मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनहीं । उसीसे विश्वकी उत्पत्ति होती है।' यह मत भी वेदान्तियोंसे मिलता है। वस्तुतः विचार स्वयं मानस क्रियारूप होता है । उसका भासक अखण्ड भान ही तात्त्विक पदार्थ है । उसी अर्थमें फिक्टेका 'विचार' शब्द प्रवृत्त होता है । फिक्टेकी प्राकृतिक स्थितिमें स्वर्णयुग था, यह कल्पना कृतयुगकी स्थितिसे मिलती है । तदतिरिक्त प्राचीन एवं भविष्यके सम्बन्धमें फिक्टेकी ऐतिहासिक कल्पना उसकी भावनापर ही निर्भर है । अतीत कल्पना आर्ष इतिहासोंके विरुद्ध है । भविष्य कल्पना आधुनिक प्रत्यक्ष अनुभवोंके विरुद्ध है । उसकी आन्तरिक स्वतन्त्रता अवश्य महत्त्वपूर्ण वस्तु है । वस्तुतः इसके बिना बाह्य स्वतन्त्रता पशुओंकी स्वतन्त्रता-जैसी ही है। राष्ट्रियताकी भावना महत्त्वपूर्ण है, परंतु समष्टि अविरोध ही नहीं, अपितु समष्टिका अभ्युदय भी उसका लक्ष्य होना चाहिये । इसी त्रुटिसे हिटलरकी राष्ट्रियतामें अहंकार, अभिमान एवं परावमान, परावमर्दन बढ़ा और अन्तमें पतन हुआ । राजतन्त्र भी धर्मनियन्त्रित होकर कल्याणकारी होता है । फिर भी वास्तविकरूपसे धर्मनियन्त्रित न होनेपर उसे पदच्युत करने- की व्यवस्था तभी सम्भव हो सकेगी, जब धारासभा या निर्वाचकमण्डलका अस्तित्व होगा । हीगेल ( १७७०—१८३१ ) सर्वश्रेष्ठ आदर्शवादी माना जाता है । कहा जाता है, उसका पिता सरकारी कर्मचारी था । अतः वह पिताके पेशेसे प्रभावित होकर नौकरशाहीका समर्थक हुआ । हीगेल फ्रांसकी राज्यक्रान्तिसे भी प्रभावित था । कहते हैं कि हीगेलका दर्शन केवल एक ही व्यक्ति समझ सका था और उस व्यक्तिने भी उसे गलत रूपमें ही समझा । वह व्यक्ति था मार्क्स । हीगेलके मतानुसार विचार-तत्त्व ही वास्तविक जगत्का निर्माण करता है । विचार ही एक- मात्र सत्ताधारी है और जगत् सब उसीकी रचना है । यही वस्तुगत आदर्शवाद है । जहाँ मस्तिष्कका स्वतन्त्र अस्तित्व है, वहाँ मस्तिष्कमे चित्रण होनेमे वस्तु- स्वरूप निश्चित होता है । यही आत्मगत आदर्शवाद है । परंतु हीगेलके वस्तुगत आदर्शवादके अनुसार मस्तिष्क और वस्तु-जगत् दोनो ही सर्वव्यापक विचार-तत्त्व या विश्वात्मासे संचालित हैं । बोदाँ ( १५३०—१५९६ ) ने कहा था कि 'मनुष्यजातिका इतिहास प्रगतिका इतिहास है।' दो शती बाद हीगेलने इसी सिद्धान्तकी व्याख्या की और उसने बताया कि यदि कभी इसके विपरीत अवनति-सी दृष्टिगोचर होती है तो भी उसे अवनति नहीं मानना चाहिये; किंतु यह घटना प्रगतिकी पृष्ठ-भूमि है । हीगेलके अनुसार मानव-इतिहास केवल कुछ घटनाओंका वर्णन नहीं है, किंतु प्रगतिकी कहानी है । उसका कहना है कि 'संसारमें प्रत्येक वस्तुकी प्रतिवादी वस्तु अवश्य होती है । पहले वाद होता है तब उसका प्रतिवाद और दोनोंके संघर्षसे