मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
सदस्योको जब निर्वाचक सप्रतिबन्ध मतदान करते हैं, तब वे स्वयं ही राजसत्ताधारीके अङ्ग बन जाते हैं । अप्रतिबन्ध मतदान करते हैं तो छोटी लोकसभा (कामन्स सभा) राजसत्ताधारीका अङ्ग बन जाती है । अतः 'राज्यमें एक निश्चित जनश्रेष्ठ सत्ताधारी है' यह न्यायसंगत नहीं। आस्टिनके मतमे 'कार्यपालिका एव नौकरशाहीको कोई स्थान नहीं और न जनताकी सत्ताका ही कोई स्थान है परंतु आजकी स्थिति- मे राज्यके कार्य निःसीम हो गये है। सभी विषयोमे उसका हस्तक्षेप होता है। फिर उसमे अनियन्त्रित 'दीर्घकाय' या 'जनश्रेष्ठ, को न्यायसगत कैसे कहा जा सकता है ? आधुनिक जनवादमें प्रतिस्पर्द्धा एव सहयोग चलता है । यह सब विभिन्न जाति, वर्ग विचार और संस्थाद्वारा होता है । अतएव कभी कोई, कभी कोई संस्था प्रभुता स्थापित करती है । इस प्रभुताका प्रभाव नियम-निर्माणपर पड़ता है । राष्ट्रमें कभी किसी संस्था या वर्गका बोलबाला होता है, कभी किसीका । कभी संसद् कार्यपालिकापर प्रभुता स्थापित करती है, कभी कार्यपालिका संसद्पर । सङ्घीय राज्योमें कभी सङ्घीय न्यायालय राज्यसत्ताधारी होता है, कभी एक दल पूरे राज्यपर हावी होता है । प्रेस-आन्दोलन तथा विभिन्न सङ्घ भी राज्यको प्रभावित करते रहते है । कभी-कभी अन्ताराष्ट्रिय जनमत नैतिकता परम्परा तथा सन्धियाँ भी राज्यके एकाधिकारको सीमित करती है । इस स्थितिमें राजसत्ताको निरपेक्ष, अविभाज्य कहना असंगत ही है । आजकी स्थितिमें राज्यकी इच्छा एव जनश्रेष्ठका निर्णय असम्भवप्राय है । 'जनश्रेष्ठका आज्ञा देना, जनताका सीधे पालन करना' यह आस्टिनकी व्यवस्था आज मान्य नही हो सकती । प्राचीन कालमे कर्तव्यपरायणतापर जोर था, परंतु आज तो अधिकारोकी ही प्रधानता है । आज अन्य संस्थाओंका भी महत्त्व कुछ कम नहीं होता । राज्य सर्वश्रेष्ठ सङ्घ है, परंतु निरपेक्ष नहीं । यह श्रेष्ठता सप्रतिबन्ध है । श्रेष्ठ लक्ष्यद्वारा ही राज्यकी श्रेष्ठता निर्धारित होती है। राष्ट्रिय जीवनका समन्वय तथा जनसेवासे ही नागरिक राजनको आदर देते हैं। एक प्रधानमन्त्री असफल होनेपर पदत्याग कर देता है। ठीक यही स्थिति राज्यकी होती है। मीमांसाके विश्लेषणवादी, इतिहासवादी, राष्ट्रवादी, विकासवादी, समाज- शास्त्रवादी, दर्शनवादी, कई दृष्टिकोण हैं। एकसत्तावादसे सम्बद्ध मीमांसा विश्लेषणवादी है। इन प्रथाओके अनुसार नियमोक दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न हाते है । विश्लेषणवादके अनुसार नियम-निर्मात्री राज्यसत्ता ही सब नियमोका स्रोत है । राजसत्ताधाराकी आज्ञा ही नियम है, रीति-रिवाज आदिका कुछ महत्त्व नहीं। परंतु वस्तुस्थित यह है कि राष्ट्रकी विविध विशेषताओं, ऐतहासिक प्रवृत्तियो, सामाजक जीवन आदिका नियम निर्माणमें महत्त्वपूर्ण स्थान होना अनिवार्य है । अनेक सङ्घोका भी नियम- निर्माणपर प्रभाव होता है। सभी देशोंमें न्यायालयोंके निर्णयोंको नियमतुल्य ही माना
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९६ मार्क्सवाद और रामराज्य अनुसार 'यदि वह ऐसा करे तो संसद् ही नहीं, क्योंकि संसदीय सरकारका सार है जनमतद्वारा शासन ।' ब्रिटेनमे संवैधानिक नियमोके निर्माणमें जनताकी स्वीकृति प्राप्त की जाती है । अन्तर्राष्ट्रिय नियमोका स्रोत भी किसी जनश्रेष्ठकी आज्ञा नहीं हो सकती । किंतु विश्व-शान्तिकी भावना मानवता एवं सामाजिकता है। यातायातकी वृद्धिसे आजकल अन्तर्राष्ट्रिय जनमत सम्भव हो गया । कोई भी निरपेक्ष शासक जनमतका उल्लङ्घन नहीं कर सकता । कोई भी निश्चित जनश्रेष्ठ अन्तर्राष्ट्रिय नियमो, संधियो एव नैतिकताको कुचल नहीं सकता । विश्वजनमतका विरोध करके किसी राज्यकी स्थिरता नहीं हो सकती । एकतावादके अनुसार 'निरपेक्षता राज्यकी सर्वश्रेष्ठ विशेषतां है। यह निरपेक्षता आन्तरिक तथा बाह्य—इन दो दृष्टियोसे होती है । आन्तरिक दृष्टिकोणसे राज्यका विरोध कोई व्यक्ति या समूह नही कर सकता, सभी उसके अधीन होते है ।' वर्जेसके मतानुसार राज्य नागरिकोको उनकी इच्छाके विरुद्ध बाध्य कर सकता है, अन्यथा अराजकता ही समझी जायगी । बाह्य नीतिकी दृष्टिसे राजसत्ताधारीका राज्यपर कोई नियन्त्रण सम्भव नही । अन्य राज्य भी उसे आज्ञा नहीं दे सकता । अन्तर्राष्ट्रिय नैतिकता, संधियाँ और नियम राजसत्ताधारी राज्य- को बाध्य नहीं कर सकते । उनका अनुकरण करना राज्यकी इच्छापर निर्भर है। एक- सत्तावादियोंके दृष्टिकोणसे अन्तर्राष्ट्रिय नियमोको नियम नही माना जा सकता, क्योकि उसकी पृष्ठभूमिमें राज्यकी तलवार नही होती । एकसत्तावादी दार्शनिक राज्योके पारस्परिक सम्बन्ध हाब्सके प्राकृतिक मनुष्योके सम्बन्धसे होता है। अर्थात् एक राज्य दूसरे राज्योके शत्रु होते हैं। भारतीय नीति-शास्त्रोके अनुसार स्वभावसे ही पड़ोसी राष्ट्रके साथ सङ्घर्षकी सम्भावना होती है और पडोसीके पडोसीके साथ मैत्रीकी सम्भावना होती है । अरिर्मित्रमरेर्मित्रं मित्रमित्रमतः परम् । तथारिमित्रमित्रं च विजिगीषोः पुरः स्मृतः॥ पार्ष्णिग्राहः स्मृतः पश्चादाक्रन्दस्तदनन्तरम्।आसारावनयोश्चैव विजिगीषोश्च पृष्ठतः॥ अरेश्च विजिगीषोश्च मध्यस्थो भूम्यनन्तरः । अनुग्रहे संहतयोर्निग्रहे व्यस्तयोः प्रभुः ॥ मण्डलाद्वहिरेतेषामुदासीनो वलाधिकः। अनुग्रहे संहतानां व्यस्तानां च वधे प्रभुः॥ ( अग्निपुरा० २४० । १—५ ) शत्रु, मित्र, शत्रु का मित्र, मित्रका मित्र और शत्रुके मित्रका मित्र—ये पाँच विजिगीषुके आगे तथा पार्ष्णिग्राह, आक्रन्द, पाष्णिग्राहासार और आक्रन्दासार—ये चार विजिगीषुके पीछे रहते हैं । अरि तथा विजिगीषुमें यदि संधि हो जाय तो उन दोनोंपर निग्रह-अनुग्रह करनेकी क्षमता रखनेवाला तथा परस्पर समझौता न होनेपर दोनोंको दण्ड देनेकी क्षमता रखनेवाला 'मध्यम' होता है । इन सबमे उदासीन और इनके मण्डलमे बाहर सबके मिलनेपर अनुग्रह
