन करके मौन हो क्रमशः पाँच ग्रासोंकी प्राणरूप अग्निमें आहुति दे। 'प्राणाय स्वाहा' कहकर पहला ग्रास मुँहमें डाले। यही प्रथम आहुति मानी गयी है। इसी प्रकार 'अपानय स्वाहा' से दूसरी, 'समानाय स्वाहा' से तीसरी, 'उदानाय स्वाहा' से चौथी और 'व्यानाय स्वाहा' से पाँचवीं आहुति दे। फिर प्राणायामके द्वारा इन्हें पृथक् करके शेष अन्न इच्छानुसार भोजन करे। भोजनके अन्तमें फिर एक बार आचमन करे। तत्पश्चात् हाथ-मुँह धोकर हृदयका स्पर्श करे। चोरी न करना, ब्रह्मचर्यका पालन, त्याग, लोभका अभाव और अहिंसा—ये भिक्षुओंके पाँच व्रत हैं। क्रोधका अभाव, गुरुकी सेवा, पवित्रता, हल्का भोजन और प्रतिदिन स्वाध्याय—ये पाँच उनके नियम बताये गये हैं।*

जो योगी 'यह जानने योग्य है, वह जानने योग्य है' इस प्रकार भिन्न-भिन्न विषयोंकी जानकारीके लिये लालायित-सा होकर इधर-उधर बिचरता है, वह हजारों कल्पोंमें भी ज्ञातव्य वस्तुको नहीं पा सकता। आसक्तिका त्याग करके, क्रोधको जीतकर, स्वल्पाहारी और जितेन्द्रिय हो, बुद्धिसे इन्द्रियद्वारोंको रोककर मनको ध्यानमें लगावे। योगयुक्त रहनेवाला योगी सदा एकान्त स्थानोंमें, गुफाओं और वनोंमें भलीभाँति ध्यान करे। वाग्दण्ड, कर्मदण्ड और मनोदण्ड—ये तीन दण्ड जिसके अधीन हों, वही महायति त्रिदण्डी है। राजन्! जिसकी दृष्टिमें सत्-असत् तथा गुण-अवगुणरूप यह समस्त जगत् आत्मस्वरूप हो गया है, उस योगीके लिये कौन प्रिय है और कौन अप्रिय। जिसकी बुद्धि शुद्ध है, जो मिट्टीके ढेले और सुवर्णको समान समझता है, सब प्राणियोंके प्रति जिसका समान भाव है, वह एकाग्रचित्त योगी उस सनातन अविनाशी परम पदको प्राप्त होकर फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। वेदोंसे सम्पूर्ण यज्ञकर्म श्रेष्ठ हैं, यज्ञोंसे जप, जपसे ज्ञानमार्ग और उससे आसक्ति एवं रागसे रहित ध्यान श्रेष्ठ है। ऐसे ध्यानके प्राप्त हो जानेपर सनातन ब्रह्मकी उपलब्धि होती है। जो एकाग्रचित्त, ब्रह्मपरायण, प्रमादरहित, पवित्र, एकान्तप्रेमी और जितेन्द्रिय होता है, वही महात्मा इस योगको पाता है और फिर अपने उस योगसे ही वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है।†


* अस्तेयं ब्रह्मचर्यं च त्यागोऽलोभस्तथैव च। व्रतानि पञ्च भिक्षूणामहिंसापरमाणि वै॥
अक्रोधो गुरुशुश्रूषा शौचमाहारलाघवम्। नित्यस्वाध्याय इत्येते नियमाः पञ्च कीर्त्तिताः॥
(४१। १६-१७)

