मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाश्चात्य राजनीति १०९ राज्यभक्त था। इसीलिये कहा जाता है कि वह दार्शनिकोंका सम्राट् होत हुए सम्राटोँ- का भी दार्शनिक था। काण्ट एव फिक्टेने राज्यको अन्तर्राष्ट्रिय नैतिकताके अधीन माना और अन्तर्राष्ट्रिय शक्तिका समर्थन किया। परन्तु हीगेल राष्ट्रसे बडी कोई संस्था नही मानता। हीगेल युद्धका समर्थक और जनवाद-विरोधी था, परन्तु काण्ट शक्ति और जनवादका समर्थक। फिक्टेके कल्पित भविष्यके आदर्श राज्यको हीगेल- ने उच्च तर्कोंके द्वारा जर्मनीके राज्यको ही आदर्श बतलाया। उसका दार्शनिक विवेचन बहुत गम्भीर समझा जाता है। उसके दर्शनको कई लोग विशिष्टाद्वैतके समीप, कई लोग अद्वैतके समीप मानते हैं। 'मनुष्य-जातिका इतिहास प्रगतिका इतिहास है' इस कथनका अर्थ यदि डार्विनका उत्तरोत्तर विकास है, तब तो कहना पड़ेगा कि हीगेल वर्तमान अनाचार, पापाचार एव भ्रष्टाचारको ही प्रगति मानता है। कारण— न मे स्तेनो जनपदे न कदर्पो न मद्यपः। नानाहिताग्निर्नायज्वा न स्वैरी स्वैरिणी कुतः॥ (छान्दो० उप० ५ । १ । ५) नहि दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहि कोउ अबुध न लच्छन हीना॥ —की स्थिति जो रामराज्य एव कृतयुगकी स्थिति थी वह तो आज है ही नहीं। उस स्थितिकी अपेक्षा वर्तमान समय प्रगतिका है या पतनका, यह कोई भी विचार सकता है। रामराज्यके अनुसार 'चक्रनेमिक्रमेण' प्रगति-अवनति ससारका धर्म है। अतः फिर भी कृतयुग रामराज्य युग आ सकता है। वैज्ञानिक आविष्कारकी दृष्टिसे भी वर्तमान उन्नतिको 'अपूर्व' नहीं कहा जा सकता, क्योकि इससे अधिक आविष्कार पूर्व युगमें हो चुके हैं और उनपर प्रतिबन्ध लगानेकी आवश्यकताके अनुसार प्रतिबन्ध लगाया जा चुका था। राज्य और राजाका महत्त्व मनुने भी बहुत कहा है, परन्तु उसपर भी धर्मका नियन्त्रण उन्होंने आवश्यक समझा। अनियन्त्रित शोषक राजाओंकी वही गति होनी उचित है जो वेन, रावण आदिकी हुई। इसी तरह स्वतन्त्रताका अर्थ यद्यपि उच्छृङ्खलता नहीं, तथापि तानाशाही शासन यन्त्रका नगण्य पुर्जा बनकर व्यक्तिगत, लौकिक, पारलौकिक अभ्युदय साधनोंमें पराधीन हो जानेको भी स्वतन्त्रता नहीं कहा जा सकता। शासकोका व्यक्तिगत, धार्मिक एव सामाजिक स्वतन्त्र जीवनमें अल्पतम हस्तक्षेप होना हर दृष्टिसे व्यक्ति एव समाजके विकासका मूलमन्त्र है। सीमित व्यक्तिगत स्वतन्त्रता तथा लौकिक, पारलौकिक, आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक नियमोंका पालन राजा-प्रजा, शासक-शासित सभीके लिये अनिवार्यरूपसे अपेक्षित एवं लाभदायक होता है। हीगेलके मतानुसार एलेक्जेण्डर (सिकन्दर), नेपोलियन-जैसे शूरवीरों-