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कभी-कभी एक व्यक्तिके पापका फल समुदायको भी भोगना पड़ता है । जैसे एक व्यक्तिने मधुमक्खीके छत्तेको छेड़ दिया । उसका दुष्परिणाम आस पासके सभी लोगोंको भोगना पड़ता है । भोक्ता लोग तात्कालिक फल भोगकर मुक्त हो जाते हैं, परंतु कर्ता ही दोषसे लिप्त होता है । परलोकमें अपना शुभाशुभ कर्म ही व्यक्तिके साथ जाता है । व्यक्तिका समुदाय ही समाज होता है । अतः व्यक्तिकी उत्पत्ति पहले हुई, फिर आवश्यकतानुसार समाजका निर्माण संगत है । रूसो कहता था—'प्राणी स्वतन्त्र जन्मा है; परंतु सभ्यताके जन्मसे वह विविध बन्धनोंसे जकड़ गया।' वह इस परतन्त्रताकी बेड़ीसे मनुष्यको मुक्त करना चाहता था । उसका कहना था कि 'अति प्राचीन नैसर्गिक स्वतन्त्रताका पुनर्जन्म तो नहीं हो सकता; परंतु एक नागरिक उच्च नैतिक वास्तविक स्वतन्त्रताकी स्थापना हो सकती है।' प्रत्यक्ष जनवादी राज्य रूसोका आदर्श राज्य था । 'प्रत्येक नागरिक व्यवस्था- पिकाका सदस्य होता था । राज्य-नियम स्वीकृतिसे ही बनते थे । वे नियम जनताकी सामाजिक इच्छाका प्रतिनिधित्व करते थे । प्रत्यक्ष जनवादी राज्यकी इच्छा ही रूसोकी 'सामान्येच्छा' थी । वही सत्ताधारी थी। सबकी इच्छामें एकताकी भावना नहीं होती । वह सुधारद्वारा ही सामान्येच्छा बन सकती है । सामान्येच्छामें सावयव या अवयवीकी-सी एकता होती है । सबकी इच्छामें इसका अभाव होता है । व्यक्तिकी शान्तिकी इच्छा सावयवकी एकतासे विदित होती है । जिस नियममें क्षेत्र, ध्येय, उद्गम, सामान्य होते हैं, वही सामान्येच्छाका प्रतीक होता है। अर्थात् जो नियम सभीके लिये हितकर हो, जो व्यक्ति या समुदायविशेषसे सम्बन्धित न होकर सम्पूर्ण राज्यसे सम्बन्धित हों तथा जो निःस्वार्थ सामाजिक इच्छाका प्रतिनिधित्व करे और उनके मतदानसे निर्धारित हो, वे ही नियम सामान्येच्छाके प्रतिनिधि हैं । "इच्छा दो प्रकारकी होती है। एक सामाजिक, दूसरी व्यक्तिगत । नागरिकोकी सामाजिक इच्छाका ही प्रतिनिधित्व सामान्येच्छा करती है। प्रगति एव शान्तिकी इच्छा सामान्येच्छा है । राष्ट्रोके वैमनस्यमूलक युद्ध आदिकी स्वार्थमूलक इच्छा सबकी इच्छा हो सकती है, सामान्येच्छा नही ।' रूसोके अनुसार सबकी इच्छा नागरिकोकी स्वार्थसम्बन्धी इच्छाका योग है । परंतु सामान्येच्छा तो नागरिकोकी सामान्येच्छाका प्रतिबिम्ब होती है । सबकी इच्छा अस्थायी हित और स्वार्थी ध्येयोंसे सम्बद्ध होती है। सामान्येच्छामें स्थायी हित एवं सार्वजनिक भलाई निहित है । सावयवकी इच्छाकी भाँति राज्यकी सामान्येच्छा स्थायी है और सदा सत्य एवं सामान्य हितका प्रदर्शन करती है। ऐसी इच्छाकी अनुपस्थितिमें न राज्य सम्भव है न नागरिकता । जोन्सके अनुसार 'जैसे एक खेलके खिलाड़ी विभिन्न इच्छा रखते हुए भी खेलके साधारण एवं नैतिक नियमोंका पालन करना चाहते हैं, वैसे ही
पाश्चात्य राजनीति [९९]
नागरिकोको विभिन्न मतभेदोंके होते हुए भी एक सामान्य हित एव सामाजिक हितकी इच्छा होती है। यह भावना ही सामान्येच्छा तथा सुव्यवस्थाकी धात्री है। ऐसी भावना- को ग्रीन 'सामान्य स्वार्थ' कहता है। रूसोके मतसे 'सामान्येच्छानुसार जीवन- यापनमें ही व्यक्तिकी नैतिक, नागरिक तथा वास्तविक स्वतन्त्रता सम्भव है। इसके विपरीत व्यक्तिकी वास्तविक स्वतन्त्रता नहीं होती । ऐसे व्यक्तिके हितके लिये उसे सामान्येच्छाके अनुसार जीवनयापन करनेके लिये बाध्य किया जा सकता है। एक नटखट विद्यार्थीको कक्षामें चुप रहनेके लिये बाध्य करनेकी क्रियाका अर्थ है, उसे स्वतन्त्र होनेके लिये बाध्य करना ।' रूसोके अनुसार "स्वतन्त्र राज्यमें स्वतन्त्र नागरिक' यह आदर्श व्यवस्था है। इसमें स्वतन्त्रता और नियम एक दूसरेके विरोधी नहीं होते।" लाकके अनुसार भी राज्यकी अनुपस्थितिमें 'मनुष्य स्वतन्त्र और नैतिक जीवन व्यतीत करता था।' रूसोने इसका खण्डन कर बताया कि 'नैतिकता और अधिकार केवल राज्यमें ही सम्भव हो सकते हैं।' एक सत्ताधारियोंने राजसत्ताधारीका क्षेत्र कुछ सीमित अवश्य कर दिया । बोदोंने राजसत्ताधारीको नैसर्गिक मौलिक नियमोंके अधीन माना था। हाब्सने कहा था कि 'राजसत्ताधारी कोई अन्याय नहीं कर सकता, न किसी नागरिकको प्राणत्यागके लिये बाध्य कर सकता है।' रूसो सामान्येच्छाके क्षेत्रको सामान्य विषयोंतक ही सीमित मानता है । वेन्थम इसे उपयोगितावादसे सीमित मानता है । वेन्थमवादी उपयोगिताके विपरीत नियम-निर्माण नहीं कर सकता, फिर भी वैधानिक दृष्टिसे एक सत्तावादियोंका राज्य 'सर्वे सर्वा है', वह कोई भूल नहीं कर सकता । अपनी प्रादेशिक सीमामें राज्य सर्वाधिकारी प्रभु है । कोई भी सङ्घ, भले वह ईसाई धर्मकी तरह अन्ताराष्ट्रिय ही हो, राज्यके नियमोंसे परे नहीं हो सकता । हाँ, राजदूतावास एव उसके निवासी राज्यविधियोंके अधीन नहीं होते । इस तरह परदेशी नागरिको एवं दूतावासोंसे ही राज्यकी व्यापकता सीमित है । उन-उन राजदूतावासोंमें उन-उन राज्योंके ही नियम चलते हैं। अन्य सभी विषयोंमें राज्यका एकाधिकार ही होता है। इस अर्थमें राजसत्ताकी व्यापकता मान्य होती है। इसी तरह राजसत्ता अदेय मानी जाती है । राजसत्ताको राज्यसे हटानेका अर्थ है 'राज्यका अन्त करना ।' राजसत्ताके विना राज्य प्राणहीन होता है। अतएव अस्थायीरूपसे राज्य अपने राजसत्ताधारी अधिकार किसी संस्थाको दे सकता है । इस कार्यसे उसके राजसत्ताधारी रूपका अन्त नहीं होता । वह उन अधिकारोंको वापस ले सकता है। यदि एक राजसत्ताधारी राजा या संस्था पदत्याग करे तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि राजसत्ताका अन्त हो गया । इससे केवल राजसत्ताका स्थान परिवर्तित होता है । राज्यके समान ही राजसत्ता स्थायी है । सरकारमें परिवर्तन होनेसे राज्य या राजसत्तामें परिवर्तन नहीं होता । राज्यसत्ता