† त्यक्तसङ्गो जितक्रोधो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः। विधाय बुद्ध्या द्वाराणि मनो ध्याने निवेशयेत्॥
शून्येष्वेवावकाशेषु गुहासु च वनेषु च। नित्ययुक्तः सदा योगी ध्यानं सम्युगुपक्रमेत्॥
वाग्दण्डः कर्मदण्डश्च मनोदण्डश्च ते त्रयः। यस्यैते नियता दण्डाः स त्रिदण्डी महायतिः॥
सर्वमात्ममयं यस्य सदसज्जगदीदृशम्। गुणगुण्यमयं तस्य कः प्रियः को नृपाप्रियः॥
विशुद्धबुद्धिः समलोष्टकाञ्चनः समन्तभूतेषु समः समाहितः।
स्थानं परं शाश्वतमव्ययं च परं हि गत्वा न पुनः प्रजायते॥
वेदाच्छ्रेष्ठाः सर्वयज्ञक्रियाश्च यज्ञाज्जप्यं ज्ञानमार्गाश्च ध्यानात्।
ज्ञानाद्ध्यानं सङ्गरागव्यपेतं तस्मिन् प्राप्ते शाश्वतस्योपलब्धिः॥
समाहितो ब्रह्मपरोऽप्रमादी शुचिस्तथैकान्तगतिर्यतेन्द्रियः।
समाप्नुयाद् योगमिमं महात्मा विमुक्तिमाप्नोति ततः स्वयोगतः॥ (४१। २०-२६)

  • योगचर्या, प्रणवकी महिमा तथा अरिष्टोंका वर्णन और उनसे सावधान होना * ११३

दत्तात्रेयजी कहते हैं—जो योगी इस प्रकार भलीभाँति योगचर्यामें स्थित होते हैं, उन्हें सैकड़ों जन्मोंमें भी अपने पथसे विचलित नहीं किया जा सकता। जिनके सब ओर चरण, मस्तक और कण्ठ हैं, जो इस विश्वके स्वामी तथा विश्वको उत्पन्न करनेवाले हैं, उन विश्वरूपी परमात्माका प्रत्यक्ष दर्शन करके उनकी प्राप्तिके लिये परम पुण्यमय 'ॐ' इस एकाक्षर मन्त्रका जप करे; उसीका अध्ययन करे। अब उसके स्वरूपका वर्णन सुनो। अकार, उकार और मकार—ये जो तीन अक्षर हैं, ये ही तीन मात्राएँ हैं। ये क्रमशः सात्त्विक, राजस और तामस हैं। इनके सिवा एक अर्द्धमात्रा भी है जो अनुस्वार या बिन्दुके रूपमें इन सबके ऊपर स्थित है। वह अर्द्धमात्रा निर्गुण है। योगी पुरुषोंको ही उसका ज्ञान हो पाता है। उसका उच्चारण गान्धार स्वरसे होता है, इसलिये उसे 'गान्धारी' भी कहते हैं। उसका स्पर्श चींटीकी गतिके समान होता है। प्रयोग करनेपर वह मस्तक-स्थानमें दृष्टिगोचर होती है। जैसे ॐकार उच्चारण किया जानेपर मस्तकके प्रति गमन करता है, उसी प्रकार ॐकारमय योगी अक्षरब्रह्ममें मिलकर अक्षररूप हो जाता है। प्रणव (ॐकार) धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म वेधनेयोग्य उत्तम लक्ष्य है। उस लक्ष्यको सावधानीके साथ वेधना चाहिये और बाणकी ही भाँति लक्ष्यमें प्रवेश करके तन्मय हो जाना चाहिये। यह ॐकार ही तीनों वेद, तीनों लोक, तीनों अग्नि, ब्रह्मा विष्णु तथा महादेव एवं ऋक्-साम और यजुर्वेद है। इस ॐकारमें वस्तुतः साढ़े तीन मात्राएँ जाननी चाहिये। उनके चिन्तनमें लगा हुआ योगी उन्हींमें लयको प्राप्त होता है। अकार भूर्लोक, उकार भुवर्लोक और व्यञ्जनरूप मकार स्वर्लोक कहलाता है। पहली मात्रा व्यक्त, दूसरी अव्यक्त, तीसरी चिच्छक्ति तथा चौथी अर्द्धमात्रा परमपद कहलाती है। इसी क्रमसे इन मात्राओंको योगकी भूमि समझना चाहिये। ॐकारके उच्चारणसे सम्पूर्ण सत् और असत्‌का ग्रहण हो जाता है। पहली मात्रा ह्रस्व, दूसरी दीर्घ और तीसरी प्लुत है, किन्तु अर्द्धमात्रा वाणीका विषय नहीं है। इस प्रकार यह ॐकार नामक अक्षर परब्रह्मस्वरूप है। जो मनुष्य इसे भलीभाँति जानता अथवा इसका ध्यान करता है, वह संसार-चक्रका त्याग करके त्रिविध बन्धनोंसे मुक्त हो परब्रह्म परमात्मामें लीन हो जाता है।* जिसका


