मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसदस्योको जब निर्वाचक सप्रतिबन्ध मतदान करते हैं, तब वे स्वयं ही राजसत्ताधारीके अङ्ग बन जाते हैं । अप्रतिबन्ध मतदान करते हैं तो छोटी लोकसभा (कामन्स सभा) राजसत्ताधारीका अङ्ग बन जाती है । अतः 'राज्यमें एक निश्चित जनश्रेष्ठ सत्ताधारी है' यह न्यायसंगत नहीं। आस्टिनके मतमे 'कार्यपालिका एव नौकरशाहीको कोई स्थान नहीं और न जनताकी सत्ताका ही कोई स्थान है परंतु आजकी स्थिति- मे राज्यके कार्य निःसीम हो गये है। सभी विषयोमे उसका हस्तक्षेप होता है। फिर उसमे अनियन्त्रित 'दीर्घकाय' या 'जनश्रेष्ठ, को न्यायसगत कैसे कहा जा सकता है ? आधुनिक जनवादमें प्रतिस्पर्द्धा एव सहयोग चलता है । यह सब विभिन्न जाति, वर्ग विचार और संस्थाद्वारा होता है । अतएव कभी कोई, कभी कोई संस्था प्रभुता स्थापित करती है । इस प्रभुताका प्रभाव नियम-निर्माणपर पड़ता है । राष्ट्रमें कभी किसी संस्था या वर्गका बोलबाला होता है, कभी किसीका । कभी संसद् कार्यपालिकापर प्रभुता स्थापित करती है, कभी कार्यपालिका संसद्पर । सङ्घीय राज्योमें कभी सङ्घीय न्यायालय राज्यसत्ताधारी होता है, कभी एक दल पूरे राज्यपर हावी होता है । प्रेस-आन्दोलन तथा विभिन्न सङ्घ भी राज्यको प्रभावित करते रहते है । कभी-कभी अन्ताराष्ट्रिय जनमत नैतिकता परम्परा तथा सन्धियाँ भी राज्यके एकाधिकारको सीमित करती है । इस स्थितिमें राजसत्ताको निरपेक्ष, अविभाज्य कहना असंगत ही है । आजकी स्थितिमें राज्यकी इच्छा एव जनश्रेष्ठका निर्णय असम्भवप्राय है । 'जनश्रेष्ठका आज्ञा देना, जनताका सीधे पालन करना' यह आस्टिनकी व्यवस्था आज मान्य नही हो सकती । प्राचीन कालमे कर्तव्यपरायणतापर जोर था, परंतु आज तो अधिकारोकी ही प्रधानता है । आज अन्य संस्थाओंका भी महत्त्व कुछ कम नहीं होता । राज्य सर्वश्रेष्ठ सङ्घ है, परंतु निरपेक्ष नहीं । यह श्रेष्ठता सप्रतिबन्ध है । श्रेष्ठ लक्ष्यद्वारा ही राज्यकी श्रेष्ठता निर्धारित होती है। राष्ट्रिय जीवनका समन्वय तथा जनसेवासे ही नागरिक राजनको आदर देते हैं। एक प्रधानमन्त्री असफल होनेपर पदत्याग कर देता है। ठीक यही स्थिति राज्यकी होती है। मीमांसाके विश्लेषणवादी, इतिहासवादी, राष्ट्रवादी, विकासवादी, समाज- शास्त्रवादी, दर्शनवादी, कई दृष्टिकोण हैं। एकसत्तावादसे सम्बद्ध मीमांसा विश्लेषणवादी है। इन प्रथाओके अनुसार नियमोक दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न हाते है । विश्लेषणवादके अनुसार नियम-निर्मात्री राज्यसत्ता ही सब नियमोका स्रोत है । राजसत्ताधाराकी आज्ञा ही नियम है, रीति-रिवाज आदिका कुछ महत्त्व नहीं। परंतु वस्तुस्थित यह है कि राष्ट्रकी विविध विशेषताओं, ऐतहासिक प्रवृत्तियो, सामाजक जीवन आदिका नियम निर्माणमें महत्त्वपूर्ण स्थान होना अनिवार्य है । अनेक सङ्घोका भी नियम- निर्माणपर प्रभाव होता है। सभी देशोंमें न्यायालयोंके निर्णयोंको नियमतुल्य ही माना