१०० मार्क्सवाद और रामराज्य अविभाज्य होती है। राज्योके शक्ति-विभाजनके कारण राज्यके कार्य विभक्त होते हैं; परंतु इससे राजसत्ताका विभाजन नहीं होता।' रूसोके अनुसार 'शक्तिका विभाजन हो सकता है, राज्यकी इच्छाका नहीं।' १९ वीं शतीमें भी औद्योगिक क्रान्तिके फलस्वरूप सामाजिक जीवनमें स्पर्धा एव संघर्षका महत्त्वपूर्ण स्थान है । उस स्थितिमे राजसत्ता एक राशि न होकर अनेक प्रकारकी हो गयी । कई राष्ट्रोमे वैधानिक राजसत्ता मान्य होती है, जैसे ब्रिटेनका सम्राट्, भारतका राष्ट्रपति । उसकी स्वीकृति बिना कोई कार्य नही चल सकता । परंतु उत्तरदायी मन्त्रिमण्डलकी स्वीकृति बिना ऐसे सत्ताधारी श्रेष्ठ जन कुछ भी नही कर सकते । ब्रिटेनमें सम्राट् और संसद् राजसत्ताधारी है । वे सभी प्रकारका नियम बना सकते हैं। कुछ परिस्थितियोंके कारण संसद् राजसत्ताधारी नहीं होती । आधुनिक समाजसेवक राज्यमें संसद् नियम निर्माणमें स्वतन्त्र नहीं होती । वस्तुतः कार्यपालिका ही सत्ताधारी होती है । सयुक्त राष्ट्र अमेरिकामें कांग्रेस ही नियम निर्माण करती है । परंतु कुछ नयी परिस्थितियोंके कारण राष्ट्राध्यक्षका भी परोक्षरूपसे नियम-निर्माणमे महत्त्वपूर्ण स्थान होता है । इसीलिये विश्वके वैधानिक अध्यक्षोमे अमेरिकाका राष्ट्रपति सबसे अधिक अधिकारसम्पन्न होता है । जनवादी राजसत्ता आधुनिक जनवादी नागरिक जनता निर्वाचनद्वारा ही नहीं, किंतु प्रचारद्वारा भी राज्यकी नीतिपर प्रभाव डालती है । भाषण, लेखन- आन्दोलनद्वारा जनमत बनता है। सरकारोको भी तदनुसार अपनी नीति बनानी पड़ती है। कहा जाता है कि 'समाजके वास्तविक शासक ढूँढे नही जा सकते । कभी एक सङ्घ, कभी दूसरा, कभी कोई आन्दोलन, कभी कोई प्रचार सफल होता है। अतः सर्वोच्च शासनसत्ता जनतामें ही निहित होती है। नियमविधायिनी संस्थाके सङ्घटनकी दृष्टिसे निर्वाचक- गण सत्ताधारी होते हैं। राजनीतिके सम्बन्धमें समस्त जनताके मतका योग ही सत्ताधारी है।' उपर्युक्त अधिकांश बाते केवल विभिन्न राष्ट्रोकी घटनाओ, इतिवृत्तोकी आलोचना-प्रत्यालोचनाओंके आधारपर ही निर्णीत होती हैं। यहाँ औचित्य-अनौचित्यकी कसौटी उत्तरोत्तरकी घटनाएँ तथा मान्यताएँ ही हैं। परंतु भारतीय विवेचक इसे अपर्याप्त मानते हैं। 'मानवका इतिहास प्रगतिका इतिहास है', केवल इसी आधारपर पूर्व-पूर्वके विचार और घटनाएँ हेय हैं, उत्तरोत्तरके विचार एव घटनाएँ उपादेय हैं, यह कहना नितान्त अज्ञता है । इससे तो पूर्व-पूर्वके बुद्धिमानोका भी महत्त्व घटता है, उत्तरोत्तरके मूर्खोका भी महत्त्व बढ़ता है । कहा
जा चुका है कि घटनाएँ भली, बुरी सब तरहकी होती हैं। विचारसरणि भी सदा ही अच्छी-बुरी होती हैं। प्रत्यक्ष, अनुमान, आप्त एवं आप्तसमर्थित विचार तथा घटनाएँ आदरणीय हैं। तद्विपरीत हेय हैं। तत्त्वनिर्णयरूप परिस्थिति, घटनाओं एवं तात्कालिक परिस्थितियोंसे प्रभावित विचारोंका कोई महत्त्व नहीं होता। लुटेरोंका राज्य हो जाय, तो 'हो गया इसलिये उचित मान लिया जाय' यह नहीं कहा जा सकता; किंतु सदा ही उसे मिटानेका प्रयत्न होना चाहिये। उचित योग्य व्यवस्था अति प्राचीन हो या अभूतपूर्व अनागत हो, उसका आदर होना चाहिये। धर्मनियन्त्रित धर्मसापेक्ष पक्षपातविहीन समष्टिव्यष्टि-अविरोधेन सर्वहितकारी राज्य ही रामराज्य, धर्मराज्य एवं ईश्वरराज्य है। उसीका सदा आदर हुआ है, आगे भी होगा। वर्तमान कालमें भी उसीके लिये प्रयत्नशील होना आवश्यक है। इस दृष्टिसे एक सत्तावादीकी निरङ्कुश राजसत्ताका समर्थन नहीं किया जा सकता। कहा जाता है कि 'जहाँ पहले सरकार स्वामी तथा जनता दास थी, वहाँ रूसोकी व्यवस्थामें सरकार दास एवं जनता स्वामी है। उसके मतानुसार जनवाणी देववाणी है। रूसोके जनवादके आधारपर ही मत-संग्रह आदिकी प्रथा है। रूसो भी एक सत्तावादी था, उसके दर्शनमें अन्य संस्था या समुदायका कोई स्थान न था। नागरिक एवं राज्यमें वह सीधा सम्बन्ध रखना चाहता था। उसके शासनतन्त्रमें समाचारपत्रों, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक या सांस्कृतिक सङ्घका स्थान नहीं। उसके अनुसार व्यक्ति प्रकृतिसे ही पवित्र है। सङ्घहीन समाजमें व्यक्ति स्वयं ही सामाजिक इच्छा या राज्यकी सामान्येच्छाके अनुसार सोचेगा। सर्वो—प्रचारयन्त्रोंसे नैसर्गिक पवित्रताका ह्रास होता है।' यद्यपि उसका यह कथन अंशतः सत्य है, वर्तमान सभ्यता एवं प्रचार- प्रपञ्चोंसे जाल-फौरेबका ही विस्तार हुआ है। तथापि सदिच्छासे सद्बुद्धि, सद्बुद्धिसे सदिच्छा और उससे सत्प्रयत्न एवं सत्फल होता है। सदिच्छाका निर्धारण होना आवश्यक है। यदि दुर्भाग्यवश किसी उत्पथगामी समुदायके हाथमें राजसत्ता आ गयी और समाचारपत्रों तथा प्रचारोंपर भी प्रतिबन्ध रहा तब तो सदा ही जनसमूहको शासनके अत्याचारोंको सिर झुकाकर सहते रहना पड़ेगा। शासन बदलनेका भी उसे कभी अवसर नहीं मिलेगा। इस तरह आदर्श राज्यके नामपर तानाशाहीकी स्थापना होगी। रूसो राज्यद्वारा एक नागरिक धर्मनिर्माण भी चाहता था। उस तरह सभी क्षेत्रोंमें राज्य हावी हो जायगा। व्यक्ति-विकासका अवकाश सर्वथा समाप्त हो जाता है। आजके समय सामान्येच्छाका बोध कितना दुर्गम है। विशेषतः
१०२ मार्क्सवाद और रामराज्य व्यक्तिस्वातन्त्र्य एवं प्रकाशन, भाषण-विस्तारका साधन न होनेसे तो वह और भी दुर्ज्ञेय हो जायगी । रूसोने नियमसे नागरिकताकी भावनाका जन्म माना और कहींपर नागरिक भावनासे नियमका जन्म माना । यह परस्पर विरुद्ध है। उसने यह भी माना है कि 'राज्यमें एक व्यवस्थापकद्वारा नागरिक भावनाके जन्म और प्रसारका प्रयत्न होगा।' इस तरह भावना-निर्माण और उसके अनुसार नियम-निर्माण होगा । अन्य किसी व्यक्ति या समुदायको भावना-निर्माणका अधिकार न होगा । फिर तो जिसके हाथमें शासन होगा वही जो चाहे करेगा। इस तरह रूसोके मतानुसार जनवाद, अधिनायकवाद—दोनो ही साथ-साथ रहते हैं । अधिनायकवाद मानवताका विरोधी ही समझा जाता है । 'नागरिकको स्वतन्त्र होनेके लिये बाध्य किया जायगा' यह एक विचित्र बात है। जनकल्याण- कल्पना स्वतन्त्र करनेके नामपर परतन्त्र बनानेका व्यामोहक मायाजाल है। बोसॉके कहता है कि 'प्रत्येक राज्यकी इच्छा चाहे वह तानाशाहकी इच्छा ही क्यो न हो सामान्येच्छा है।' उसके अनुसार 'नागरिकको जीवनयापन करनेके लिये बाध्य किया जाना चाहिये, अर्थात् स्वतन्त्र होनेके लिये बाध्य किया जाना चाहिये।' यद्यपि यह ठीक ही है कि कितने ही कार्योंमें जनहितके लिये उसकी इच्छाके विरुद्ध कुछ करनेके लिये बाध्य किया जा सकता है । जैसे किसी अदीर्घदर्शी अबोध शिशुकी कुपथ्य-परिवर्जन, पथ्य-परिपालन तथा चिरायता आदि जैसी कटु औषधोके सेवनमें प्रवृत्ति नहीं होती तो वहाँ उसे हितैषिणी माताके द्वारा वैसा करनेके लिये बाध्य किया जा सकता है— जदपि प्रथम दुख पावइ रोवइ बाल अधीर । ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर ॥ एक हितैषी डाक्टर भी आपरेशन करते हुए चीरफाड़ करता है और एक दुर्भावनावाला कूटनीतिज्ञ दुश्मन भी चीरफाड करता है । आजकल विभिन्न शासनारूढ दल ऐसी स्थिति उत्पन्न करके नागरिको एवं दूमरे दलोकी प्रचार- सुविधा रोककर केवल अपना ही प्रचार करते हैं। यह सदाके लिये अपने दलका शासन कायम रखनेका षड्यन्त्र ही है। स्वास्थ्यवर्धक ओषधि खानेके लिये बाध्य करना एक बात है और जहर खानेके लिये बाध्य करना अन्य बात । अठारहवी शतीके मध्यसे उन्नीसवी शतीतक ब्रिटेन एवं फासमें आधुनिक आदर्शवादका प्रभाव बढ़ा । स्वतन्त्रता, भ्रातृता, समानता फ्रांसीसी राज्यक्रान्तिका नारा था । वह समस्त यूरोपमें गूँजा और गरीब, किसान तथा मजदूरलोगोंने उसे अपनाया । जर्मनी, प्रशा आदि मध्य यूरोपके देशोंमें राष्ट्रियताका प्रसार हो रहा था । उसके अनुकूल आदर्शवादका जन्म हुआ । उदारवादके अनुसार राज्य-
पाश्चात्त्य राजनीति १०३ साधन तथा उसका कार्यक्षेत्र सीमित है । उसमें स्वतन्त्रताका अर्थ है स्वेच्छाम जीवन-निर्वाह करना । ठीक इसके विपरीत आदर्शवादके अनुसार आदर्श राज्य साध्य, निःसीम एवं निरपेक्ष है उसके हस्तक्षेपपर कोई प्रतिबन्ध नहीं । इसके अनुसार स्वतन्त्रताका अर्थ है 'राज्यके नियमानुसार जीवन-सञ्चालन करना ।' मान्टेस्क्यू शक्ति-विभाजन स्वतन्त्रताके लिये अनिवार्य मानता था । आदर्शवादी शक्ति-विभाजनके पक्षमें नहीं थे। उदारवादमें जनस्वीकृति मुख्य है । कान्ट ( १७२४-१८०४ ) आधुनिक आदर्शवादका जन्मदाता माना जाता है । वह कनिग्सवर्ग विश्वविद्यालयका अध्यापक था । वह दर्शन एवं राजनीति शास्त्रका विद्वान् और अध्यात्मवादी था । उसके मता- नुसार एक वस्तुका ज्ञान उसकी बनावटसे नहीं, किंतु मस्तिष्कमें पड़े हुए उस वस्तुके प्रतिबिम्बसे होता है । एक वस्तुको हम पुस्तक इसीलिये कहते हैं कि वह हमारे मस्तिष्कके अनुसार पुस्तककी भाँति है । विशुद्ध विवेकका जीवनमें अनुभवसे अधिक महत्त्व है, लाककी परम्परानुसार केवल अनुभव और प्रयोगसे नहीं । राजनीतिके सम्बन्धमें उसने कहा कि 'नियममें व्यापकता आवश्यक है; परंतु उसका आधार विवेक होना चाहिये ।' उसने जनवादका समर्थन करते हुए कहा कि 'राजतन्त्र आदर्श व्यवस्था नहीं है, क्योकि उसमें नियम विवेकके अनुसार नहीं होते ।' जनवादमें भी विवेकका अभाव ही है । निष्पक्ष दूरदर्शी ऋषियोंके राजनीतिक शास्त्रों एवं धार्मिक आध्यात्मिक दर्शनोंके बिना विवेक न तो भौतिक जनतन्त्रमे है न निरपेक्ष राजतन्त्रमे ही । अध्यात्मवादपर आधारित धर्मनियन्त्रित शासनतन्त्रमें ही विवेकका महत्त्व है । वस्तुतस्तु इस पक्षमें संविधान एवं नियम भी सनातन ही है । उनका निर्माण नहीं करना है, किंतु निर्णय किया जाता है । इसलिये विधान-निर्मात्री परिषद् न बनाकर विधान-निर्णेत्री परिषद् ही बनाना है । कान्ट सर्वव्यापक नैतिक नियमोंको व्यक्तिका प्रेरक मानता है । वह इसीके द्वारा इच्छाओका सञ्चालन और नियमन मानता है । अन्यथा मनुष्य निकृष्ट नियमोंका शिकार होकर नष्ट हो जाता है । अतः ऐसे नियमोंद्वारा ही नागरिक जीवनका संचालन होना चाहिये । उसका कहना है कि यदि नागरिक अपने कर्तव्योंका पालन करता है तो अधिकारी अपने आप ही उसका अनुगमन करते हैं । व्यक्तिवादियोंके अनुसार अधिकारकी प्रधानता है; परंतु कान्टके मतानुसार कर्तव्यकी । व्यक्तिवादी स्वेच्छानुसार कार्यको ही स्वतन्त्रता कहते हैं; परंतु कान्ट नैतिक नियमानुसार जीवनयापनसे ही स्वतन्त्रता सम्भव मानता है । मद्यपान, द्यूत आदि नैतिकताके विरुद्ध आचरणको स्वतन्त्रता नहीं कहा जा सकता । व्यक्तिवादी मिलके अनुसार
'मद्यपान आदि भी व्यक्ति-स्वातन्त्र्यमें ग्राह्य हैं।' कान्ट कहता है—'व्यक्ति ही समाजकी जड़ है, जब उसमें भी खराबी हो तब पत्तों, शाखाओंकी खराबी रोकी नहीं जा सकती । अतएव व्यक्तिके अनैतिक कार्य सर्वथा वर्ज्य हैं । राज्यके द्वारा मनुष्य नैतिक नियमोंका अनुगामी बन सकता है।' शक्ति-विभाजनको अङ्गीकार करता हुआ भी कान्ट व्यवस्थापिका सभाको राज्यमें प्रधान मानता था । सामन्तों एवं मठोंके भूमिसम्बन्धी एकाधिकारका भी वह विरोधी था । उसके मतानुसार 'मनुष्यके विवेक एवं नैतिकताका पूर्ण विकास केवल राष्ट्रसङ्घद्वारा ही हो सकता है । स्थिर शान्ति एवं मानव-प्रगतिके लिये यह अत्यन्त आवश्यक है ।' फिर भी कान्टके अनुसार 'राज्यको शासितोंकी स्वीकृतिपर निर्भर नहीं रहना चाहिये । उसके मतानुसार शक्तिद्वारा राज्यका जन्म हुआ है, कण्ट्राक्ट (सामाजिक समझौता) द्वारा नहीं। वह रूसोके समान ही 'सामान्येच्छा' का समर्थक था। पर उसके लिये प्रत्यक्ष जनवादका आश्रयण अनिवार्य नहीं। एक व्यक्ति भी उसका प्रतिनिधित्व कर सकता है। कान्टका सर्वमनस्तत्त्व वेदान्तियोंके विशुद्ध अखण्डबोध ब्रह्मके तुल्य है। बाह्यार्थवादी बौद्धोंके समान ही उसके मतमें बाह्यार्थ भले ही हो; किंतु वह स्वतः प्रत्यक्ष नहीं, अपितु अनुमेय-सा है। आन्तरिक ज्ञानमें होनेवाले प्रतिबिम्बों- द्वारा ही उसकी ज्ञप्ति हो सकती है। आन्तर होनेसे ज्ञान ही स्वप्रकाश एवं प्रत्यक्ष है। विभिन्न आकारवाली वस्तुएँ ज्ञाननिष्ठ प्रतिबिम्बके द्वारा विदित होती हैं। वेदान्तीके मतानुसार भले ही बाह्यार्थ अनिर्वचनीय व्यावहारिक ही हो तथापि घटादिका प्रत्यक्ष सर्वानुभवसिद्ध है। अतिसूक्ष्म वस्तुओंमें अनुभव एवं प्रयोग असम्भव है। अतः विवेक ही तत्त्वनिर्णयका मूलाधार है। कान्टकी यह बात अवश्य बहुमूल्य है । विवेकके लिये परम्परा एवं अपौरुषेय या ईश्वरीय तथा आर्ष शास्त्रोंका समाश्रयण अपेक्षित है । विवेकसामग्री बिना विवेक असफल ही रहता है । सामान्य विषयोंमें जनवादद्वारा विवेकका प्रयोग हो सकता है; परंतु तत्तद्विशिष्ट विषयोंमें उन-उन विषयोंके विशेषज्ञों- द्वारा ही विवेकका सफल प्रयोग हो सकता है । ऐसे विवेक-निर्धारित नियमोंद्वारा इच्छाओंका नियन्त्रण एवं सञ्चालन अवश्य ही व्यष्टि-समष्टि सर्वकल्याणका कारण है। यह नियन्त्रण स्वतन्त्रताका साधक ही है, बाधक नहीं । माता-पिता गुरुजनो- द्वारा उचित नियन्त्रण एवं शिक्षणसे ही मनुष्य विद्वान्, बलवान्, धनवान् होकर स्वातन्त्र्यसुखका भोक्ता हो सकता है । अनियन्त्रित, उच्छृङ्खल बालक प्रायेण मूर्ख रहकर परतन्त्रताके बन्धनोंमें जकड़ा ही रहता है । व्यक्तिका समुदाय ही समष्टि है। सुतरां व्यक्तिका पतन समष्टिके पतनका कारण बन सकता है। प्रसिद्ध है कि एक ग्रामके नेताने ग्रामीणोंको कहा कि आज रात्रिमें सभी लोग एक कुण्डमें दूध डालें । ग्रामीणोंने स्वीकार कर लिया, परंतु डालते समय एक व्यक्तिके मनमे