* तन्प्राप्तये महत् पुण्यामोमित्येकाक्षरं जपेत्। तदेवाध्ययनं तस्य स्वरूपं शृण्वतः परम्॥
अकारश्च तथोकारो मकारश्चाक्षरत्रयम्। एता एव त्रयो मात्राः सात्त्वराजसतामसाः॥
निर्गुणा योगिगम्यान्त्या चार्द्धमात्रोर्ध्वसंस्थिता।
गान्धारीति च विज्ञेया गान्धारस्वरसंश्रया। पिपीलिकागतिस्पर्शा प्रयुक्ता मूर्ध्नि लक्ष्यते॥
यथा प्रयुक्त ओङ्कारः प्रतियातीति मूर्द्धनि। तथोङ्कारमयी योगी त्वक्षरे त्वक्षरो भवेत्॥
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुत्तमम्। अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत्॥
ओमितिह्येतत् त्रयो वेदास्त्रयो लोकास्त्रयोऽग्नयः। विष्णुर्ब्रह्मा हरश्चैव ऋक्सामानि यजूंषि च॥
मात्राः सार्द्धाश्च तिस्रश्च विज्ञेयाः परमार्थतः। तत्र युक्तस्तु यो योगी स तल्लयमवाप्नुयात्॥
अकारस्त्वथ भूर्लोक उकारश्चोच्यते भुवः। सव्यञ्जने मकारश्च स्वर्लोकः परिकल्प्यते।
व्यक्ता तु प्रथमा मात्रा द्वितीयाव्यक्तसंज्ञिता। मात्रा तृतीया चिच्छक्तिरर्द्धमात्रा परं पदम्॥
अनेनैव क्रमेणैता विज्ञेया योगभूमयः। ओमित्युच्चारणात् सर्वं गृहीतं सदसद्द्वयम्॥
ह्रस्वा तु प्रथमा मात्रा द्वितीया दीर्घसंयुक्ता। तृतीया च प्लुता ज्ञेया वचसः सा न गोचरा॥
इत्येतदक्षरं ब्रह्म परमोङ्कारसंज्ञितम्। यस्तु वेद नरः सम्यक् तथा ध्यायति वा पुनः॥
संसारचक्रमुत्सृज्य त्यक्तत्रिविधबन्धनः। प्राप्नोति ब्रह्मणि लयं परमे परमात्मनि॥
(४२ ३—१५)

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  • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

कर्मबन्धन क्षीण नहीं हुआ है, वह अरिष्टसे अपनी मृत्यु जानकर प्राणत्यागके समय भी योगका चिन्तन करे। इससे वह दूसरे जन्ममें पुनः योगी होता है। इसलिये जिसका योग सिद्ध नहीं हुआ है, वह तथा जिसका योग सिद्ध हो चुका है, वह भी सदा मृत्युसूचक अरिष्टोंको जाने, जिससे मृत्युके समय उसे कष्ट न उठाना पड़े।

