भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 104

पाश्चात्य राजनीति ९१ चाहिये। स्पेंसरके मतानुसार 'एक गंदी बस्तीके निवासियोंको उनके भाग्यपर छोड़ देना चाहिये। जो व्यक्ति योग्य होंगे, वे इस प्रतिकूल वातावरणमे भी जीवित रह सकेंगे। प्रतिकूल बीमार होकर मर जायेंगे। राज्यको स्वच्छता, जल और अन्नका प्रबन्ध नहीं करना चाहिये। अयोग्य स्वयंसे लुप्त हो जायगा, योग्य बच जायगा।' यह सिद्धान्त मानवताके विरुद्ध है। किसी भी बीमार प्राणी- की सहायता करना या कम-से-कम उसे स्वावलम्बी बननेमे सहायता करना एक मनुष्यता है। किसी परिस्थितिमे रुग्ण, मूर्च्छित प्यासे तथा असहाय आदमी या प्राणिमात्रकी सहायता करना भारतीय शास्त्रोंके अनुसार विश्वधर्म है। एकसत्तावाद एकसत्तावाद भी एक राजनीतिक वाद है। इसके अनुसार एक प्रादेशिक राष्ट्रिमें केवल एक ही सर्वोच्च सत्ताधारी व्यक्ति-विशेषोंका समूह होता है। सभी नागरिक एवं संस्थाएँ इस सत्ताधारी संस्थाके आधीन होती हैं। राज्यको राज- सत्ताधारी संस्था माननेवाले दार्शनिक 'अद्वैतवादी' या 'एकसत्तावादी' कहलाते हैं। 'राज सत्ता' शब्द श्रेष्ठता अर्थमे प्रयुक्त होता है। तदनुसार श्रेष्ठता राज्य