मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० मार्क्सवाद और रामराज्य द्वारा ही मानवकी प्रगति होती है । फिक्टे राज्यको अन्तर्राष्ट्रीय नैतिकताके अधीन रहना उचित समझता था, परंतु हीगेल राज्यको स्वतन्त्र मानता था। रामराज्यकी दृष्टिमें व्यष्टि-समष्टिके समन्वयसे ही सुव्यवस्था हो सकती है। हीगेलके मतानुसार युद्ध 'न्यायसंगत' है। वह इससे देशप्रेम एवं नैतिकताकी वृद्धि मानता है। रामराज्य यद्यपि युद्धके द्वारा धन-जन एवं शक्ति क्षय होनेसे युद्धको हानिकारक ही समझता है तथापि साम, दान, भेद आदि अन्य नीति सफल न होनेपर सभ्यता, संस्कृति तथा न्यायकी रक्षाके लिये उपस्थित धर्मसंग्रामसे पराङ्मुख होनेको क्लैब्य एवं पाप मानता है और ऐसे समुपस्थित धर्मसंग्रामको स्वर्गका खुला द्वार समझकर स्वागत करता है । हीगेल राज्यकार्य-संचालन, शिक्षा, जनोपयोगी कार्य, स्वास्थ्य, निर्धनोंकी सहायता, व्यवसाय, व्यापार-संचालन आदि सभी कार्योंमे पुलिसका प्रयोग उचित समझता था । न्यायालय एवं पुलिसको राज्यकी उच्च एवं व्यापक संस्था मानता था । वह मान्टेस्क्यूके शक्ति- विभाजन सिद्धान्तका भी विरोधी था । हीगेलका सीमित राजतन्त्र ब्रिटेनके राजतन्त्रसे भिन्न था । ब्रिटेनमे संसद्द्वारा सीमित राजतन्त्र होता है; किंतु उसपर नौकरशाहीका कुछ नियन्त्रण होता है। राज्यके किसान, व्यापारी एवं सर्वव्यापकवर्ग—इन तीन वर्गोंमे सर्वव्यापकवर्ग ही समाजका नेता होता है। इसी वर्गसे योग्यतानुसार नियुक्ति होनी चाहिये । इसी वर्गद्वारा राजतन्त्रकी शक्ति सीमित होनी चाहिये । हीगेलके आदर्श व्यवस्थापक मण्डलमें दो सभाएँ होनी चाहिये । बडी सभा कुलीनोंकी प्रतिनिधि और छोटीमें समाजकी अन्य संस्थाओंके प्रतिनिधि होने चाहिये । हीगेलके आदर्श समाजमें सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक संघोंको भी स्थान है। एकसत्तावादी दर्शनोंमें राज्य और प्रजाके बीच इन संघोंका कोई स्थान नही । परंतु हीगेलके राज्यके नियन्त्रणमें ही इन संघोंका संचालन हो सकता है। रामराज्यवादीकी दृष्टिसे शास्त्रोक्त धर्मनियन्त्रण प्रत्येक संस्थापर आवश्यक है । इसी ढंगसे सब व्यवस्थाएँ निर्दिष्ट हो सकती हैं । अन्यथा व्यक्तियों एवं समाजको तानाशाहीका शिकार बनना पड़ता है। टी० एच० ग्रीन (१८३६-८२) ब्रिटेनका आदर्शवादी दार्शनिक था । उसने ग्रीक (यूनानी) दर्शन एवं आदर्शवादी दर्शनका अध्ययन किया और एक नया दर्शन (आक्सफोर्डदर्शन) निर्मित किया। वह आक्सफोर्ड विश्वविद्यालयमें दर्शनका प्रोफेसर था । वह अफलातून, अरस्तूकी तरह राजनीतिशास्त्रको आचारशास्त्र- का एक अङ्ग मानता था । रिची, ब्रेडले, बोसांके, लिण्डसे, बार्कर आदि ग्रीन परम्पराके अनुयायी हुए हैं। ग्रीन भी उनके समान ही मनुष्यके सामाजिक प्राणीराज्यको प्राकृतिक संस्था मानता था । उसके अनुसार 'आदर्श राज्यको नैतिक जीवनका सच्चा सहायक होना चाहिये।' काण्टके समान उसके दर्शनमें