मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाश्चात्त्य राजनीति ८९ चलता रहा, परंतु किसीके विचार या भाषणपर प्रतिवन्ध नहीं लगाया जाता था । यहाँ ईसा, सुकरातकी तरह विचार-भेदके कारण किसीको फाँसीपर नहीं लटकाया जाता था । रामराज्यमें एक रजकको अखण्ड भूमण्डलके लोकप्रिय सर्वजनरञ्जन रामकी परम साध्वी सीताके विरुद्ध भी विचार रखने एवं भाषण देनेपर प्रतिबन्ध नहीं था । राम चाहते तो उसे दण्ड दे सकते थे। लौकिक मनुष्य, वानर, भालू, राक्षस तथा अलौकिक महर्षि, देवता, सिद्ध, इन्द्र, ब्रह्मा, रुद्र, आदिके सामने जिनकी अग्नि-परीक्षा हो चुकी, उनके विरुद्ध एक रजक बोल सका । रामने यही सोचा कि 'दण्डके द्वारा एक मुख बद किया जायगा तो हजारों मुखोंसे वही आवाज निकलेगी।' व्यवहारद्वारा ही जनता या व्यक्तिके विचार या भाषण बदले जा सकते हैं, दण्डद्वारा नहीं। फिर भी उसकी कुछ सीमा उचित है । असम्बद्ध अहितकर विचारों एवं भाषणोंका दुष्प्रभाव समाजपर पड़ सकता है । अतः समष्टिहितके लिये उसमें भी एक सीमा उचित ही है । 'सनकीके भाषणसे भी कोई चीज अच्छी मिल सकती है।' इसका इतना ही अभिप्राय है कि 'बालादपि सुभाषितं ग्राह्यम्' एक अबुद्ध बालकसे भी सुभाषित ग्रहण करनेमे कोई हर्ज नहीं । इसका यह अभिप्राय नहीं कि पागलोंके बढ़ाने और उनके भाषणोंकी व्यवस्था की जाय, उसमें समयका अपव्यय किया जाय । ज्ञानपिपासा अवश्य अच्छी चीज है, परंतु बहुत-सा ज्ञानभार भी लाभदायक नहीं होता । ईश्वरद्वारा निर्मित एवं नियमित विश्वके कल्याणोपयोगी सभी आवश्यक विषयोंका प्रबोध ईश्वरीय शास्त्रों एवं सर्वज्ञ महर्षियोंकी ऋतम्भरा- प्रज्ञाओंद्वारा सुलभ है । महाभारतकारका कहना है कि जो भारत ग्रन्थमें है, वही अन्यत्र है, जो यहाँ नहीं है, वह कहीं नहीं है—'यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित् ।' फिर भी एक सीमाके साथ उसपर स्वतन्त्र तर्क करनेकी परम्परा मान्य ही है । जहाँसे शास्त्रोंकी परम्परा टूट गयी थी और शास्त्रीय देशोंसे भी सम्पर्क टूट गया था, वहाँ अन्वेषणकी उत्कृष्ट लगन लाभदायक सिद्ध हुई है । यह बात अवश्य है कि किसी परम सत्यपर बिना पहुँचे और बिना दृढ़ निश्चय किये समाजकी स्थिरता एवं सुखशान्तिका स्थायित्व नहीं हो सकता । दौड़ दौड़के लिये नहीं, श्रम श्रमके लिये नहीं; किंतु परम विश्रामके ही लिये होना चाहिये । 'सत्य किसीकी बपौती नहीं' परंतु किसीकी इच्छा-अनुसार उसमें रद्दोबदल भी नहीं होता रहता । एक रज्जुमे रज्जु ज्ञान ही यथार्थ है । रज्जुमें सर्पका ज्ञान, धाराका ज्ञान, मालाका ज्ञान अयथार्थ ही है । इन ज्ञानोंमे समझौता नहीं हो सकता । देह ही आत्मा है या देहभिन्न आत्मा है, चेतन आत्मा है या अचेतन- व्यापक आत्मा है या अणु अथवा मध्यम परिमाण है, आत्मा असङ्ग है या कर्ता-भोक्ता है ? इन सभी विचारोंका समान दृष्टिकोणसे समान सत्तामे समन्वय नहीं हो