महाराज! अब अरिष्टोंका वर्णन सुनो। मैं उन अरिष्टोंको बतलाता हूँ, जिनके देखनेसे योगवेत्ता पुरुष अपनी मृत्युको जान लेता है। जो मनुष्य देवमार्ग (आकाशगङ्गा), ध्रुव, शुक्र, चन्द्रमाकी छाया और अरुन्धतीको नहीं देख पाता, वह एक वर्षके बाद जीवित नहीं रहता। जो सूर्यके मण्डलको किरणोंसे रहित और अग्निको किरणमालाओंसे मण्डित देखता है, वह मनुष्य ग्यारह महीनेसे अधिक नहीं जी सकता। जो स्वप्नमें वमन, मूत्र और विष्ठाके भीतर सोने और चाँदीका प्रत्यक्ष दर्शन करता है, उसकी आयु दस महीनेतककी ही है। जो प्रेत, पिशाच आदि, गन्धर्वनगर तथा सुवर्णके वृक्ष देखने लगता है, वह नौ महीनेतक जीवित रहता है। जो अकस्मात् स्थूल शरीरसे दुर्बल शरीरका हो जाता है या दुर्बलसे स्थूल हो जाता है तथा जिसकी प्रकृति सहसा बदल जाती है, उसका जीवन आठ महीनेतक ही रहता है। धूल या कीचड़में पैर रखनेपर जिसकी एड़ी या पादाग्रभागका चिह्न खण्डित दिखायी दे, वह सात मासतक जीवित रहता है। यदि गीध, कबूतर, डाभ्र, कौआ, मांसखोर पक्षी या नीले रंगका पक्षी मस्तकपर बैठ जाय तो वह छः मास आयु शेष रहनेकी सूचना देता है। यदि कौए आकर चोंच मारें या धूलकी वर्षासे आहत होना पड़े तथा अपनी छाया और तरहकी दिखायी दे तो वह चार पाँच महीने ही जीवित रहता है। यदि बिना बादलके ही दक्षिण दिशाके आकाशमें बिजली चमकती दिखायी दे और रातमें इन्द्रधनुषका दर्शन हो तो उस मनुष्यका जीवन दो तीन महीनेका ही है। जो घी, तेल, दर्पण अथवा जलमें अपनी परछाईं न देख सके अथवा देखे भी तो बेसिरकी ही परछाईं दिखायी दे तो वह एक महीनेसे अधिक नहीं जी सकता। राजन्! जिस योगीके शरीरसे बकरे अथवा मुर्देकी-सी दुर्गन्ध आती हो, उसका जीवन पंद्रह दिनोंका ही समझना चाहिये। स्नान करते ही जिसकी छाती और पैर सूख जायें तथा जल पीनेपर भी कण्ठ सूखने लगे, वह केवल दस दिनतक ही जीवित रह सकता है। जिसके भीतरकी वायु पृथक् होकर मर्मस्थानोंको छेदती-सी जान पड़े तथा जलके स्पर्शसे भी जिसके शरीरमें रोमाञ्च न हो, उसकी मृत्यु पास खड़ी है। जो स्वप्नमें भालू और वानरकी सवारीपर बैठकर गीत गाता हुआ दक्षिण दिशामें जाय, उसकी मृत्यु समयकी प्रतीक्षा नहीं करती। स्वप्नमें ही लाल और काले कपड़े पहने हुए कोई स्त्री हँसती-गाती हुई जिसे दक्षिण दिशाकी ओर ले जाय, वह भी जीवित नहीं रहता। यदि स्वप्नमें नंगा एवं मूँड़ मुँड़ाया हुआ कोई महाबली मनुष्य हँसता और उछलता कूदता दिखायी दे तो समझना चाहिये कि मौत आ गयी। जो स्वप्नावस्थामें अपनेको पैरसे लेकर चोटीतक कीचड़के समुद्रमें डूबा देखता है, वह मनुष्य तत्काल मृत्युको प्राप्त होता है। जो स्वप्नमें केश, अँगार, भस्म, सर्प और बिना पानीकी नदी देखता है, उसकी दसवेंसे लेकर ग्यारहवें दिनतक मृत्यु हो जाती है। स्वप्नमें विकराल, भयंकर और काले रंगके पुरुष हाथोंमें हथियार लिये जिसको पत्थरोंसे मारते हैं, उसकी तत्काल मृत्यु हो जाती है। सूर्योदयके समय जिसके

