भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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ईसाई-धर्ममें कई शाखाओ, उपशाखाओका जन्म होनेसे पोपके एकाधिकारका अन्त हो गया । राजनीतिमे रोमन सम्राट्की भी सर्वोच्चताका अन्त हो गया । इस समय पुरानी परम्पराका अन्त होनेसे जनतामे कुछ अनिश्चितता एवं व्याकुलता उत्पन्न हो रही थी । उस समय बोदाँने राज्यकी आज्ञाका पालन करना नागरिको- का परम कर्तव्य बतलाया, क्योकि प्रादेशिक राशिमें राज्य ही एक राजसत्ताधारी है । राजसत्ता निरपेक्ष, अदेय, अविभाज्य, व्यापक एवं स्थायी है । जादूके डंडेके तुल्य राज्यो एव नरेशोने इसका दुरुपयोग भी किया और अपनी निरपेक्षताको राज्यकी एक विशेषता बताया, फिर भी बोदोंक्त 'राजसत्ताधारी राज्य' नैसर्गिक नियमोके परतन्त्र था । परन्तु हाब्सका 'लेवियाथन' ( दीर्घकाय ) तो सर्वथा निरपेक्ष था । वह सभी नियमोको राजाकी तलवारसे ही सार्थक समझता था । लाकके प्रयत्नसे ब्रिटेनमे सीमित राजतन्त्र स्थापित हुआ । उसके मतानुसार नैसर्गिक नियम, सभ्य समाज और वैयक्तिक सम्पत्ति सर्वोपरि है । फिर भी व्यवहारमें राज्यसरकार ही सत्ताधारी अधिकारोका प्रयोग करती है । यह विचार- धारा हाब्सके एकसत्तावादसे भिन्न थी । उसका प्रभाव फ्रामके मांटेस्क्यूपर भी पड़ा । रूसो भी हाब्सके एकसत्तावादका समर्थक था । उसके अनुसार भी राज्यकी राजसत्ता निरपेक्ष, अविभाज्य, व्यापक एवं स्थायी है। हाब्सके अनुसार 'राजसत्ता' एक 'लेवियाथन'मे निहित है और रूसोके अनुसार एक प्रत्यक्ष जनतन्त्रीय राज्यकी सामान्य इच्छामें । रूसोने हाब्सकी निरपेक्षता और लाककी जनस्वीकृतिका समन्वय किया । वेन्थमने भी उपयोगितावादके लिये 'एकसत्तावाद' अपनाया । जान आस्टिनने एकसत्तावादकी 'राजसत्ता' नामक प्रामाणिक परिभाषा की । वह वेन्थमका शिष्य था। उसकी परिभाषा यह है कि 'यदि एक निश्चित जनश्रेष्ठ किसी अन्य जनश्रेष्ठकी आज्ञा स्वभावतः पालन न करता हो और एक बहुसंख्यक समाज स्वभावतः उसकी आज्ञाका पालन करता हो, तो वह जनश्रेष्ठ उस समाजमें राजसत्ताधारी है और उस जनश्रेष्ठके सहित वह समाज राजनीतिक दृष्टिसे स्वतन्त्र है ।' आस्टिनकी उक्त परिभाषाके मीमांसा और राजनीति—ये दो दृष्टिकोण हैं। प्रथमके अनुसार प्रत्येक राज्यमें एक निश्चित जनश्रेष्ठ होता है, वही राजसत्ताधारी होता है । राजसत्ताकी विशेषताएँ निरपेक्षता आदि हैं । मीमांसाके दृष्टिकोणसे राजसत्ताधारीकी आज्ञा ही कानून है । दैवी, नैसर्गिक, लौकिक नियम तथा सङ्घोंके नियम एवं परम्परा कानून नहीं माने जा सकते । उसके अनुसार प्रत्येक नियमका निश्चित स्रोत होना आवश्यक है । नियम आज्ञासूचक होना चाहिये । नियमकी पृष्ठभूमिमे कोई प्रमाण भी चाहिये । इस प्रमाणसे ही दण्डविधान होता है । भले ही एकसत्तावादी राज्य-व्यवस्थासे राज्य-सरकारोंकी दृढता हुई और यह अच्छी चीज है; परंतु इसमें अत्यन्त अपेक्षित धर्म-नियन्त्रण भी समाप्त हो जाता