पाश्चात्त्य राजनीति १०५ आया कि सब लोग दूध डालेंगे ही यदि मैं दूधके बदले पानी डाल दूँगा तो भी क्या पता लगेगा ? दैवात् डालनेके समयतक सबके ही मस्तिष्कमें यही विचार आ गया । फलस्वरूप सबने कुण्डमें पानी ही डाला, दूध किसीने भी नहीं । कुण्डमें शुद्ध जल-ही-जल पड़ा । ठीक इसी तरह व्यक्तियोंकी बुराईसे समष्टि-समाजमें बुराई और व्यष्टिकी अच्छाईसे समष्टिमें अच्छाई आ सकती है । अतः व्यष्टि-समष्टिका परस्पर अविरोधेन समन्वय ही दोनोंके कल्याणका कारण होता है । भारतीय राजनीति शास्त्रोंके अनुसार यद्यपि व्यष्टि शासक समष्टि शासक ईश्वरका ही प्रतीक होता है, इसीलिये उसमे तदनुसार आंशिक ही सही ईश्वरके गुणों एवं शक्तियोंका सन्निवेश अनिवार्यरूपसे होना चाहिये, तथापि मात्स्य न्यायसे पीड़ित जनताने शान्ति- सुव्यवस्थाके लिये राजाका वरण किया । इस तरह वह जनताके ऊपर बलात् लादा नहीं गया । इसीलिये उसके कार्योंमें विवेकका प्राधान्य होते हुए भी जन-सम्मति एवं जनसमर्थनकी उपेक्षा कभी न होनी चाहिये । अयोग्य अविवेकी शौर्यवीर्यविहीनके
प्रवेश करेगी । उसमें आदर्शराज्य सर्वव्यापक होगा । विवेक ही सत्ताधारीका स्थान ग्रहण करेगा । पूर्ण स्वतन्त्रता एवं समानता सर्वव्यापक होगी ।' कहा जाता है कि फिक्टेके इस विश्लेषणका प्रभाव हीगेल एवं मार्क्सपर पड़ा था । उसके मतानुसार भी 'उपयुक्त कार्य करनेमें मनुष्यकी स्वतन्त्रता ही स्वतन्त्रता है । इससे भिन्न स्वतन्त्रता आत्महत्याकी स्वतन्त्रता-जैसी है । स्वतन्त्रता आन्तरिक-बाह्य दो प्रकारकी होती है । आन्तरिक स्वतन्त्रताद्वारा व्यक्ति निजी प्रेरणाओंसे मुक्त होता है, अर्थात् स्वच्छ विवेकके अनुसार कार्य करता है। बाह्य स्वतन्त्रताका अर्थ है व्यक्तिके कार्योंमें किसी अन्य व्यक्तिका हस्तक्षेप न होना । फिक्टेके मतानुसार आन्तरिक स्वतन्त्रता ही सच्ची स्वतन्त्रता है, इससे मनुष्य तुच्छ प्रेरणाओंको पराजित कर विवेकके अनुसार जीवन-यापन करता है । व्यक्तिवादियोंके अनुसार ऐसी स्वतन्त्रता व्यक्तिस्वतन्त्रताद्वारा ही सम्भव हो सकती है ।' वह कहता है—'राज्यका कर्त्तव्य है कि शिक्षा आदि साधनोद्वारा नागरिकको आन्तरिक या नैतिक स्वतन्त्रता-प्राप्तिके योग्य बनाये ।' फिक्टेने राष्ट्रीय राज्य-सञ्चालनके लिये भाषाकी एकता, आर्थिक राष्ट्रियता एवं समाजपर सम्पूर्ण नियन्त्रण आवश्यक बतलाया । कहा जाता है कि फिक्टेकी इसी विचार- धारासे हिटलर एवं मुसोलिनीका जन्म हुआ । फिक्टेके मतसे राज्यद्वारा आर्थिक और सामाजिक व्यवस्थाका संचालन होना चाहिये। उसने समाजको किसान, शिल्पी एवं व्यापारी—इन तीन विभागोंमें बाँटा है। उसके आदर्श-राज्यमें वस्तुओंका मूल्य राज्यद्वारा निर्धारित होगा । वह बेरोजगारीका पूर्ण विरोधी था, पर साथ ही व्यक्तिगत सम्पत्तिका समर्थक । वह व्यक्तिको स्वतन्त्र छोड़ देनेका भी विरोधी था । फिक्टे पहले जनवादी था, परंतु धीरे-धीरे वह अधिनायकवादी और फिर शुद्ध राजतन्त्रवादका समर्थक हो गया । वह पैतृक शासनप्रथाको सर्वश्रेष्ठ कहता था । उसके मतमें राजतन्त्रपर न धारासभा और निर्वाचक-मण्डलका ही नियन्त्रण होना चाहिये । यद्यपि उसके गुरु काण्टके मतमे राज्यमे व्यवस्थापिका सभाका ही प्रमुख स्थान था । फिक्टेके अनुसार मानवप्रगति शूरवीरो एव विद्वानोंके कार्योसे हुई है । भविष्यके आदर्श राज्यमें भी इन्हींकी प्रधानता होगी । तभी शुद्ध विवेकके साथ नियम-निर्माण हो सकेगा । ऐसे नियमोसे ही नागरिककी नैतिक एव आन्तरिक स्वतन्त्रता सम्भव होगी । विश्वमें सत्यके आधिपत्यके लिये असभ्योंपर सभ्य लोगोंका शासन होना चाहिये । इस तरह विद्वान्, शिक्षक भी हो, शासक भी हो—यह फिक्टेका आदर्श है । कहा जाता है, हिटलरका नाजीदल इन्हीं भावनाओंके प्रभावसे बना था । फिक्टेका विचारतत्त्व बाह्य वस्तुओंसे प्रभावित नही होता; अर्थात् वेदान्तियोंके नित्यबोधस्वरूप ब्रह्मके समान निर्विकार है, अन्तःकरण-वृत्तिरूप
नहीं । उसीसे विश्वकी उत्पत्ति होती है।' यह मत भी वेदान्तियोंसे मिलता है। वस्तुतः विचार स्वयं मानस क्रियारूप होता है । उसका भासक अखण्ड भान ही तात्त्विक पदार्थ है । उसी अर्थमें फिक्टेका 'विचार' शब्द प्रवृत्त होता है । फिक्टेकी प्राकृतिक स्थितिमें स्वर्णयुग था, यह कल्पना कृतयुगकी स्थितिसे मिलती है । तदतिरिक्त प्राचीन एवं भविष्यके सम्बन्धमें फिक्टेकी ऐतिहासिक कल्पना उसकी भावनापर ही निर्भर है । अतीत कल्पना आर्ष इतिहासोंके विरुद्ध है । भविष्य कल्पना आधुनिक प्रत्यक्ष अनुभवोंके विरुद्ध है । उसकी आन्तरिक स्वतन्त्रता अवश्य महत्त्वपूर्ण वस्तु है । वस्तुतः इसके बिना बाह्य स्वतन्त्रता पशुओंकी स्वतन्त्रता-जैसी ही है। राष्ट्रियताकी भावना महत्त्वपूर्ण है, परंतु समष्टि अविरोध ही नहीं, अपितु समष्टिका अभ्युदय भी उसका लक्ष्य होना चाहिये । इसी त्रुटिसे हिटलरकी राष्ट्रियतामें अहंकार, अभिमान एवं परावमान, परावमर्दन बढ़ा और अन्तमें पतन हुआ । राजतन्त्र भी धर्मनियन्त्रित होकर कल्याणकारी होता है । फिर भी वास्तविकरूपसे धर्मनियन्त्रित न होनेपर उसे पदच्युत करने- की व्यवस्था तभी सम्भव हो सकेगी, जब धारासभा या निर्वाचकमण्डलका अस्तित्व होगा । हीगेल ( १७७०—१८३१ ) सर्वश्रेष्ठ आदर्शवादी माना जाता है । कहा जाता है, उसका पिता सरकारी कर्मचारी था । अतः वह पिताके पेशेसे प्रभावित होकर नौकरशाहीका समर्थक हुआ । हीगेल फ्रांसकी राज्यक्रान्तिसे भी प्रभावित था । कहते हैं कि हीगेलका दर्शन केवल एक ही व्यक्ति समझ सका था और उस व्यक्तिने भी उसे गलत रूपमें ही समझा । वह व्यक्ति था मार्क्स । हीगेलके मतानुसार विचार-तत्त्व ही वास्तविक जगत्का निर्माण करता है । विचार ही एक- मात्र सत्ताधारी है और जगत् सब उसीकी रचना है । यही वस्तुगत आदर्शवाद है । जहाँ मस्तिष्कका स्वतन्त्र अस्तित्व है, वहाँ मस्तिष्कमे चित्रण होनेमे वस्तु- स्वरूप निश्चित होता है । यही आत्मगत आदर्शवाद है । परंतु हीगेलके वस्तुगत आदर्शवादके अनुसार मस्तिष्क और वस्तु-जगत् दोनो ही सर्वव्यापक विचार-तत्त्व या विश्वात्मासे संचालित हैं । बोदाँ ( १५३०—१५९६ ) ने कहा था कि 'मनुष्यजातिका इतिहास प्रगतिका इतिहास है।' दो शती बाद हीगेलने इसी सिद्धान्तकी व्याख्या की और उसने बताया कि यदि कभी इसके विपरीत अवनति-सी दृष्टिगोचर होती है तो भी उसे अवनति नहीं मानना चाहिये; किंतु यह घटना प्रगतिकी पृष्ठ-भूमि है । हीगेलके अनुसार मानव-इतिहास केवल कुछ घटनाओंका वर्णन नहीं है, किंतु प्रगतिकी कहानी है । उसका कहना है कि 'संसारमें प्रत्येक वस्तुकी प्रतिवादी वस्तु अवश्य होती है । पहले वाद होता है तब उसका प्रतिवाद और दोनोंके संघर्षसे
१०८ मार्क्सवाद और रामराज्य जो तीसरी वस्तु उत्पन्न होती है उसे ही संवाद कहते हैं । संवादमें वाद प्रतिवाद- की विशेषताओंका समावेश होता है, स,थ ही वह दोनोंका अतिक्रमण भी करता है । इस तरह सवाद एक नयी परिस्थिति है । प्रगतिके दौरानमें कुछ दिनोंमें वह भी वाद बन जाता है, क्योंकि उसके भी कुछ विरोधी होते ही हैं । उनका सघटन होते ही वह प्रतिवाद बन जाना है । इस सघर्षके फलस्वरूप एक दूसरा सवाद उत्पन्न होता है । यह पहले सवादसे उच्चकोटिका होता है । तात्पर्य यह कि सर्वप्रथम संघटित शक्ति अपना कार्यक्रम रखती है । उसी कार्यक्रमके अनुसार वह विश्वका संचालन करती है । यह कार्यक्रम एक वाद है, परंतु प्रत्येक व्यक्तिके अनुकूल उसका कार्यक्रम नहीं हो सकता । अतः प्रतिकुलोंकी संख्या बढ़ती है, उनका संघटन होता है और उस संघटनद्वारा कार्यक्रमका विरोध करते हुए एक नवीन कार्यक्रम उपस्थित किया जाता है । इसीको प्रतिवाद कहा जाता है । कुछ समयतक इनमें सघर्ष चलता है तब इन दोनोंकी विशेषताओंका समन्वय कर कुछ नवीनका योग कर एक नया दल सघटित होता है । वह अपना नवीन कार्यक्रम उपस्थित करना है, इसे ही संवाद कहा जाता है । आगे इस सवादके भी प्रतिद्वन्द्वी तत्त्व प्रकट होने लगते हैं, तब यही सवाद वाद बन जाता है । इस तरह यह आवर्तन निरन्तर चलता रहता है । इस द्वन्द्वात्मक सघर्ष- द्वारा ही मानवकी प्रगति होती आयी है । यह क्रिया इतिहासमे व्यापक है ।' यह द्वन्द्ववाद यूनानमें हीगेलसे पहले भी प्रचलित था । परंतु उसके अनुसार प्रगति वृत्तात्मक थी । हीगेलके अनुसार 'वह चक्रव्यूहके तुल्य' है । समाज, राज्य, दर्शन आदिमें भी हीगेलने इसी तर्कका प्रयोग किया । यह हीगेलकी विशिष्ट देन समझी जाती है । मार्क्सने हीगेलके इसी द्वन्द्ववादको 'द्वन्द्वात्मक भौतिक वाद'का रूप दिया । इसी तर्कके आधारपर हीगेलने बताया कि राज्य मानवकी सामाजिक प्रगतिकी चरम सीमा है । पहले कुटुम्ब होता है, यही वाद है । उसकी विशेषता प्रेम तथा त्यागमें होती है । कुछ समय पश्चात् समाजका जन्म हुआ, यह प्रतिवाद हुआ । उसकी विशेषता कुटुम्बके विपरीत स्पर्धा थी । वाद और प्रतिवादमें सघर्ष होनेसे संवादरूपी राज्यका जन्म हुआ । इस संवादमें वाद- प्रतिवादका समन्वय हुआ । उसमें कुटुम्ब एव समाजकी विशेषताके साथ कुछ अन्य विशेषताओंका भी समावेश है । इसीलिये यह राज्य, कुटुम्ब एव समाज दोनोंसे ही ऊँची संस्था है । हीगेल इसे विश्वात्माके प्रतिविम्ब-तुल्य कहता है । अति प्राचीन कालमें स्वेच्छाचारी राज्यवाद था । इसके बाद जनतन्त्रका जन्म हुआ, यह प्रतिवाद हुआ । दोनोंके सघर्षके फलस्वरूप संवैधानिक राजतन्त्रका जन्म हुआ । यही सर्वोच्चतन्त्र है । इसके बाद प्रतिवादके गुण आ जाते हैं । हीगेल जर्मनीके तत्काल शासनको संवैधानिक राज्य मानता था । वह एक राष्ट्रिय
पाश्चात्य राजनीति १०९ राज्यभक्त था। इसीलिये कहा जाता है कि वह दार्शनिकोंका सम्राट् होत हुए सम्राटोँ- का भी दार्शनिक था। काण्ट एव फिक्टेने राज्यको अन्तर्राष्ट्रिय नैतिकताके अधीन माना और अन्तर्राष्ट्रिय शक्तिका समर्थन किया। परन्तु हीगेल राष्ट्रसे बडी कोई संस्था नही मानता। हीगेल युद्धका समर्थक और जनवाद-विरोधी था, परन्तु काण्ट शक्ति और जनवादका समर्थक। फिक्टेके कल्पित भविष्यके आदर्श राज्यको हीगेल- ने उच्च तर्कोंके द्वारा जर्मनीके राज्यको ही आदर्श बतलाया। उसका दार्शनिक विवेचन बहुत गम्भीर समझा जाता है। उसके दर्शनको कई लोग विशिष्टाद्वैतके समीप, कई लोग अद्वैतके समीप मानते हैं। 'मनुष्य-जातिका इतिहास प्रगतिका इतिहास है' इस कथनका अर्थ यदि डार्विनका उत्तरोत्तर विकास है, तब तो कहना पड़ेगा कि हीगेल वर्तमान अनाचार, पापाचार एव भ्रष्टाचारको ही प्रगति मानता है। कारण— न मे स्तेनो जनपदे न कदर्पो न मद्यपः। नानाहिताग्निर्नायज्वा न स्वैरी स्वैरिणी कुतः॥ (छान्दो० उप० ५ । १ । ५) नहि दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहि कोउ अबुध न लच्छन हीना॥ —की स्थिति जो रामराज्य एव कृतयुगकी स्थिति थी वह तो आज है ही नहीं। उस स्थितिकी अपेक्षा वर्तमान समय प्रगतिका है या पतनका, यह कोई भी विचार सकता है। रामराज्यके अनुसार 'चक्रनेमिक्रमेण' प्रगति-अवनति ससारका धर्म है। अतः फिर भी कृतयुग रामराज्य युग आ सकता है। वैज्ञानिक आविष्कारकी दृष्टिसे भी वर्तमान उन्नतिको 'अपूर्व' नहीं कहा जा सकता, क्योकि इससे अधिक आविष्कार पूर्व युगमें हो चुके हैं और उनपर प्रतिबन्ध लगानेकी आवश्यकताके अनुसार प्रतिबन्ध लगाया जा चुका था। राज्य और राजाका महत्त्व मनुने भी बहुत कहा है, परन्तु उसपर भी धर्मका नियन्त्रण उन्होंने आवश्यक समझा। अनियन्त्रित शोषक राजाओंकी वही गति होनी उचित है जो वेन, रावण आदिकी हुई। इसी तरह स्वतन्त्रताका अर्थ यद्यपि उच्छृङ्खलता नहीं, तथापि तानाशाही शासन यन्त्रका नगण्य पुर्जा बनकर व्यक्तिगत, लौकिक, पारलौकिक अभ्युदय साधनोंमें पराधीन हो जानेको भी स्वतन्त्रता नहीं कहा जा सकता। शासकोका व्यक्तिगत, धार्मिक एव सामाजिक स्वतन्त्र जीवनमें अल्पतम हस्तक्षेप होना हर दृष्टिसे व्यक्ति एव समाजके विकासका मूलमन्त्र है। सीमित व्यक्तिगत स्वतन्त्रता तथा लौकिक, पारलौकिक, आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक नियमोंका पालन राजा-प्रजा, शासक-शासित सभीके लिये अनिवार्यरूपसे अपेक्षित एवं लाभदायक होता है। हीगेलके मतानुसार एलेक्जेण्डर (सिकन्दर), नेपोलियन-जैसे शूरवीरों-
