भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पाश्चात्त्य राजनीति ८७

पड़ता है । फिर तो भोजनमें भी विषकी कल्पना होने लगती है । कई लोग बालकी खाल ही खींचते रहते हैं । वे अपने और दूसरोंका समय व्यर्थ ही अपव्यय करते रहते हैं । कितने ही जिद्दियोंको तर्क करनेकी स्वाधीनता देनेपर तत्त्व-निर्णय न होकर विवाद ही बढ़ता है । चरित्रोंकी भिन्नता एवं झक्कियोंकी वृद्धि समाजकी प्रगतिका लक्षण नहीं; किंतु निश्चित एवं उपयोगी गुणोंकी समृद्धि ही प्रगतिका लक्षण है । भिन्नताकी अपेक्षा गुणात्मक समृद्धिपर ही जोर देना आवश्यक है । योग्य वातावरण, उच्चकोटिकी शिक्षा एवं सदाचारके द्वारा ही उच्चकोटिका चारित्रिक संघटन होता है और यही राष्ट्रकी प्रगति है । झक्कियोंकी स्वतन्त्रतासे चरित्रमें भिन्नता भले ही आ जाय, परंतु चारित्रिक उच्चतामें कोई सहायता न मिलेगी । इसी प्रकार भले राजकीय नियम कम-से कम हों, परंतु धार्मिक, सामाजिक नियमोंद्वारा सदा ही व्यक्तियोंको उच्छृङ्खल जीवनसे बचाना अनिवार्य है । अवश्य ही रामराज्यकी दृष्टिसे सभी सम्पत्तियों एवं कार्योंका सरकारीकरण अनुचित है । तथापि विशिष्ट शिष्टों एवं शास्त्रोंका मार्ग-दर्शन समाजकी प्रगतिमे सदा ही सहायक होता है । प्रगतिके बाधक तत्त्वोंका निराकरण राज्यका अवश्य कर्तव्य है । विकास- वादियो एवं आधुनिक विचारकोंका सबसे बड़ा दोष यह है कि वे पूर्व-पूर्वके निर्णयों एवं सत्योंको निम्नस्तरका तथा उत्तरोत्तर निर्णयों एवं सत्योंको उच्चकोटिका मानते हैं । इसीलिये वे सदा ही निश्चित विषयमे भी खोजते रहते हैं । वे इसी दृष्टिसे झक्कियोंसे भी नवीन ज्ञानकी आशा रखते हैं और नयी-नयी व्यवस्थाओंकी खोजमें लगे रहते हैं । परंतु प्रमाणद्वारा प्रमित तत्त्व किसी भी कालान्तर या देशान्तर- में अन्यथा नहीं हो सकते । इस दृष्टिसे अपौरुषेय वेदों, तदनुसारी आर्ष ग्रन्थों तथा सर्वज्ञकल्प महर्षियों, राजर्षियोंने अपने ऋतम्भरा प्रज्ञा एवं सफल प्रयोगोंद्वारा . जिन नियमो, व्यवस्थाओंको समाजके लिये लाभदायक समझा, वे त्रिकालाबाध्य सत्य एवं उपयोगी हैं । उनका अनुसरण करना समाज एवं तद्घटक व्यक्तियोंका कर्तव्य है । शास्त्र एवं समाज स्थिर वस्तु है । उनका धार्मिक, सास्कृत स्वरूप एवं सभ्यता स्थिर वस्तु है और राज्यलक्ष्मी अस्थिर वस्तु । विशेषतया राज्यसत्ताको हथियानेके लिये सभी लोग प्रयत्नशील होते हैं । जिस ढगकी विचारधारावालोंका बहुमत होता है, उन्हींका शासन होता है । फलतः वे शासन, शिक्षा, सम्पत्ति, धर्म सभीको अपने हाथमे लेना चाहते हैं । कहना न होगा कि उक्त तीनो विषयोंमें सरकारी हस्तक्षेप होनेसे समाजकी संस्कृति, सभ्यता एवं धर्ममें सर्वथा रद्दोबदल हो जाता है, फिर समाजकी स्थिरता भी नष्ट हो जाती है । यह भी नहीं कहा जा सकता कि 'अच्छे ही लोगोंके हाथमे शासन सत्ता जाती है ।' अनुभव तो यह है कि शान्तिप्रिय विचारक, गम्भीर विद्वान्, जाल-फरेब न करनेवाले पीछे रह