  • योगचर्या, प्रणवकी महिमा तथा अरिष्टोंका वर्णन और उनसे सावधान होना * ११५

सम्मुख और बायें-दायें गीदड़ी रोती हुई जाय, उसकी तत्काल मृत्यु हो जाती है। भोजन कर लेनेपर भी जिसके हृदयमें भूखका कष्ट होता हो तथा जो दाँतोंसे दाँत घिसता रहे, उसकी आयु भी निश्चय ही समाप्त हो चुकी है। जिसको दीपककी गन्धका अनुभव न होता हो, जो रात और दिनमें भी डरता हो तथा दूसरेके नेत्रमें अपनी परछाईं न देखता हो, वह जीवित नहीं रहता। जो आधी रातके समय इन्द्रधनुष और दिनमें तारोंको देख ले, वह आत्मवेत्ता पुरुष अपनी आयु क्षीण हुई समझे। जिसकी नाक टेढ़ी और कान ऊँचे-नीचे हो जाते हैं तथा जिसके बायें नेत्रसे सदा पानी गिरता रहता है, उसकी आयु समाप्त हो चुकी है। यदि मुँह सब ओरसे लाल और जीभ काली पड़ जाय तो बुद्धिमान् पुरुषको अपनी मृत्यु निकट समझनी चाहिये। जो स्वप्नमें ऊँट या गदहेपर बैठकर दक्षिण दिशाकी ओर जाय, उसको तत्काल मृत्यु होनेवाली है—ऐसा जानना चाहिये। जो अपने दोनों कान बंद कर लेनेपर अपनी ही आवाज न सुने तथा जिसके नेत्रोंकी ज्योति नष्ट हो जाय, वह भी जीवित नहीं रह सकता। जो स्वप्नमें किसी गढ्ढेके भीतर गिरे और उससे निकलनेका द्वार बंद हो जाय तथा फिर वह उस गढ्ढेसे न निकल सके तो वहींतक उसका जीवन समझना चाहिये। जिसकी दृष्टि ऊपरकी ओर उठे किन्तु वहाँ ठहर न सके, बार-बार लाल होकर घूमती रहे, मुँह गरम हो और नाभि शीतल हो जाय तो ये लक्षण मनुष्यके शरीर-परिवर्तनकी सूचना देते हैं। जो स्वप्नमें अग्नि या जलके भीतर प्रवेश करके फिर न निकले, उसके जीवनका वही अन्त है। जिसको दुष्ट जीव रातमें और दिनमें भी मारें, वह सात रातके भीतर निश्चय ही मृत्युको प्राप्त हो जाता है। जो अपने निर्मल श्वेतवस्त्रको भी लाल या काले रंगका देखे, उसकी भी मृत्यु निकट समझनी चाहिये। स्वभावका विपरीत होना और प्रकृतिका बिल्कुल बदल जाना भी मृत्युके निकट होनेकी सूचना देते हैं।<br><br>जिसका काल निकट आ गया है, वह मनुष्य जिनके सामने सदा विनीत रहता था, जो लोग उसके परम पूजनीय थे, उन्हींकी अवहेलना और निन्दा करता है। वह देवताओंकी पूजा नहीं करता। बड़े-बूढ़ों, गुरुजनों तथा ब्राह्मणोंकी निन्दा करता है, माता-पिता तथा दामादका सत्कार नहीं करता। इतना ही नहीं, वह योगियों, ज्ञानी विद्वानों तथा अन्य महात्मा पुरुषोंके आदर-सत्कारसे भी मुँह मोड़ लेता है। बुद्धिमान् पुरुषोंको मृत्युके इन लक्षणोंकी जानकारी रखनी चाहिये। राजन्! योगी पुरुषोंको उचित है कि वे सदा यत्नपूर्वक इन अरिष्टोंपर दृष्टि रखें; क्योंकि ये वर्षके अन्तमें तथा दिन-रातके भीतर भी फल देनेवाले होते हैं। राजन्! इनके विशद फलोंको भलीभाँति देखना चाहिये और मन-ही-मन विचार करके उस समयके अनुसार कार्य करना चाहिये। मृत्युकालको जान लेनेपर योगी किसी निर्भय स्थानमें बैठकर योगाभ्यासमें प्रवृत्त हो जाय, जिससे उसका वह समय निष्फल न जाने पावे। अरिष्ट देखकर योगी मृत्युका भय छोड़ दे और उसके स्वभावका विचार करके जितने समयमें वह आनेवाली हो, उतने समयके प्रत्येक भागमें योगी योग-साधनमें लगा रहे। दिनके पूर्वाह्न, मध्याह्न तथा अपराह्नमें अथवा रात्रिके जिस भागमें अरिष्टका दर्शन हो, तभीसे लेकर जबतक मृत्यु न आवे तबतक योगमें लगा रहे। तदनन्तर सारा भय छोड़कर जितात्मा पुरुष उस कालपर विजय प्राप्त करके उसी स्थानपर या और कहीं—जहाँ भी अपना चित्त स्थिर हो सके, योगमें संलग्न हो जाय और तीनों गुणोंको जीतकर परमात्मामें तन्मय हो