भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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१०८ मार्क्सवाद और रामराज्य जो तीसरी वस्तु उत्पन्न होती है उसे ही संवाद कहते हैं । संवादमें वाद प्रतिवाद- की विशेषताओंका समावेश होता है, स,थ ही वह दोनोंका अतिक्रमण भी करता है । इस तरह सवाद एक नयी परिस्थिति है । प्रगतिके दौरानमें कुछ दिनोंमें वह भी वाद बन जाता है, क्योंकि उसके भी कुछ विरोधी होते ही हैं । उनका सघटन होते ही वह प्रतिवाद बन जाना है । इस सघर्षके फलस्वरूप एक दूसरा सवाद उत्पन्न होता है । यह पहले सवादसे उच्चकोटिका होता है । तात्पर्य यह कि सर्वप्रथम संघटित शक्ति अपना कार्यक्रम रखती है । उसी कार्यक्रमके अनुसार वह विश्वका संचालन करती है । यह कार्यक्रम एक वाद है, परंतु प्रत्येक व्यक्तिके अनुकूल उसका कार्यक्रम नहीं हो सकता । अतः प्रतिकुलोंकी संख्या बढ़ती है, उनका संघटन होता है और उस संघटनद्वारा कार्यक्रमका विरोध करते हुए एक नवीन कार्यक्रम उपस्थित किया जाता है । इसीको प्रतिवाद कहा जाता है । कुछ समयतक इनमें सघर्ष चलता है तब इन दोनोंकी विशेषताओंका समन्वय कर कुछ नवीनका योग कर एक नया दल सघटित होता है । वह अपना नवीन कार्यक्रम उपस्थित करना है, इसे ही संवाद कहा जाता है । आगे इस सवादके भी प्रतिद्वन्द्वी तत्त्व प्रकट होने लगते हैं, तब यही सवाद वाद बन जाता है । इस तरह यह आवर्तन निरन्तर चलता रहता है । इस द्वन्द्वात्मक सघर्ष- द्वारा ही मानवकी प्रगति होती आयी है । यह क्रिया इतिहासमे व्यापक है ।' यह द्वन्द्ववाद यूनानमें हीगेलसे पहले भी प्रचलित था । परंतु उसके अनुसार प्रगति वृत्तात्मक थी । हीगेलके अनुसार 'वह चक्रव्यूहके तुल्य' है । समाज, राज्य, दर्शन आदिमें भी हीगेलने इसी तर्कका प्रयोग किया । यह हीगेलकी विशिष्ट देन समझी जाती है । मार्क्सने हीगेलके इसी द्वन्द्ववादको 'द्वन्द्वात्मक भौतिक वाद'का रूप दिया । इसी तर्कके आधारपर हीगेलने बताया कि राज्य मानवकी सामाजिक प्रगतिकी चरम सीमा है । पहले कुटुम्ब होता है, यही वाद है । उसकी विशेषता प्रेम तथा त्यागमें होती है । कुछ समय पश्चात् समाजका जन्म हुआ, यह प्रतिवाद हुआ । उसकी विशेषता कुटुम्बके विपरीत स्पर्धा थी । वाद और प्रतिवादमें सघर्ष होनेसे संवादरूपी राज्यका जन्म हुआ । इस संवादमें वाद- प्रतिवादका समन्वय हुआ । उसमें कुटुम्ब एव समाजकी विशेषताके साथ कुछ अन्य विशेषताओंका भी समावेश है । इसीलिये यह राज्य, कुटुम्ब एव समाज दोनोंसे ही ऊँची संस्था है । हीगेल इसे विश्वात्माके प्रतिविम्ब-तुल्य कहता है । अति प्राचीन कालमें स्वेच्छाचारी राज्यवाद था । इसके बाद जनतन्त्रका जन्म हुआ, यह प्रतिवाद हुआ । दोनोंके सघर्षके फलस्वरूप संवैधानिक राजतन्त्रका जन्म हुआ । यही सर्वोच्चतन्त्र है । इसके बाद प्रतिवादके गुण आ जाते हैं । हीगेल जर्मनीके तत्काल शासनको संवैधानिक राज्य मानता था । वह एक राष्ट्रिय