मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८ मार्क्सवाद और रामराज्य जाते हैं। जाल-फरेबवाले अयोग्य लोग आगे आ जाते हैं । ऐसी स्थितिमें विभिन्न शासनोंके बदलनेके साथ यदि सभ्यता, संस्कृति, शिक्षामे भी रद्दोबदल होता जाय, तब तो समाजकी एकरूपता, स्थिरता असम्भव हो जायगी । बहुत-से लोग विकासवादी नियमानुसार उत्तरोत्तर प्रगतिका ही सिद्धान्त मानते हैं, परंतु इस मतमें फिर मनुष्यके प्रमाद, पुरुषार्थकी विशेषता नहीं रह जाती । परंतु वस्तुस्थिति यह है कि प्रमाद और सावधानीसे पतन एवं अभ्युदय स्पष्ट परिलक्षित होते हैं। अतः हर चीजका भार राज्यपर छोड़ देना उचित नहीं । सामाजिक एवं वैयक्तिक जीवनमें राज्यका कम-से-कम हस्तक्षेपवाला सिद्धान्त शास्त्र- सम्मत है । फिर भी धार्मिक, सामाजिक नियमोका पालन तो सबके लिये अपेक्षित होगा ही । न्याय, सुरक्षा, समष्टि-स्वास्थ्य, सुव्यवस्था, सफाई आदिका काम सरकार कर सकती है । आज तो राष्ट्रके प्रत्येक जीवन-क्षेत्रमे सरकार ही हावी होती जा रही है। व्यक्ति शासनयन्त्रका एक नगण्य कल-पुर्जा बनता चला जा रहा है । उसे व्यक्तिगत विकास-विचार आदिकी कोई भी स्वतन्त्रता नही । मिलकी दृष्टिसे 'मद्य-पान, द्यूत आदि व्यक्तिगत समझे जानेवाले कार्योंका भी समाजपर असर पड़ता ही है।' धन एव समयका यदि अनुचित कार्योंमें अपव्यय न कर किसी उचित कार्यमे व्यय किया जाय तो अवश्य ही उससे समाजका लाभ हो सकता है। एक व्यक्तिके भी दुराचारी होनेसे समाज दूषित होता है । अन्य लोगोपर भी उसके दुस्संस्कार पडते हैं, फिर जब व्यक्तियोका समुदाय ही समाज है, तब तो व्यक्तिके दूषित होनेसे समाज दूषित होगा ही । मिलके इस स्वतन्त्रता-प्रेमका भी आधार रूसोका यह वाक्य है कि 'मनुष्य स्वतन्त्र जन्मा है, किंतु सभी ओरसे बेड़ियोंसे जकड़ा हुआ।' इसका सार यही है कि व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और सामाजिक बन्धन परस्पर विरोधी है । किंतु भारतीय भावनासे स्वतन्त्रता-प्रेम स्वाभाविक है और वह है परम ध्येय एवं प्राप्य, परंतु उसे पूर्णरूपसे प्राप्त करनेके लिये पर्याप्त स्वतन्त्रताका वलिदान कर धार्मिक एवं सामाजिक सभी बन्धनोको अंगीकार करना परमावश्यक है । अधिक मुनाफा पानेके लिये व्यापार आदिमें पर्याप्त धन व्यय करना पडता ही है । अतएव रूसो भी तो वास्तविक स्वतन्त्रता राज्य-नियन्त्रणसे मानता ही था । इस दृष्टिसे व्यक्ति एवं समाजका परस्पर पोष्य- पोषक भाव ही है, विरोध नहीं । लौकिक दृष्टिसे भी कई स्वतन्त्रताएँ परस्पर विरोधी होती हैं । वहाँ समझौतासे काम चलता है । सर्वथापि समष्टिहिताविरोधेन स्वतन्त्रताका उपयोग ही सदुपयोग है । विचार और भाषणकी स्वतन्त्रता बहुत आवश्यक है । भारतीय सिद्धान्तोमे उसका सदा ही अत्यन्त आदर था । इस देशमें चार्वाक, शून्यवाद, द्वैती, अद्वैती आदि अनेक प्रकारके परस्पर विरुद्ध दार्शनिक हुए हैं । उनमें विचार-संघर्ष