मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 103, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ें९० मार्क्सवाद और रामराज्य सकता । अवस्थाभेद, दृष्टिभेद, सत्ताभेदसे समन्वयकी बात अलग है । फिर विचारके लिये अनेक पक्षोंका उत्थापन तत्त्व-अतत्त्वका विवेचन आवश्यक होता ही है । इसी प्रकार हरबर्ट स्पेन्सरने (१८२०-१९०३) डार्विनके विकासवादके अनुसार बतलाया कि 'विश्वका विकास एक अनिश्चित असम्बन्धित एकत्वसे निश्चित और सम्बन्धित विभिन्नताकी ओर हो रहा है।' उसके मतसे समाजका विकास भी इसी ढङ्गसे हुआ है । प्राचीन समाजमे एकत्व था, परंतु था अनिश्चित एव असम्बन्धित । आधुनिक समाज विभिन्नताके साथ निश्चित एव सम्बद्ध है । जीवका विकास भी एक निम्नप्राणीसे उच्चकोटिके प्राणीकी ओर हुआ है । पहले एक सूक्ष्म अणु- के द्वारा ही खाना, पीना, श्वास लेना आदि काम होता था । प्रगतिके फलस्वरूप विभिन्न अणुओका जन्म हुआ । इनके द्वारा विभिन्न क्रियाएँ होने लगीं । अणुओमे कार्य-विभाजन हो गया । समाजका विकास भी इसी तरह हुआ । पहले समाज- मे कार्य-विभाजन नहीं था । जीवन-सम्बन्धी सभी कार्योंको एक व्यक्ति सम्पादित करता था । विज्ञानकी प्रगतिसे समाजके कार्योका विभाजन हो गया । आजका कार्यविभाजन जटिल हो गया । इसीलिये समाजके अंग अन्योन्याश्रित हो गये । पहले भी मनुष्य समूहरूपमे रहते थे । कुछ मात्राके नष्ट होनेपर कोई स्थायी प्रभाव नहीं पडना था । परंतु आज तो यदि रेल या मिलोके श्रमिक कार्य बंद कर दें तो समाजपर उसका भीषण प्रभाव पडता है । स्पेन्सरके मतानुसार यह कार्य-विभाजन आन्तरिक एवं अपरिवर्तनीय हैं। इस आन्तरिक कार्य-विभाजनकी गतिमे राज्यको हस्तक्षेप न करना चाहिये । इस कार्यविभाजनसे समाज स्वय प्रगतिशील होगा । यह जीवशास्त्रका सुप्रसिद्ध नियम है कि 'योग्य ही जीवित रहेगा ।' इस तरह उक्त महानुभाव जो सामाजिक वातावरणके अनुकूल अपना जीवन-यापन कर सकते हैं, वे ही जीवित रहकर उन्नतिमें सफल होते हैं । वर्षाऋतु- में अनन्त कीडे उत्पन्न होते हैं। वर्षाके अनन्तर ये नये वातावरणके अनुकूल अपनी जीवन व्यवस्थामे परिवर्तन नहीं कर सकते, इसीलिये मर जाते हैं । स्पेन्सर कहता है कि 'गरीब वही है, जो जीवनको सामाजिक व्यवस्थाके अनुकूल संचालित करनेमें असफल होता है। जो योग्य होता है वही सफल होता है। योग्य अनुपयुक्त वातावरणमे भी सफलता प्राप्त करता है। अयोग्य व्यक्ति परिस्थितिके शिकार होते हैं । अयोग्य प्राणियोके समान ही अयोग्य व्यक्ति भी समयानुसार जीवन-यापनमें असफल होते हैं । जैसे अयोग्य प्राणी मृत्युके शिकार होते हैं, वैसे ही अयोग्य मनुष्य निर्धन एवं निर्बल होते हैं । संघर्षमें पिछड़ जानेवाला ही गरीब होता है । 'योग्य ही जीवित रहता है' इस प्राकृतिक नियममे राज्यको हस्तक्षेप नहीं करना