११० मार्क्सवाद और रामराज्य द्वारा ही मानवकी प्रगति होती है । फिक्टे राज्यको अन्तर्राष्ट्रीय नैतिकताके अधीन रहना उचित समझता था, परंतु हीगेल राज्यको स्वतन्त्र मानता था। रामराज्यकी दृष्टिमें व्यष्टि-समष्टिके समन्वयसे ही सुव्यवस्था हो सकती है। हीगेलके मतानुसार युद्ध 'न्यायसंगत' है। वह इससे देशप्रेम एवं नैतिकताकी वृद्धि मानता है। रामराज्य यद्यपि युद्धके द्वारा धन-जन एवं शक्ति क्षय होनेसे युद्धको हानिकारक ही समझता है तथापि साम, दान, भेद आदि अन्य नीति सफल न होनेपर सभ्यता, संस्कृति तथा न्यायकी रक्षाके लिये उपस्थित धर्मसंग्रामसे पराङ्मुख होनेको क्लैब्य एवं पाप मानता है और ऐसे समुपस्थित धर्मसंग्रामको स्वर्गका खुला द्वार समझकर स्वागत करता है । हीगेल राज्यकार्य-संचालन, शिक्षा, जनोपयोगी कार्य, स्वास्थ्य, निर्धनोंकी सहायता, व्यवसाय, व्यापार-संचालन आदि सभी कार्योंमे पुलिसका प्रयोग उचित समझता था । न्यायालय एवं पुलिसको राज्यकी उच्च एवं व्यापक संस्था मानता था । वह मान्टेस्क्यूके शक्ति- विभाजन सिद्धान्तका भी विरोधी था । हीगेलका सीमित राजतन्त्र ब्रिटेनके राजतन्त्रसे भिन्न था । ब्रिटेनमे संसद्द्वारा सीमित राजतन्त्र होता है; किंतु उसपर नौकरशाहीका कुछ नियन्त्रण होता है। राज्यके किसान, व्यापारी एवं सर्वव्यापकवर्ग—इन तीन वर्गोंमे सर्वव्यापकवर्ग ही समाजका नेता होता है। इसी वर्गसे योग्यतानुसार नियुक्ति होनी चाहिये । इसी वर्गद्वारा राजतन्त्रकी शक्ति सीमित होनी चाहिये । हीगेलके आदर्श व्यवस्थापक मण्डलमें दो सभाएँ होनी चाहिये । बडी सभा कुलीनोंकी प्रतिनिधि और छोटीमें समाजकी अन्य संस्थाओंके प्रतिनिधि होने चाहिये । हीगेलके आदर्श समाजमें सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक संघोंको भी स्थान है। एकसत्तावादी दर्शनोंमें राज्य और प्रजाके बीच इन संघोंका कोई स्थान नही । परंतु हीगेलके राज्यके नियन्त्रणमें ही इन संघोंका संचालन हो सकता है। रामराज्यवादीकी दृष्टिसे शास्त्रोक्त धर्मनियन्त्रण प्रत्येक संस्थापर आवश्यक है । इसी ढंगसे सब व्यवस्थाएँ निर्दिष्ट हो सकती हैं । अन्यथा व्यक्तियों एवं समाजको तानाशाहीका शिकार बनना पड़ता है। टी० एच० ग्रीन (१८३६-८२) ब्रिटेनका आदर्शवादी दार्शनिक था । उसने ग्रीक (यूनानी) दर्शन एवं आदर्शवादी दर्शनका अध्ययन किया और एक नया दर्शन (आक्सफोर्डदर्शन) निर्मित किया। वह आक्सफोर्ड विश्वविद्यालयमें दर्शनका प्रोफेसर था । वह अफलातून, अरस्तूकी तरह राजनीतिशास्त्रको आचारशास्त्र- का एक अङ्ग मानता था । रिची, ब्रेडले, बोसांके, लिण्डसे, बार्कर आदि ग्रीन परम्पराके अनुयायी हुए हैं। ग्रीन भी उनके समान ही मनुष्यके सामाजिक प्राणीराज्यको प्राकृतिक संस्था मानता था । उसके अनुसार 'आदर्श राज्यको नैतिक जीवनका सच्चा सहायक होना चाहिये।' काण्टके समान उसके दर्शनमें
उदारवाद और आदर्शवादका समन्वय मिलता है । वह क्रामवेलका, जिसने इंगलैंडमें कुछ कालके लिये गणतन्त्र स्थापित किया था, वंशज था । वह 'प्यूरिटन' और 'नानकन्फार्मिस्ट' ( आत्मसंयमी और स्वतन्त्र ) मनोवृत्ति- का था । इसीलिये वह 'स्वतन्त्रता' और 'नैतिकता' का प्रेमी था । उसके समयमे मिलकी 'स्वतन्त्रता' और 'अर्थशास्त्र' का पर्याप्त प्रभाव था । अतः वह व्यक्तिगत स्वतन्त्रताका पोषक था । ग्रीन राज्यको 'संघोंका संघ' मानता था । इन संघोंका जन्म राज्यके पूर्व हुआ था, राज्य इनका जन्मदाता नहीं । इनका समन्वय करना राज्यका कर्तव्य है । ग्रीन वास्तविक अधिकार राज्यकी देन मानता था । सामाजिक प्रगति तथा नैतिकताकी वृद्धिमें सहायक अधिकार ही वास्तविक अधिकार होते हैं । वह बाहुबलद्वारा राज्यका संचालन और मानवके अधिकारोंकी रक्षा मानता है । परंतु वह बाहुबलको राज्यके व्यक्तिगत अधिकारोंका जन्मदाता नहीं मानता । वह व्यक्तिगत अधिकारोंका स्रोत राज्य और राज्यका आधार जनस्वीकृति मानता है । ग्रीन स्वतन्त्रताका प्रेमी था, परंतु व्यक्तिवादियोंके समान वह स्वेच्छानुसार कार्य करनेको स्वतन्त्रता नहीं मानता था । वह सामाजिक, नैतिक दृष्टिकोणसे प्राप्तियोग्य वस्तु या सुखके लिये कार्य करनेको ही स्वतन्त्रता समझता था । नैतिकताकी वृद्धि सामाजिक भलाईके कार्यकी स्वतन्त्रता ही स्वतन्त्रता है । ग्रीन अनुबन्धवादको इतिहास एवं तर्कके दृष्टिकोणसे मिथ्या कहता है । 'जनस्वीकृति राज्यका आधार है, बाहुबल नहीं' ग्रीनका यह ऐतिहासिक वाक्य है । फिर भी यह लॉकके समान अनुबन्धवादी नहीं था । जनस्वीकृतिपर आधारित राज्य सामान्येच्छासे होना चाहिये । सामान्य भलाईकी सामान्य चेतना उसकी सामान्येच्छाका अर्थ है । जो राज्य ऐसा नहीं, उसका अन्त निश्चित है । ग्रीनकी सामान्येच्छा रूसोके समान जनतन्त्रीय नहीं, किंतु उसके मतानुसार राज्यतन्त्र भी सामान्येच्छाका प्रतिनिधित्व कर सकता है । व्यक्तिगत सम्पत्तिके सम्बन्धमें वह पूँजीपतिका अस्तित्व उचित मानता था; किंतु जमीनदारका नहीं । वह उत्पादनमें जमीनदारोंका हाथ नहीं मानता, अतः वह जमीनदारी प्रथाका विरोधी था । ग्रीनके अनुसार राज्य आदर्श संस्था अवश्य है, परंतु व्यक्तिराज्यका दास नहीं । समाज हितके लिये नागरिक राज्यका विरोध कर सकता है, परंतु बहुमत उसके पक्षमें होना चाहिये । इस तरह राज्यका विरोध किया जा सकता है । परंतु शर्तें कठिन हैं । वह युद्धविरोधी और विश्वसंघद्वारा संसारमें शान्ति स्थापनाका समर्थक था । उसके अनुसार समाजहितका राज्यहितसे अधिक महत्त्व है । राज्य समाजका प्रतिनिधि है, स्वामी नहीं । अतः राज्यको विश्वसमाजकी सामान्य नैतिक चेतनाके अनुसार संचालित होना चाहिये ! यह सामान्य चेतना
शान्तिका पोषक है। उसके मतानुसार 'आदर्श राज्यका ध्येय विश्वशान्ति और सामाजिक प्रगति है।' इस ध्येयकी पूर्तिमें असफल होनेपर राज्यका नागरिकोद्वारा विरोध न्याय-संगत है। ग्रीनके अनुसार 'सामाजिक हितका स्थान व्यक्तिगत इच्छाओं एवं स्वार्थोंसे ऊँचा है।' व्यक्तिवादियोंके नैसर्गिक अधिकारोंका वह विरोधी था। 'समाज हितद्वारा ही व्यक्तिहित हो सकता है।' काण्टके अनुसार ही ग्रीन भी राज्यके नियमोको रुकावटोंकी रुकावट मानता था। अर्थात् नैतिक जीवनकी रुकावटोंको रोकना राज्यके नियमोंका उद्देश्य है। अज्ञानता, दरिद्रताकी हालतमें सच्ची स्वतन्त्रता सम्भव नही। ग्रीनका कहना है कि 'राज्य प्रत्यक्ष तो नही, किन्तु परोक्षरूपसे ऐसी स्थिति उत्पन्न कर सकता है जिसके द्वारा व्यक्तिकी स्वतन्त्रता और नैतिकताकी वृद्धि हो सके। स्वतन्त्रता एव नैतिकताके प्रतिरोधक तत्त्वोको दूर करना राज्यका कर्तव्य है। अनिवार्य शिक्षा, मद्यविक्रयादि-निषेध ग्रीनकी दृष्टिमे अज्ञान एव प्रमादका निवारक होनेसे अत्यावश्यक है। उसके मतानुसार एक मद्यप स्वतन्त्र नहीं, परतन्त्र ही है, क्योकि इससे वह अपने विवेकका समुचित प्रयोग नहीं कर सकता। स्वच्छ स्वास्थ्यवर्धक गृहनिर्माणके लिये राज्य नागरिकोको बाध्य कर सकता है। श्रमिकोकी दयनीय दशाका सुधार भी राज्यका कर्त्तव्य है।' वर्तमान यान्त्रिक विकास एव उसके द्वारा होनेवाले आर्थिक असंतुलन तथा क्रयशक्तिका ह्रास और मालकी अधिक उपज तथा माल खपतके लिये बाजारोका अभाव आदि समस्याओका समाधान ग्रीनकी व्यवस्थासे सम्पन्न नहीं होता। अतः उसके लिये अतिरिक्त आयके वितरण और यान्त्रिक विकासके अवरोध आदिके लिये रामराज्यवादका आश्रयण अनिवार्य है। रामराज्यकी दृष्टिमें भी जनसम्मति अवश्य अपेक्षित है; क्योकि लोकरञ्जन राजाका मुख्य कार्य है। तथापि जन-स्वीकृतिके विषय सीमित ही है, निस्सीम नही। अनेकविध धर्म, दर्शन, शिल्प, कला आदि विषयोंमें जनसम्मतिकी अपेक्षा नहीं होती। यद्यपि परम्पराप्राप्त राज्य-प्राप्तिमें जन-स्वीकृति मूल नही। फिर भी जनरञ्जनकी दृष्टिसे अपने कार्योंमें जन-सम्मति या जन-स्वीकृति लेना आवश्यक है। इसी तरह जिस न्यायसे ग्रीन व्यक्तिगत पूँजीकी सत्ता मानता है, व्यक्तिगत भूमिकी सत्ता माननेमें भी वही न्याय क्यो न माना जाय? रामराज्यवादकी दृष्टिसे तो भूमि, सम्पत्ति, कल-कारखाना तथा उद्योग-धंधे आदि सभी विषयोमें 'सप्तवित्तागमा धर्म्या' के अनुसार, व्यक्तिगत वैध अधिकार मान्य हैं। शर्त यही है कि अन्याय, अत्याचार, शोषण आदिद्वारा उनकी प्राप्ति न की गयी हो; किन्तु पितृपितामहादि परम्पराके दायसे तथा गाढ़े पसीनेकी कमाई एवं मान- पुरस्कारादिसे प्राप्त की गयी हो। इसकी उपपत्ति पीछे की जा चुकी है। अन्य अंशोंमे ग्रीनका मन्तव्य रामराज्य-सम्मत ही है।
पाश्चात्त्य राजनीति ११३ एफ. एच. ब्रैडले (१८४६-१९२४) का कहना था कि 'मनुष्यका समाजसे बाहर कोई अस्तित्व ही नहीं। समाजद्वारा ही उसे भाषा एवं विचार मिलते हैं। मनुष्यका शरीर एक पैतृक सम्पत्ति है। परन्तु बिना समाजके यह सम्पत्ति प्रगति नहीं कर सकती। व्यक्तित्व-वृद्धिके लिये समाज अनिवार्य है।' उनके अनुसार 'व्यक्तिको समाजमें स्थान चुननेकी स्वाधीनता है। परन्तु चुननेके पश्चात् समाज- सम्बन्धी कर्त्तव्योंका पालन अत्यावश्यक है।' बोसाके (१८४८-१९२३) की प्रसिद्ध पुस्तक 'फिलॉसॉफिकल थ्योरी आफ दि स्टेट' (राज्यका दार्शनिक सिद्धान्त) है। उसके दर्शनमें रूसोकी सामान्येच्छाका विश्लेषण किया गया है। वह राज्यकी इच्छाको सामान्येच्छा मानता था। वह सामाजिक इच्छाके अनुसार कार्य करनेको ही स्वतन्त्रता मानता था। इसीलिये चोर स्वतन्त्र नहीं कहा जा सकता। व्यक्तिकी सामाजिक इच्छा सामान्येच्छासे अभिन्न है, वह राज्यमें निहित है, उसका कहना है कि 'एक चोरके चोरी करनेका कार्य स्वार्थमयी इच्छाका प्रतिबिम्ब है। यह कार्य उसके वास्तविक स्वतन्त्रताके अनुसार नहीं है। न्यायाधीशका चोरको दण्ड देनेका कार्य चोरकी सामाजिक या विवेकशील इच्छाका प्रतीक है। उसके अनुसार चोरकी वास्तविक स्वतन्त्रता चोरी करनेमें नहीं बल्कि दण्ड भोगनेमें है। सामान्येच्छा और सबकी इच्छामें यह भी विभिन्नता मानता है। रूसोकी सामान्येच्छा जनतन्त्रीय है। परन्तु इसके मतानुसार 'सामान्येच्छा राज्यमें ही निहित है, भले ही वह राज्य तानाशाही क्यों न हो। एक तानाशाहकी इच्छा भी इसके अनुसार सामान्येच्छा है।' रूसोके अनुसार राजसत्ता नागरिकोंमें निहित होती है। अतः उसके अनुसार नागरिकोंको स्वतन्त्र होनेके लिये बाध्य करना न्याय-सङ्गत है। परन्तु एक अधिनायककी इच्छाके अनुसार काम करनेके लिये नागरिकको बाध्य किया जा सकता है और इसीको स्वतन्त्र होनेके लिये बाध्य करना कहा जायगा। उसके अनुसार 'राजसत्ताधारी नागरिकोंकी सामाजिक इच्छाके प्रतिबिम्बभूत सामान्येच्छाके अनुसार नियम बनायें, भले ही नागरिक उनका विरोध करे। वह विरोध उनके अज्ञानका ही प्रतीक है। वे राज्यनिहित अपनी सामाजिक इच्छाको नहीं जानते। स्वार्थी तात्कालिक इच्छाके अधीन होकर नियमका विरोध करते हैं। उदाहरणार्थ एक व्यक्ति नदीमें तैरना चाहता है। दूसरा उसका हितैषी तैरनेसे रोकता है, क्योंकि उसमें घड़ियाल-मगर आदि हैं। जिनसे कि तैरनेवाला खतरेमें पड़ सकता है। तैरनेकी इच्छा स्वार्थी इच्छा है। रोकनेवालेका परामर्श सामाजिक एवं विवेकशील इच्छाके अनुसार है। इसी तरह व्यवस्थापक, सत्ताधारी, सामाजिक, विवेकशील इच्छाका प्रतिनिधि है। विरोधी नागरिक स्वार्थी इच्छाके अनुसार कार्य करता है।' बोसांकेके मतानुसार 'राज्य अनैतिक कार्य नहीं कर सकता।' हीगेलके समान ही बोसांके भी 'अन्ताराष्ट्रिय मा० शा० ८-